बिहार में रामनवमी के दौरान क्यों भड़की सांप्रदायिक हिंसा?

साल 2022 में पटना के महावीर मंदिर के सामने रामनवमी के मौक़े पर निकाली गई शोभायात्रा

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से

"साल 2018 में जब फिर इनलोगों के साथ गए थे, तो क्या हुआ था? एक नेता का बेटा ही किया था, उसको गिरफ़्तार किया था या नहीं किया था? इन लोगों ने कभी कुछ किया है?"

ये बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शब्द हैं, जो बता रहे हैं कि साल 2018 में उनकी सरकार ने केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता अश्विनी चौबे के बेटे को गिरफ़्तार किया था.

अश्विनी चौबे के बेटे अरिजीत शाश्वत पर 2018 में बिहार के भागलपुर में रामनवमी के मौक़े पर हिंसा भड़काने का आरोप लगा था.

नीतीश ने यह बयान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के एक बयान को लेकर पत्रकारों के सवाल के जवाब में दिया.

अमित शाह ने रविवार को नवादा की सभा में कहा कि 'बिहार में 2025 में बीजेपी की सरकार बनी तो दंगाइयों को उल्टा लटका देंगे'.

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साल 2018 में हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ़्तार किए गए अरिजीत शाश्वत को एक हफ़्ते के अंदर ज़मानत मिल गई थी. उस समय बीजेपी भी बिहार सरकार में जेडीयू के साथ थी और नीतीश कुमार एनडीए सरकार के मुखिया थे.

अमित शाह के हालिया बयान पर बिहार के उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी पलटवार किया है.

उन्होंने कहा, "बिहार को जो लोग बुरी नज़र से देखेगा, बिहार का लोग उसको उल्टा से सीधा कर देगा. कुछ लोग गुजरात से आए हैं और किस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं? जहां जा रहे हैं, वहीं दंगा हो रहा है, कौन नहीं समझ रहा है?"

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साल 2018 के बाद 2022 तक बिहार में रामनवमी पर कोई बड़ी हिंसा नहीं हुई थी. लेकिन इस साल रामनवमी के मौक़े पर बिहार के दो शहरों बिहार शरीफ़ और सासाराम में हिंसा भड़की.

बिहार शरीफ़ की हिंसा में एक युवक की मौत हो गई, जबकि सासाराम में कई परिवार हिंसा के डर से घर छोड़कर सुरक्षित स्थान पर चले गए.

इस हिंसा में लाखों की संपत्ति का नुक़सान हुआ है. दोनों शहरों में दहशत का माहौल है. इसके अलावा इंटरनेट सेवा, बाज़ार और दुकानें बंद की गईं.

सवाल उठता है कि आख़िर रामनवमी के त्योहार या जुलूस के दौरान हिंसा क्यों भड़की?

बीबीसी ने बिहार के सासाराम और बिहार शरीफ़ जाकर इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की है.

सासाराम में हुई हिंसा के बाद बर्बादी का मंज़र
इमेज कैप्शन, सासाराम में हुई हिंसा के बाद बर्बादी का मंज़र

रामनवमी का बदलता स्वरूप

वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी ने सासाराम में लंबा समय गुज़ारा है. उन्होंने वहीं से पढ़ाई भी की है. वह सासाराम को बेहद क़रीब से जानते हैं.

कन्हैया भेलारी याद करते हैं कि जब बिहार और झारखंड एक थे, तब केवल जमशेदपुर, हज़ारीबाग़ और रांची में रामनवमी का बड़ा जुलूस निकलता था.

उनके अनुसार, इनके अलावा कुछ ही जगहों पर ऐसी यात्रा निकलती थी, लेकिन अब हर जगह इस तरह की यात्रा निकलने लगी है.

कन्हैया भेलारी कहते हैं, "पहले एक कहावत थी 'रामनगर की रामलीला, डोल डुमरांव की, कोचस की कंसलीला, ताज़िया सासाराम की'. सासाराम की ताज़िया पूरे भारत में प्रसिद्ध थी. लेकिन अब हर जगह रामलीला होती है और यह सब वोटों के ध्रुवीकरण के लिए हो रहा है."

रामनवमी की शोभा यात्रा में अब एक और बदलाव आया है कि यह बड़े स्तर पर आयोजित होने लगी है. पहले यह छोटे स्तर पर स्थानीय अखाड़े की तरफ़ से होती थी.

