हमलावर भीड़ से भिड़कर युवक को बचाने वाले गगनदीप सिंह किस बात से आहत हैं?

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- Author, आसिफ़ अली
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तराखंड पुलिस के सब-इंस्पेक्टर गगनदीप सिंह छह साल पहले अचानक से सुर्ख़ियों में आ गए थे.
नैनीताल ज़िले में एक मुस्लिम युवक को हमलावरों से बचाते हुए उनकी तस्वीर वायरल हुई थी. यह तस्वीर एक पुलिस अधिकारी की मुस्तैदी और निडरता की मिसाल बन गई.
इस काम के लिए गगनदीप सिंह को भरपूर तारीफ़ मिली और कुछ लोगों ने उनकी आलोचना भी की लेकिन वे मीडिया की सुर्ख़ियों से दूर रहते हुए लगातार अपनी ड्यूटी निभाते रहे.
किस बात से आहत हैं गगनदीप सिंह

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उन्हीं गगनदीप सिंह का मन पश्चिम बंगाल में आईपीएस अधिकारी जसप्रीत सिंह को कथित तौर पर 'ख़ालिस्तानी' कहे जाने से आहत है.
बीते 20 फरवरी को पश्चिम बंगाल के विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी के साथ बीजेपी के कई नेता संदेशखाली जा रहे थे. इस दौरान बीजेपी के किसी कार्यकर्ता को आईपीएस अधिकारी जसप्रीत सिंह को 'खालिस्तानी' कहने का मामला सामने आया था.
इस बात को पश्चिम बंगाल पुलिस ने भी गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई करने का भरोसा जताया था.
पिछले छह साल तक गगनदीप ने मीडिया से कभी बात नहीं की, छह साल की चुप्पी के बाद उन्होंने पहली बार बीबीसी से बात की है.
बंगाल के मामले पर गगनदीप सिंह कहते हैं, ''जो भी शख़्स यूनिफ़ॉर्म में होगा, वह अपना काम ही करेगा. ऐसे में किसी अफ़सर को इस तरह धार्मिक तौर पर टार्गेट करना ग़लत है.''
गगनदीप सिंह कहते हैं, ''जब से मैंने वीडियो देखा, तब से तकलीफ़ में हूं क्योंकि यह वाक़ई तकलीफ़ देने वाली बात है. वैसे किसी समाज में इस तरह के चंद ही लोग होते हैं जो माहौल ख़राब करते हैं.''
कैसे बचाई थी मुस्लिम युवक की जान

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गगनदीप सिंह ने नैनीताल के रामनगर के गर्जिया मंदिर में उग्र भीड़ से घिरे एक मुस्लिम युवक और हिंदू युवती को हिंसा से बचाया था. 22 मई, 2018 को हुई इस वारदात के समय 27 साल के गगनदीप सिंह अपनी पहली पोस्टिंग पर तैनात थे.
उन्होंने मुस्लिम युवक और हिंदू युवती के लिए ढाल बनकर न सिर्फ़ अपनी ड्यूटी निभाई बल्कि मज़हबी फसाद को फैलने से रोक लिया था. इस घटना के बाद भी गगनदीप पुलिस चौकी में अपनी ड्यूटी निभाते रहे.
उस वक़्त सोशल मीडिया और अन्य कई हलकों में पुलिस इंस्पेक्टर गगनदीप सिंह को 'हीरो' के तौर पर देखा गया, लेकिन गगनदीप सिंह हमेशा निजी करणों से मीडिया के सामने आने में असहज महसूस करते रहे.
'मैं सिर्फ़ अपनी ड्यूटी कर रहा था'

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अब उनकी उम्र 33 साल के हो चुके हैं और उनका कहना है कि वे पहले की ही तरह अपना काम कर रहे हैं.
गगनदीप सिंह ने छह साल पहले हुई उस घटना और उसके बाद जीवन में आए बदलावों पर पहली बार बातचीत की. उन्होंने याद किया, ''मैं गर्जिया मन्दिर में अपनी ड्यूटी पर तैनात था. इस दौरान मुझे पता लगा कि नीचे नदी की तरफ़ एक लड़का और एक लड़की जो कि बैठे हुए थे, उनको भीड़ ने पकड़ लिया है.''
''मुझे यह भी मालूम हुआ कि यह लड़की हिंदू है, ख़बर पाकर मैं मौक़े पर पहुँचा. मैंने लड़के को अपने साथ में ले लिया. मैं लड़के को मन्दिर से बाहर ले जाना चाहता था.''
मुझे यह भी मालूम हुआ कि यह लड़की हिंदू है.खबर पाकर मैं मौक़े पर पहुँचा. मैंने लड़के को अपने पजेशन में ले लिया. इसके बाद मैं लड़के को मन्दिर से बाहर लेकर जाना चाह रहे थे.
गगनदीप सिंह के मुताबिक वे लड़के को किसी सुरक्षित जगह पर ले जाना चाहते थे, लेकिन भीड़ ने मंदिर का गेट बंद कर दिया था और लड़के को पीटने की कोशिश करने लगी.
''मैंने यही कोशिश की कि लड़के को गंभीर चोट न पहुंचे, कोई बड़ी घटना ना घट जाए. वहीं भीड़ का कहना था कि पहले प्रशासन को यहां बुलाया जाए, हम उनसे बात करेंगे कि मन्दिर में ऐसी घटनाएँ क्यों हो रही हैं.''
यूनिफ़ॉर्म का फ़र्ज़ था कि हिंसा न हो

