वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल 2022: गरिंचा यानी फ़ुटबॉल का वो सुपरस्टार जिसने शराब में डूबने से पहले पेले की चमक फीकी कर दी थी

गरिंचा

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इमेज कैप्शन, पेले और गरिंचा एक साथ 1958 के वर्ल्ड कप में ब्राज़ील टीम का हिस्सा बने थे
    • Author, प्रदीप कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

फ़ुटबॉल की दुनिया को जानने वाले जानते हैं कि ख़ूबसूरत फुटबॉल का मतलब ड्रिब्लिंग है. ड्रिब्लिंग यानी पैर का गेंद से ऐसा तालमेल कि सामने वाला खिलाड़ी भौचक्का रह जाए और देखते-देखते दूसरा खिलाड़ी गोलपोस्ट तक पहुंच जाए. इसे फ़ुटबॉल के खेल की सबसे मुश्किल विधा माना जाता है.

आधुनिक फ़ुटबॉल में इसलिए मेसी का जादू साल दर साल बना हुआ है. मेसी के अलावा ब्राज़ील के सुपरस्टार रहे रोनाल्डिन्हो हों या फ़िर फ्रांस के लीजेंड जिनेदिन ज़िदान, दुनिया इनके खेल की आज भी दीवानी है.

कुछ उम्रदराज़ फ़ुटबॉल प्रशंसक अगर टकरा जाएं तो वे आपको बताएंगे कि मैराडोना जैसा ड्रिब्लर सदियों में एक बार आता है. उनसे पहले के दौर के लोग इंग्लिश फ़ुटबॉलर जॉर्ज बेस्ट और डच फ़ुटबॉलर जोहान क्रूफ़ की ड्रिब्लिंग को याद करते दिखेंगे.

अब बात उस फ़ुटबॉलर की जो ड्रिब्लिंग की दुनिया का बेताज बादशाह था. ऐसा फ़ुटबॉलर जो फ़ुटबॉल के जादूगर माने जाने वाले पेले के सामने सुपर स्टार था.

ब्राज़ीली फ़ुटबॉल को शिखर पर पहुंचाने वाले उस खिलाड़ी का जलवा ऐसा था कि पेले की टीम में मौजूदगी के सामने अख़बारों की हेडलाइन हुआ करती थी, 'अगले गुरुवार को फिर दिखेगा गरिंचा का जलवा.'

फ़ुटबॉल की दुनिया में लंबे समय तक उन्हें पेले की तुलना में भी महान खिलाड़ी माना जाता रहा. इस फुटबॉलर का नाम था गरिंचा.

इस नाम को रखे जाने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. गरिंचा हमउम्र बच्चों की तुलना में बहुत छोटे और कमज़ोर थे और उनकी बहनों ने उनका नाम स्थानीय छोटी पक्षी गरिंचा के नाम पर गरिंचा रख दिया था.

गरिंचा

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इमेज कैप्शन, गरिंचा को आज भी ड्रिब्लिंग का सुपरस्टार माना जाता है

गरिंचा और पेले की तुलना तो तब भी होती थी और आज भी होती है. लेकिन उस पर बात करने से पहले कहानी गरिंचा की जिसके बारे में डॉक्टरों की राय ये थी कि वह ठीक ठाक एथलीट भी नहीं हो सकते.

'सबसे बेहतरीन ड्रिब्लर'

28 अक्टूबर, 1933 को ब्राज़ील के रियो डि जेनेरियो की झुग्गी झोपड़ी वाली बस्ती में जन्मे गरिंचा के पैरों में समस्या थी. उनका दायां पैर बाएं पैर की तुलना में छह सेंटीमीटर छोटा था और उनका बायां पैर अंदर की ओर मुड़ा हुआ भी था.

एक तरह से वे सीधे खड़े नहीं हो सकते थे, लेकिन गरिंचा ने ड्रिब्लिंग में अपनी इस खामी को ही ख़ासियत में तब्दील कर लिया. वे जब बेढंग से अंदाज़ में विपक्षी टीम के डिफेंडरों को छकाते थे तो स्टेडियम की जनता का हंसते-हंसते बुरा हाल हो जाता था.

इसी वजह से गरिंचा के फुटबॉल को लोग पीपल्स जॉय के नाम से जानते हैं. उन्हें फुटबॉल का चार्ली चैप्लिन जैसा दर्जा हासिल था. गरिंचा यहां तक बेहद ग़रीबी में पहुंचे थे.