नालंदा के पुलिस अधीक्षक अशोक मिश्र के मुताबिक़, "रामनवमी की शोभा यात्रा का आयोजन विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल मिल कर करते हैं. इस बार रामनवमी की शोभा यात्रा में असामाजिक तत्व ज़्यादा थे और वो उत्तेजित करने वाले नारे लगा रहे थे."

नालंदा पुलिस ने बिहार शरीफ़ में हिंसा भड़काने के मामले में क़रीब 150 लोगों को गिरफ़्तार भी किया है.

रोहतास के पुलिस अधीक्षक विनीत कुमार के मुताबिक़, ज़िले में प्रशासन ने 103 से ज़्यादा यात्रा की अनुमति दी थी. उन्होंने सासाराम के जुलूस से जुड़े संगठन की जानकारी नहीं दी. उनका कहना है कि जांच के बीच में ऐसी जानकारी देना उचित नहीं है.

हालांकि सासाराम में मरकज़ी (केंद्रीय) मोहर्रम कमेटी के महासचिव अख़लाक़ अहमद रिज़वी का दावा है कि वहां रामनवमी के जुलूस में वीएचपी और बजरंग दल के लोग शामिल थे.

बिहार शरीफ़ में हिंसा
इमेज कैप्शन, बिहार शरीफ़ में पिछली बार सांप्रदायिक हिंसा 1981 में हुई थी

'कई दशकों से नहीं हुई ऐसी हिंसा'

बिहार शरीफ़ और सासाराम में पहले भी कई धार्मिक आयोजन हुए हैं, लेकिन इन जगहों पर हाल के वर्षों में कभी ऐसी हिंसा नहीं हुई.

सासाराम में पिछली बार साल 1989 में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी. यह हिंसा 'अयोध्या राम मंदिर आंदोलन' के समय हुई थी. उस समय बिहार के भागलपुर में सबसे बड़ी सांप्रदायिक हिंसा हुई थी.

जबकि बिहार शरीफ़ में पिछली बार सांप्रदायिक हिंसा साल 1981 में हुई थी.

उस वक़्त भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी दंगा प्रभावित इलाक़ों का दौरा किया था. इस हिंसा का भी रामनवमी के जुलूस से कोई संबंध नहीं था. ख़बरों के मुताबिक़, यहां यादवों और मुसलमानों के बीच एक क़ब्रिस्तान की ज़मीन को लेकर विवाद था.

दरअसल बिहार शरीफ़ में कई क़ब्रिस्तान थे जिसकी ज़मीन पर मुसलमान लोग अपना दावा करते थे जबकि यादवों का कहना था कि यह उनकी ज़मीन है. इस तरह के कई मामले अदालत में भी लंबित थे.

यानी इन दोनों शहरों में तीन दशक से ज़्यादा समय से कोई बड़ी सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई थी. और यहां अंतिम बार जो सांप्रदायिक दंगे हुए भी थे, उसका रामनवमी से कोई संबंध नहीं था.

सासाराम में मरकज़ी मोहर्रम कमेटी के महासचिव अख़लाक़ अहमद रिज़वी कहते हैं, "रामनवमी की शोभा यात्रा वर्षों से निकलती है, इसमें दोनों समुदायों की ओर से नारेबाज़ी भी होती रही है. लेकिन आजकल इसमें भड़काऊ नारे और अपशब्दों का प्रयोग जान-बूझ कर किया जाता है."

इन्हीं नारों के बीच बिहार शरीफ़ में एक मस्जिद के पास तनाव और फिर पत्थरबाज़ी से हिंसा भड़की. फिर यह हिंसा बिहार शरीफ़ के दूसरे इलाकों में भी हुई.

विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष (कार्यवाहक) आलोक कुमार

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वीएचपी का क्या कहना है

विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष (कार्यवाहक) आलोक कुमार कहते हैं, "विश्व हिन्दू परिषद जो यात्रा निकालती है, उसमें हम यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी संप्रदाय के ख़िलाफ़ कोई नारेबाज़ी न हो. यह कौन-सी मानसिकता है कि 'जय श्री राम' बोलना उन्हें हमला करने के लिए उकसाती है."

कन्हैया भेलारी का मानना है कि ऐसे जुलूस में केवल 'जय श्रीराम' के नारे नहीं लगते बल्कि और भी कई भड़काऊ बातें की जाती हैं, जुलूस में लोग तलवार लेकर चलते हैं.

