इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी की राम मंदिर पर यह प्रतिक्रिया

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इस्लामिक और मुस्लिम बहुल देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी ने अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की निंदा की है.
ओआईसी ने मंगलवार को एक बयान जारी कर कहा, "भारतीय शहर अयोध्या में जिस जगह पर पहले बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी, वहीं 'राम मंदिर' का निर्माण और इसकी प्राण प्रतिष्ठा गंभीर चिंता का विषय है."
22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में बने नए राम मंदिर का उद्घाटन किया था. इस कार्यक्रम में राजनीति और बॉलीवुड के जाने-माने चेहरों से लेकर बड़ी संख्या में आम लोग भी शामिल हुए थे.
इस कार्यक्रम के ठीक एक दिन बाद, 23 जनवरी को ओआईसी ने मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाए जाने की निंदा की.
अपने बयान में ओआईसी ने कहा, "ओआईसी देशों के विदेश मंत्रियों के काउंसिल की पिछली बैठकों में ज़ाहिर रुख़ के अनुसार, हम इन क़दमों की निंदा करता है, जिनका लक्ष्य बाबरी मस्जिद जैसे महत्वपूर्ण इस्लामिक स्थलों को मिटाना है. बाबरी मस्जिद उसी स्थान पर पाँच सदी तक खड़ी थी."
अब तक भारत की तरफ़ से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.
क्या है ओआईसी और इसमें भारत क्यों नहीं

मुस्लिम आबादी के लिहाज से भारत, इंडोनेशिया और पाकिस्तान के साथ शीर्ष तीन देशों में है. प्यू रिसर्च के अनुसार, मुसलमानों की आबादी 2060 में सबसे ज़्यादा भारत में होगी और दूसरे नंबर पर पाकिस्तान होगा.
ओआईसी इस्लामिक या मुस्लिम बहुल देशों का संगठन है. इसके कुल 57 देश सदस्य हैं. ओआईसी में सऊदी अरब का दबदबा है, लेकिन सऊदी अरब दुनिया के उन टॉप 10 देशों में भी शामिल नहीं है, जहाँ मुस्लिम आबादी सबसे ज़्यादा है. हालांकि इस्लाम के लिहाज से मक्का और मदीना के कारण सऊदी अरब काफ़ी अहम है.
भारत मुस्लिम आबादी के लिहाज से शीर्ष तीन देशों में होने के बावजूद ओआईसी का सदस्य नहीं है. 2006 में 24 जनवरी को सऊदी अरब के किंग अब्दुल्लाह बिन अब्दुल अज़ीज़ भारत के दौरे पर आए थे.
इस दौरे में उन्होंने कहा था कि भारत को ओआईसी में पर्यवेक्षक का दर्जा मिलना चाहिए. सऊदी के किंग ने कहा था कि यह अच्छा होगा कि भारत के लिए यह प्रस्ताव पाकिस्तान पेश करे.
हालांकि पाकिस्तान ने इस पर आपत्ति जताई थी और कहा था कि जो भी देश ओआईसी में पर्यवेक्षक का दर्जा चाहता है, उसे ओआईसी के किसी भी सदस्य देश के साथ किसी भी तरह के विवाद में संलिप्त नहीं होना चाहिए.