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गगनदीप सिंह याद करते हैं, ''घटना के दौरान मैं यूनिफ़ॉर्म में था और मेरे दिल और दिमाग़ में यही था कि मेरे सामने कोई किसी को कैसे मार-पीट सकता है. मैं नहीं चाहता था कि यूनिफ़ॉर्म के सामने ऐसी कोई घटना घटे, मुझे यूनिफ़ॉर्म की गरिमा की चिंता थी.''
''लेकिन फिर भी लोग उस लड़के को मार रहे थे. तो मैं उसे चारों तरफ़ से कवर कर रहा था ताकि उसे किसी तरह की चोट ना लगे. मुझे लग जाए,कोई बात नहीं, मगर उसे ना लगे. मेरा प्रयास उसको बचाने का था. और यूनिफ़ॉर्म का फ़र्ज़ भी यही कहता है.''
'मुझे एंटी हिंदू बनाकर भी पेश किया गया...'

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इस घटना के ठीक बाद जब गगनदीप सिंह मीडिया की सुर्ख़ियों में आ गए. हर कोई उनके इंटरव्यू के लिए संपर्क साधने लगा तब उनके वरिष्ठों ने बताया कि गगनदीप सिंह ने छुट्टी ले ली है. यह बात उस दौरान काफ़ी चर्चा में रही थी.
इस पहलू पर गगनदीप सिंह ने कहा, ''उस दौरान यह भी कहा गया कि गगनदीप सिंह डर गया. जबकि छुट्टी तो मैंने पहले से अप्लाई की हुई थी.''
गगनदीप बताते हैं, ''यह घटना 22 मई, 2018 को हुई थी, और जहाँ तक मुझे ध्यान है, मैं छुट्टी 24 या 25 तारीख़ को गया था. हमारे पुलिस विभाग में छुट्टी लगभग एक हफ़्ता पहले अप्लाई कर देते हैं, मैंने इसीलिए छुट्टी एक हफ़्ता पहले अप्लाई की हुई थी.''
ये बात और है कि जब वे छुट्टी से वापस लौटे तो उनकी दुनिया बदल चुकी थी.
गगनदीप सिंह बताते हैं, ''छुट्टी से वापस आने के बाद मेरे लिए रामनगर का माहौल काफी बदल गया था. लोगों के बीच मुझे प्रोत्साहन मिलने लगा और लोग मेरे साथ फोटो खिंचवाने लगे.''
छुट्टी से वापस आने के बाद मेरे लिए रामनगर का माहौल काफी बदल गया था. लोगों के बीच मुझे प्रोत्साहन मिलने लगा और लोग मेरे साथ फोटो खिंचवाने लगे.
गगदीप सिंह याद करते हैं, ''99 प्रतिशत लोगों ने मुझे प्रोत्साहित ही किया, नकारात्मक किसी ने नहीं कहा, सबने तारीफ़ ही की. इस दौरान कुछ लोगों ने मुझे एंटी हिंदू बताने की भी कोशिश की. लेकिन ऐसे लोग बहुत कम ही रहे हैं. मुझे लगता है कि 0.1 फीसद लोग ही ऐसी बातें करते हैं.''
गगनदीप सिंह यह भी याद करते हैं कि छुट्टी से लौटने के बाद रोज़ाना की तरह ड्यूटी करने में उन्हें कोई मुश्किल नहीं हुई और न ही काम करने के तरीक़े में कोई बदलाव आया.
पुलिस विभाग से मिली मदद का जिक्र करते हुए वे कहते हैं, ''उसी साल 15 अगस्त को तत्कालीन डीजीपी ने मुझे मेडल से भी नवाजा. मैं पुलिस डिपार्टमेंट की ओर से मिलने वाले पूरे सपोर्ट को नहीं भूल सकता.''
लेकिन इस पूरे विवाद ने उनके परिवार को चिंतित ज़रूर किया था. वे कहते हैं, ''यह न्यूज़ मीडिया में ज़्यादा चल रही थी तो उस बात को लेकर परिवार थोड़ा घबरा रहा था. कोई नहीं चाहता कि मैं बहुत ज़्यादा लाइमलाइट में आऊँ और मेरे साथ कुछ ग़लत हो.''
पुलिस का काम है निष्पक्ष होकर काम करना

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अपने परिवार को लेकर गगनदीप कहते हैं,''मेरे परिवार ने हमेशा सही करना ही सिखाया है. उन्होंने जो मुझे संस्कार दिए हैं, उसी के अनुरूप मैंने अपना काम किया.''
वो कहते हैं, ''पुलिस का काम भी यही होता है. मैं यह नहीं कहूँगा कि यह कोई विशेष काम था, पुलिस का काम ही निष्पक्ष होकर काम करना होता है. मैं तो आज भी यही कहता हूँ कि अगर मेरी जगह और कोई भी ड्यूटी पर होता तो शायद वही करता, जो मैंने किया था.''
गगनदीप सिंह कहते हैं कि किसी भी शख़्स को क़ानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए, अगर किसी को किसी बात पर आपत्ति है, तो उसे जताने के लिए तमाम विकल्प मौजूद हैं.
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