आलोक कुमार ने बीबीसी से कहा है कि रामनवमी के जुलूस में कुछ लोगों के पारंपरिक हथियार लेकर चलने की परंपरा रही है, इसमें जो तलवार होती है, उसमें धार नहीं होती.

उनका कहना है कि मोहर्रम के जुसूस में भी लड़ने वाले हथियार से अपनी ही पीठ पर चोट कर ख़ून निकाल लेते हैं, ऐसे ही सिखों के कुछ जुलूस में भी हथियार लेकर चलने की परंपरा हैं.

सासाराम के मुबारकगंज में कुछ युवकों ने हमें बताया कि वहां भी हिंसा की शुरुआत पास के चिकटोली मोहल्ले से हुई थी, जब रामनवमी की रात जुलूस से लौट रहे दो-तीन लड़कों को पीटा गया था.

हमने इस दावे की सच्चाई जानने के लिए सासाराम के चिकटोली मोहल्ले में गुड्डू कुमार से मुलाक़ात की, जिनके भाई की रामनवमी की रात 'पिटाई' मुबारकगंज में कुछ युवकों ने की थी.

गुड्डू कुमार का दावा है कि उनके भाई समेत तीन लड़कों की पिटाई रामनवमी की रात क़रीब साढ़े नौ बजे की गई थी. हमें बताया गया कि जिसकी पटाई हुई वो अभी 12-13 साल का है और पहचान और ख़तरे के डर से उसे किसी रिश्तेदार के घर भेज दिया गया है.

हैदराबाद स्थित नलसार लॉ यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, "किसी को भी 'जय श्रीराम' पर आपत्ति करने का अधिकार नहीं है. मर्यादा पुरुषोत्तम राम को अल्लामा इक़बाल ने इमाम-ए-हिंद कहा है और भारत के मुसलमान भी राम पर बड़ी श्रद्धा रखते हैं."

उनका कहना है कि वास्तव में भगवान राम के जिन मर्यादाओं का ख़्याल रखा जाना चाहिए, उन मर्यादाओं का ख़याल नहीं रखने से दंगे होते हैं.

नीतीश कुमार

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रामनवमीः धार्मिक या राजनीतिक उत्सव

रामनवमी की शोभा यात्रा पर यह आरोप लगता है कि अब यह धार्मिक कम और राजनीतिक ज़्यादा हो गई है.

सासाराम के अख़लाक़ अहमद रिज़वी का आरोप है कि अब रामनवमी की यात्रा आरएसएस, वीएचपी और बजरंग दल वाले निकालते हैं और सब जानते हैं कि वो किसके क़रीबी हैं.

रामनवमी की शोभा यात्रा के लिए बिहार शरीफ़ और सासाराम में सड़कों और गलियों में झंडे और पैम्फ़लेट लगाए गए थे. कई जगहों पर विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के बड़े-बड़े बैनर और पोस्टर भी लगे हुए थे.

वीएचपी के आलोक कुमार का कहना है, "हम ऐसी शोभा यात्रा में वोट नहीं मांगते, सबका स्वागत करते हैं. निमंत्रण सबको होता है, जो आएं सो आएं. और मान लीजिए कि इसमें बीजेपी के लोग आएं तो क्या इस कारण पत्थर चलाए जाएंगे."

रामनवमी के ठीक बाद बिहार में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के दौरे को लेकर भी ख़ूब सियासत हुई है.

बीजेपी के सांसद और बिहार बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष संजय जायसवाल ने बीबीसी से बातचीत में आरोप लगाया है कि सासाराम में अमित शाह की सभा को स्थगित कराने के लिए यह सब किया गया है.

वहीं बिहार सरकार में महागठबंधन के दो बड़े दलों आरजेडी और जेडीयू ने इस मामले में सीधा बीजेपी पर आरोप लगाया है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का आरोप है, "बिहार में यह सब नहीं होता था. यह जान-बूझ कर किया गया है, एक जगह (सासाराम) जहां उनको (अमित शाह) जाना था, और दूसरा जिसे मैंने बिहार से बिहार शरीफ़ (बिहार शरीफ़ के नामकरण का संदर्भ) बनाया है."

जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार

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जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने तो बीबीसी से बातचीत में सीधा आरोप लगाया है कि गृहमंत्री अमित शाह के राजनीतिक व्यवहार ने बिहार में उन्माद को भड़काने में भूमिका निभाई.