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यरुशलम की अल-अक़्सा मस्जिद पर मोरक्को की राजधानी रबात में 1969 में आयोजित इस्लामिक समिट कॉन्फ़्रेंस के बाद से ही ओआईसी और भारत रिश्तों में उलझन रही है. सऊदी अरब के किंग फ़ैसल ने इस कॉन्फ्रेंस में भारत को आमंत्रित किया था. उनका कहना था कि यहां मुस्लिम देशों का मामला नहीं है बल्कि सभी मुसलमानों का मामला है. तब भारत के राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन थे.
तब भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने समिट को संबोधित भी किया था. लेकिन पाकिस्तान को यह ठीक नहीं लगा था और उसने समिट के बाक़ी सत्रों से भारत को बाहर करवा दिया था. पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल याह्या ख़ान ने भारत का बहिष्कार किया था.
उसके बाद से ओआईसी और भारत के रिश्तों में बहुत मधुरता नहीं रही है. कश्मीर मुद्दे पर ओआईसी पाकिस्तान की लाइन के क़रीब बयान देता है और यह भारत के लिए कभी स्वीकार्य नहीं रहा है.
ओआईसी कहता है कि संयुक्त राष्ट्र के 1948 और 1949 के प्रस्ताव के हिसाब से कश्मीरियों को आत्मनिर्णय का अधिकार मिलना चाहिए.
ओआईसी चार्टर के अनुसार, इस संगठन के लक्ष्यों को बढ़ावा देने के इच्छुक मुस्लिम देश ही सदस्यता के योग्य हैं. लेकिन ग़ैर-मुस्लिम देशों को ओआईसी में पर्यवेक्षक का दर्जा मिला है और कुछ को पूरी सदस्यता भी है. 2005 में रूस ऑब्ज़र्वर के तौर पर शामिल हुआ. 1998 में थाईलैंड को भी पर्यवेक्षक का दर्जा मिला, जबकि वह बौद्ध बहुल देश है.
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पहले भी आए ओआईसी बयान
ये पहली बार नहीं है, जब ओआईसी ने भारत से जुड़े किसी मामले को लेकर बयान जारी किया है, ये संगठन पहले भी अलग-अलग मुद्दों पर ऐसा करता रहा है.
जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की भी ओआईसी ने निंदा की थी और इसे भारत सरकार का एकतरफ़ा फ़ैसला बताया था.
ओआईसी ने इसे लेकर जारी बयान में कहा था, "ये इस विवादित क्षेत्र की जनसांख्यिकीय संरचना को बदलने के उद्देश्य से किया गया है."
ओआईसी ने कश्मीरी नेता यासिन मलिक को दी गई उम्र क़ैद की सज़ा को लेकर चिंता जताई थी.
बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नुपूर शर्मा मामले में भी ओआईसी ने कड़ी आपत्ति जताई थी और कहा था कि भारत में इस्लाम के प्रति बढ़ रही नफ़रत और इस्लाम को बदनाम करने की मुसलमानों के ख़िलाफ़ सुनियोजित कोशिशों का हिस्सा हैं."

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ओआईसी के बयानों पर भारत की प्रतिक्रिया
हालांकि ओआईसी की तरफ़ से जारी बयानों को भारत ने हमेशा ख़ारिज ही किया है.
जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने पर आई ओआईसी की प्रतिक्रिया पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने 'ग़लत इरादे से दिया बयान' कहा था.
मंत्रालय ने पाकिस्तान की तरफ़ इशारा करते हुए कहा था कि, "ओआईसी ऐसी टिप्पणी मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले और सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले के इशारे पर करता है. ऐसे बयान ओआईसी की विश्वसनीयता को कमज़ोर करते हैं."

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राम मंदिर को लेकर पाकिस्तान में भी हो रही चर्चा
पाकिस्तान से छपने वाले अख़बार डॉन में पाकिस्तान के जाने-माने लेखक परवेज़ हुदभोय ने "राम मंदिर - एक अनहोनी" शीर्षक से लेख लिखा है.
इसमें उन्होंने कहा कि 22 जनवरी के कार्यक्रम और उनमें भारतीय पीएम की भूमिका धार्मिक आधार के उद्देश्य से थी, लेकिन कुछ वरिष्ठ पुजारियों ने इसका विरोध किया है.
परवेज़ हुदाभोय ने लिखा है, "मोदी एक बार फिर से संकेत देना चाहते हैं कि उनके शासन में एक नए भारत का आगाज़ हुआ है, ऐसा भारत जो 1947 में जन्मे भारत से पूरी तरह अलग है."
उन्होंने लिखा, "हिंदुत्व का संदेश दो लोगों के लिए है. पहला भारतीय मुसलमानों के लिए- वो ये कि नया भारत हिंदुओं के लिए है, उनके लिए नहीं. ठीक वैसे, जैसे पाकिस्तान अपने यहां के हिंदुओं को दोयम दर्जे का नागरिक समझता है और उन्हें कम हक़ देता है, वैसे ही भारत के मुसलमानों को ये नहीं भूलना चाहिए कि वो उन हमलावरों की संतानें हैं, जिन्होंने देश की प्राचीन धरती को अपवित्र किया और देश को लूटा."
परवेज़ हुदभोय ने लिखा है, "मार्च 2023 में 'जय श्री राम' का नारा लगे रही एक भीड़ ने क़रीब सौ साल पुराने एक मदरसे को आग के हवाले कर दिया, जिसमें एक लाइब्रेरी भी थी. इस लाइब्रेरी में प्राचीन पांडुलिपियां रखी हुई थीं."
"ये 12वीं सदी में मुसलमान आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी के नालंदा युनिवर्सिटी को ध्वस्त करने का बदला था."
वो लिखते हैं कि इस कार्यक्रम के ज़रिए दूसरा संदेश दिया जा रहा है, वो है विपक्ष यानी कांग्रेस. वो लिखते हैं, "उनका कहना है कि विपक्ष अपना संदेश बदले और धर्मनिरपेक्ष से धार्मिक करे और हमारी बिछाई बिसात पर खेले. या फिर उन्हें हिंदू विरोधी की तरह देखा जाएगा और अप्रैल 2024 में होने वाले आम चुनावों में जब मोदी तीसरी बार सत्ता आने की कोशिश करेंगे, विपक्ष हार जाएगा."
"राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में कांग्रेस को परेशानी में डाल दिया है. कुछ दिन पहले विपक्ष के आला नेताओं ने इसे 'राजनीतिक कार्यक्रम' कहते हुए इसकी निंदा की और इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया. लेकिन पार्टी के छोटे रैंकों में जो नेता है वो अयोध्या गए, उन्होंने सरयू नदी में स्नान किया 'राम राज्य' की कसम दोहराई, हालांकि उनका 'राम राज्य', बीजेपी के 'राम राज्य' से थोड़ा अलग है."
परवेज़ हुदाभोय लिखते हैं, "जो लोग पाकिस्तान के इतिहास को जानते हैं, उन्होंने धर्म और राजनीति का मिश्रण चकित नहीं करेगा- चाहे वो हिंदू की नज़र से हो या मुसलमान की नज़र से. 1937 के चुनावों में बुरी तरह हारने के बाद ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के नेतृत्व ने धर्म को औजार बना कर उसे राजनीति में पिरोया. बाद में 1980 के दशक में जनरल ज़िया उल-हक़ ने देश को इसका डबल डोज़ दिया."

