बिहार के सासाराम में रामनवमी हिंसा के बाद का मंज़र : ग्राउंड रिपोर्ट

- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सासाराम (बिहार) से
आज कुलमति देवी को अपने ही घर का ताला खोलने में डर लग रहा है. जिस घर को तीन बच्चों के साथ मिलकर ख़ुद उन्होंने बनाया और संवारा था.
इसी घर में उन्होंने अपने बच्चों की शादी की और कई सपने देखे थे. लेकिन एक सांप्रदायिक ज़हर ने उनका सबकुछ छीन लिया है.
घर में सोने के बिस्तर जलकर राख हो चुके हैं. रसोईघर में केवल मिट्टी के एक चूल्हे की निशानी बची हुई है. उनके घर के सारे सामान लूट लिए गए यहां तक कि अनाज और सब्ज़ियां भी.
कुलमति देवी हिम्मत जुटाकर अपनी दो बहुओं के साथ अपने घर का हाल लेने आई हैं. सासाराम के इस वीरान मोहल्ले में किसी घर के सामने लोगों की मौजूदगी हैरान करने वाली थी.
बिहार के सासाराम में रामनवमी के बाद भड़की हिंसा ने कई घरों की तस्वीर बदल दी है. लोग जान बचाने के लिए अपने घरों को छोड़ कर परिजनों और जानकारों के घर चले गए हैं.
कुलमति देवी रोते हुए कहती हैं, "शुक्रवार रात का वक़्त था हम सब सो रहे थे. अचानक बाहर से पत्थरबाज़ी शुरू हो गई. पीछे-पीछे पुलिस वाले भी आए. उन्होंने हमें बचाकर घर से निकाला और जान बचाने के लिए यहां से कहीं और जाने को कहा."

डर का माहौल
इस हिंसा में किसी की जान तो नहीं गई लेकिन कई घरों को लूटा गया और उनमें आग लगा दी गई. सासाराम के इलाक़े में अब भी डर का माहौल बना हुआ है और अपने घर आने से घबरा रहे हैं.
हालांकि यहां चप्पे चप्पे पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की टुकड़ियां मौजूद हैं और पुलिस लगातार हर मोहल्ले में पेट्रोलिंग कर रही है.
शाहाबाद रेंज के डीआईजी नवीन चंद्र झा ने बीबीसी को बताया है पुलिस लगातार गश्त कर रही है और अब यहां माहौल नियंत्रण में है.
उनका कहना है, "कुछ लोग ज़रूर घबराए हुए हैं और अपने घरों को नहीं लौट रहे हैं. हम उनसे बात कर रहे हैं कि अब डरने की बात नहीं है और घर आकर अपनी सामान्य ज़िंदगी शुरू करें."

पुलिस और प्रशासन के लिए यह बात जितनी आसान है, दरअसल हक़ीकत इससे कोसों दूर है. सासाराम के गोला मंडी बाज़ार से क़रीब एक किलोमीटर की दूरी पर ही सपुलागंज और शाहज़लालपीर मोहल्ला है.
ये दोनों मोहल्ले इतने क़रीब हैं एक मोहल्ला कहां ख़त्म हो जाता है और दूसरा कहां शुरू हो जाता है, यह पता भी नहीं लगता.
सपुलागंज के घरों दर्जनों घरों और दुकानों में अगर ताले लटक रहे हैं तो शाहज़लालपीर की गलियां भी वीरान पड़ी हैं. इन गलियों में दो-तीन बच्चों से हमने पूछा कि सब लोग कहां है, तो एक बच्चे ने जवाब दिया सबका कसूर है, एक तरफ से कुछ नहीं हुआ.
थोड़ी दूर चलने पर हमें बच्चे की बात सही लगने लगी. यह अल्पसंख्यकों की बस्ती है और सड़क पर ईंट, पत्थर फेंके जाने की निशानी अब भी मौजूद है.

