जब कोलकाता में ‘प्यार के क़िले’ में कैद थे पेले और बाहर लग रहे थे ज़िंदाबाद के नारे

पेले

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इमेज कैप्शन, 1977 में पेले का कॉसमॉस मैच भारत एक मैच खेलने आया था.
    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

क्या आप 'योर एक्सलेंसी' कहलवाना चाहेंगे, मिस्टर पेले? इस दिग्गज फुटबॉल खिलाड़ी से ये सवाल कोलकाता में एक रिपोर्टर ने पूछा था.

ये सवाल 45 साल पहले पूछा गया था जब लीजेंड बन चुका ये खिलाड़ी सितारों से सजी अपनी टीम न्यूयॉर्क कॉसमॉस को लेकर एक मैच खेलने के लिए तीन दिवसीय दौरे पर कोलकाता पहुंचा था.

ब्राजील का ये स्टार खिलाड़ी उस समय 37 साल का था. 'हिन्दुस्तान स्टैंडर्ड' अख़बार ने इस वाकये का ज़िक्र करते हुए लिखा था, ''पेले पहले तो मुस्कुराए और फिर ठहाका लगाकर हंस पड़े''

ये 24 सितंबर 1977 की बात थी. इसके ठीक एक दिन बाद भारत के चर्चित और सबसे पुराने फुटबॉल क्लब मोहन बागान के साथ उनकी टीम का मैच होना था.

पेले की टीम का पहला मैच मशहूर इडन गार्डन स्टेडियम में होना था और फुटबॉल से पागलों की तरह प्यार करने वाले कोलकाता शहर में इसे लेकर रोमांच चरम पर था.

'हिन्दुस्तान स्टैंडर्ड' के मुताबिक मोहन बागान ने पेले और उनके क्लब के खिलाड़ियों को बुलाने के लिए उस वक्त 17 लाख रुपये खर्च किए थे.

शहर में उन्मादी फैन्स से पेले और उनकी टीम को बचाने के लिए 35 हजार पुलिसकर्मियों का इंतजाम किया गया था. मैच के टिकट पांच से 60 रुपये के बीच बेचे गए थे.

कई अख़बारों ने उनके लिए ''किंग पेले'' और ''द एंपेरर'' लिखा था.

पेले की तुलना में लियोनार्दो विंची से

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इमेज कैप्शन, पेले अक्तूबर 2015 में भी कोलकाता आए थे. तब वहां के फ़ैन्स ने उन्हें ये मुकुट पहनाया था.

'हिन्दुस्तान स्टैंडर्ड' ने बड़े ही उत्साह से लिखा था, ''इसे धृष्टता न समझें तो कहा जा सकता है कि पेले खुद अपनी तुलना इतिहास की अब तक की महान शख्सियतों और लियोनार्दो द विंची और बिथोविन से कर सकते हैं. इस खेल के जानकारों के मुताबिक पेले का खेल उतना ही खूबसूरत और आनंददायक है, जितना लियोनार्दो दा विंची की पेंटिंग मोनालिसा या बिथोविन की नौवीं सिंफनी.''

कोलकाता ( उस वक्त कलकत्ता) में पेले को लेकर गज़ब का उत्साह था.

चाय की दुकान के ऊपर लगे बिलबोर्ड में बड़े अक्षरों में लिखा था - पेले. एक स्थानीय अख़बार ने पहले पन्ने पर ग्राफ़िक की सिरीज चलाई, जिसमें बताया गया था पेले किस तरह खेलते हैं.

पेले का नाम हेल्थ ड्रिंक के विज्ञापन पर छापा गया. मैच के 'लॉटरी कूपन' हासिल करन के लिए लंबी-लंबी लाइनें लगी थीं. टिकट भी ड्रॉ से बेचे गए थे.लेकिन एक ज्योतिषि ने मज़ा किरकिरा कर दिया. उसने भविष्यवाण की पेले बीमार पड़ जाएंगे और मैच में पूरे वक़्त तक नहीं खेल पाएंगे.

जब पेले टोक्यो से एयर इंडिया के विमान से पहुंचे तो उस समय उनका कॉसमॉस क्लब दो हफ्ते की एशिया की अपनी 'गुडविल ट्रिप' लगभग खत्म कर रहा था. इससे पहले वो जापान और चीन का दौरा कर चुका था.

