रूस में फुटबॉल वर्ल्ड कप वाली किक गोल है

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मास्को से
राजधानी मॉस्को के बीचों बीच प्रॉस्पेक्ट मीरा नाम का इलाक़ा, शाम चार बजे का समय है, एक बड़े से फ़ुटबॉल स्टेडियम में कई गोलपोस्ट लगे हुए हैं. बच्चों से लेकर बूढ़ों तक, सभी अपनी गोल दागने की क्षमता परख रहे हैं.
स्टेडियम में नई कुर्सियां चमचमा रहीं हैं, ताजे पेंट की ख़ुशबू आ रही है और एक कोने में बच्चे रूसी झंडे के टैटू बनवा रहे हैं, मुफ़्त में.
ज़्यादातर लोगों में उत्साह है, 14 जून से दुनिया के सबसे लोकप्रिय स्पोर्ट्स टूर्नामेंट का आगाज़ होगा, ब्राज़ील में हुए पिछले वर्ल्ड कप को लगभग आधी दुनिया ने देखा था.
रूस में फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप शुरू होने में कुछ ही दिन रह गए हैं. हर चार साल में होने वाले इस टूर्नामेंट को दुनिया में सबसे ज़्यादा लोग देखते हैं और रूस को अपने इतिहास में पहली बार इसकी मेज़बानी करने का मौका मिला है.
रूस के लिए ऐतिहासिक लम्हा
वैसे फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप जिस देश में होता है वहाँ इसका बुख़ार काफ़ी पहले से ही दिखने लगता है. कुछ ही दिन रह गए हैं जब दुनिया भर के करोड़ों लोग टेलीविज़न पर आँख गड़ाए सिर्फ़ खेल ही नहीं, पुतिन के रूस को भी देखेंगे जहाँ पिछले 18 साल से उनका एकछत्र राज है.

यहाँ के स्थानीय लोगों में तो थोड़ा जोश दिखता है लेकिन वो रौनक नहीं जो दुनिया के सबसे बड़े स्पोर्टिंग इवेंट के लिए होनी चाहिए.
मिसाल के तौर पर राजधानी मॉस्को में विश्व कप से जुडी चीज़ों का पता थोड़ा ढूँढ़ने से मिलता है. बिक हर चीज़ रही है, लेकिन खऱीददार और खेल के दीवाने ज़रा कम दिखते हैं.
आख़िर क्यों नहीं दिख रहे ख़रीदार
राजधानी की सबसे मशहूर शॉपिंग स्ट्रीट को अरबात स्ट्रीट के नाम से जाना जाता है. दो-तीन सोवेनियर शॉप्स में हमारी बातचीत दुकानदारों से हुई तो वे कैमरे पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे थे.
बाद में एक ने कहा, "फ़ीफ़ा विश्व कप से जुड़े कप, मफ़लर, चाभी के गुच्छे और फ़ुटबॉल, सब कुछ एक महीने से रखा हुआ है. लेकिन बिक्री वैसी नहीं हुई जैसा सोचकर के माल ख़रीदा था."
मार्केट में मेरी मुलाक़ात कई ऐसे लोगों से हुई जिनकी बातों में प्रतियोगिता को लेकर उत्साह थोड़ा कम दिखा.
वर्ल्ड कप पर 12 अरब डॉलर का ख़र्च
मॉस्को में जन्मे ऑर्थर काम के सिलसिले में अकसर विदेश यात्रा करते रहते हैं.

उन्होंने बताया, "मैं दो दिन पहले मॉस्को लौटा हूँ लेकिन मुझे कोई ख़ास चहल-पहल नहीं दिखती. वैसे भी इस वर्ल्ड कप के आयोजन में बहुत बड़ी रक़म ख़र्च की जा रही है. मुझे लगता है टैक्स देने वाले इतने सारे लोगों के पैसे को किसी दूसरे ज़रूरी काम में लगाना चाहिए, मैं इतना पैसा बर्बाद किए जाने के ख़िलाफ़ हूँ".
रूस में फ़ीफ़ा विश्व कप के आयोजन में ख़र्च होने वाली रकम 12 अरब अमरीकी डॉलर तक पहुंच चुकी है.
इसमें कोई शक नहीं है कि दुनिया भर में सरकारें ऐसे आयोजन करके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि चमकाने की कोशिश करती हैं, ज़ाहिर है पुतिन में भी ऐसा चाहेंगे.
ऑर्थर से हमारी बात ख़त्म ही हुई थी कि सड़क पर हमें सैलानियों का एक बड़ा जत्था मिला. पता चला इसराइल से आया ये ग्रुप पिछले एक हफ़्ते से रूस के कई शहरों से होता हुआ अब मॉस्को पहुंचा है.
जब मिले हिंदी बोलने वाले रूसी नागरिक
इसी ग्रुप में 29 वर्षीय एना भी थीं जिन्होंने कहा, "अपने देश में हम लोग फ़ुटबॉल को फ़ॉलो करते हैं. यहाँ रूस में अपने होटल में ही कुछ लोगों को फुटबॉल टी-शर्ट पहने देखा है बस. और तो कुछ ख़ास नहीं दिखा अभी तक".

