क्या इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग वाकई में सेक्युलर पार्टी है?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) को सेक्युलर पार्टी बताए जाने के बाद राजनीतिक टिप्पणीकारों और शिक्षाविदों ने एक बार फिर इस पार्टी से जुडे़ धर्म के इतिहास की तरफ रुख़ किया है.
अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी में मीडिया से बातचीत के दौरान आईयूएमएल पार्टी को 'धर्मनिरपेक्ष पार्टी' बताने के बाद पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को उन लोगों की आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है जो मानते हैं कि यह पार्टी 76 साल पहले देश के बंटवारे के लिए ज़िम्मेदार थी. जबकि तथ्य कुछ और ही बात करते हैं.
ये भी दिलचस्प है कि जिस सवाल का सामना राहुल गांधी को अमेरिका में करना पड़ा, 1960 के दशक की शुरुआत में उसी सवाल का जवाब उनके नाना और भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिया था.
आईयूएमएल एक सेक्युलर पार्टी है या एक सांप्रदायिक पार्टी है?
इसका जवाब मिला-जुला है. इसका कोई सीधा जवाब नहीं है. लेकिन राजनीतिक टिप्पणीकारों और धर्म के जानकार एक समाजशास्त्री के अनुसार पार्टी की भूमिका काफी बारीक है.
बीबीसी से बातचीत में राजनीतिक टिप्पणीकार बीआरपी भास्कर कहते हैं, "वे अभी भी अपनी पार्टी के नाम पर मुस्लिम समुदाय को अपने पक्ष में बनाए रखते हैं. लेकिन पार्टी के व्यवहार में किसी तरह की साम्प्रदायिकता को नहीं देखा गया है. केरल में भी इस मुद्दे को तूल नहीं दी जाती है."
भारत में केरल ही इकलौता ऐसा राज्य है जहां इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का राजनीतिक आधार है. इस पार्टी ने केरल की 2021 के विधानसभा चुनाव में 8.27 फीसदी वोट हासिल किए थे और 15 सीटों पर जीत हासिल की थी.
पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में केरल में 5.48 फीसदी वोट हासिल किए थे और दो सीटों पर जीत हासिल की थी. इसके अलावा पार्टी ने तमिलनाडु में भी एक सीट जीती थी. यह दशकों से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ़) का हिस्सा रही है.

आईआईटी मद्रास में मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. आर संतोष ने बीबीसी हिंदी को बताया, ''हमें पार्टी की वास्तविक ज़मीनी गतिविधियों के आधार पर वास्तविक धर्मनिरपेक्षता और औपचारिक धर्मनिरपेक्षता के बीच अंतर करने की ज़रूरत है.''
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग में अंतर
ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की स्थापना मोहम्मद अली जिन्ना ने की थी. इस पार्टी का अस्तित्व भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद नहीं था. भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान के गठन का आंदोलन चलाने वाली ऑल इंडिया मुस्लिम लीग को भंग कर दिया गया था.
आज़ादी के बाद 1948 में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की स्थापना हुई थी. इसकी स्थापना मद्रास के मोहम्मद इस्माइल ने की थी. ये पार्टी स्पष्ट तौर पर भारत के संविधान के प्रति प्रतिबद्ध थी.
भास्कर कहते हैं, ''1961 में कांग्रेस, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पीएसपी) और आईयूएमएल ने गठबंधन किया था, लेकिन आईयूएमएल से किसी को सरकार में मंत्री पद नहीं दिया गया था.''
भास्कर याद करते हैं, ''एक वक़्त पर आईयूएमएल ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से कहा था कि 'सांप्रदायिक लीग मर चुकी है'. इस बातचीत की दिलचस्प पहलू यह थी कि 1967 में ईएमएल नंबूदरीपाद की कम्युनिस्ट सरकार ने सबसे पहले आईयूएमएल को सत्ता में जगह दी थी.''

राजनीतिक आलोचक और टिप्पणीकार शाहजहां मदमपत ने बीबीसी हिंदी को बताया कि भारत की राजनीति में आईयूएमएल का योगदान महत्वपूर्ण रहा है.
शाहजहां मदमपत कहते हैं, ''यह केरल में काम करने वाली एक राजनीतिक पार्टी है, जिसने दूसरे धार्मिक समुदायों के ख़िलाफ़ किसी ध्रुवीकरण अभियानों में शामिल हुए बिना मुस्लिम समुदाय के सामाजिक सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई है. पार्टी की भूमिका को भाजपा के नेता भी स्वीकार करते हैं.''
लेकिन क्या किसी पार्टी के नाम में 'मुस्लिम' होना चाहिए?
इस सवाल के जवाब में शाहजहां कहते हैं, ''किसी भी समुदाय को खुद को संगठित करने और संविधान द्वारा दिए गए वैध अधिकारों की मांग करने का संवैधानिक अधिकार है. मुद्दा यह है कि किसी पार्टी के नाम में किसी विशेष धर्म के नाम होने से आप संगठन को सांप्रदायिक नहीं कह सकते हैं.''