वहीं भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने टीवी पर आने वाले 'डिसाइफ़र' कार्यक्रम में कहा भारत में भी ऐसे लोग मौजूद हैं जो देश के सेक्युलर संविधान को लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं.
उन्होंने कहा, "विपक्षी कांग्रेस को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने के लिए निमंत्रण दिया गया था लेकिन उन्होंने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया. भारत में ऐसे अच्छे लोग मौजूद हैं जो सेक्युलर संविधान को आगे लेकर जाना चाहते हैं. लेकिन जब से बीजेपी आई है, तब से भारत में हालात ख़राब हुए हैं, ख़ासकर अल्पसंख्यकों के लिए."
"वहाँ की मीडिया और सोशल मीडिया को देखें तो ऐसा दिखाया जाता है कि बड़ा अमन-चैन है, कोई मुद्दे नहीं हैं. लेकिन ऐसा है नहीं."
इससे पहले पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा को लेकर एक बयान जारी किया था.
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा था, "1992 में मस्जिद गिराए जाने के बाद से बीते 31 सालों के घटनाक्रम आज प्राण प्रतिष्ठा तक पहुँचे हैं. ये भारत में बढ़ते बहुसंख्यकवाद की ओर इशारा करते हैं. ये भारतीय मुसलमानों को राजनीतिक और सामाजिक तौर पर हाशिए पर डालने की कोशिशों को दिखाते हैं."
"ढहाई गई मस्जिद के स्थान पर बना राम मंदिर भारत के लोकतंत्र पर लंबे समय तक धब्बे की तरह रहेगा. ध्यान देने वाली बात ये है कि वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की शाही ईदगाह सहित ऐसे मस्जिद की सूची बढ़ती जा रही है जिनपर ऐसे ही ढहाए जाने का ख़तरा बना हुआ है."

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पीएम मोदी ने क्या कहा था?
इससे पहले 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा के दिन प्रधानमंत्री ने कहा, "आज हमें सदियों के उस धैर्य की धरोहर मिली है. आज हमें श्रीराम का मंदिर मिला है. ग़ुलामी की मानसिकता को तोड़कर उठ खड़ा हुआ राष्ट्र ऐसे ही नव इतिहास का सृजन करता है."
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में राम मंदिर पर अदालत के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया और कहा "संविधान के अस्तित्व में आने के बाद भी दशकों तकराम के अस्तित्व को लेकर क़ानूनी लड़ाई चली. भारत के न्यायपालिका ने न्याय की लाज रख ली. न्याय का पर्याय राम का मंदिर भी न्याय बद्ध तरीके से ही बना."
अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को लेकर लंबे समय तक अदालत में मुकदमा चला. 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फ़ैसले में कहा कि विवादित ज़मीन को एक ट्रस्ट को सौंप दिया जाए, जो वहाँ पर एक मंदिर का निर्माण कराए.
इसके साथ ही कोर्ट के आदेश पर उत्तर प्रदेश सेंट्रल सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को पाँच एकड़ की ज़मीन आवंटित की गई. अयोध्या से क़रीब 22 किलोमीटर दूर इस ज़मीन पर मस्जिद बनना है.
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