पीएम मोदी का प्राण प्रतिष्ठा समारोह का भाषण क्या राजनीतिक संदेश है?

नरेंद्र मोदी

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    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार ( 22 जनवरी 2024) को अयोध्या में भगवान राम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में आए लोगों के सामने दिए अपने भाषण में कहा कि 'हमारे राम आ गए हैं. रामलला अब टेंट में नहीं बल्कि दिव्य मंदिर में रहेंगे.'

प्रधानमंत्री ने कहा, ''आज हमें सदियों के उस धैर्य की धरोहर मिली है. आज हमें श्रीराम का मंदिर मिला है. गुलामी की मानसिकता को तोड़कर उठ खड़ा हुआ राष्ट्र ऐसे ही नव इतिहास का सृजन करता है.''

प्रधानमंत्री ने राम मंदिर को लेकर अदालत के फैसले का भी ज़िक्र किया और कहा कि न्याय के पर्याय प्रभु राम का मंदिर भी न्यायबद्ध तरीके से ही बना.

राम मंदिर से जुड़े विवाद की ओर संकेत करते हुए पीएम मोदी ने कहा, ''कुछ लोग कहते थे कि राम मंदिर बना तो आग लग जाएगी. ऐसे लोग भारत की सामाजिक विवेक को नहीं जान पाए."

उन्होंने कहा, ''राम आग नहीं है, राम ऊर्जा है. राम विवाद नहीं, राम समाधान हैं.''

''राम सिर्फ़ हमारे नहीं हैं, राम तो सबके हैं. राम सिर्फ़ वर्तमान नहीं, राम अनंतकाल हैं. ये भारत का समय है और भारत अब आगे बढ़ने वाला है. शताब्दियों के इंतज़ार के बाद ये पल आया है. अब हम रुकेंगे नहीं.''

अयोध्या में भगवान राम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम पर दुनिया भर की निगाहें थीं.

भारत समेत दुनिया भर के मीडिया में इस प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का विश्लेषण किया जा रहा है.

कहा जा रहा है कि इस कार्यक्रम के ज़रिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2024 के लोकसभा चुनाव का बिगुल फूंक दिया है.

इसके ज़रिये वो रिकॉर्ड तीसरी बार सत्ता में आने की कोशिश करेंगे.

'हिंदुओं के रक्षक' का राजनीतिक संदेश?

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राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रधानमंत्री के भाषण में राम को आने की बात कहकर एक बड़ी ''पॉलिटिकल मैसेजिंग'' की गई है.

प्रधानमंत्री के भाषण के मायने समझाते हुए वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता सवाल करते हैं, ''क्या राम इससे पहले दुनिया में नहीं थे. पीएम ये बताना चाह रहे हैं राम को बीजेपी और आरएसएस लेकर आए हैं. ये एक राजनीतिक संदेश है जो आने वाले चुनाव को देखकर दिया गया है. पिछले चुनाव में भी बीजेपी का ये नारा था कि जो राम को लेकर आएंगे हम उनको लेकर आएंगे.''

शरद गुप्ता कहते हैं कि "इस कार्यक्रम से पहले जिस तरह से देशभर में झंडे बांटे गए और भजन-कीर्तन हुआ. इससे ये मैसेज देने की कोशिश की गई कि सिर्फ बीजेपी ही हिंदुओं की एक मात्र रक्षक है वरना तो यहां मस्जिद होती. और लोग गुलामी की ज़िंदगी जीते. गुलामी मुगलों की यानी मुसलमानों की.’’

वो कहते हैं, ''प्रधानमंत्री ने ये बताने की कोशिश की है कि बीजेपी ही हिंदुओं की रक्षक है. कांग्रेस जिस तरह ‘तुष्टिकरण’ की नीति चलाती रही है उससे देश में अस्सी फीसदी होते हुए भी हिंदू दोयम दर्जे के नागरिक बने रहते.’’

