पश्चिम बंगाल: रामनवमी के मौक़े पर बार-बार क्यों हो रही है सांप्रदायिक हिंसा?

पश्चिम बंगाल
    • Author, अमिताभ भट्टासाली
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला

बादशाह शेरशाह सूरी (1486-1545) ने देश के पूर्वी और पश्चिमी हिस्से को जोड़ने के लिए ग्रैंड ट्रंक रोड या जीटी रोड नाम की जिस विशाल सड़क का निर्माण करवाया था उसके किनारे चाय की एक टूटी-फूटी दुकान पर मोहम्मद सऊद चुपचाप बैठे थे. उनकी दुकान से पास एक हिंदू मंदिर है.

मोहम्मद सऊद बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "मैं मुसलमान हूं. लेकिन बग़ल में ही एक हिंदू मंदिर है. उसके दूसरी तरफ़ मेरे भाई की दुकान है. हम लोग ही इस मंदिर की साफ़-सफ़ाई कर बत्ती जला देते हैं. मैं इतने साल से यहां दुकान चला रहा हूं, अब तक कुछ भी नहीं हुआ था. लेकिन देखिए, वह लोग मेरी दुकान को तहस-नहस कर चले गए."

मोहम्मद सऊद बिहार के समस्तीपुर इलाक़े से क़रीब चार दशक पहले रोज़ी-रोटी की तलाश में हुगली ज़िले के जूट मिल वाले इलाक़े रिसड़ा में आए थे. इसी रिसड़ा में कुछ दिन पहले रामनवमी के जुलूस के दौरान सांप्रदायिक हिंसा हुई थी.

पुलिस ने उत्सव के दो दिनों बाद वहां जुलूस निकालने की अनुमति दी थी. इसके पीछे दलील दी गई थी कि तमाम इलाक़े में एक ही दिन रामनवमी का जुलूस निकालने की स्थिति में हर इलाक़े में पुलिस का समुचित इंतज़ाम करना संभव नहीं होगा. इसलिए अलग-अलग दिन जुलूस का आयोजन किया जाएगा.

रिसड़ा में रविवार दो अप्रैल को जुलूस का आयोजन किया गया था.

सऊद की दुकान के ठीक सामने एक और टूटी-फूटी दुकान नज़र आती है. उन्होंने बताया, "मैंने सुना था कि जहां जुलूस निकला है वहां उपद्रव हो रहा है. शाम को अचानक युवकों के एक गुट ने यहां आकर पास खड़े कुछ ठेलों को आग लगा दी. वह सब ठेले मुसलमानों के थे. उसके बाद मेरी दुकान में तोड़-फोड़ की और सामानों को तहस-नहस कर दिया."

जीटी रोड पर जब दुकानों में तोड़-फोड़ हो रही थी और ठेलों में आग लगाई जा रही थी, तब वहां से कुछ दूर हिंदू बहुल इलाक़ों पर ईंट के टुकड़े और शीशे की बोतलें फेंकी जा रही थी. घटना के कुछ दिनों बाद भी ईंटों के टुकड़ें और बोतलें सड़क के किनारे एक जगह रखी थीं.

उस इलाक़े की गलियों में हिंदुत्व के प्रतीक भगवा झंडों की भरमार है, नुक्कड़ और चौराहों पर आम लोगों की भीड़ है. पुलिस बीच-बीच में सबको वहां से जाने के लिए कह रही है.

रिसड़ा मूल रूप से एक औद्योगिक इलाक़ा है. वहां नज़दीक ही एक जूट मिल भी है. मज़दूरों के मोहल्ले में आम तौर पर धार्मिक हिंसा नहीं होती थी.

रिसड़ा में इससे पहले कभी सांप्रदायिक हिंसा भी नहीं हुई थी.

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इमेज कैप्शन, मोहम्मद सऊद

इस बार तनाव कैसे शुरू हुआ?

अभिषेक सिंह नामक एक युवक बताते हैं, "बीते 12 वर्षों से जिस तरह रामनवमी का जुलूस निकलता था, इस साल भी उसी तरह निकला था. लेकिन पहले के मुक़ाबले अंतर यह था कि इस बार भीड़ ज़्यादा थी, इस बार बहुत से लोग जमा हुए थे. जुलूस के जीटी रोड से गुज़रते समय दूसरे संप्रदाय के लोगों (मुसलमानों) ने पथराव शुरू कर दिया. बस, उसके बाद ही झगड़ा शुरू हो गया."

रिसड़ा की घटना से दो दिन पहले हावड़ा के शिवपुर में भी ठीक इसी तरह सांप्रदायिक हिंसा हुई थी.