शराबी पिता से गरिंचा को केवल शराब की लत ही मिली थी और 14 साल की उम्र से पेट पालने के लिए वे एक टेक्स्टाइल मिल में मजदूरी करने लगे थे. उन्हें एक आलसी कर्मचारी के तौर पर देखा जाता था, लेकिन वे मिल की फुटबॉल टीम के स्टार थे. इसी वजह से नौकरी नहीं छिनी थी.

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इमेज कैप्शन, 1962 के वर्ल्ड कप में पेले चोटिल हो गए थे, गरिंचा ने अकेले दम पर टीम को चैंपियन बना दिया

गरिंचा के इस संघर्ष की कहानी दुनिया को शायद ही पता चलती, अगर ब्राज़ीली पत्रकार रॉय कैस्ट्रो ने गरिंचा के जीवन पर 'गरिंचा- द ट्रिंप एंड ट्रेज़डी ऑफ़ ब्राज़ील्स फॉरगॉटन फुटबॉलिंग हीरो' नामक पुस्तक ना लिखी होती.

यह पुस्तक गरिंचा के असमय निधन के 12 साल बाद प्रकाशित हुई और अंग्रेज़ी का अनुवाद इसके दस साल बाद आया, लेकिन जब आया तब खेल की दुनिया ने इस पुस्तक को हाथों हाथ लिया.

इसमें गरिंचा के ग़रीबी के गर्त से निकलकर सुपरस्टार बनने और उसके बाद शराब और सेक्स की लत में डूबने तक की कहानी को सिलसिलेवार ढंग से बताया गया है.

गरिंचा को किसी फुटबॉल क्लब में निखरने का मौका नहीं मिला था. ब्राज़ील के बेहतरीन फुटबॉलर निल्टन सैंटोस की नज़र जब 19 साल के गरिंचा पर पड़ी तो वे उसे बोटोफोगो क्लब में ले आए थे.

जिस उम्र में पेले को नेशनल टीम में खेलने का मौका मिल गया था, उससे भी अधिक उम्र में गरिंचा पर पहली बार किसी दिग्गज की नजर पड़ी थी. 1953 में गरिंचा को बोटोफोगो क्लब से पहली बार खेलने का मौका मिला और पहले ही मैच में उन्होंने हैट्रिक जमा दी. सैंटोस के भरोसे को उन्होंने सही साबित कर दिखाया.

लेकिन उन्हें 1954 के वर्ल्ड कप के लिए नेशनल टीम में जगह नहीं मिली. गरिंचा क्लब के लिए लगातार बढ़िया प्रदर्शन करते रहे. 1957 में उन्होंने क्लब के लिए 20 गोल करके नेशनल सेलेक्शन के लिए दरवाज़ा खटखटाया और राइट विंगर के तौर पर वे टीम में शामिल किए गए.

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इमेज कैप्शन, गरिंचा को आज भी मोहक फुटबॉल खेलने के लिए लोग याद करते हैं

पेले ने भी अपने संस्मरण 'व्हाई सॉकर मैटर्स' में गरिंचा को लेकर कई पहलूओं पर लिखा है. दरअसल, पेले और गरिंचा, दोनों का करिश्मा पहली बार दुनिया के फ़ुटबॉल प्रेमियों को 1958 वर्ल्ड कप के दौरान दिखा.

गरिंचा की शारीरिक क्षमता को लेकर टीम प्रबंधन को शक़ तो था ही, लेकिन मेंटल टेस्ट में भी गरिंचा पास नहीं कर पाए थे. पेले ने अपनी पुस्तक में लिखा है, "गरिंचा ने अपने प्रोफेशन का स्पेलिंग भी ग़लत लिखा था, अगर स्पेलिंग सही लिखना एक क्राइटेरिया होता तो टीम का कोई खिलाड़ी वर्ल्ड कप में हिस्सा नहीं ले पाता."

जब ब्राज़ील बना पहली बार चैम्पियन

वैसे गरिंचा के अलावा टीम का दूसरा खिलाड़ी जो मेंटल टेस्ट पास नहीं कर पाया था, वे पेले थे. डॉक्टरों के मुताबिक कम उम्र के चलते वे वर्ल्ड कप जैसे मुक़ाबले का दबाव नहीं झेल सकते थे. बाद में पेले और गरिंचा की बदौलत ही ब्राज़ील पहली बार वर्ल्ड चैम्पियन बनने में कामयाब हुआ था.

टीम के कोच ने मनोचिकित्सकों और डॉक्टरों की राय से उलट इन दोनों खिलाड़ियों को टीम में शामिल करने का फ़ैसला लिया.

