उत्तराखंड में यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड का मसौदा तैयार, इसमें क्या-क्या है- प्रेस रिव्यू

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उत्तराखंड सरकार की ओर से बनाई गई विशेषज्ञों की समिति ने समान नागरिक संहिता या यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) पर अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सौंप दी है.
इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार, पांच सदस्यों की इस समिति ने शुक्रवार को यह रिपोर्ट सौंपी, जिसमें बहुविवाह पर रोक लगाने और सभी धर्मों में शादी की न्यूनतम उम्र समान करने जैसे सुझाव दिए गए हैं. हालांकि, जनजातीय समुदायों को इससे बाहर रखा गया है.
उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज रंजना प्रकाश देसाई के नेतृत्व में पांच सदस्यों की समिति का गठन किया गया था.
राज्य विधानसभा का सत्र सोमवार को शुरू होगा और मंगलवार को वहां यूसीसी विधेयक पेश किया जा सकता है.
इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि रिपोर्ट में विशेषज्ञों के पैनल ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत शादी और तलाक़ के लिए हलाला, इद्दत और ट्रिपल तलाक़ को सज़ा योग्य अपराध बनाने की अनुशंसा की है.
यह भी कहा गया है कि इसमें इसमें सभी धर्मों में पुरुषों और महिलाओं की शादी की न्यूनतम क़ानूनी उम्र एक समान करने की भी सिफ़ारिश की गई है.
इसमें जनजातीय समुदायों को छूट देने की सिफ़ारिश की गई है, जो यूसीसी का विरोध करते आ रहे हैं.
उत्तराखंड की आबादी में 2.9 प्रतिशत जनजातीय आबादी है. इनमें जौनसारी, भोटिया, थारू, राजी और बुक्सा शामिल हैं.
गोद लेने के नियम भी सभी के लिए समान करते हुए इसके लिए जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के प्रावधानों का पालन ज़रूरी करने के लिए गया है. साथ ही लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण को भी ज़रूरी बनाने की सिफ़ारिश की गई है.

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इस रिपोर्ट के चार हिस्से हैं. पहले में समिति की रिपोर्ट है, दूसरे में संहिता का मसौदा अंग्रेज़ी में है, तीसरे में लोगों से की गई बातचीत की रिपोर्ट है और चौथे में संहिता का मसौदा हिंदी में दिया गया है.
अख़बार के मुताबिक़, सूत्रों का कहना है कि समिति ने और भी कई सुझाव दिए थे, जिनमें जनसंख्या नियंत्रण के लिए बच्चों की संख्या सीमित करना भी शामिल था. लेकिन समिति से कहा गया कि इस विषय पर केंद्र सरकार नीति बनाएगी, वही जनसंख्या नियंत्रण के लिए क़दम उठाएगी.
बढ़ती आबादी पर नियंत्रण का ज़िक्र केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अंतरिम बजट पेश करते हुए भी किया था.
उन्होंने कहा था कि एक हाई पावर समिति बनाई जाएगी जो तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या के कारण आ रही चुनौतियों से निपटने के लिए सुझाव देगी ताकि विकसित भारत का लक्ष्य हासिल किया जा सके.
इससे पहले बीते साल अक्टूबर में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दशहरा के मौक़े पर दिए भाषण में जनसंख्या नियंत्रण के लिए ऐसी नीति बनाने की ज़रूरत बनाई थी जो सभी के लिए लागू हो.
विपक्ष क्या कह रहा है?
अख़बार के अनुसार, सूत्रों का कहना है कि उत्तराखंड विधानसभा में इस विधेयक के पारित होने के बाद यह प्रदेश अन्य राज्यों के लिए एक मॉडल बन जाएगा. इसके बाद गुजरात और असम में भी यूसीसी विधेयक लाया जा सकता है.
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है, "राज्य में यूसीसी लागू करना किसी को निशाने पर लेने के लिए नहीं बल्कि 2022 विधानसभा चुनावों से पहले किए गए वादे को पूरा करने के लिए है."
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, उत्तराखंड कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि सरकार के लिए यूसीसी लागू करना आसान नहीं होगा.
उन्होंने कहा, "यूसीसी समवर्ती सूची का विषय है यानी केंद्र और राज्य सरकारें इस संबंध में क़ानून बना सकती हैं. लेकिन जब केंद्र सरकार क़ानून बनाती है तो यह सभी के लिए मान्य होता है और फिर राज्यों के बनाए गए क़ानून या निष्प्रभावी हो जाते हैं या फिर केंद्रीय कानून में मिल जाते हैं."
अख़बार के मुताबिक़, मुस्लिम सेवा संगठन के अध्यक्ष नईम क़ुरैशी ने कहा है कि उन्होंने यूसीसी का ड्राफ़्ट नहीं पढ़ा है लेकिन अगर इस प्रस्तावित क़ानून से उनके निजी और धार्मिक अधिकार प्रभावित होंगे तो इसका विरोध किया जाएगा.
मालदीव में भारतीय जवानों को लेकर क्या सहमति बनी