शरद गुप्ता

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शरद गुप्ता कहते हैं कि वो लोगों में हिंदू गर्व भरने में कामयाब रहे हैं और हिंदुओं की एक बड़ी आबादी इस भावना में बहने भी लगी है.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक विजय त्रिवेदी भी मानते हैं कि पीएम का भाषण राजनीतिक था. वो कहते हैं कि 'प्रधानमंत्री राजनीतिक पार्टी के नेता हैं और उनके भाषण में राजनीतिक संदेश तो होगा ही. फिर भी अयोध्या में दिया गया भाषण कम राजनीतिक है. विपक्षी पार्टियां डरी हुई हैं इसलिए इसे राजनीतिक भाषण बता रही हैं और इसे 2024 के चुनाव से जोड़ रही हैं.'

वो कहते हैं, ''इस आयोजन के ज़रिये मोदी पर हिंदुओं का रक्षक बन कर आगे आने की बात गलत है. प्रधानमंत्री ने राम को राष्ट्र से जोड़ने की बात की है. वैसे भी पूरा हिन्दुस्तान राम को राष्ट्र नायक मानता है.''

''अपने भाषण को वो अयोध्या में राम मंदिर बनाने या राम जन्म भूमि आंदोलन से आगे ले गए हैं, जहां वो कहते हैं भारत के उत्कर्ष, उदय और विकास की बात करते हैं. वो राम को भारत की आस्था, आधार और विधान बताते हैं.''

'मास्टर ऑफ सेरेमनी'

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विश्लेषकों का कहना है कि नरेंद्र मोदी ने खुद को इसलिए इस समारोह के केंद्र में रखा कि इससे वो एक साथ दो मकसद साधना चाहते थे. वो इसके ज़रिये राजनीतिक संदेश भी देना चाहते थे और इतिहास में अमर भी होना चाहते थे. चूंकि 2024 का चुनाव भी उन्हें ही केंद्र में रख कर लड़ा जा रहा है इसलिए बीजेपी सरकार की नहीं मोदी की गारंटी की बात की जा रही है. इसी रणनीति को उन्होंने आगे बढ़ाते हुए खुद को समारोह के केंद्र में रखा है.

शरद गुप्ता कहते हैं, ''हिंदू वोटरों की लामबंदी के लिए पीएम ने ये दिखाया कि उनसे बड़ा हिंदू कोई नहीं. उन्हें तीन दिन व्रत करने के लिए कहा गया लेकिन उन्होंने कहा कि 11 दिन करेंगे. अयोध्या में सारा पूजा-पाठ कर्मकांड वही करते रहे. बाकी लोग मूकदर्शक बने रहे. भले ही कहा गया कि मुख्य यजमान अनिल मिश्रा होंगे लेकिन सारा फोकस उन पर था. बाकी सब गौण था.''

हालांकि विजय त्रिवेदी इससे इत्तेफाक़ नहीं रखते. उनका कहना है कि मंदिर समारोह 2024 चुनाव में केक में आइसिंग की तरह होगा. बीजेपी मोदी की गारंटी और मंदिर के उद्घाटन को मिलाकर चुनाव लड़ेगी.

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वो कहते हैं, ''सिर्फ राम मंदिर के भरोसे बीजेपी चुनाव नहीं जीत सकती. सारे राम भक्त बीजेपी के समर्थक नहीं हैं. अगर सारे हिंदू राम के नाम पर बीजेपी को वोट देते तो इसे कम से कम अस्सी फीसदी नहीं तो साठ फीसदी वोट मिलते ही.''

वो कहते हैं, ''राम के भक्त को भारतीय जनता पार्टी का वोटर मानना ठीक नहीं होगा. ये भी नहीं कि भारतीय जनता पार्टी को इसका कोई लाभ नहीं होगा. ज़ाहिर है फायदा होगा क्योंकि बीजेपी ने 30 साल तक इसके लिए लड़ाई लड़ी है. तमाम हार-जीत, कानूनी लड़ाई, संसद की राजनीति, वोट की राजनीति वगैरह के बाद भव्य मंदिर बना है. बीजेपी इसका फायदा क्यों न उठाए.''