पेले ने 1958 वर्ल्ड कप फ़ाइनल मुक़बले को याद करते हुए लिखा है, "स्वीडन के ख़िलाफ़ आख़िरी पलों में मैंने हेडर से पांचवां गोल किया था. उस हेडर को लगाने के बाद आंखों के सामने अंधेरा छा गया था और गोल पोस्ट के सामने मैं लेट गया था. बिना हिले डुले."

"गरिंचा मेरे पास सबसे पहले भागकर आए थे. वे प्यारी आत्मा वाले खिलाड़ी थे, वे मेरी मदद करने के लिए भागे थे. उन्होंने मेरे पांव को उठाया, वे किसी तरह मेरे सिर में रक्त के प्रवाह को फिर से शुरू करना चाहते थे. थोड़ी देर में मुझे होश आया तो देखा टीम के बाक़ी खिलाड़ी जश्न मना रहे थे."

इस वर्ल्ड कप में वेल्स की टीम में शामिल डिफेंडर मेल हॉपकिंस ने मुक़ाबले के बाद कहा था, "गरिंचा पेले की तुलना में कहीं ज़्यादा ख़तरनाक थे, उनको खेलते देखना जादू देखने जैसा था."

पेले

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इमेज कैप्शन, पेले ने उन्हें अपना सर्वश्रेष्ठ जोड़ीदार माना है

इन दोनों खिलाड़ियों के आपसी तालमेल में ऐसा जादू था कि दोनों जिस भी मुक़ाबले में एक साथ खेले ब्राज़ील वो मुक़ाबला नहीं हारा. दोनों खिलाड़ियों ने एक साथ 40 मैच खेले जिसमें ब्राज़ील 36 मैच जीतने में कामयाब रहा और चार मैच ड्रॉ रहे. टीम ने कोई मुक़ाबला नहीं गंवाया.

कहते हैं कि एक जीनियस ही दूसरे जीनियस का सम्मान करना जानता है. अगर इस कसौटी पर आंकें तो फुटबॉल के जादूगर पेले ने एक अगस्त 2018 को अपने फेसबुक अकाउंट से लिखा था, 'मैं अपने जीवन में गरिंचा से बेहतर खिलाड़ी के साथ या ख़िलाफ़ नहीं खेला. जब हम मैदान में होते थे तो टीम मेट्स थे. पिच के बाहर हम भाई थे.'

बहरहाल सच्चाई यही थी कि 1958 के बाद ब्राज़ील में गरिंचा और पेले का जलवा किसी सुपरस्टार से कम नहीं था. बीबीसी के चैनल फोर ने गॉड्स ऑफ़ ब्राज़ील- पेले एंड गरिंचा नाम से 2002 में एक डॉक्यूमेंट्री बनायी. दो पार्ट की इस सिरीज़ को देखने से अंदाज़ा होता है कि पेले और गरिंचा को लेकर आम लोगों में कितनी दीवानगी थी.

एक बेहतर माहौल आपको क्या कुछ दे सकता है और क्या कुछ छीन सकता है, इसकी मिसाल पेले और गरिंचा की कहानी भी है.

रॉय कैस्ट्रो ने गरिंचा पर लिखी किताब में बताया है कि 1958 के बाद पेले ने एक अनुभवी मैनेजर रखा और उस मैनेजर ने पेले के क्लब सैंटोस के साथ 500 डॉलर प्रति महीने का क़रार किया था. ऐसा क़रार जिसमें अनुबंध की रकम हर साल बढ़नी थी.

जबकि दूसरी बोटोफोगो क्लब के मैनेजर ने गरिंचा के सामने अनुबंध के पेपर पर रक़म की जगह खाली छोड़ दी थी, लेकिन गरिंचा के पास कोई ऐसा मैनेजर नहीं था जो उन्हें संभालता. लिहाज़ा गरिंचा ने खाली जगह पर ही साइन कर दिया और अगले तीन साल तक क्लब ने उन्हें 300 डॉलर प्रति महीने की दर से भुगतान किया.

ये एक उदाहरण बताता है कि जब आप स्टारडम की ओर बढ़ने लगते हैं तो आपके आस-पास के लोगों की भूमिका कितनी अहम हो जाती है. दूसरा उदाहरण है कि पेले जहां अपने क्लब करियर को लेकर गंभीर होते गए वहीं गरिंचा अपने आस-पास के लोगों की दुनिया में खोते चले गए.

बीबीसी चैनल फोर की डॉक्यूमेंट्री में एक जगह वे कहते हैं, "1958 के बाद मैं काफी लोकप्रिय हो गया था, जहां भी जाता था वहां मुझे जानने वाले मिल रहे थे. लोग मुझसे मिलने के लिए इंतज़ार करते थे."

