वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल 2022: अल्सीडेस घिग्गिया के सामने कैसे पूरा ब्राज़ील सदमे में डूब गया था

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- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क़तर में खेले जा रहे वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल में उलटफेर का सिलसिला बना हुआ है. शुक्रवार की देर रात इस बार की फेवरिट मानी जा रही ब्राज़ीली टीम को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा.
कैमरून ने ब्राज़ील को 1-0 से हराया. कैमरून की ओर से विंसेंट अबूबाकर ने मैच के 92वें मिनट में गोलकर अपनी टीम को ऐतिहासिक जीत दिलाई. इस जीत के साथ क़तर वर्ल्ड कप में भले कैमरून को कोई फ़ायदा नहीं हुआ हो लेकिन ब्राज़ील को हराने वाली वह पहली अफ्रीकी टीम ज़रूर बन गई है.
ब्राज़ील की टीम क़तर वर्ल्ड कप ग्रुप स्टेज में आगे बढ़ चुकी है लिहाज़ा इस हार से उसे कोई नुक़सान तो नहीं हुआ है लेकिन इसने ख़तरे की घंटी ज़रूर बजा दी है. इसने एक ओर जहां पांच बार की चैंपियन ब्राज़ील के खिलाड़ियों के आत्मविश्वास को डिगाया होगा, वहीं दूसरी ओर दूसरी टीमों के मनोबल को बढ़ाया भी है कि ब्राज़ील को हराया जा सकता है.
ब्राज़ील वर्ल्ड कप फुटबॉल की अब तक की सबसे कामयाब टीम ज़रूर है लेकिन समय-समय पर उसे अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा है. लेकिन इन अप्रत्याशित हारों में एक हार ऐसी भी है जिसका दर्द ब्राज़ील के फ़ुटबॉल प्रेमियों को सालों या कहें दशकों से टीस मारता आया है. इस दर्द की तुलना ब्राज़ील के फैन्स किसी दूसरी हार से नहीं करना चाहते.
दरअसल ये मैच था 1950 के वर्ल्ड कप का ख़िताबी मुक़ाबला, जहां फेवरिट मानी जाने वाली मेजबान ब्राजील को उरुग्वे ने हराकर वर्ल्ड कप जीत लिया था. 1950 का ये वही वर्ल्ड कप था जहां द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों के चलते कई देशों ने खेलने से इनकार कर दिया था और भारत के सामने इस वर्ल्ड कप में हिस्सा लेने का मौक़ा था.
लेकिन ऐन मौक़े पर भारतीय फुटबॉल टीम भी इसमें हिस्सा नहीं ले पायी थी. भारत के अलावा स्कॉटलैंड और यूगोस्लाविया की टीमों ने भी टूर्नामेंट से पहले नाम वापस ले लिया था. लेकिन यही वो वर्ल्ड कप था जिसमें पहली बार खिलाड़ियों के जर्सी पर नंबर लिखे हुए थे.
ब्राज़ील में इस टूर्नामेंट को लेकर काफ़ी उत्साह था. ये 1950 का वह साल था जब इससे पहले फ़ुटबॉल की दुनिया में ब्राज़ील का जलवा कभी नहीं दिखा था, लेकिन घरेलू दर्शकों के सामने टीम फेवरिट मानी जा रही थी.
यह वह समय था जब ब्राज़ील की आधी जनता के सामने खाने का संकट था, एक-तिहाई जनता साक्षर थी लेकिन इस वर्ल्ड कप के दौरान फ़ुटबॉल ने इन सबको आपस में जोड़ दिया था. दूसरी ओर ब्राज़ील की सरकार का अनुमान था कि इस वर्ल्ड कप के साथ ही दुनिया को ब्राज़ील की ताक़त का अंदाज़ा होगा. लिहाज़ा टीम पर हर हाल में वर्ल्ड कप जीतने का दबाव था.
इसकी तैयारी के लिए ब्राज़ील ने एक बेहतरीन टीम चुनी थी. ब्राज़ील की टीम का प्रदर्शन भी शानदार रहा था. उरुग्वे के ख़िलाफ़ अंतिम मुक़ाबले से पहले खेले गए दो मुक़ाबले में ब्राज़ील ने स्वीडन को 7-1 से और स्पेन को 6-1 से हराया था. ऐसे में उरुग्वे के ख़िलाफ़ भी टीम का पलड़ा भारी माना जा रहा था. इस मैच को ड्रॉ कराने की सूरत में भी ब्राज़ील चैंपियन बन जाता.