हुगली ज़िले के रिसड़ा में पहले कभी सांप्रदायिक संघर्ष भले नहीं हुआ हो, हावड़ा के जिस इलाक़े में 30 मार्च को रामनवमी के दिन हिंसा हुई, वहां वर्ष 2022 में भी रामनवमी के दिन शाम को इसी तरह हिंसा हुई थी.

शिवपुर के क़ाज़ीपाड़ा इलाक़े में घूमते समय एक हिंदू मंदिर पर निगाह जाती है. उसके ठीक सामने क़तार से मुसलमान दुकानदार फल बेच रहे हैं. वहां से रोज़ा (आज कल रमज़ान का महीना चल रहा है जिसमें मुलसमान रोज़ा रखते हैं) रखने वाले मुसलमान जिस तरह फल ख़रीद रहे हैं, उसी तरह हिंदू भी फल ख़रीद रहे हैं.

उसके पास बने एक आवासीय परिसर में रहने वाले राजेश झंवर कहते हैं, "उनके साथ तो हमारे संबंध कभी ख़राब नहीं थे. हम उनकी दुकानों से आम तौर पर फल और सब्ज़ियां ख़रीदते रहे हैं. उस दिन पता नहीं क्यों वह लोग अचानक पत्थर फेंकने लगे."

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स्थानीय लोगों का कहना है कि रामनवमी के जुलूस के एक मस्जिद के सामने से गुज़रते समय उस पर पथराव किया गया. उस सम वहां इफ़्तार का आयोजन हो रहा था.

सरकार का दावा है कि जुलूस को उस इलाक़े से गुज़रने की अनुमति नहीं थी क्योंकि बीते साल भी वहां हिंसा हुई थी. पुलिस ने बताया है कि अनुमति नहीं होने के बावजूद जुलूस वहां गया. उसमें शामिल लोगों के हाथों में हथियार और पिस्तौल भी थे.

स्थानीय निवासी महताब अज़ीज़ बताते हैं, "पहले पथराव किसने किया यह तो मैं नहीं जानता लेकिन उसके बाद दोनों धर्मों के लोगों के बीच पथराव शुरू हो गया."

राजेश झंवर जिस बहुमंज़िला इमारत में रहते हैं वहां के एक निवासी अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "मैं खिड़की के पास बैठकर अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था. कुछ ही पलों में सामने की सड़क जैसे युद्धक्षेत्र में बदल गई."

वे अपने फ़्लैट से रिकॉर्ड किया हुआ वीडियो मुझे दिखाते हैं. वीडियो में देखा जा सकता है कि पथराव करने वालों में से किसी के सिर पर टोपी है तो किसी के हाथ में गेरुआ झंडा.

पथराव के बाद ही इलाक़े में आगज़नी और तोड़-फोड़ भी शुरू हो गई. हिंसा की आग में किसी के फलों का ठेला जल गया तो बैंक से क़र्ज़ लेकर ख़रीदी गई किसी की टैक्सी.

पीएम बस्ती की जिस मस्जिद के सामने हिंसा शुरू हुई, उसी गली में मेरी मुलाक़ात हुई शाहिद वारसी से हुई. उन्होंने बैंक से क़र्ज़ लेकर एक टैक्सी ख़रीदी थी.

वारसी का कहना था, "मेरी टैक्सी कोने में खड़ी थी. उस पर मेरा नाम और माशा अल्लाह लिखा था. वही देख कर उन लोगों ने टैक्सी को जला दिया. मैं इस बारे में बात करने बैंक गया था. लेकिन उन लोगों ने हाथ खड़े करते हुए कह दिया कि वे इस मामले में कुछ नहीं कर सकते. मेरी टैक्सी को उन्होंने जला दिया लेकिन क़र्ज़ की क़िस्त मुझे चुकानी ही होगी."

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इमेज कैप्शन, शाहिद वारसी

स्थानीय लोग कहते हैं कि अगले दिन यानी शुक्रवार को जुमे की नमाज़ के बाद मुसलमानों ने अलग-अलग समूहों में आकर इलाक़े के कई आवासीय परिसरों पर पथराव किया था.

वहां रहने वाली मेघना झंवर बताती हैं, "नमाज़ के बाद यहां आकर मुसलमानों ने पथराव शुरू कर दिया. एक आवासीय परिसर के अलावा मंदिर पर भी पत्थर फेंके गए. एक बड़े शोरूम का पूरा शीशा तोड़ दिया गया. उसमें आग भी लगा दी गई थी. पुलिस ने मौक़े पर मौजूद होने के बावजूद कुछ नहीं किया."

