अयोध्या के मामले में क्या मोदी सरकार ने धर्मनिरपेक्षता के मानदंडों का उल्लंघन किया?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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    • Author, उमंग पोद्दार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र है लेकिन कई बार धर्म और राज्य के बीच की लक़ीर काफ़ी धुंधली हो जाती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी को अयोध्या में बन रहे राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की. इस आयोजन में कई और नेता भी शामिल हुए.

उस दिन केंद्र सरकार के साथ-साथ कई राज्य सरकारों ने छुट्टी की घोषणा की थी. इसके बाद कई लोगों ने यह सवाल उठाया की क्या इसका मतलब यह हुआ कि भारतीय गणराज्य ने ख़ुद को एक धार्मिक आयोजन में शामिल कर लिया है.

यहाँ हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि संविधान के मुताबिक धर्मनिरपेक्षता क्या है और इसको लेकर अदालतों ने क्या कहा है.

भारत में धर्मनिरपेक्षता

कोलकाता में कांग्रेस सेवादल का प्रदर्शन

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इमेज कैप्शन, कोलकाता में कांग्रेस सेवादल का प्रदर्शन

संविधान की प्रस्तावना कहती है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. सेक्युलर शब्द को इंदिरा गांधी के शासनकाल में एक संविधान संशोधन के ज़रिए 1976 में जोड़ा गया था.

संविधान का अनुच्छेद-25 लोगों को कुछ पाबंदियों के साथ धर्म का पालन और उसका प्रसार करने की आज़ादी देता है. अनुच्छेद-29 और 30 अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देता है.

इसकी व्याख्या करते हुए वरिष्ठ वकील और संविधान मामलों के जानकार डॉक्टर राजीव धवन कहते हैं, ''भारत में धर्मनिरपेक्षता के दो पहलू हैं. पहला भाग कहता है कि आप धर्मों के बीच भेदभाव नहीं कर सकते हैं. वहीं दूसरा भाग कहता है कि आपको अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देनी होगी.''

संविधान धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान खोलने का अधिकार देता है. यह भी कहता है कि सहायता देते समय सरकार अल्पसंख्यक संस्थानों के साथ भेदभाव नहीं कर सकती है.

Rajeev Dhavan/FB
धर्मनिरपेक्षता (भारत) के दो पहलू हैं. पहला नकारात्मक भाग कहता है कि आप धर्मों में भेदभाव नहीं कर सकते हैं. दूसरा सकारात्मक भाग कहता है कि आपको अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देनी होगी.
डॉक्टर राजीव धवन
सुप्रीम कोेर्ट के वरिष्ठ वकील

डॉक्टर धवन कहते हैं, ''जब हम धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं तो भारत में इसका मतलब यह है कि सभी धर्मों को समान अहमियत दी जाए. हम धर्म और राज्य के बीच सख्त विभाजन के सिद्धांत का पालन नहीं करते हैं.''

कुछ देशों में इसका पालन किया जाता है. उदारहण के लिए फ्रांस बहुत सख्त विभाजन का पालन करता है, जहाँ सार्वजनिक जीवन में सभी धर्मों के प्रतीकों के प्रयोग पर सख़्त पाबंदी है.

संवैधानिक क़ानून के जानकार डॉक्टर जी मोहन गोपाल कहते हैं, ''भारत की धर्मनिरपेक्षता क्या है, इसका उत्तर एक किताब के बराबर हो सकता है. यहां तक कि संविधान सभा की बहसों में भी इसको लेकर बहुत कम स्पष्टता थी. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों में भी यह अस्पष्टता नजर आती है.''

वो कहते हैं, ''यहाँ तक कि सभी धर्मों से समान दूरी रखने का विचार, जिस पर अदालतों का मुख्य रूप से ज़ोर है, वह भी ब्राह्मणवादी ग्रंथों से लिया गया है.''

साल 1994 में सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले में जस्टिस जेएस वर्मा ने यजुर्वेद, अथर्ववेद और ऋगवेद से 'सर्व धर्म समभाव' के सिद्धांत को उद्धृत करते हुए कहा है कि धर्मनिरपेक्षता का मतलब सभी धर्मों के लिए सहिष्णुता है.

कई जानकारों का कहना है कि यह 'अजीब बात' है कि धर्मनिरपेक्षता को धार्मिक ग्रंथों के ज़रिए परिभाषित किया जा रहा है.

धर्मनिरपेक्षता पर सुप्रीम कोर्ट का रुख़

भारत की सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने धर्मनिरपेक्षता पर कई फ़ैसले किए हैं. हालांकि आलोचकों का कहना है कि इसकी कोई एक परिभाषा नहीं है.

नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिडिकल साइंस में क़ानून और धर्मनिरपेक्षता पढ़ाने वाले विजय किशोर तिवारी कहते हैं, ''धर्मनिरपेक्षता का भारतीय संस्करण पश्चिम की धर्मनिरेपक्षता की अवधारणा से अलग है. संवैधानिक रूप से यह धर्म और राज्य में विभाजन के सवाल पर अस्पष्ट है.''

''सुप्रीम कोर्ट ने भी धर्मनिरपेक्षता की कोई ऐसी परिभाषा नहीं दी है, जिसका पालन किया जाना चाहिए, यह अच्छा भी है क्योंकि यह उसके दायरे में नहीं आता है. भारत के संदर्भ में राज्य और धर्म को अलग करना न तो पूरी तरह से संभव है और न ही इसकी ज़रूरत है. ''

संघमित्रा पाधी रांपो कॉलेज ऑफ न्यू जर्सी में क़ानून और सामाजिक विज्ञान विषय की अस्सिटेंट प्रोफ़ेसर हैं. वो कहती हैं, ''इस मुद्दे पर कुछ मामलों में अदालत ने आक्रामक रुख़ अपनाते हुए कहा है कि धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान का ऐसा प्रावधान है, जिसमें संशोधन नहीं हो सकता है.''

''वहीं कुछ अन्य मामलों में धर्मनिरपेक्षता को लेकर सुप्रीम कोर्ट की मान्य परिभाषा बहुसंख्यकों के हितों के प्रति संवेदनशील और अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों पर चोट करती है. कुछ दूसरे मामलों में यह अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार देती है.''

संशोधन करके सेक्युलर शब्द जोड़े जाने से चार साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने 1972 में माना था कि धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान के बुनियादी संरचना का हिस्सा है. इसका मतलब यह हुआ कि किसी भी सरकार के पास इसे जनता से छीनने की ताक़त नहीं है.

यह बात अदालत ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान कही थी जब उसके सामने एक मामला आया था जिसमें संविधान में संशोधन के सरकार के अधिकार को चुनौती दी गई थी.

हालांकि 1974 में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने लिखा कि उन्हें इस बात पर संदेह है कि क्या 'धर्मनिरपेक्ष राज्य' शब्द को भारत पर लागू किया जा सकता है, क्योंकि भारत के पास विभाजन की सख़्त दीवार नहीं है. उन्होंने लिखा,'' संविधान में कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जो हमारे राज्य को धर्मनिरपेक्ष बनने से रोकते हैं.''

साल 1994 में धर्मनिरपेक्षता पर आए सबसे मज़बूत फ़ैसलों में से एक में सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों के पीठ ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद राजस्थान, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में भाजपा की सरकारों को बर्खास्त करने के फ़ैसले को सही ठहराया था.

इन राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाकर विधानसभाओं को निलंबित कर दिया गया था. अपने फ़ैसले में अदालत ने कहा कि इन राज्य सरकारों ने सांप्रदायिक संगठनों का समर्थन किया और मस्जिद गिराए जाने में मदद की. इन राज्यों के राज्यपालों ने कहा कि बहुमत होते हुए भी राज्य का संवैधानिक तंत्र फेल हो गया.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और धर्म के बीच सख्त विभाजन पर ज़ोर दिया था.

फ़ैसला देने वाले एक जज ने लिखा था कि धार्मिक आधार पर विकसित राजनीतिक दलों का कार्यक्रम या सिद्धांत, राजनीतिक शासन के एक हिस्से के रूप में धर्म को मान्यता देने के समान है, इसे संविधान में साफ़ तौर पर प्रतिबंधित किया गया है. अदालत ने यह भी कहा था कि क़ानून के अलावा कार्यपालिका के कामों में भी धर्मनिरपेक्षता होनी चाहिए.

भारत की अदालतों में धर्मनिरपेक्षता

छह दिसंबर 1992 को अयोध्या की बाबरी मस्जिद पर चढ़े कारसेवक

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हालांकि बाद में यह मामला कमज़ोर हो गया. अदालत ने 1995 में माना कि एक नेता का यह बयान कि 'महाराष्ट्र में पहला हिंदू राज्य स्थापित किया जाएगा' धार्मिक आधार पर वोट मांगना नहीं है.

साल 2002 में, एनसीईआरटी की ओर से तैयार पाठ्यक्रम को इस आधार पर चुनौती दी गई कि इसमें संस्कृत, वैदिक गणित आदि शामिल हैं. इस मामले में अदालत ने पाठ्यक्रम को बरकरार रखा. एक जज ने लिखा, "तटस्थता की नीति ने देश का कोई भला नहीं किया है."