सासाराम और बिहार शरीफ़ में हिंसा के बाद पुलिस मामले की जांच में जुटी है. उसने अब तक इन दोनों शहरों में हिंसा फैलाने के आरोप में क़रीब 200 लोगों को गिरफ़्तार भी किया है. लेकिन इन गिरफ़्तारियों पर भी बिहार में सियासत गर्म है.

बिहार में विपक्षी दल बीजेपी आरोप लगा रही है कि 'राज्य में हिंसा में रामभक्तों पर हमला हुआ है, जबकि नीतीश सरकार तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है और हिन्दुओं को जेल में डाल रही है.'

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शोभा यात्रा का रूट

रामनवमी की शोभा यात्रा में उन सड़कों पर हंगामा देखा गया जहां अल्पसंख्यक समुदाय के लोग रहते हैं. उन जगहों पर नारेबाज़ी हिंसा का रूप ले लेती है और फिर इससे माहौल ख़राब होता है.

रोहतास पुलिस अधीक्षक विनीत कुमार का दावा है कि वहां रामनवमी के दिन या रात कोई घटना नहीं हुई थी और इसे लेकर कोई शिकायत या एफ़आईआर नहीं कराई गई है और न ही कोई इलाज के लिए हॉस्पिटल पहुंचा था.

इसी मोहल्ले में रामनवमी यानी गुरुवार की रात को एक और व्यक्ति की पिटाई का दावा किया जा रहा था. हम उनके भी घर पहुंचे तो 45 साल के अरुण कुमार सिंह के सिर पर पट्टी बंधी हुई थी.

अरुण कुमार सिंह ने कहा, "रात क़रीब 10 बजे अल्पसंख्यक समुदाय के युवकों ने मुझ पर हमला कर दिया. सब कम उम्र के थे. अंधेरे की वजह से मैं उनका चेहरा नहीं देख पा रहा था, लेकिन कुछ लड़के मुझे पहचान रहे थे और बचाने की कोशिश भी कर रहे थे."

अरुण कुमार सिंह का दावा है कि शहर का माहौल और न बिगड़े इसलिए हमने कोई एफ़आईआर नहीं कराई और प्राइवेट डॉक्टर के पास जाकर इलाज करा लिया.

फ़ैजान मुस्तफ़ा के मुताबिक़ दंगा होने में सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदारी ज़िला प्रशासन की होती है. यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि प्रशासन ने जुलूस को किस रूट से अनुमति दी है, वहां कितना पुलिस बल मौजूद है, पुलिस ख़ामोश खड़ी रही या फ़ौरन एक्शन में आकर हालात को संभालने की कोशिश की.

प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा कहते हैं, "कहीं पर भी अगर लॉ एंड ऑर्डर (क़ानून और व्यवस्था) के हालात बिगड़ते हैं तो उसकी शुरुआती ज़िम्मेदारी ज़िला प्रशासन की होती है. ज़िला प्रशासन अगर सचेत रहे तो कहीं कोई दंगा नहीं होगा."

वीएचपी के आलोक कुमार का कहना है कि सड़कों और मोहल्लों को धर्म के अनुसार न बांटें, अगर सड़कें भी इस तरह से बांटी जाएंगी तो देश की एकता का क्या होगा, जो भी आम रास्ते हैं हम उस पर जाएंगे, उसमें राम जी के गुण गाएंगे.

आलोक कुमार पूछते हैं, "अगर हम एक जगह से दूसरी जगह तक जा रहे हैं तो पहले यह हिसाब लगाएं कि किस जगह पर कितने मुसलमान रहते हैं, उसके हिसाब के रूट तय करें. यह पूरी तरह से अव्यावहारिक बात है."

रोहतास प्रशासन के मुताबिक़, जुलूस को जिन रास्तों से गुज़रने की अनुमति दी गई थी, वह उन्हीं रास्तों से गुज़रा है और पूरा प्रशासन जुलूस में शांति बनाए रखने के लिए मौजूद था.

वहीं बिहार शरीफ़ में भी शोभा यात्रा अब तक जिन रास्तों से गुज़रती रही है, प्रशासन की तरफ़ से उन्हीं रास्तों पर इस साल भी शोभा यात्रा की अनुमति दी गई थी.

यानी इन दोनों ही शहरों में रामनवमी की शोभा यात्रा के रूट को लेकर कोई विवाद नहीं था. न ही इन शहरों में पुराने रूट में कोई बदलाव किया गया था.

