फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप फ़ाइनल 2022: दुनिया का सर्वश्रेष्ठ फुटबॉलर जो डॉक्टर, फ़िलॉसफ़र था लेकिन वर्ल्ड कप नहीं जीत सका

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- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
2022 के वर्ल्ड कप फ़ाइनल में अर्जेंटीना के लियोनेल मेसी का सपना पूरा हो गया है. 2006 से 2022 तक का लंबा सफ़र ज़रूर तय करना पड़ा लेकिन आख़िर में वर्ल्ड कप जीतने वाले करिश्माई खिलाड़ियों में उनका नाम भी शामिल हो गया.
फ़ुटबॉल के खेल को लेकर तमाम नैसर्गिक जादू और निसार होने वाली मोहक छवि के बावजूद उनके करियर का एक कोना खाली ही था, लेकिन अब उनके नाम हर उपलब्धि है.
इसी वर्ल्ड कप में हमने देखा है कि क्वार्टर फ़ाइनल में मोरक्को के सामने किस तरह क्रिस्टियानो रोनाल्डो का सपना टूट गया. मेसी को लगभग बराबरी की टक्कर देने वाले पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो का भी शायद ये आख़िरी वर्ल्डकप था और वर्ल्ड कप से बाहर होने का दर्द उनके आंसूओं में साफ़ दिखा.
क्रिस्टियानो रोनाल्डो के अलावा क्रोएशिया के लुका मॉडरिच और ब्राज़ील के नेमार को भी इस सूची में शामिल कर सकते हैं. ये दोनों भी दुनिया के सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों में शुमार हैं लेकिन वर्ल्ड कप जीतने का करिश्मा ये दोनों भी नहीं कर सके हैं.
क़तर वर्ल्ड कप के क्वार्टर फ़ाइनल में बेहतरीन गोल करने के बाद भी क्रोएशिया के हाथों ब्राज़ील को हार मिली और नेमार ने कहा कि ये हार वे लंबे समय तक नहीं भूल पाएंगे. साथ ही उन्होंने ये भी स्पष्ट किया है कि ये उनका आख़िरी वर्ल्ड कप नहीं है.
यही है वर्ल्ड कप का वो जादू जो लीजेंड खिलाड़ियों को भी बार बार मैदान में वापस लाता रहा है और कई लीजेंड खिलाड़ी सब कुछ झोंकने के बाद भी सबसे अहम उपलब्धि हासिल नहीं कर पाते हैं.
अगर बीते दिनों के चैंपियन खिलाड़ियों पर ही नज़र डालें तो हमें ऐसे कई दिग्गज नज़र आते हैं. एक नाम तो नॉर्दन आयरलैंड के फुटबॉलर जॉर्ज बेस्ट का है, दूसरा नीदरलैंड के जोहान क्रॉयफ़ हैं. इनके अलावा हंगरी के फ्रेनेक पुस्कास, फ्रांस के माइकल प्लाटिनी और रूस के गोलकीपर लेव याशिन का नाम भी शामिल कर सकते हैं.
पर आज आपको ऐसे खिलाड़ी के बारे में बता रहे हैं, जिनके बारे में कई समीक्षकों ने माना है कि ये वो सबसे बेहतरीन खिलाड़ी रहे हैं जो वर्ल्ड कप नहीं जीत सके.
1982 वर्ल्ड कप में दिखा था जलवा
लेकिन आज ये कहानी है उस खिलाड़ी की जिनके बारे में ना केवल यह कहा जाता है कि वे ऐसे सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी रहे जो वर्ल्ड कप नहीं जीत सके बल्कि उनकी पूरी टीम के बारे में भी यही धारणा है कि यह सबसे बेहतरीन टीम थी जो वर्ल्ड कप नहीं जीत सकी.
ये टीम थी 1982 के वर्ल्ड कप में हिस्सा लेने वाली ब्राज़ील की टीम और उस खिलाड़ी का नाम था सॉक्रेटीज़. वे किस तबियत के फुटबॉलर रहे होंगे, इसे समझने के लिए उनका जीवन चरित बताने वाली पुस्तक का टाइटिल ही काफ़ी होगा. इस पुस्तक का नाम है 'डॉक्टर सॉक्रेटीज़- फ़ुटबॉलर, फ़िलॉसफ़र और लीजेंड.'
खेल की दुनिया में शायद ही कोई दूसरा सितारा होगा, जिसके बारे में बताने के लिए आपको इतना कुछ कहना पड़ रहा हो, डॉक्टर भी फुटबॉलर भी, फ़िलॉसफ़र भी और लीजेंड भी. लेकिन सॉक्रेटीज़ की यही ख़ासियत थी. उन पर यह किताब लिखने वाले फुटबॉल पत्रकार एंड्रूय डोउने ने रायटर्स समाचार एजेंसी के लिए 17 साल ब्राज़ील में बिता कर ये पुस्तक लिखी है.
