महुआ मोइत्रा और निशिकांत दुबे के बीच किस बात को लेकर हो रही है तकरार

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
कांग्रेस नेता राहुल गांधी की संसद की सदस्यता ख़त्म होने के बाद विपक्षी दल लगातार केंद्र सरकार और बीजेपी को घेर रहे हैं.
राहुल गांधी को मानहानि के एक मामले में दो साल की सज़ा सुनाई गई है. उसके बाद राहुल गांधी की संसद सदस्यता भी समाप्त कर दी गई.
इस संबंध में लोकसभा सचिवालय ने नोटिफ़िकेशन जारी किया था. कांग्रेस पार्टी इस पर भी सवाल उठा रही है.
इसी सिलसिले में पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने भी लोकसभा सचिवालय पर सवाल उठाए हैं.
महुआ मोइत्रा ने ट्वीट कर लिखा है कि शपत्रपत्र में झूठ बोलना और झूठे दस्तावेज़ पेश करना एक अपराध है, इंतज़ार रहेगा कि इसपर कितनी ज़ल्दी कार्रवाई होती है, या फिर अलग-अलग लोगों के लिए इसका अलग-अलग पैमाना है.
मोइत्रा ने इस ट्वीट में झारखंड की गोड्डा लोकसभा सीट से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे पर गंभीर आरोप लगाए हैं.
निशिकांत दुबे लगातार तीन बार यानी साल 2009, 2014 और 2019 से इस सीट से सांसद हैं.
महुआ मोइत्रा के आरोप

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महुआ मोइत्रा ने निशिकांत दुबे के चुनावी हलफ़नामें का ज़िक्र करते हुए चार मुद्दे उठाए हैं.
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1. महुआ मोइत्रा का पहला आरोप यह है कि निशिकांत दुबे ने साल 2009, 2014 और 2019 में जो चुनावी हलफ़नाम दिया है, उसके मुताबिक़ उनका जन्म साल 1972 में हुआ है. साल 2009 और साल 2014 के शपथपत्र के मुताबिक़ निशिकांत दुबे ने साल 1982 में मैट्रिक (दसवीं) की परीक्षा पास की है. यानी दस साल की उम्र में उन्होंने मैट्रिक पास कर ली और 17 साल की उम्र में भागलपुर के मारवाड़ी कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरा कर लिया.
2. महुआ मोइत्रा का कहना है कि साल 2009 और साल 2014 के चुनावी हलफ़नामे में निशिकांत दुबे ने साल 1993 में दिल्ली विश्वविद्यालय से एमबीए का ज़िक्र किया है, जबकि डीयू का कहना है कि उस साल डीयू में न तो निशिकांत दुबे नाम के किसी छात्र ने दाख़िला लिया और न ही डिग्री ली है.
3. महुआ मोइत्रा का दूसरा आरोप है कि निशिकांत दुबे ने साल 2019 के चुनावी हलफ़नामें में कहा है कि उन्होंने साल 2018 में प्रताप यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री ली है. महुआ मोइत्रा का कहना है कि पीएचडी की डिग्री के लिए पहले मास्टर्स की डिग्री होनी चाहिए.
निशिकांत दुबे का दावा है कि उन्होंने प्रताप यूनिवर्सिटी से एमबीए की एक और डिग्री ली है. अगर निशिकांत दुबे की दिल्ली यूनिवर्सिटी की डिग्री सही है तो फिर उन्हें दूसरी बार एमबीए करने की क्या ज़रूरत पड़ी?
महुआ मोइत्रा का आरोप है कि निशिकांत दुबे के दावे के मुताबिक़ उन्होंने प्रताप यूनिवर्सिटी से साल 2013 से 2015 के बीच रेगुलर कोर्स के ज़रिए एमबीए किया है.
इस दौरान निशिकांत दुबे पहली बार गोड्डा लोकसभा सीट से सांसद बने थे. महुआ मोइत्रा ने मांग की है कि सांसद रहते हुए क्या वो रेगुलर क्लास कर रहे थे और क्या उन्होंने न्यूनतम क्लास अटेंड किया था, इसकी जाँच होनी चाहिए.
