अणुब्रत मंडल: पश्चिम बंगाल में बिना किसी पद के कैसे बने इतने ताक़तवर

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
केस्टो उर्फ़ अणुब्रत मंडल.
वर्ष 1998 में ममता बनर्जी की ओर से तृणमूल कांग्रेस के गठन के कुछ साल बाद से अब तक बीरभूम ज़िले में पार्टी प्रमुख.
पश्चिम बंगाल से बाहर ज़्यादा लोग भले ही डील-डौल वाले इस शख़्स को नाम या चेहरे से नहीं पहचानते हों लेकिन इस राज्य और ख़ासकर बीरभूम और आस-पास के इलाके में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जिसने अणुब्रत का नाम न सुना हो.
राज्य में बिना किसी प्रशासनिक या संवैधानिक पद के शायद ही दूसरा कोई व्यक्ति इतना रसूखदार रहा हो.
बीते साल 11 अगस्त को पशु तस्करी मामले में सीबीआई और फ़िर ईडी के हाथों गिरफ़्तारी के बाद लगातार जेल में रहने के बावजूद उनकी लोकप्रियता का ग्राफ़ रत्ती भर भी कम नहीं हुआ है.
बीरभूम में उनके रसूख़ का आलम यह है कि लोग आपसी बातचीत में कहते हैं कि ज़िले में मंडल के कहने पर बाघ और बकरी एक ही घाट पर पानी पीते हैं.
उनकी गिरफ़्तारी के महीनों बीत जाने के बावजूद ममता बनर्जी ने मंडल की जगह किसी नेता को ज़िले में पार्टी की कमान नहीं सौंपी है.
इसके बजाय चार सदस्यों की एक कोर कमिटी बनाई गई है जो पार्टी के कामकाज को देखेगी. इसके साथ ही खु़द ममता बनर्जी वहां पार्टी के कामों पर निगाह रखती हैं.

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ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद 'लेफ्टिनेंट'
तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बहुत पहले से ही अणुब्रत को ममता बनर्जी का सबसे भरोसेमंद 'लेफ्टिनेंट' माना जाता रहा है.
उन्होंने बीरभूम और आसपास के ज़िलों में वामपंथी किले को ढहा कर तृणमूल कांग्रेस की जड़ें जमाने में अहम भूमिका निभाई थी.
ज़िले में उनके रसूख और उनके ख़िलाफ़ धांधली के आरोपों के कारण में चुनाव आयोग ने चुनाव के दौरान उनकी गतिविधियों पर निगरानी बिठाई थी. बावजूद इसके ज़िले में तृणमूल का प्रदर्शन शानदार रहा था.
अणुब्रत में आत्मविश्वास इतना कूट-कूट कर भरा था कि वे चुनाव के पहले से पार्टी की जीत के दावे करने लगते थे और ज़्यादातर मामलों में उनका दावा सही साबित होता था.
राज्य के बाहर यह बात भी बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल के 'खेला होबे' नारे को लोकप्रिय बनाने में उनकी भूमिका सबसे अहम थी.
यही नहीं, अणुब्रत पर एक पत्रकार चंद्रनाथ बनर्जी की लिखी जीवनी का नाम भी यही है. वे तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद अकेले ऐसे नेता हैं जिनकी जीवनी छप चुकी है.
आख़िर पंसारी की दुकान और मछली बेचने से शुरुआत करने वाले अणुब्रत बिना किसी प्रशासनिक या संवैधानिक पद के कैसे इतने कम समय में फर्श से अर्श और फिर पशु तस्करी मामले में गिरफ़्तारी के बाद अर्श से फर्श पर पहुंच गए?
राजनीति में क़दम रखने के बाद उनके दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की अचरज में डालने वाली है. अपने तीन भाइयों में मझले अणुब्रत मंडल ने आठवीं कक्षा के बाद आगे पढ़ाई नहीं की.
ज़िले के नानूर स्थित हाटसोराँदी गांव में उनके पिता कृपासिंधु मंडल की गल्ले यानी खाद्यान्नों की दुकान थी.

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मछली बेचने का काम
उनका परिवार लोहे की ग्रिल बनाने और मछली का धंधा भी करता था. पढ़ाई छोड़ने के बाद अणुब्रत पारिवारिक धंधे में जुट गए और तमाम काम देखने लगे.
तीस साल की उम्र में उन्होंने गांव की ही युवती छवि के साथ प्रेम विवाह किया और साल 1991 में उनकी पुत्री सुकन्या पैदा हुई. अब ईडी सुकन्या से भी पशु तस्करी मामले और आय से ज़्यादा संपत्ति के मामले में पूछताछ कर रही है.
अणुब्रत के ससुर बोलपुर में एक ट्रैवल एजेंसी चलाते थे और बोलपुर बाजार में उनकी जूते की भी एक दुकान थी. शादी के कुछ दिनों बाद अणुब्रत प्रोमोटिंग यानी रियल एस्टेट के धंधे में उतरे.
इस काम में उनके पार्टनर थे चंद्रनाथ सिंह, जो फ़िलहाल ममता बनर्जी सरकार में मंत्री हैं. इलाके के राजनेता डा. सुशोभन बनर्जी का हाथ थाम कर वे राजनीति में उतरे थे और कांग्रेस के सदस्य बने थे.
वर्ष 1998 में तृणमूल कांग्रेस के गठन के समय ममता की अपील पर वे पार्टी में शामिल हो गए, लेकिन बीरभूम ज़िले में नानूर के सूचपुर गांव में 11 मज़दूरों की हत्या के बाद अणुब्रत का नाम अचानक सुर्ख़ियों में आया.