विजय त्रिवेदी कहते हैं, ''क्या विपक्ष के पास इन दोनों मुद्दों की कोई तैयारी है. चाहे वो राम मंदिर हो, हिंदुत्व का मसला हो या मोदी की गारंटी जैसे नारे की तुलना की टक्कर देने वाला कोई मुद्दा लाने की बात. ये बड़ा सवाल है.''

पीएम मोदी ने क्यों कहा, 'विवाद नहीं समाधान हैं'

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प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के बाद प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा, ''राम आग नहीं है, राम ऊर्जा है. राम विवाद नहीं, राम समाधान हैं.''

प्रधानमंत्री के भाषण की इस लाइन की अलग-अलग व्याख्या की जा रही है.

विजय त्रिवेदी कहते हैं, ''प्रधानमंत्री ने विजय से विनय तक की बात की. विजय के उन्माद में अमर्यादित होने की आशंका रहती है. लिहाज़ा प्रधानमंत्री ने कहा कि इसे राम मंदिर को विजय की तरह देखें लेकिन विनय का साथ न छोड़ें. मर्यादा न छोड़ें. विजय की तरह दिखें तो भी विनय के साथ रहें. अमर्यादित न हों."

हालांकि नरेंद्र मोदी और राम जन्मभूमि विवाद पर किताब लिख चुके वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं,'' प्रधानमंत्री ने कहा है कि राम आग नहीं हैं, ऊर्जा हैं. ये वाक्य उन्होंने अयोध्या में रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद की पृष्ठभूमि को ध्यान में रख कर कहा है. क्योंकि इस विवाद के दौरान भारी दंगे, आगजनी और हत्याएं हो चुकी हैं. क्या ऐसा कहके उन्होंने लोगों को हिंसा न करने का मैसेज दिया है.''

उन्होंने कहा, ''अभी इस मैसेज के मायने समझने के लिए इंतज़ार करना होगा. क्या प्रधानमंत्री के इस मैसेज से वाराणसी या मथुरा और दूसरी जगहों के उन धार्मिक स्थलों पर बीजेपी और संघ का वो पुराना रुख बदल जाएगा जो अब तक चलता आया है. अभी एक बीजेपी नेता का बयान आया था कि काशी में बारह, सोलह या बाईस मस्जिदों को ध्वस्त कर दिया जाएगा. उनमें मंदिर बनाए जाएंगे."

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वो कहते हैं, ''क्या बीजेपी उनको बोलेगी आप चुप हो जाइए. क्या ये पल 'संघर्ष का खात्मा है.' या एक नए धर्मतंत्र की शुरुआत है. ये देखना होगा. बीजेपी जब चुनाव में उतरेगी तब देखना होगा कि वो क्या नारे लगाती है. चुनाव भाषणों में उसके नेता क्या कहते हैं. वो कैसा व्यवहार करते हैं. वो किस तरह की राजनीति करते हैं. जो नतीजे आएंगे उस पर बहुत कुछ निर्भर होगा कि भारत का चरित्र आगे क्या होगा. ''

वो कहते हैं, ''अगर बीजेपी को 303 सीटों से ज्यादा आ गई तो इसकी व्याख्या कर वो एक तरह की पॉलिसी अपनाएगी. शायद वो और आक्रामक पॉलिसी लेकर आ सकती है. जैसे 2019 में बहुमत में आने के साथ ही उन्होंने कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर दिया. तीन तलाक के ख़िलाफ़ कानून ले आए. सीएए और यूएपीए का कानून ले आए. हां अगर 272 से कमी सीटें मिलीं तो गठबंधन के सहयोगियों पर निर्भर रहना होगा. तो ये सारा कुछ 2024 के चुनाव नतीजों पर निर्भर करेगा.

''इसलिए अभी राम को आग नहीं ऊर्जा बता कर बीजेपी के तेवरों में नरमी के संकेत देना समय से पहले की बात है. बीजेपी कितना नरम रवैया अपनाएगी ये चार-छह महीने के बाद ही पता चलेगा.''

पीएम ने भाषण में दक्षिण भारत की यात्रा का ज़िक्र क्यों किया?