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जब रिकॉर्ड संख्या में दर्शक मैदान में जुटे

यही वजह थी पूरा रियो डि जेनेरियो उत्साह से भरा हुआ था. हर किसी को ब्राज़ील के वर्ल्ड चैंपियन बनने का भरोसा था. इस भरोसे की वजह से मैच की साइडलाइन पर सांबा बैंड को तैनात किया गया था. इस बैंड को एक ख़ास गीत को गाना था- ब्राज़ील द विनर्स. स्थानीय अख़बारों में मैच की सुबह ही हेडलाइन थी- 'चैंपियंस ऑफ़ द वर्ल्ड'.
इस उत्साह का पता मैच के दिन तब चला जब मरकाना स्टेडियम में देखते-देखते हज़ारों लोग जमा हो गए. आधिकारिक रूप से टिकट लेकर मैच देखने वाले दर्शकों की संख्या 1 लाख 75 हज़ार थी, जबकि 25 हज़ार वैसे लोग थे जो या तो आमंत्रित मेहमान थे या फिर किसी तरह से दरवाज़ा फांद कर अंदर आए थे. यानी स्टेडियम में ठीक दो लाख लोग मौजूद थे. किसी एक मैच में इससे ज़्यादा दर्शक कभी जमा नहीं हुए. आज तक ये किसी भी मैच में दर्शकों की सबसे बड़ी संख्या का रिकॉर्ड है. ये दर्शक मैच के शुरू होते ही जश्न मनाने लगे थे.
फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप को लेकर सैम बेर्केले की संपादित पुस्तक 'इवरीथिंग यू एवर वॉन्टेड टू नो अबाउट द वर्ल्ड कप' के पहले वॉल्यूम में इस वर्ल्ड कप का दिलचस्प विवरण मिलता है. इसके मुताबिक़ इस मैच को लेकर उरुग्वे की टीम पर इतना दबाव था कि टीम के मिड फ़िल्डर जूलियो पेरेज का मैच से पहले राष्ट्रीय गान सुनते वक्त पेशाब निकल आया था. मैच के बाद उन्होंने कहा था, "इस बात को लेकर मुझे कोई शर्म महसूस नहीं हुई."
हालांकि मीडिया के सामने उन्होंने जब स्वीकार किया होगा तब उनकी टीम इतिहास रच चुकी थी. बहरहाल इससे ये पता चलता है कि सामने वाली टीम कितने दबाव में खेल रही थी. ब्राज़ील के फॉरवर्ड एडिमिर टूर्नामेंट में नौ गोल दाग़ चुके थे और टीम में ज़िज़िन्हो के तौर पर बेमिसाल खिलाड़ी मौजूद था.
मैच के शुरू होते ही दर्शकों का शोर ब्राज़ीली टीम के पक्ष में गूंजने लगा था. लेकिन पहले हॉफ़ में कोई टीम गोल नहीं कर सकी. मैच के 47वें मिनट में ज़िज़िन्हों के पास पर फ्रिका ने गोल कर ब्राज़ील को बढ़त दिला दी. पूरा मरकाना स्टेडियम सांबा संगीत पर थिरकने लगा. लेकिन उरुग्वे के कप्तान ओबडूलो वारेला का इरादा कुछ और था. उन्होंने गोल पर एतराज़ जताते हुए रेफ़री से बहस करना शुरू कर दिया. रेफ़री को उनकी बात समझ में नहीं आ रही थी तो एक ट्रांसलेटर मैदान में लाया गया. वारेला आठ मिनटों तक रेफ़री से गोल पर बहस करते रहे हालांकि वे जान रहे थे कि फ्रिका का गोल एकदम सही है.

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लेकिन आठ मिनटों तक चली उनकी बहस ने एक ओर स्टेडियम के दर्शकों को शांत कर दिया. हर कोई ये जानने की कोशिश कर रहा था कि आख़िर हुआ क्या. वहीं दूसरी ओर इसने उरुग्वे की टीम को एकजुट करने में कामयाबी हासिल कर ली.
उस गोल का दबाव खिलाड़ियों पर से जाता रहा. कई खेल विश्लेषकों ने उरुग्वे के कप्तान के इस काम को ट्रिक माना, जिसके ज़रिए उन्होंने ब्राज़ील के खिलाड़ियों ही नहीं, बल्कि दर्शकों तक को फ्रस्टेट कर दिया था.
और अचानक से मैच के दूसरे हॉफ़ में एक ऐसा खिलाड़ी उभरकर सामने आया जिसे आज भी 72 सालों के बाद, ब्राज़ील में किसी विलेन की तरह देखा जाता है. उरुग्वे के राइट विंगर अल्सीडेस घिग्गिया इस मैच से पहले इसी वर्ल्ड कप में अपनी टीम के लिए तीन मैचों में तीन गोल जमा चुके थे. लेकिन यहां दबाव के पलों में उन्होंने पहले तो अपने साथी की मदद की. उन्होंने अपने साथी खिलाड़ी जुआन स्केयफ़िनो को सटीक पास दिया और इस गोल की बदौलत उरुग्वे ने बराबरी कर ली.
घिग्गिया के गोल से हारा ब्राज़ील