सांप्रदायिक और धर्मनिरपेक्ष के बीच का फ़र्क़
हालाँकि डॉ. आर संतोष इस सवाल को एक अलग नज़रिए से देखते हैं.
वह कहते हैं, ''हमें आईयूएमएल को उन मुस्लिम पार्टियों से अलग कर देखने की ज़रूरत है, जिन पार्टियों ने अपने नाम में मुस्लिम शब्द को नहीं जोड़ा लेकिन उनकी गतिविधि काफी ज़्यादा सांप्रदायिक थी.''
''हम यह नहीं कहते कि आईयूएमएल एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी है क्योंकि सही मायनों में यह जटिल मुद्दा है, क्योंकि एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी को एक ऐसी पार्टी होनी चाहिए जो किसी विशेष धर्म से संबंधित न हो. यह एक तरह की पारंपरिक समझ है.''
डॉ आर. संतोष आगे कहते हैं, ''इसे (आईयूएमएल को) एक साम्यवादी पार्टी के रूप में देखा जाता है जो अपने समुदाय के लोगों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए खड़ी होती है. साम्प्रदायिक दल और सामुदायिक दल (कम्यूनिटेरियन पार्टी) में अंतर होता है.''
''साम्प्रदायिक पार्टी अपने विपक्षियों के विरोध के साथ अपने समाज के हितों की रक्षा करने की कोशिश करती हैं. ये पार्टियां ज़्यादातर अपने हितों की रक्षा के लिए हिसंक गतिविधियों का सहारा लेती हैं. जबकि सामुदायिक पार्टी जाति आधारित पार्टियों की तरह ही अपने वर्ग के लोगों के कल्याण की बात करते हैं जो उनकी जाति या धर्म से जुडें हों.''
डॉ आर. संतोष कहते हैं, यदि आप केरल में आईयूएमएल को देखें, तो यह सांप्रदायिक हिंसा या तनाव से जुड़ी नहीं है, इसके अलावा और भी कई ऐसे उदाहरण हैं जो यह दर्शाते हैं कि पार्टी सेक्यूलर हैं.
शाहजहां मदमपत बताते हैं, ''ऐसे एक भी उदाहरण नहीं है जिसमें यह साबित होता हो कि आईयूएमएल किसी दूसरे समुदाय के ख़िलाफ़ नज़र आया हो या किसी समुदाय के अधिकारों के हड़प लिया हो. आईयूएमएल ने किसी समुदाय को ठेस पहुँचाए बिना मुसलमानों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी है.''
डॉ. संतोष और शाहजहां बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आईयूएमएल के रुख़ को उदाहरण के तौर पर पेश करते हैं.
बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर डॉ संतोष बताते हैं, ''आईयूएमएल हालात को शांतिपूर्ण रखने के लिए दरकिनार रहा. इब्राहिम सुलेमान सैत मस्जिद के विध्वंस के जवाब में कट्टरपंथी प्रतिक्रिया देना चाहते थे लेकिन जीएम बनतवाला की अध्यक्षता वाली पार्टी सहमत नहीं थी. और आख़िरकार इब्राहिम सुलेमान पार्टी से बाहर हो गए.''

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क्या पार्टी के नाम से मुस्लिम हटा देने से कोई फर्क पड़ेगा ?
डॉ. संतोष कहते हैं, ''आईयूएमएल किसी भी खांचे में नहीं आती. पार्टी अब एक बंधन में फँस गई है क्योंकि उनके समुदाय के भीतर कट्टरपंथी वर्गों का दबाव है और दूसरी ओर पीएफ़आई सरीखी संस्थाएं पार्टी के अप्रभावी होने की आलोचना करती है. भारत में शायद ही कोई ऐसी कोई पार्टी है जो सही मायनों में सेक्युलर है.''
डॉ. संतोष कहते हैं, ''सारी पार्टी को जाति या धर्म की सामूहिक पहचान को स्वीकार करना होगा. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) भी इससे अछूती नहीं है. ये विस्तृत विविधताओं का सवाल है. जो मायने रखता है वो है शांति, बहुलता और सह-अस्तित्व के प्रति प्रतिबद्धता. और इनके प्रति आईयूएमएल प्रतिबद्ध है.''
राहुल गांधी आज उसी सवाल में फंस गए हैं जिसका जवाब 62 साल पहले उनके परनाना के पास जवाब था.
बीआरपी भास्कर कहते हैं, जब भारत के बंटवारे के लिए मुस्लिम लीग को ज़िम्मेदार ठहराने की चर्चा चल रही थी और कांग्रेस ने आईयूएमएल के साथ गठबंधन कर लिया था. तब नेहरू ने कहा था कि 'मरे हुए घोड़े को कोड़े मारने की कोई ज़रूरत नहीं है'.
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