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सीपीएम के ख़िलाफ़ आंदोलन
उन्होंने इस घटना के विरोध में सीपीएम के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू किया था. तब वह इलाका सीपीएम का गढ़ था.
उसके कुछ समय बाद ममता ने उनको ज़िला तृणमूल कांग्रेस की कमान सौंप दी. तब मुकुल राय ममता के बाद पार्टी में सबसे ताकतवर थे और उन्हीं मुकुल राय के सबसे भरोसेमंद आदमी बन गए अणुब्रत.
साल 2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद मंडल का राजनीतिक क़द तेज़ी से बढ़ा. उसके बाद उनकी बातें अख़बारों की सुर्खियां बनने लगीं.
इस दौरान अपने विवादास्पद बयानों के ज़रिए भी उन्होंने अक्सर सुर्खियां बटोरीं. मंडल ने कभी राजनीतिक विरोधियों के घरों को बम से उड़ाने की बात कही तो कभी पुलिस वालों पर बम फेंकने की, लेकिन मंडल के अंकुश लगाने के बजाय ममता ने उनको फ्री हैंड देना जारी रखा.
चुनावों के दौरान तो मंडल पर लगातार धांधली के आरोप लगते रहे. इसी वजह से चुनाव आयोग ने उनकी गतिविधियों की निगरानी की व्यवस्था की थी. बावजूद इसके ज़िले में पार्टी का प्रदर्शन बरकरार रहा.
साल 2018 के पंचायत चुनाव में विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि मंडल ने उनकी पार्टी के उम्मीदवारों को नामांकन पत्र ही दाखिल नहीं करने दिया.
साल 2021 में चुनाव बाद की हिंसा में भी मंडल का नाम सामने आया था. फिलहाल सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है.
बीते साल ज़िले के बगटुई में आठ लोगों को जिंदा जला कर मारने की घटना में भी उनका नाम सामने आया था.

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रसूख के साथ साथ बेहिसाब संपत्ति
पशु तस्करी मामले में सीबीआई ने मंडल की गिरफ़्तारी के बाद बीते साल 7 अक्टूबर को उनके ख़िलाफ़ अदालत में जो आरोप पत्र दायर किया था उसमें कहा गया था कि बीते आठ सालों में मंडल की आय 1 हजार 795 फीसदी और उनकी पुत्री सुकन्या की आय 2 हजार 964 फीसदी बढ़ी है.
आरोप है कि मंडल के रसूख़ के कारण उनकी पुत्री को घर के पास ही एक सरकारी स्कूल में नौकरी मिल गई थी और वे बिना स्कूल गए ही नियमित रूप से वेतन लेती रहीं.
अब इस साल जनवरी से उनका वेतन रोक दिया गया है. इसके मुताबिक़, मंडल की वार्षिक आय साल 2013-14 के 5.33 लाख से बढ़ कर साल 2020-21 में 1.45 करोड़ तक पहुंच गई थी. साल 2020 में मंडल की पत्नी छवि मंडल का निधन हो गया था.
इसी तरह वर्ष 2012-13 के बाद मंडल की पुत्री सुकन्या की आय का ग्राफ़ भी तेजी से बढ़ा. पेशे से शिक्षिका सुकन्या की वार्षिक आय उस साल 3.10 लाख रुपए थी जो अगले साल यानी 2013-14 में आठ और 2014-15 में दस लाख तक पहुंच गई.
साल 2015-16 के दौरान यह रकम 49.32 लाख थी जबकि दो साल बाद यानी वर्ष 2019-20 में यह बढ़ कर 1.45 करोड़ तक पहुंच गई. 2020-21 में यह आंकड़ा कुछ घट कर 92.97 लाख रहा.
केंद्रीय एजेंसी ने अपने आरोप पत्र में कहा था कि यह सुकन्या की निजी आय है. इसके अलावा उनके नाम से जो चावल मिलें और दूसरे कारोबार हैं उनसे होने वाली आय अलग है. अब महीनों से पशु तस्करी मामले में मंडल कभी सीबीआई की हिरासत में रहें हैं तो कभी ईडी की.
फ़िलहाल अदालत के निर्देश पर उनको पूछताछ के लिए दिल्ली ले जाया गया है. ईडी ने उनकी पुत्री सुकन्या को भी इसी मामले में पूछताछ के लिए दिल्ली बुलाया है.
ईडी ने अणुब्रत की संपत्ति का हिसाब-किताब रखने वाले उनके सीए मनीष कोठारी को भी लंबी पूछताछ के बाद गिरफ़्तार कर लिया है.
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