उनका कहना था कि बीते साल भी ऐसी ही घटना हुई थी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह घटना महज़ संयोग है. यह पूरी तरह सुनियोजित ही है.

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इमेज कैप्शन, मेघना झंवर

शुक्रवार की दोपहर को इलाक़े के एक हिंदू मंदिर पर पथराव किया गया था, वहां अब भी इसके सबूत बिखरे पड़े हैं.

मंदिर के पुरोहित सुदामा ठाकुर बताते हैं, "दोपहर क़रीब एक-डेढ़ बजे अचानक पथराव शुरू हो गया. मैं उस समय मंदिर के भीतर ही था. किसी ने विग्रह की ओर या मंदिर के भीतर तो पत्थर नहीं फेंके, लेकिन बाहर की ओर, छत पर बारिश की तरह पत्थर गिर रहे थे. मैंने उन पत्थरों को एक जगह जमा कर रखा है."

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इमेज कैप्शन, इस मंदिर पर हमले के आरोप

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

हावड़ा के रहने वाले राज्य के मंत्री अरूप राय बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "हमने तो बचपन से ही रामनवमी के जुलूस देखे हैं. हमारे शहर का रामराजातला इलाक़ा तो राम की पूजा के लिए ही मशहूर है."

"लेकिन हमने लाठी, तलवार और पिस्तौल के साथ रामनवमी का जुलूस निकलते कभी नहीं देखा था. अब हाल के वर्षों से यह सब देख रहे हैं. ऐसा वही लोग करना चाहते थे जिनको हिंदू और मुसलमान के विभाजन से फ़ायदा होगा."

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इससे साफ़ है कि तृणमूल कांग्रेस सीधे तौर पर इस सांप्रदायिक हिंसा के लिए हिंदुत्ववादी संगठनों को ज़िम्मेदार ठहरा रही है. दूसरी ओर, भाजपा इसके लिए मुख्यमंत्री को दोषी ठहरा रही है.

पार्टी के प्रदेश सचिव उमेश राय बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "सौ फ़ीसद मुस्लिम वोटों का तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में ध्रुवीकरण हुआ था, वह अब लौट रहा है. इसके दोबारा ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने सुनियोजित तरीक़े से यह सब कराया है. राजनीति से किसी न किसी को तो फ़ायदा होगा ही. लेकिन ममता अपनी बयानबाज़ी के ज़रिए बंगाल को आग की ओर धकेल रही हैं."

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पुलिस इस बार रामनवमी के मौक़े पर राज्य में होने वाली सांप्रदायिक हिंसा की तमाम घटनाओं की जांच कर रही है. लेकिन घटनाक्रम से लगता है कि हर जगह एक ही तरीक़े से हिंसा फैली है.

रामनवमी का जुलूस मग़रिब (शाम क़रीब 6-7 बजे के क़रीब पढ़ी जाने वाली नमाज़) की नमाज़ या इफ़्तार के समय मस्जिद या मुस्लिम बहुल इलाक़ों के सामने से गुज़रा और ठीक वहीं टकराव हुआ है.

महताब अज़ीज़ कहते हैं, "मैंने पहले भी रामनवमी के जुलूस देखे हैं. वह लोग भक्ति गीत बजाते हुए जुलूस लेकर गुज़र जाते थे. लेकिन इस बार बजने वाले गीत भड़काऊ थे. मिसाल के तौर पर यह गीत बज रहा था कि हिंदुस्तान में रहने पर क्या-क्या करना होगा---ऐसे ही तमाम गीत थे."

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इमेज कैप्शन, महताब अज़ीज़

रामनवमी के जुलूस में भड़काऊ गीतों का ज़िक्र छिड़ते ही वर्ष 2018 की घटना की याद आती है.

उस साल कोयलांचल और औद्योगिक इलाक़े आसनसोल-रानीगंज में रामनवमी के जुलूस से ही बड़े पैमाने पर दंगा भड़का था.

उस दंगे की रिपोर्टिंग के लिए जाने पर पता चला था कि रामनवमी के जुलूस में जो गीत बजाए जा रहे थे वह मुस्लिम समाज को उत्तेजित करने के लिए पर्याप्त था.

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इमेज कैप्शन, उपद्रवग्रस्त इलाकों में लोगों से बात करते बीबीसी संवाददाता अमिताभ भट्टासाली

इंटरनेट पर फैलने वाले उन गीतों में क्या होता है?

इंटरनेट पर फैले ऐसे गीतों को रामनवमी के जुलूस के लिए डीजे के ज़रिए अलग-अलग साउंड ट्रैक को मिला कर तैयार किया जाता है.