अपने दम पर दिलाया 1962 का वर्ल्ड कप

ग़रीबी और अभाव में पले-बढ़े गरिंचा के क़दम यहां से लड़खड़ाते चले गए. उन्होंने ख़ुद को शराब के नशे में डूबो लिया. उनका वज़न बढ़ता गया और महिलाओं के साथ सेक्स संबंधों की अंतहीन कहानियों का सिलसिला चल निकला.

लेकिन फुटबॉल की दुनिया को अभी भी गरिंचा का वो दौर देखना था जिसे इतिहास में दर्ज होना था. चार साल बीतने में वक्त नहीं लगा और 1962 का वर्ल्ड कप सामने आ गया. चिली में होने वाले इस वर्ल्ड कप के लिए किसी तरह गरिंचा इस टीम में जगह पाने में कामयाब हुए थे.

गरिंचा

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इमेज कैप्शन, गरिंचा खिलाड़ियों को छकाने और फ्रीकिक लगाने में भी शानदार थे

टूर्नामेंट के दूसरे मैच में पेले चोटिल होकर टूर्नामेंट से बाहर हो गए थे. तब टीम की ज़िम्मेदारी गरिंचा पर आ गयी थी. उस वक्त चिली फुटबॉल कोच एसोसिएशन के चेयरमैन अलबर्टो कासोरला ने कहा था, "ब्राज़ील की दो टीम है- एक टीम जिसमें पेले हैं और दूसरी टीम जो पेले के बिना है. दूसरी टीम वर्ल्ड कप जीतने में सक्षम नहीं है."

कासोरला को अंदाज़ा भी नहीं रहा होगा कि उन्हें अपने शब्द वापस निगलने पड़ेंगे, यह संभव कर दिखाया था गरिंचा ने.

गरिंचा ने इंग्लैंड और चिली के ख़िलाफ़ दो अहम मैचों में चार गोल दागे. चिली के ख़िलाफ़ सेमीफ़ाइनल मुक़ाबले में ब्राज़ील 4-2 से जीतने में कामयाब रहा था.

इस मैच में गरिंचा ने दो गोल ज़रूर दागे और तीसरा गोल बनाने में मदद की थी. गरिंचा के दोनों गोल आज भी बेमिसाल माने जाते हैं. पहला गोल उन्होंने बला की तेज़ी से बाएं पैर से 20 गज की दूरी से झन्नाटेदार शाट्स से किया था तो दूसरा गोल एक अद्भुत हेडर था.

चिली के खिलाड़ियों ने उन्हें लगातार मार्क करने की कोशिश की थी जिसके चलते उनका व्यवहार भी आक्रामक हुआ तो 83वें मिनट में रेफ़री ने उन्हें लाल कार्ड दिखाया, जिसके बाद वे फ़ाइनल मुक़ाबले से भी बाहर हो गए थे.

बेमिसाल प्रतिभा के खिलाड़ी

रेफ़री के इस फ़ैसले पर हंगामा मच गया था. ब्राज़ील ने भी फीफा के डिसिप्लिनरी कमेटी में इस फ़ैसले पर आपत्ति जताई. रॉय कैस्ट्रो की किताब में इस बात का ज़िक्र है कि ब्राज़ील के प्रधानमंत्री ने रणनीतिक तौर पर भी इसे मुद्दा बनाया. इसके बाद रेफ़री ने ये कहा कि गरिंचा के फ़ाउल को उन्होंने अपनी आंखों से नहीं देखा था और लाइंसमैन की बात पर उन्होंने फ़ैसला सुनाया.

अलग-अलग लैटिन अमेरिकी देशों के प्रीमियर ने भी फ़ीफ़ा के अधिकारियों से बात की और लाइंसमैन को रातों-रात हटा दिया गया और गरिंचा को फ़ाइनल खेलने का मौका मिला.

कम ही लोगों को मालूम होगा कि गरिंचा चेकोस्लोवाकिया के ख़िलाफ़ फ़ाइनल मुक़ाबले में 102 डिग्री बुखार के बाद खेलने के लिए उतरे. लेकिन उनकी मौजूदगी का ऐसा असर रहा कि टीम लगातार दूसरी बार वर्ल्ड कप जीतने में कामयाब रही.

एक तरह से गरिंचा ने अपने दम पर ब्राज़ील को ये वर्ल्ड कप जिताया था. ऐसा करिश्मा फुटबॉल फैंस को 1986 में जाकर दोबारा देखने को मिला जब मैराडोना ने अर्जेंटीना को वर्ल्ड कप में जीत दिलाई थी.