अगर ये मैच बराबरी पर भी छूटता तो भी बेहतर गोल औसत के चलते ब्राज़ील चैंपियन बनने वाली थी. 79वें मिनट में घिग्गिया फिर से ब्राज़ील की गोलपोस्ट की ओर बढ़े, उनको बढ़ते देख ब्राज़ील के डिफ़ेंडरों ने स्केयफ़िनो को मार्क करना शुरू किया और घिग्गिया ने ब्राज़ीली डिफ़ेंडरों और गोलकीपर बारबोसा को छकाते हुए बाएं पैर से झनझनाटा शॉट लगाया जो सीधे गोलपोस्ट में जा उलझा.
मरकाना स्टेडियम में सन्नाटा फैल गया और इसके बाद खेल के बाक़ी समय में ब्राज़ील की टीम पूरी ताक़त लगाने के बाद भी बराबरी हासिल नहीं कर सकी.
घिग्गिया ने बीबीसी के विटनेस प्रोग्राम में दिए गए एक इंटरव्यू में कहा था, "ब्राज़ीली गोलकीपर और गोलपोस्ट के बीच बहुच जगह नहीं थी. मैंने पलभर के लिए सोचा कि क्या कर सकता हूं, फिर मैंने शॉट् खेला, वह गोलकीपर के बाईं ओर गया. वो नहीं रोक सके और गेंद गोलपोस्ट में गई. यह मेरी ज़िंदगी का सबसे बेहतरीन गोल था. हमारा दूसरा गोल. जब मैं इस गोल का जश्न मना रहा था तब पूरा स्टेडियम शांति में डूबा था. केवल तीन लोग ही अपने एक मूव से मरकाना स्टेडियम को शांत कर सकते हैं, फ्रैंक सिनात्रा, पोप जॉन पॉल द्वितीय और मैं."
फ्रैंक सिनात्रा मशहूर अमेरिकी गायक रहे हैं और जब घिग्गिया ने ये इंटरव्यू दिया था तब पोप जॉन पॉल द्वितीय रोमन कैथोलिक पोप थे. इसी इंटरव्यू में घिग्गिया ने एक दिलचस्प वाक़या सुनाया था.
उन्होंने बताया, "एक बार मैं ब्राज़ील गया था. पासपोर्ट चेक करने वाली खिड़की पर 23-24 साल की लड़की थी. उसने कागज़ात चेक करने के बाद कहा- आप घिग्गिया हैं, मरकाना वाले? मैंने कहा- हां, लेकिन वह तो बहुत पहले की बात है. तो उसने कहा- नहीं, नहीं. वह वाक़या हमारे दिलों को आज भी दुख पहुंचाता है."
ब्राज़ील के नाटककार और स्पोर्ट्स राइटर नेल्सन रोड्रिगेज़ ने 1950 की हार पर कहा था, "1950 की हार के साथ हमने पिछली 45 पीढ़ियों का पाप चुकाया है."

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इस मैच के बारे में ब्राज़ील के जानेमाने फुटबॉल पेले ने भी कई बार कहा कि उन्होंने इस हार से अपने पिता को पहली बार रोते हुए देखा था. तब पेले की उम्र नौ साल की थी. उन्होंने अपनी पुस्तक 'व्हाई सॉकर मैटर्स' में लिखा है, "उस दिन लाखों ब्राज़ीली लोगों के साथ मैंने भी जीवन का मुश्किल सबक सीखा था. जब तक अंतिम सीटी ना बजे तब तक जीवन और फ़ुटबॉल में कुछ भी निश्चित नहीं है."
पेले ने ये भी लिखा है कि इस हार ने ब्राज़ील को एकजुट किया था. उन्होंने लिखा है, "ये 16 जुलाई, 1950 का ही दिन था जब हमारा देश एकजुट हुआ था सेलिब्रेट करने के लिए, लेकिन हमें हार का सामना करना पड़ा और हमने ये दुख भी एक देश के तौर पर झेला था. यह पहला मौक़ा था जब हम एकजुट थे."
वर्ल्ड कप आयोजन समिति के लिए भी ये नतीज़ा इतना अप्रत्याशित था कि उरुग्वे को बिना किसी सेलिब्रेशन और संबोधन के वर्ल्ड कप की ट्रॉफ़ी पकड़ा दी गई और दर्शकों से डर के चलते उरुग्वे के खिलाड़ी भी इसका बखूबी जश्न नहीं मना सके थे. इस मैच को मरकानाज़ो भी कहते हैं, जिसका मतलब ग्रेट मरकाना ब्लो यानी मरकाना की करारी हार, जिसे हर ब्राज़ीलियाई नागरिक आज भी महसूस करता है.
इस टूर्नामेंट में ब्राज़ीली टीम को ट्रेनिंग देने के लिए फ्लावियो कोस्टा को कोच नियुक्त किया गया था,उन्हें उस वक्त प्रति महीने एक हज़ार पाउंड की सैलेरी दी जा रही थी. जो बहुत ही आकर्षक वेतन था, लिहाज़ा हार के बाद उन पर लोगों का गुस्सा निकल सकता था. उन्हें मरकाना स्टेडियम के ड्रेसिंग रूम में 48 घंटे तक बंद रखा गया. इसके बाद उन्हें महिलाओं के कपड़ों में स्टेडियम से बाहर ले जाया गया.