जब पेले 22 सितंबर की आधी रात को कोलकाता पहुंचे तो शहर रोमांच के चरम पर पहुंच गया. लोगों पर एक उन्माद छा गया.

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इमेज कैप्शन, न्यूयॉर्क के कॉसमॉस क्लब की स्थापना अमेरिका मे प्रोफेशनल फुटबॉल को बढ़ावा देने के लिए की गई थी.

'पेले ज़िंदाबाद,पेले ज़िंदाबाद' के नारे

अख़बारों ने एयरपोर्ट के बाहर और भीतर खुशी से चिल्लाते प्रशंसकों के सैलाब की तस्वीरें छापी थीं. हर ओर 'पेले,जिंदाबाद,पेले जिंदाबाद' के नारे गूंज रहे थे.

बांग्ला के सबसे ज्यादा बिकने वाले अख़बार 'आनंद बाज़ार पत्रिका' के रिपोर्टर ने बताया,'' मैंने रात में एयरपोर्ट के बाहर ऐसी भीड़ कभी नहीं देखी थी. पूरे शहर और आसपास के उपनगरीय इलाकों से लोग यहां उमड़ आए थे. ''

हवाईपट्टी पर प्रशंसकों का एक रेला घुस आया था. लोग हाथों में माला लिए हुए थे और वे सुरक्षा चक्र को तोड़ कर बोइंग 707 की ओर दौड़ पड़े थे. जैसे ही पेले का विमान उतरा वो बाहर आए और अपना चिर-परिचित विक्ट्री साइन ( V) लहराया.

नीचे जबरदस्त भीड़ थी. पुलिस ने किसी तरह इसे तितर-बितर किया. पेले अपनी पत्नी रोजमेरी के साथ बाहर आए. पीछे-पीछे पूरी टीम थी.

इसमें वर्ल्ड कप जीतने वाली ब्राजील की टीम के कार्लोस अल्बर्टो टोरेस और इतालवी खिलाड़ी जिर्योजियो चिंगालिया भी थे. टर्मिनल बिल्डिंग पहुंच कर पेले ने पत्रकारों से कहा,'' मैं आज थका हुआ हूं. कल मैदान में मिलते हैं. ''

लोगों के बीच पेले के बारे में जानने की इतनी अधिक उत्सुकता थी कि पत्रकारों ने उस फ्लाइट में आ रहे एक जापानी यात्री को जा पकड़ा.

लेकिन उस यात्री ने कहा, ''मुझे लगा कि मैं पेले से दोस्ती कर लूं. लेकिन मेरी अंग्रेजी अच्छी नहीं है और फिर मैं उन पर खुद को थोपना भी नहीं चाहता था. इसके अलावा पेले पूरी फ्लाइट के दौरान सोते रहे.''

हंगामा चलता रहा. एयरपोर्ट के भीतर पुलिस ने प्रशंसकों पर लाठी चार्ज किया. लोगों ने खिड़कियों को शीशे तोड़ दिए और जूते फेंके. लोग फुटबॉल के इस भगवान की झलक न मिलने से नाराज थे.

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इमेज कैप्शन, 1970 के वर्ल्ड कप में ओपनिंग गोल करने के बाद खुशी मनाते पेले

'प्यार के किले में बंद'

पुलिस ने पेले और कॉसमॉस के खिलाड़ियों को एयरपोर्ट से निकालकर कर बस में बिठाया और फिर उन्हें कोलकाता शहर के बीचोंबीच लग्जरी होटल ले जाया गया. वहां भी फैन्स होटल की लॉबी और उसके बाहर जमा हो गए थे.

अख़बारों के मुताबिक़ अगले दो दिनों तक पेले ज़्यादातर वक्त अपनी पत्नी के साथ होटल में ही रहे. अगले कमरे में एक 'विशालकाय बॉडीगार्ड' ठहरा हुआ था.

वे सिर्फ अमेरिकी दूतावास और मोहन बागान की ओर से आयोजित दो स्वागत समारोहों में पहुंचे थे. उनकी पत्नी रोजमेरी ने संवाददाताओं से कहा, '' हम प्यार के किले में बंद हैं. ''

निश्चित तौर पर पेले वीकेंड गेम के दौरान मैदान में पहुंचे. एक स्थानीय अख़बार के मुताबिक उन्होंने पूरे 90 मिनट तक खेलने का वादा किया था जबकि मैदान नम और भीगा हुआ था. मौसम विभाग ने बारिश की आशंका जताई थी.