इस पुस्तक की प्रस्तावना में जोहान क्रॉयफ़ ने लिखा है, "सॉक्रेटीज़ गेंद से जो चाहते वो कमाल दिखाने में सक्षम थे. वे बहुत तेज़ नहीं भागते थे, वे दूसरे खिलाड़ियों को ज़्यादा नहीं छकाते थे और ना ही बेहतरीन हेडर लगाते थे लेकिन वे जो चाहते वो कर सकते थे. दरअसल वे उन खिलाड़ियों में शामिल थे जो सबकुछ थोड़ा बहुत कर सकते थे और उनका थोड़ा बहुत बेस्ट जितना था."
बहरहाल, सॉक्रेटीज़ के पिता काफी पढ़ाकू थे और उन पर ग्रीक दर्शन का अच्छा खासा प्रभाव था और इसकी वजह से उन्होंने अपने बेटे का नाम रखा सॉक्रेटीज़. उनके पिता को फुटबॉल से भी लगाव था तो जब सॉक्रेटीज़ छह साल के हुए तो पिता ने उन्हें ब्राज़ील के मशहूर क्लब सैंटोस की टीशर्ट दिलाई. सैंटोस वह क्लब था जहां से पेले निकले थे और सॉक्रेटीज़ को उनके कई मैच देखने का मौका मिला.

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बचपन में उनको फुटबॉल के अलावा जूडो और बॉक्सिंग भी पसंद था लेकिन जल्दी ही उन्हें बोटाफ़ोगो क्लब से खेलने का मौका मिल गया. यह वही क्लब था जहां से गरिंचा जैसे लीजेंड खिलाड़ी खेल चुके थे.
मेडिसिन की पढ़ाई में डिग्री
ज़ाहिर है कि फुटबॉल के मैदान में कोई बड़ा कारनामा करने से पहले सॉक्रेटीज़ ने मेडिसिन की पढ़ाई पूरी की थी. उन्होंने साउ पाउलो यूनिवर्सिटी के मेडिकल स्कूल से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की थी.
उनकी बायोग्राफ़ी से पता चलता है कि पढ़ाई और खेल का दबाव सोक्रेटीज के लिए मुश्किल भरा हो रहा था और उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी लेकिन घर में किसी को बताया नहीं. वे घर से पढ़ने के लिए निकलते लेकिन सिनेमा और पब से जाकर लौट आते. उनके घर वालों को यह सब तब पता चला जब सॉक्रेटीज़ परीक्षा में फेल हो गए.
इसके बाद पांच बच्चों के परिवार को चलाने वाले उनके पिता ने उन्हें समझाया कि पढ़ाई क्यों ज़रूरी है. 18 साल की उम्र में सॉक्रेटीज़ ने मेडिसिन की पढ़ाई के लिए चार यूनिवर्सिटीज की परीक्षा दी और चारों में उनका चयन हो गया था. घर वालों के करीब रहने के लिए उन्होंने साओ पाउलो को ही चुना.
डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के साथ ही सॉक्रेटीज़ के सामने एक बड़ी चुनौती थी, उन्हें ब्राज़ील की फुटबॉल टीम को उस मुकाम तक लाना था जहां से 1970 की कामयाबी के बाद टीम पहुंची नहीं थी. 1979 में ब्राज़ील टीम में पहुंचने के बाद उनके सामने 1982 का वर्ल्डकप लक्ष्य था.
तब तक सॉक्रेटीज़ के लंबे बाल और दाढी, लंबाई, कद काठी ये सब मिलाकर उन्हें कूल फ़ुटबॉलर बना चुके थे. लेकिन सोक्रेटीज को ब्राज़ील में आज भी फुटबॉलर से ज़्यादा फुटबॉल और समाज-राजनीति की समझ रखने वाले फ़ुटबॉलर के तौर पर देखा जाता है.
उन्होंने फुटबॉल के बारे में कहा था, "फुटबॉल आपको सच से मिलाता है. कोई दूसरा पेशा ऐसा नहीं कर सकता. फुटबॉल इतना लोकतांत्रिक है. मैं हमेशा ऐसे खिलाड़ियों से घिरा रहता हूं, जिसकी सामाजिक स्थिति और शिक्षा बहुत अलग है. इसलिए आपको समाज की सच्चाई नज़दीकी से देखने का मौका मिलता है."
टीम के काले और ग़रीब खिलाड़ियों को देखकर उनके लोकतांत्रिक मन में खिलाड़ियों को क्लब से मुक्त कराने या फिर बेहतर पैसे दिलाने का आंदोलन ख़्याल में आया था. उनका मानना था कि क्लब के साथ अनुबंध खिलाड़ियों से ज़्यादा क्लब के फ़ायदे को ध्यान में रखकर बनाया जाता है, ऐसे में खिलाड़ियों के पास मोल भाव करने के लिए कुछ नहीं होता है.