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गोलकीपर ने जीवनभर झेली सज़ा

इस हार की सबसे बड़ी क़ीमत टीम के कोच मोआसिर बारबोसा को चुकानी पड़ी. वे इस टूर्नामेंट से पहले देश में आदर्श गोलकीपर माने जाते थे लेकिन हार के बाद वे ऐसे गोलकीपर के तौर पर उभरे जिन्हें ब्राज़ील में घृणा की नज़र से देखा जाने लगा था. उन्हें इस भाव के साथ पूरा जीवन बिताना पड़ा.
1993 में वे जब ब्राज़ीली टीम अमेरिका में होने वाले वर्ल्ड कप की तैयारी कर रही थी तो वे खिलाड़ियों से मिलने कैंप में पहुंचे थे. आपको ये जानकार आश्चर्य हो सकता है कि टीम के एक डायरेक्टर ने सुरक्षा गार्ड्स को बुलाकर कहा कि इस आदमी को बाहर निकालो, ये हमेशा बैड लक लेकर आता है.
ऐसी ही कई दिलचस्प बातों का पता लुसियानो वैरिंके की लिखी पुस्तक 'द मोस्ट इनक्रेडिबल वर्ल्ड कप स्टोरीज़' में 1950 के वर्ल्ड कप पर लिखे चैप्टर में है.
8 अप्रैल, 2000 को बारबोसा का निधन हुआ और वे अपने निधन से पहले लोगों को हमेशा कहते रहे, "हमारे देश में किसी अपराध की अधिकतम सज़ा 30 साल है. लेकिन मैं 50 साल की सज़ा भुगत चुका हूं, उस अपराध के लिए जो मैंने किया ही नहीं."
उरुग्वे के लिए भी जीत अप्रत्याशित थी

इस पुस्तक के मुताबिक़ उरुग्वे की जीत वहां के लोगों के लिए भी इतनी अप्रत्याशित थी कि आठ लोगों का हर्ट अटैक से निधन हो गया. मैच के दौरान पांच लोगों की मौत हुई जबकि अंतिम सिटी बजने के बाद तीन लोगों की.
वहीं दूसरी ओर मरकाना स्टेडियम के डॉक्टरों के मुताबिक़ अलग-अलग वजहों से बेहोश हुए कुल 169 लोगों का इलाज मैच के दौरान किया गया. इनमें छह लोगों की गंभीर स्थिति में अस्पताल में भर्ती कराया गया था. वैसे इसे रियो डि जेनेरियो के इतिहास का सबसे दुखद दिन माना जाता है.
लुसियानो वैरिंके की पुस्तक में ब्राज़ील के पुलिस विभाग के पास मिली रिपोर्टों के आधार पर कहा गया है कि क़रीब सौ फैन्स ने आत्महत्या करने की कोशिश की थी. हालांकि इस जानकारी की पुष्टि दूसरी स्रोतों से नहीं होती है.
इस वर्ल्ड कप में हार के बाद ब्राज़ील ने अपनी फ़ुटबॉल की टीम के लिए पीली जर्सी की शुरुआत की थी.
वैसे ब्राज़ील की फ़ुटबॉल संस्कृति की ख़ासियत है कि जिस घिग्गिया ने उन्हें खेल इतिहास का सबसे बड़ा दुख दिया, उन्हीं घिग्गिया को उन्होंने 2014 में वर्ल्ड कप आयोजन का ड्रॉ निकालने के लिए बुलाया गया, लेकिन ब्राज़ीली अधिकारियों ने उस दौरान भी उनसे हार का ज़िक्र किया.
घिग्गिया का निधन 88 साल की उम्र में 16 जुलाई, 2015 को उरुग्वे के एक अस्पताल में हुआ. ये भी दिलचस्प संयोग था कि ये मरकाना में जीत का गोल दागने की 65वीं वर्षगांठ का दिन था.
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