' बेयरफुट टु बूट्स : द मेनी लाइव्स ऑफ इंडियन फुटबॉल'' के लेखक नोवी कपाड़िया ने लिखा, ''मैदान में फिसलन की वजह से पेले ने खेलने से लगभग मना ही कर दिया था. लेकिन पुलिस वाले ये कह कर मनाते रहे कि अगर वो नहीं खेले तो भीड़ मोहन बागान के अधिकारियों को पीट-पीट कर मार डालेगी. इसके बाद पेले ने हिचकिचाते हुए खेलना शुरू किया लेकिन वो पूरे मैच के दौरान वह काफी सतर्क दिखे. ''

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इमेज कैप्शन, पेले अपनी पत्नी रोजमेरी के साथ

पेले के खेल से दर्शक निराश

कई ब्योरों के मुताबिक मैच में एंटी-क्लाइमेक्स दिखा. पेले ने गोल पोस्ट पर कई निशाने लगाए लेकिन नाकाम रहे. वो अपने रंग में नहीं थे. जबकि मोहन बागान की टीम पूरे जोश में थी. एक सप्ताह पहले हुई बरसात ने मैदान को कीचड़ से भर दिया था लेकिन घरेलू टीम पूरी मुस्तैदी से खेल रही थी.

मैच दो-दो गोल की बराबरी पर छूटा. जब पेले मैदान से बाहर जा रहे थे तो हर तरफ चुप्पी थी. लेकिन जब मोहन बागान की टीम बाहर जा रही थे दीवाने दर्शकों की तालियों से स्टेडियम गूंजने लगा था. हजारों लोग मोहन बागान की इस टीम के खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ा रहे थे.

कोलकाता के पेले प्रेम की परतें उतरने लगी थीं. फुटबॉल के स्थानीय पंडितों ने पेले के खेल की लानत-मलामत की. एक अखबार की सुर्खी थी, '' साफ है कि पेले अब बूढ़े हो चुके हैं.''

लोकप्रिय बांग्ला अख़बार आनंद बाज़ार पत्रिका के प्रतिष्ठित स्पोर्ट्स राइटर मोती नंदी ने लिखा,'' पेले को कोलकाता इसलिए बुलाया गया था कि हमारे युवा फुटबॉलर इस खेल के बारे में उनसे कुछ सीखें. कम से कम आयोजकों ने तो हमें यही बताया था. पेले से वास्तव में उन्होंने ये सीखा कि मैदान में बगैर ज्यादा कुछ किए 90 मिनट तक कैसे रहा जाए. ''

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मायूस वापसी

पेले को लेकर फैला उन्माद जल्दी ही काफूर हो गया. उनके होटल के बाहर की भीड़ कम होने लगी. निराश प्रशंसकों ने सत्तारुढ़ कम्यूनिस्ट सरकार के एक मंत्री पर आरोप लगाया, ''कोलकाता में किसी नकली पेले को लाया गया था.''

एक कम्युनिस्ट सांसद ने उसी मंत्री से कहा, ''आपको लोगों को मैच टिकट के पैसे लौटा देने चाहिए. ''

रविवार की रात जब पेले न्यूयॉर्क लौट रहे थे और एयरपोर्ट पर कोई भीड़ नहीं थी. एक अखबार की हेडलाइन थी,'' एक राजा की मायूस वापसी.'' साफ था कि दर्शकों का जोश ठंडा पड़ चुका था.

वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार घोष ने कहा कि पेले और कॉसमस के खिलाड़ियों पर जितना पैसा खर्च किया गया उसके एक हिस्से से शहर की कई सड़कों का सौंदर्यीकरण हो सकता था''

पेले के इस मुकाबला विहीन मैच पर टिप्पणी करते हुए जाने-माने स्पोर्ट्स कंमेटेटर अरिजीत सेन ने कहा,'' कॉसमॉस के खिलाड़ियों ने अपनी चौथाई क्षमता से ज्यादा का प्रदर्शन नहीं किया. वे मैच का टाइम बिता कर संतुष्ट थे. ''

'' उनका मकसद पूरा हो चुका था. उनकी जेबें गरीब भारतीयों की गाढ़ी कमाई के पैसे से भर चुकी थीं. ''

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