यहां सड़क पर घर के टूटे-फूटे सामान बिखरे पड़े हैं और आगजनी की वजह से कई घरों के बाहर राख बिखरी पड़ी है. तभी दूर से दो-तीन महिलाएं हमारी तरफ आईं.
इसी में मौजूद परजाना बेग़म कहने लगीं, "जिनके साथ इतने साल से रह रहे थे, वही जान लेने की कोशिश करेंगे ऐसा कभी सोचा भी नहीं था. हमारा घर पूरी तरह से लुट चुका है, कुछ भी नहीं बचा."
हिंसा की शुरुआत
हर साल की तरह इस साल भी सासाराम में रामनवमी की शोभा यात्रा निकाली गई. शाहज़लालपीर के पास ड्यूटी पर मौजूद एक महिला पुलिसकर्मी के मुताबिक़ रामनवमी के दिन तक सबकुछ शांत था और कोई परेशानी या हिंसा नहीं हुई, यहां शोभा यात्रा भी शांति से संपन्न हो गई.
रामनवमी की रात को ही पुलिसवालों और सासाराम के लिए माहौल कुछ ही घंटों में बदल गया. यहां मुख्य बाज़ार के साथ ही एक मोहल्ला है खिड़कीगंज.
खिड़कीगंज के ही एक बुज़ुर्ग झलेंद्र प्रसाद गुप्ता कहते हैं, "रात को ज़्यादातर लोग रामनवमी की शोभा यात्रा में थे और हम सब सो रहे थे. तभी यहां घरों पर अचानक पत्थरबाज़ी शुरू हो गई, हालांकि पुलिस फौरन पहुंच गई और मामला शांत हो गया."

बम फटने के बाद अफ़वाहों का दौर
उनके मुताबिक़ अगले दिन शेरगंज और क़ादिरगंज जैसे मोहल्ले से भी हिंसा की ख़बरें आईं. इसी दौरान एक बम धमाके ने शहर का माहौल बदल दिया और कई तरह की अफ़वाहें फ़ैलने लगीं.
दरअसल यह शुक्रवार का दिन था और अल्पसंख्यक मोहल्ले के लोग नमाज पढ़ने गए थे. इसी दौरान शाहज़लालपीर मोहल्ले में हिंसा शुरू हो गई.
गुलाम मुस्तफ़ा इसी मोहल्ले के रहने वाले हैं. पुलिस की मौजूदगी ने उनको भी साहस दिया है और वो अपने घर को देखने आए हैं.
गुलाम मुस्तफ़ा बताते हैं, "घर पर कोई मर्द नहीं था. पहले पत्थरबाज़ी हुई फिर घर को लूटा गया और आग लगा दी गई. मैं सिलाई का काम करता था, मेरी मशीन भी उठाकर ले गए."

इस हिंसा के बाद इलाक़े में भगदड़ मच गई और लोग बचने के लिए जहां-तहां भागकर छिप गए. इस तरह की हिंसा और भी कई मोहल्लों में भड़की.
उसके बाद से शहर में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई और लोगों को अफ़वाहों से बचने को कहा जा रहा है.
डीआईजी नवीन चंद्र झा बताते हैं, "तीन दिन पहले बम धमाके की जो ख़बर आई थी उसकी जांच की जा रही है और सोमवार सुबर एक छोटा धमाका हुआ था, एक घर की दीवार पर निशान देखा गया है, लेकिन इसका सासाराम हिंसा से कोई संबंध नहीं है."