रोहतास (सासाराम) डीएम धर्मेंद्र कुमार

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क्या रही पुलिस-प्रशासन की भूमिका?

बिहार में रामनवमी के मौक़े पर हुई हिंसा में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. बिहार शरीफ़ में पुलिस की मौजूदगी में रामनवमी की शोभा यात्रा के दौरान एक मस्जिद के पास हिंसा शुरू हो गई.

बिहार शरीफ़ के पुलिस अधीक्षक का कहना है कि इस बार जुलूस में ज़्यादा लोग थे. दो-तीन हज़ार लोगों को संभालने के लिए वो ख़ुद सबसे आगे की तरफ़ मौजूद थे.

वो कहते हैं, "आगे की तरफ़ कोई हलचल हुई तो उसे शांत कराया, तभी पीछे की तरफ़ हंगामा हो गया."

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का कहना है कि भारत की आबादी 140 करोड़ है और इसमें दो-तीन हज़ार लोग बहुत कम हैं. भारत में कुंभ का मेला लगता है, जिसमें लाखों की भीड़ जमा होती है और उसे भी सफलता से संचालित किया जाता है.

रोहतास के ज़िलाधिकारी धर्मेंद्र कुमार के मुताबिक़, "शोभा यात्रा के दौरान हंगामे की आशंका होती है और उसे हमने शांति पूर्वक संपन्न करा लिया था. इसलिए अगले दिन पुलिस की ड्यूटी आम दिनों की तरह थी."

यानी प्रशासन को गुरुवार रामनवमी की रात हुई वारदातों की कोई सूचना लोकल नेटवर्क से नहीं मिली, ताकि अगले दिन भी सुबह से ही सुरक्षा व्यवस्था चौकस रखी जा सके.

सासाराम के विजय कुमार सिंह का आरोप है कि उनके बेटे पर रामनवमी की रात को कुछ अल्पसंख्यक युवाओं ने हमला किया था.

वो कहते हैं, "यह प्रशासन की नाकामी है. उनके पास गुप्चर हैं, अपना सूचना तंत्र है. क्या उन्हें कहीं से कोई रिपोर्ट नहीं मिली. यह उन्हीं की नाकामी है."

बिहार शरीफ़ में लगे पोस्टर
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बिहार शरीफ़ और सासाराम

बिहार में जिन दो शहरों में सांप्रदायिक हिंसा हुई है, वहां दोनों समुदायों की आबादी में बहुत बड़ा अंतर नहीं है. कई इलाक़ों में दोनों ही समुदायों के दुकान और मकान आस-पास हैं.

बिहार की राजधानी पटना से क़रीब 70 किलोमीटर दूर स्थित बिहार शरीफ़ नालंदा ज़िले का मुख्यालय है.

रोहतास ज़िले का मुख्यालय सासाराम, पटना से क़रीब 150 किलोमीटर दूर है. सासाराम को मध्यकालीन भारत के एक शासक शेरशाह सूरी के मक़बरे के लिए जाना जाता है.

बिहार शरीफ़ की आबादी क़रीब साढ़े तीन लाख मानी जाती है, जिसमें मुस्लिम आबादी क़रीब 30 से 35 फ़ीसद है. जबकि सासाराम की आबादी क़रीब साढ़े तीन लाख है और मुस्लिम आबादी यहां भी क़रीब 35 फ़ीसद होने का अनुमान है.

कन्हैया भेलारी

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा के मुताबिक़, अगर कहीं एक समुदाय की जनसंख्या ज़्यादा होती है तो कम संख्या वाला समुदाय उसमें घुल-मिल जाता है.

वो कहते हैं, "असल में दोनों समुदायों में जो गुंडा तत्व होते हैं, जो शरारत पसंद लोग होते हैं, वो शरारत करते हैं. अगर जुलूस किसी मस्जिद के सामने से गुज़रे और ज़िला प्रशासन कहे कि डीजे ज़ोर से मत बजाओ, नारे मत लगाओ तो कुछ नहीं होगा."

सासाराम के विजय कुमार सिंह का भी कुछ ऐसा ही आरोप है. वो कहते हैं, "दोनों समुदायों में कुछ उपद्रवी तत्व हैं, इनको पढ़ाई-लिखाई या किसी चीज़ से कोई मतलब नहीं है, ये उन्हीं का काम है, ये लोग किसी के नहीं हैं."

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