गरिंचा के खेल पर उरुग्वे के मशहूर खेल पत्रकार इडुआर्डो गैलिनो ने लिखा है, "जब गरिंचा अपने फॉर्म में होते थे तो फुटबॉल का मैदान सर्कस बन जाता था. फुटबॉल पालतू जानवर और खेल पार्टी की शुरुआत. गरिंचा जानवर और खेल के माध्यम से ऐसा जादू रचते कि दर्शक केवल देखते रह जाते थे."

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लेकिन ऐसे खिलाड़ी का दूसरा पहलू भी था, वे शराब के नशे में सुबह से डूब जाते थे. रॉय कैस्ट्रो ने बताया कि एक बार नशे में वे इतने धुत थे कि सड़क से गुजरते अपने पिता पर ही उन्होंने कार चढ़ा दी थी. पिता घायल हुए थे और लोगों की भीड़ ने जब उन्हें पकड़ा तो वे नशे में इतने धुत कि उन्हें कुछ भी पता नहीं चल पाया था. इतना ही नहीं उन्होंने नशे में अपनी सास को भी कुचल दिया था जिसमें उनकी मौत हो गई थी.

जीवन के उतार-चढ़ाव

शराब के नशे के अलावा महिलाओं के साथ सेक्स संबंधों ने भी उनके खेल के जीवन को बहुत प्रभावित किया था. गरिंचा के पांच महिलाओं से 14 बच्चे थे, और ये वो रिश्ते थे जिन्हें गरिंचा ने दुनिया के सामने स्वीकार किया था. वैसे गरिंचा ने दो शादियां की थीं, एक तो फैक्ट्री वर्कर के तौर पर एक सहकर्मी से और दूसरी शादी ब्राज़ील की मशहूर सांबा सिंगर एलेजा सुआरेस से और दोनों शादियों में बात तलाक़ तक भी पहुंची.

शराब की लत और वैवाहिक संबंधों के तनाव ने गरिंचा के जीवन पर ऐसा असर डाला कि वे 1966 के वर्ल्ड कप में अपनी छाया भर रह गए थे. उनका लचर खेल भी एक वजह रहा कि ब्राज़ील लगातार तीसरी बार वर्ल्ड कप जीतने का करिश्मा नहीं दिखा पाया था.

बहरहाल, इन सबके बाद भी एक सवाल यह उठता है कि गरिंचा पेले जैसे लीजेंड क्यों नहीं बन पाए. रॉय कैस्ट्रो ने इसका जवाब तलाशा है. उन्होंने बताया है कि गरिंचा ने कभी बिज़नेस कारणों से हवाई यात्रा नहीं की और ना ही उन्होंने अपने जीवन में टाई-सूट पहना. ना ही वे राजनेताओं से मिलते थे और ना ही कॉरपोरेट घरानों के मालिकों से.

गरिंचा जीवन भर ब्राज़ीली जीवनशैली के प्रतीक रहे. फुटबॉल, सांबा संगीत, शराब और महिलाएं. इससे अधिक उन्होंने कुछ और चाहा भी नहीं.

लेकिन उनका जीवन आम स्टार जैसा नहीं रहा. जीवन के आख़िरी सालों में पैसों की तंगी भी हुई और जनवरी, 1983 में महज़ 49 साल की उम्र में लिवर सिरोसिस की बीमारी से उनकी मौत हुई.

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गरिंचा की मौत रियो के एक अस्पताल में हुई थी, लेकिन उनकी आख़िरी इच्छा अपने पैतृक इलाके में अंतिम संस्कार की थी. रियो के मरकाना स्टेडियम से जब उनका पार्थिव शरीर उनके गांव पाउ ग्रेनेड के लिए चला तो ब्राज़ील की जनता सड़कों पर उतर आयी.

रॉय कैस्ट्रो ने लिखा है कि 65 किलोमीटर के उस सफ़र में हज़ारों लोगों ने अपने सितारे को अलविदा कहा. शव जब उनके गांव पहुंचा तो वहां चर्च में 500 लोगों के बैठने की व्यवस्था थी, जिसमें तीन हज़ार लोग खड़े थे.

इतनी भीड़ देखकर पादरी ने अंतिम प्रार्थना भी मिनटों में निपटाई और जब गरिंचा को दफ़नाने के लिए क़ब्रिस्तान लाया गया तो वहां आठ हज़ार लोगों की भीड़ पहले से मौजूद थी.

इतनी भीड़ थी कि गरिंचा के नाते रिश्तेदार भी उनकी अंतिम झलक नहीं देख सके.

गरिंचा जैसा फुटबॉल खेलते रहे, वैसे ही उनकी विदाई हुई थी. रंगारंग, अराजक नाटकीयता से भरपूर और मनोरंजन से भरपूर.

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