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मालदीव के साथ संबंधों में आए तनाव के बीच भारत ने कहा है कि वह हिंद महासागर के इस द्वीप समूह में तीन विमानों को चलाने के लिए 'व्यावहारिक समाधान' पर सहमत हो गया है और इन विमानों को उड़ाने या इनकी देखरेख करने वाले जवानों को इस साल मई तक वापस बुला लिया जाएगा.
हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक ख़बर के अनुसार, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है दोनों पक्षों ने जो समाधान निकाला है, उससे मालदीव के लोगों को मानवीय और स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं के लिए भारत के हवाई प्लेटफॉर्म की सुविधा मिलती रहेगी.
मालदीव के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि "दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए हैं कि तीन में से एक हवाई प्लेटफॉर्म में तैनात भारतीय सैनिक 10 मार्च 2024 तक और बाक़ी प्लेटफॉर्म में तैनात सैनिक 10 मई 2024 तक भारत लौट जाएंगे."
इससे पहले मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने कहा था कि भारतीय सैनिकों को 15 मार्च तक मालदीव छोड़ना होगा.
अख़बार के अनुसार, इस मामले की जानकारी रखने वालों का कहना है कि भारत 75 से ज़्यादा सैन्य जवानों को बदलने के विकल्पों पर विचार कर रहा है.
पहला विकल्प तो यह है कि सैनिकों की जगह सिविल ऑपरेटर रखे जाएं या ऐसे रिटायर्ड जवान तैनात किए जाएं, जिन्हें विमान उड़ाने और उनकी देखरेख करने का अनुभव हो.
40 सीटें भी नहीं जीतेगी कांग्रेस: ममता बनर्जी

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तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि उन्हें नहीं लगता कि आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 40 सीटें भी जीत पाएगी.
बनर्जी की यह टिप्पणी कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि "पश्चिम बंगाल में सीटों के बंटवारे पर टीएमसी से चर्चा चल रही है और मामले को सुलझा लिया जएगा."
द हिंदू की ख़बर के अनुसार, पश्चिम बंगाल के होकर गुज़रने वाली भारत जोड़ो न्याय यात्रा की आलोचना करते हुए बनर्जी ने कहा कि यह सिर्फ़ 'फ़ोटो खिंचवाने का मौक़ा' है. उन्होंने यह भी कहा कि 'प्रवासी पक्षी अल्पसंख्यकों के वोट बांटने आए हैं.'
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने कहा, "मैंने सुझाया था कि कांग्रेस 300 सीटों (देश भर में जहां बीजेपी से मुक़ाबला है) पर चुनाव लड़े लेकिन उन्होंने मानने से इनकार कर दिया. अब वे मुसलमान मतदाताओं के लिए राज्य में आए हैं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि अगर वे 300 सीटों पर लड़े तो 40 पर भी जीत हासिल कर पाएंगे."
केंद्र से 'राज्य के अधिकारों' की मांग के लिए कोलकाता में आयोजित धरने के दौरान ममता बनर्जी ने कहा कि उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन चाहती है लेकिन कांग्रेस ने ही उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया.
उन्होने कहा, "हम गठबंधन के लिए तैयार हैं और उन्हें दो सीटें देंगे. लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया. उसके बाद से हमारे बीच कोई बात नहीं हुई. अब उन्हें सभी 42 सीटों पर अकेले लड़ने दो. हम अकेले लड़ेंगे और बंगाल में बीजेपी को हराएंगे."
जजों को परीक्षा में बिठाना गरिमामय नहीं: चीफ़ जस्टिस

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हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज राज्यों के कंज़्यूमर फ़ोरम की अगुवाई के लिए लिखित परीक्षा और इंटरव्यू देने के लिए तैयार नहीं हैं.
द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के अनुसार, स्टेट कंज़्यूमर डिस्प्यूट्स रीड्रेसल कमिशन (एससीडीआरसी) के अध्यक्ष चुने जाने के लिए लिखित परीक्षा और इंटरव्यू में कम से कम 50 प्रतिशत अंक लेने की व्यवस्था को लेकर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार एक ही पाले में खड़े दिखे.
चीफ़ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने कहा, "रिटायर्ड जजों को परीक्षा में बिठाना गरिमामय नहीं है. ज़्यादातर क़ाबिल सेवानिवृत जज इसके ख़िलाफ़ हैं. उनकी क्षमता का आकलन उनके फैसलों के आधार पर किया जाना चाहिए."
उन्होंने कहा कि रिटायर्ड ज़िला जज भी इस प्रक्रिया के पक्ष में नहीं हैं.
अख़बार के अनुसार सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने चीफ़ जस्टिस से सहमति जताते हुए कहा कि सरकार ने चयन नियमों में संशोधन कर सेवानिवृत न्यायाधीशों के एससीडीआरसी अध्यक्ष बनने के लिए लिखित या मौखिक परीक्षा से गुज़रने की बाध्यता को ख़त्म कर दिया था. मगर मार्च 2023 में इस संशोधन को सुप्रीम कोर्ट ने ही खारिज कर दिया था और दो परीक्षाओं के आधार पर मूल्यांकन करने की व्यवस्था दी थी.
चीफ़ जस्टिस ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय से बात करके अदालत के उस फ़ैसले के प्रभाव का मूल्यांकन करने और सेवानिवृत जजों की परीक्षा की ज़रूरत की समीक्षा करने के बाद इस संबंध में राहत देने के लिए आवेदन किया जाए.
इस मामले में अगली सुनवाई 15 फ़रवरी को होगी.
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