इनमें से ज़्यादातर गीत पाकिस्तान के प्रति ज़हर उगलते हुए शुरू होते हैं. जय श्रीराम और पाकिस्तान-विरोधी नारों या छोटे-से भाषण से शुरू होने के बावजूद इन गीतों के बाक़ी हिस्सों में पाकिस्तान का ज़िक्र नहीं रहता.

एक गीत में कहा गया है- 'जिस दिन हिंदू जाग उठेगा, उस दिन टोपी वाले सिर झुका कर जय श्री राम कहेंगे'. वहीं एक और गीत में लिखा है- 'जिस दिन हमारा ख़ून गरम होगा, उस दिन तुमको दिखा देंगे, उस दिन मैं नहीं, मेरी तलवार बात करेगी.'

साउंड ट्रैक में कुछ छोटे-छोटे भाषण भी होते हैं—उनको ध्यान से पूरा सुनें तो साफ़ हो जाएगा कि तमाम बातें मुस्लिम समुदाय को निशाने पर रख कर ही कही जा रही हैं. इन गीतों में जय श्रीराम, भारत माता की जय और वंदे मातरम जैसे नारे भी होते हैं.

रामनवमी के जुलूस के दौरान होने वाली सांप्रयादिक हिंसा की शुरुआत वर्ष 2018 में आसनसोल-रानीगंज के दंगे से ही हुई थी.

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दंगों का चुनावी कनेक्शन

राजनीतिक विश्लेषक और कोलकाता के रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के शिक्षक सब्यसाची बसु रायचौधरी कहते हैं कि यह एक निश्चित पैटर्न है.

वो कहते हैं, "2018 में राज्य में पंचायत चुनाव या अगले साल यानी 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले इसी तरह रामनवमी के मुद्दे पर ऐसी घटनाएं हुई थी. अब हम 2023 में भी इसी मुद्दे पर हिंसा देख रहे हैं. अगले कुछ महीनों में पंचायत चुनाव होने हैं और अगले साल लोकसभा के चुनाव हैं. तमाम सांप्रदायिक हिंसा एक ही पैटर्न पर हो रही है. यह महज़ संयोग नहीं है."

इस मुद्दे के बारे में बात करते हुए वह बताते हैं कि सांप्रदायिक हिंसा होने पर धार्मिक ध्रुवीकरण होता है और उसका असर सामने चुनाव होने पर उसके नतीजों पर पड़ता है.

2018 के दंगे और उसके कारण होने वाले धार्मिक ध्रुवीकरण का फ़ायदा भाजपा को उस साल के पंचायत चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में मिला था.

बसु रायचौधरी कहते हैं, "इस नए तरह के धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश में एक ओर जहां भाजपा का स्वार्थ छिपा है वहीं दूसरी ओर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस का भी स्वार्थ छिपा है."

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इमेज कैप्शन, सब्यसाची बसु रायचौधरी

टीएमसी से मुसलमान वोट खिसक रहे हैं?

हाल में मुर्शिदाबाद ज़िले की मुसलमान बहुल सागरदीघी विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ था. वह सीट तृणमूल कांग्रेस के क़ब्ज़े में थी. लेकिन इस बार वहां कांग्रेस-वामपंथी गठजोड़ का उम्मीदवार जीत गया.

इससे पहले तृणमूल कांग्रेस वहां क़रीब 50 हज़ार वोटों के अंतर से जीती थी, लेकिन इस बार वहां गठजोड़ के उम्मीदवार की जीत का अंतर क़रीब 25 हज़ार था, यानी तृणमूल कांग्रेस के पाले से क़रीब 75 हज़ार वोट खिसक कर विपक्षी ख़ेमे में चले गए.

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में मुसलमानों का बड़ा हिस्सा तृणमूल कांग्रेस को ही वोट देता है, लेकिन सागरदीघी के नतीजे के बाद तृणमूल कांग्रेस को इस बात की चिंता है कि क्या मुस्लिम वोटर उससे दूर खिसक रहे हैं!

सब्यसाची बसु रायचौधरी कहते हैं, "हाल की कुछ घटनाओं, जिनमें सागरदीघी उपचुनाव का नतीजा भी शामिल है, से मिले संकेतों से शायद तृणमूल कांग्रेस को इस बात की आशंका है कि अल्पसंख्यक वोट, जिसका ज़्यादातर हिस्सा उसे ही मिलता था, का विभाजन हो सकता है. इसलिए धर्म के आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण दोनों पक्षों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है."

इसी वजह से वह मानते हैं कि हावड़ा के शिवपुर, हुगली के रिसड़ा और उत्तर दिनाजपुर के दालखोला में रामनवमी के जुलूस के मुद्दे पर जो कुछ हुआ वह संयोग नहीं है.

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