इससे पहले 80 के दशक में हुई थी हिंसा
सासाराम बिहार के रोहतास ज़िले का ऐतिहासिक शहर है. यह शेरशार सूरी के मक़बरे के लिए मशहूर है.
यहां के ज़्यादातर मोहल्लों की हलचल देखकर अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता है कि शहर में कोई तनाव है.
लेकिन चप्पे चप्पे पर पुलिस की मौजूदगी कुछ और बयां कर रही थी. यहां के मुख्य बाज़ार पर एक दुकानदार का कहना था कि दिन में डर नहीं लगता लेकिन रात में घबराहट होती है.
इसी दुकान पर मौजूद एक बुज़ुर्ग ने बताया कि सासाराम में बड़ी हिंसा 1980 के दशक के अंत में हुई थी और उसके बाद यहां कभी ऐसी हिंसा नहीं हुई. लोग आमतौर पर मिलजुलकर रहते हैं.

कोरोना के समय भी तनाव
सासाराम की परज़ाना बेग़म बताती हैं, "यहां कोविड के दौरान एक बार दो समुदायों के बीच झगड़ा हुआ था. दरअसल उस समय लोग एक दूसरे को छूते नहीं थे और इसी वजह से पैसे लेने-देने में एक बार दो समुदाय भिड़ गए थे. लोग कहते थे कि दूर हटो नहीं तो कोरोना फ़ैलेगा."
हालांकि दो लोगों की वजह लड़ाई दो समुदायों की लड़ाई बन गई थी और इलाक़े में एक तरह का तनाव पैदा हो गया था. लेकिन लॉकडाउन की वजह से लोग घरों में बंद हो गए तो बात ज़्यादा आगे नहीं बढ़ी और मामला शांत हो गया.
बिहार शरीफ़ के सन्नाटे ने हमें कोविड लॉकडाउन की याद दिलाई थी और एक बार फिर से हमें कोविड का ज़िक्र सुनने को मिला.

पुलिस की भूमिका
बिहार के सासाराम की हिंसा को लेकर सियासत भी खूब हुई है. सबसे पहले बीजेपी ने अप्रैल को यहां होने वाली गृहमंत्री अमित शाह की जनसभा को रद्द कर दिया. बीजेपी ने आरोप लगाया कि अमित शाह की रैली को देखकर शहर में धारा 144 लागू की गई.
हालांकि प्रशासन ने दावा किया कि यहां कभी धारा 144 नहीं लगाई गई. लेकिन प्रशासन दावे के बाद भी शहर की तस्वीर अलग कहानी बयां करती है.
दोनों ही समुदायों के लोग आरोप लगा रहे हैं कि पुलिस की मौजूदगी में उनके घरों को लूटा गया.
सपुलागंज की ही पूनम देवी कहती हैं, "पुलिसवाले कह रहे थे कि जान बचानी है तो घर छोड़कर भाग जाओ. उनके सामने हमारे घर पर हमला हो रहा था, लेकिन उन्हें रोकने की जगह हमें घर से जाने को कह रहे थे."

पुलिस पर आरोप
पूनम देवी का कहना है कि पुलिस के कहने पर घर लौट भी जाएंगे तो घर में खाने तक को कुछ भी नहीं है, छोटे-छोटे बच्चों को क्या खिलाएंगे.
सासाराम में पुलिस पर यह आरोप दोनों ही समुदाय लगा रहे हैं कि उन्होंने हिंसा को रोकरने के लिए कुछ भी नहीं किया.
रजाना बेग़म के मुताबिक़ पुलिस के सामने लोग भड़काऊ नारे लगा रहे थे, सामने घरों पर झंडे लगा दिए गए, लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया.
पुलिस पर लगे आरोपों के बारे में रोहतास जिला एसपी का कहना है कि ये पूरी तरह से अफ़वाह और झूठ है. पुलिस ने किसी को घर छोड़ने के लिए नहीं कहा. इसके उलट पुलिस लोगों से घर के अंदर रहने की अपील कर रही थी.
"रामनवमी का जुलूस पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से पूर्व निर्धारित रास्ते से निकला. हिंसा रामनवमी के दिन नहीं बल्कि अगले दिन हुई. इस हिंसा में उपद्रवी तत्वों का हाथ है, करीब 50 लोग गिरफ़्तार किए गए हैं. जाँच अभी जारी है."
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