4. महुआ मोइत्रा का चौथा आरोप है कि मौजूद दस्तावेज़ों के मुताबिक़ निशिकांत दुबे ने साल 2015 से 2018 के बीच राजस्थान से फुल टाइम पीएचडी की डिग्री ली है, जबकि वो उस दौरान लोकसभा सांसद थे. इसके अलावा निशिकांत दुबे ने इसमें अपना जन्म 28 जनवरी 1969 बताया है.
महुआ मोइत्रा ने इन सब कथित विसंगतियों की जाँच और इस पर फ़ौरन कार्रवाई की मांग की है.
इसके लिए उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और सेंट्रल विजिलेंस कमिशन को चिट्ठी भी लिखी है.
ऐसा भी नहीं है कि महुआ मोइत्रा ने इस मुद्दे को राहुल गांधी की सदस्यता ख़त्म होने के बाद उठाया है. उन्होंने इसी महीने 21 मार्च को भी इस मुद्दे पर ट्वीट किया था.
बीजेपी सांसद के चुनावी हलफ़नामे का ज़िक्र करते हुए महुआ ने लिखा था, "दस्तावेज़ों के मुताबिक निशिकांत दुबे ने 10 साल की उम्र में मैट्रिक पास कर ली थी. वो जीनियस हैं और हम सब ग़रीब नगरवधुएँ, उनके इस कमाल को केवल देख ही सकते हैं."
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पुरानी तल्ख़ी

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निशिकांत दुबे और महुआ मोइत्रा के बीच लंबे समय से कई मुद्दों पर तक़रार होती रही है और दोनों के समर्थक आपस में एक-दूसरे से सोशल मीडिया पर भी भिड़ते रहते हैं.
महुआ मोइत्रा ने अपने ट्वीट में जिस नगरवधू का ज़िक्र किया है, उसे दरअसल निशिकांत दुबे के इसी 18 मार्च के एक ट्वीट से जोड़कर देखा जा रहा है.
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निशिकांत दुबे के इस ट्वीट पर काफ़ी विवाद भी हुआ था. उस ट्वीट पर दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालिवाल ने भी आपत्ति दर्ज की थी.
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दरअसल इन दोनों सांसदों के बीच रंज़िश काफ़ी पुरानी है. 28 जुलाई 2021 को आईटी मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति की एक बैठक में निशिकांत दुबे ने आरोप लगाया था कि महुआ मोइत्रा ने उनको 'बिहारी गुंडा' कहा है.
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यह बैठक 'पेगासस जासूसी कांड' के मुद्दे पर बुलाई गई थी और आरोप लगा था कि सरकार नहीं चाहती थी कि यह मीटिंग हो.
जबकि महुआ मोइत्रा ने इस आरोप से इनकार किया था और कहा था कि कोरम पूरा नहीं होने की वजह से उस दिन मीटिंग ही नहीं हो पाई थी.
उनका कहना था कि अगर निशिकांत दुबे मीटिंग में आ जाते, तो कोरम पूरा हो जाता और मीटिंग हो जाती.
मीटिंग नहीं हो पाई यानी निशिकांत दुबे मीटिंग में नहीं थे, यह उस दिन के रजिस्टर में भी देखा जा सकता है.
निशिकांत दुबे पर महुआ मोइत्रा के ताज़ा आरोपों के बाद बीबीसी ने इस मामले में उनका पक्ष जानने की कोशिश की.
निशिकांत दुबे का क्या कहना है?

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निशिकांत दुबे का कहना है कि इस मामले पर हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग तक का फ़ैसला उनके पक्ष में आ चुका है.
उन्होंने पूछा है कि सुप्रीम कोर्ट से भी बड़ा कोई हो सकता है क्या?
निशिकांत दुबे का कहना है कि उनके वोटर कार्ड में जो उम्र दर्ज कर ली गई है, अपने चुनावी हलफ़नामे में उन्हें उसी उम्र का ज़िक्र करना होता है.