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प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा, ''अपने 11 दिन के व्रत अनुष्ठान के दौरान मैंने उन स्थानों का चरण स्पर्श करने का प्रयास किया, जहां प्रभु श्रीराम के चरण पड़े थे, चाहे नासिक हो, केरल हो, रामेश्वरम हो या फिर धनुषकोडी, मेरा सौभाग्य है कि सागर से सरयू तक की यात्रा का अवसर मिला.''

आखिर पीएम मोदी ने अपने भाषण में इस यात्रा का ज़िक्र कर क्या संदेश देने की कोशिश की है.

शरद गुप्ता कहते हैं, ''जब से ये कार्यक्रम शुरू हुआ वो दक्षिण भारत के दस-ग्यारह मंदिरों के दर्शन करने गए. स्नान किया. सारा कर्मकांड किया. जबकि कर्नाटक को छोड़ कर बीजेपी का दक्षिण में कोई अस्तित्व नहीं है. उन्हें लग रहा है कि 2024 के चुनाव में अगर बीजेपी को उत्तर भारत में कोई झटका लगता है तो दक्षिण में कुछ सीटें जीतकर वो इसकी भरपाई कर सकती है.''

वो कहते हैं कि 'बीजेपी दक्षिण भारत में अपना विस्तार करना चाहती है. मोदी जी का हर कदम राजनीतिक और चुनावी होता है. जिस तरह वो दक्षिण में मंदिर-मंदिर घूमे हैं उससे यही संकेत मिलता है.'

हालांकि विजय त्रिवेदी इससे इत्तेफाक नहीं रखते हैं, ''मुझे नहीं लगता कि उत्तर भारत में बीजेपी की सीटों में कोई कमी आएगी. लेकिन प्रधानमंत्री ये समझते हैं कि भारतीय जनता पार्टी पर उत्तर भारतीय या हिंदी बेल्ट की पार्टी होने का जो टैग लगा है उसे खत्म किया जाए. मोदी की गारंटी और मंदिर को वो दक्षिण भारत में 'एक्सप्लॉयट' और 'एक्सप्लोर' करना चाहते हैं.''

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नीलांजन मुखोपध्याय दक्षिण भारत में बीजेपी की पैठ बढ़ाने की रणनीति की समझाते हुए कहते हैं, ''दक्षिण में बीजेपी की हिंदू-मुसलमानों के बीच टकराव की नीति को आधार बना कर जनाधार बढ़ाने की कीशिश थी. लेकिन ये सफल नहीं हुई. तो उन्हें दूसरे तरीके अपनाने शुरू किए हैं.''

वो कहते हैं, "अब वो राम का सहारा लेकर जा रहे हैं. वो एक सॉफ्ट तरीके से वहां जा रहे हैं. हिंदू-मुसलमान विवाद न छेड़ कर वो सांस्कृतिक संबंधों का सहारा ले रहे हैं. बीजेपी कह रही है कि उत्तर और दक्षिण की संस्कृति एक है. राम आपके भी हैं हमारे भी.''

''लेकिन उसमें एक समस्या है. बीजेपी की एक मोनोइज्म की थ्योरी है- नेशन वन पीपुल वन रिलीजन वन. रामायण में भी एक ही राम है. हिन्दुस्तान में कई रामायण है जिसमें राम के अलग-अलग चरित्र हैं. तमिल का कम्बन रामायण बंगाल के कृतिवास रामायण से अलग है. जो रामलीला इंडोनेशिया में होती है वो अलग है. लेकिन राम की विविधता खत्म करके उन्हें एक सांचे में ढाला जा रहा है.''

नीलांजन कहते हैं, ''राम का एक स्टीरियोटाइप टाइप बनाया जा रहा है. आपने एक छवि राम का बनाया और चाहते हैं सब उसी को मानें. आज से पहले राम के लिए किसी केंद्रीय मंदिर की ज़रूरत नहीं पड़ी थी. फिर भी लोग राम को पूरे देश में मानते हैं. फिर आपको एक हिंदू वेटिकन शहर बनाने की क्या ज़रूरत थी. आप इतिहास में अमर हो जाना चाहते हैं इसलिए इसे बनाते हैं.''

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