इस पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आफ़ताब आलम ने 2009 में दिए एक व्याख्यान में कहा था कि इस फ़ैसले में इस बात की अनदेखी की गई कि पाठ्यक्रम में केवल एक ही धर्म की शिक्षाओं को शामिल किया गया है.

2004 में विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया को कर्नाटक के एक तनावग्रस्त ज़िले में घुसने से रोकते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, "किसी व्यक्ति को ऐसा काम करने की छूट नहीं दी जा सकती जिससे देश में सेक्युलरिज़्म तबाह हो."

इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "देश के हर नागरिक को, चाहे उसका धर्म कोई भी हो, उसे राज्य की तरफ़ से यह भरोसा होना चाहिए कि वह अपना धर्म मानने और उसका प्रचार-प्रसार करने के लिए स्वतंत्र और संरक्षित है."

लेकिन हाल के दिनों में अदालतों के धर्मनिरपेक्ष न होने के कई आरोप लगे हैं.

डॉक्टर गोपाल कहते हैं, "ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें अदालतों ने अपने फैसले के लिए धार्मिक ग्रंथों का सहारा लिया है." वो कहते हैं, "अयोध्या पर आए फ़ैसले का परिशिष्ट एक धार्मिक आदेश है."

अयोध्या पर आए फ़ैसले में एक अतिरिक्त परिशिष्ट है. इसमें हिंदुओं की इस आस्था पर ज़ोर दिया गया है कि भगवान राम का जन्म उसी स्थान पर हुआ था, जहाँ बाबरी मस्जिद थी.

डॉक्टर धवन को यहां तक लगता है कि धर्मनिरपेक्षता को बरकरार रखने के मामले में अदालतें कमज़ोर पड़ गई हैं. वो कहते हैं, ''ज्ञानवापी मामले में प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट को पूरी तरह से भुला दिया गया.''

डॉक्टर तिवारी कहते हैं, ''अदालतों ने भी बार-बार समान नागरिक संहिता की मांग की है, यह एक राजनीतिक पार्टी के एजेंडे की तरह है.''

क्या राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा धर्मनिरपेक्ष थी?

अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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डॉक्टर धवन के मुताबिक 22 जनवरी की गतिविधियां भारतीय धर्मनिरपेक्षता के विचार के ख़िलाफ़ थीं.

वो कहते हैं, ''आपको किसी धर्म का उस तरह से समर्थन और राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए, जैसे किया गया. यह भारत की धर्मनिरपेक्षता के लिए ठीक नहीं है, जो तटस्थता दिखाते हुए राज्य और धर्म के बीच दूरी पैदा करता है. साफ़ तौर पर सरकार ऐसा करते हुए नज़र नहीं आ रही है.''

वो पूछते हैं कि आप अन्य धर्मों को छोड़कर एक धर्म का पक्ष नहीं ले सकते हैं, क्या जब मस्जिद बनेगी, तब भी प्रधानमंत्री वहाँ जाएंगे?

डॉक्टर तिवारी कहते हैं, ''अल्पसंख्यकों के लिए हमारा संवैधानिक वादा बिना भेदभाव के धार्मिक स्वतंत्रता है. दुख की बात है कि ये अधिकार ख़तरे में हैं और वे सुरक्षित भी नहीं महसूस कर रहे हैं.''

सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डिवेलपिंग सोसाइटी के प्रोफेसर हिलाल अहमद के मुताबिक़ अयोध्या में हुए आयोजन को दो नज़रिए से देखा जा सकता है.

कोई यह कह सकता है कि यह एक सांस्कृतिक आयोजन था, इसलिए क़ानूनी नज़रिए से सरकार की सहभागिता स्वीकार्य है. वहीं भारतीय संदर्भ में किसी मस्जिद, किसी मंदिर या किसी राजनेता को चंदा देना या किसी मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए चंदा देना आम तौर पर स्वीकार्य होगा.

वो कहते हैं, ''हालांकि, इसे देखने का दूसरा तरीक़ा इसके पीछे की संवैधानिक नैतिकता को देखना होगा. राज्य से यह अपेक्षा की जाती है कि वह धार्मिक मामलों से सैद्धांतिक दूरी बनाए रखेगा. यहां दो सवाल हैं: यह धार्मिक आयोजन है या नहीं? क्या इसमें सभी धर्मों के लोगों को शामिल किया जाएगा या वे ख़ुद इससे दरकिनार कर दिया गया महसूस करेंगे?''

वो कहते हैं कि उस नजरिए से अयोध्या का आयोजन धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक नैतिकता के विचार के ख़िलाफ़ हो सकता है.

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