उनका दूसरा दावा यह भी है कि लोग एक से ज़्यादा एमए कर सकते हैं और करते हैं, फिर वे क्यों दो बार एमए नहीं कर सकते.
दरअसल एक कथित आरटीआई के ज़रिए दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे की एमबीए की डिग्री के बारे में जानकारी मांगी गई थी.
आरटीआई डालने वाले ने दावा किया था डीयू ने जानकारी दी है कि साल 1993 में डीयू में न तो निशिकांत दुबे नाम के किसी छात्र ने दाख़िला लिया है और न ही डिग्री ली है.
इस कथित आरटीआई के आधार पर झारंखंड में सत्ता पर बैठी झारखंड मुक्ति मोर्चा ने 27 जुलाई 2020 को चुनाव आयोग को एक चिट्ठी लिखकर इस पर कार्रवाई की मांग की थी.
इस पर 25 दिसंबर 2020 को चुनाव आयोग ने जवाब दिया था कि दोनों पक्षों से मिली जानकारी के बाद आयोग को निशिकांत दुबे के ख़िलाफ़ कार्रवाई का कोई आधार नहीं मिला है.
निशिकांत दुबे का दावा है कि डीयू ने बाद में कोर्ट में कहा कि न उनके पास ऐसी कोई आरटीआई आई थी और न ही डीयू इस तरह की आरटीआई का जवाब देता है.
निशिकांत दुबे का कहना है कि गोरखपुर के जिस व्यक्ति के नाम पर आरटीआई की बात की जाती है, उन्होंने ख़ुद गोरखपुर के एक थाने में इसकी शिकायत की थी.
विजेंद्र कुमार पांडेय नाम के इस व्यक्ति का कहना था कि ऐसी कोई आरटीआई उन्होंने नहीं डाली थी. निशिकांत दुबे ने इस शिकायत का दस्तावेज़ भी बीबीसी को मुहैया कराया है.
हालाँकि इसी आरटीआई के आधार पर झारखंड के देवघर में एक व्यक्ति ने सांसद निशिकांत दुबे के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई थी और इसपर वहाँ चार्जशीट भी दाख़िल की गई थी.
निशिकांत दुबे इसके ख़िलाफ़ राँची हाईकोर्ट गए थे. राँची हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद 30 मार्च 2022 को देवघर में निशिकांत दुबे पर दर्ज एफ़आईआर को रद्द करने का आदेश दिया था और निशिकांत दुबे के पक्ष में फ़ैसला सुनाया था.
हाई कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद एफ़आईआर दर्ज कराने वाले व्यक्ति की जगह झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी और सुप्रीम कोर्ट ने भी 7 नवंबर 2022 को रांची हाईकोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराते हुए निशिकांत दुबे के पक्ष में आदेश दिया था.
महुआ मोइत्रा ने क्या कहा?
इस मामले पर महुआ मोइत्रा का पक्ष लेने के लिए बीबीसी ने उनसे भी संपर्क किया.
महुआ मोइत्रा का कहना है, "डीयू की जो चिट्ठी मैंने दी है, वो फ़्रॉड नहीं है, वो झारखंड पुलिस की सर्टिफ़ाइड कॉपी है. डीयू ने ख़ुद मना किया है कि उस समय निशिकांत दुबे नाम का कोई स्टूडेंट नहीं था."
उनका कहना है कि यह महुआ मोइत्रा की निशिकांत दुबे से लड़ाई नहीं है और चुनाव आयोग या कोर्ट ने क्या कहा है इससे मुझे कोई मतलब नहीं है, यह चुनावी हलफ़नामें में झूठ का मामला है.
महुआ मोइत्रा ने मांग की है कि निशिकांत दुबे ने प्रताप यूनिवर्सिटी से सांसद रहते हुए कैसे पीएचडी की है इसकी जाँच होनी चाहिए. इसके लिए यूनिवर्सिटी के रजिस्टर और पार्लियामेंट के रजिस्टर में उनकी हाज़िरी की जाँच होनी चाहिए.
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