अरबात स्ट्रीट से थोड़ी दूर पर ही हमारी मुलाक़ात पीटर से हुई जो भारत से इतने प्रभावित रहे हैं कि फ़र्राटेदार हिंदी भी बोलते हैं.
पीटर ने कहा, "शायद ये कहना ठीक ही रहेगा कि बहुत एक्साइटमेंट हैं यहाँ, लेकिन मैं और मेरी बेटी पूरे विश्व कप के दौरान मॉस्को शहर से बाहर जाना चाहते हैं क्योंकि यहाँ ट्रैफ़िक जाम होंगे, सिक्योरिटी प्रॉब्लम होने वाली है".
एक महीने चलने वाले फ़ुटबॉल के इस महाकुम्भ हिस्सा लेने 32 टीमें पहुँच चुकी हैं और रूस के 11 शहरों में मैचों का आयोजन होना है.
साल 2010 में इस टूर्नामेंट को आयोजित करने की रेस जीतने के साथ ही रूस में होने वाले इस विश्व कप पर विवादों का साया मंडराता रहा है. क्राइमिया में रूसी सरकार का हस्तक्षेप या फिर अमरीकी चुनावों में कथित रूसी हाथ की जांच पर विवाद रहा है.
सीरिया युद्ध में रूस के रुख और ब्रिटेन में एक पूर्व रूसी जासूस पर जानलेवा हमला और राजनयिक रिश्तों में दरार पड़ने का असर भी साफ़ दिखता है. हालाँकि, ग्राउंड ज़ीरो पर मौजूद लोगों को लगता है इसका सीधा असर नहीं पड़ेगा.

क्या पर्यटकों पर दिखेगा असर
जॉर्जी चरदांतसेव रूस के जाने-माने फ़ुटबॉल विश्लेषक हैं जिन्होंने फुटबॉल के इतिहास पर एक हाल ही में एक किताब भी लिखी है.
उन्होंने बताया, "रूसी लोगों के बारे में एक कहावत है, हम इरादों को लंबे समय तक अपने भीतर रखते हैं और एकाएक बाहर निकालते हैं इसीलिए हम लंबे समय तक इंतज़ार करने के आदी नहीं हैं. जब ये शुरू होगा तब ज़बरदस्त तरीके से शुरू होगा और उतना ही उत्साह भी दिखेगा. ये फ़ुटबॉल है, उसी समय पता चलेगा कितना उत्साह है."
रूस में फ़ुटबॉल की दिलचस्पी को लेकर शक़ नहीं है. शक़ इस बात को लेकर ज़्यादा है कि क्या इस खेल को खेलने और देखने वाले अपनी दीवानगी को पूरा कर सकेंगे.
मॉस्को में फ़ुटबॉल के एक और ट्रेनिंग ग्राउंड में रोज़ शाम लोग अपने ऑफ़िस का काम निपटा कर खेलने पहुँचते हैं. यहीं पर हमारी मुलाक़ात कज़ाकस्तान के नागरिक लेकिन रूस में 10 वर्षों से रह रहे अज़ीज़ से हुई.

अज़ीज़ बड़ी दिलचस्पी के साथ देख रहे थे लेकिन आँखों में कुछ कसक दिखी.
वे बोले, "वो जुनून नहीं दिखा रहा जिसकी मुझे उम्मीद रही है. वैसे भी मैं अब मैचों को टीवी पर ही देखूँगा. क्योंकि जब टिकट खरीदने गया तो पता चला जितनी मेरी महीने की तनख़्वाह है अब उतने का एक टिकट मिल रहा है. खाऊँगा या मैच देखूँगा?."
अज़ीज़ जैसों के सवाल छोटे हैं लेकिन अहम हैं. बिगुल बजने की देर है, जवाब भी मिलने शुरू हो जाएँगे.

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