यही वजह है कि उन्हें इंटेलिक्चुअल फ़ुटबॉलर के तौर पर देखा जाता है. ये इंटेलिक्ट इस तरह का था कि आम तौर पर गोल करने के बाद वे टीम के खिलाड़ियों के साथ जश्न भी नहीं मनाया करते थे.
ब्राज़ील की नेशनल टीम में दस्तक देने से पहले सॉक्रेटीज़ ब्राज़ील के क्लब कोरांथियंस के स्टार बन चुके थे. यह क्लब दरअसल ब्राज़ील के मजदूर वर्ग या कामकाजी लोगों का क्लब था और यहां उन्होंने खिलाड़ियों ही नहीं बल्कि क्लब के कामगारों के हितों की लड़ाई भी लड़ी. उनकी इस लड़ाई को कोरांथियंस डेमोक्रेसी के नाम से मशहूरी मिली और क्लब के अंदर पैसों का भ्रष्टाचार काफ़ी हद तक कम हो गया. इस लड़ाई ने सॉक्रेटीज़ को हीरो बना दिया था.

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वहीं खेल के मैदान में उन्हें अपेक्षाकृत धीमा खिलाड़ी माना जाता था, लेकिन तकनीकी तौर पर वे जीनियस थे. वे खेल पहले ही भांप लेते थे, इस लिहाज से वे हमेशा दूसरों पर भारी पड़ते थे. उनके सारे शाट्स कारगर साबित होते थे. उनके पास एकदम सटीक होते थे, और गोल और भी सटीक.
1982 वर्ल्ड कप में इटली से मिली हार
बावजूद इन सबके बतौर कप्तान वे अपनी टीम को 1982 में ऐसी स्थिति में ले आए थे, जिसे टूर्नामेंट में सबसे फेवरिट टीम माना जा रहा था. इस टूर्नामेंट में टीम के कप्तान थे और सेंटर मिडफ़ील्डर की भूमिका निभा रहे थे. उनके साथ ज़ीको, क्रेजो, इडर और फलकाओ जैसे मिडफ़ील्डर मौजूद थे.
इनकी कमान सॉक्रेटीज़ के हाथ में जो किसी भी रक्षा पंक्ति को भेदने की काबिलियत रखते थे. टूर्नामेंट से पहले उनसे प्रेस कांफ्रेंस में पूछा गया कि डच की टीम ने टोटल फुटबॉल का इजाद किया है और पेले की टीम मार्शल आर्ट्स की शैली गिंगा में खेलती रही, आपकी टीम कैसे खेलेगी तो उन्होंने कुछ पल ठहरते हुए जवाब दिया, "ऑर्गेनाइजड केओस."
लेकिन रूस के ख़िलाफ़ पहले मैच में ब्राज़ील की टीम पिछड़ गई थी. 75 मिनट के खेल के बाद टीम एक गोल से पीछे चल रही थी तब गोलपोस्ट से 40 गज दूर गेंद सॉक्रेटीज़ को मिली और उन्होंने पलक झपकते ही दो डिफेंडरों को छकाते हुए झन्नाटेदार शाट्स लगाया जो गोलपोस्ट की बायीं ओर जा समाया. इसके बाद इडर के गोल से टीम को जीत मिली. अपने गोल के बारे में सॉक्रेटीज़ ने बाद में कहा, "नॉट ए गोल, इंडलेस ऑर्गेज़्म."
लेकिन यही टीम इटली के ख़िलाफ़ ऐन मौके पर पिछड़ गई. इस मैच में भी सॉक्रेटीज़ ने गोल करके टीम को बढ़त दिलाई, लेकिन 2-2 की बराबरी के बाद इटली के पाओलो रोसी के अंतिम और हैट्रिक वाले गोल से ब्राज़ील टूर्नामेंट से बाहर हो गयी.

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ब्राज़ील यह मुक़ाबला 2-3 के अंतर से हार गयी थी और सेमीफ़ाइनल में जगह नहीं बना सकी थी.
5 जुलाई, 1982 को जब ब्राज़ील की टीम हारी तो उस दिन मैदान में हर दर्शक के आंखों से आंसू निकल आए थे. लेकिन सॉक्रेटीज़ ने इस मैच के बाद टीम के खिलाड़ियों से कहा था, "दोस्तो, हम मैच हार गए हैं लेकिन हमारे पास जो है, उसे नहीं खोना है. हमारी टीम के खिलाड़ियों की अविश्वसनीय एकजुटता और भाईचारा, जीवन भर रहेगा. यह बात मायने रखती है." हालांकि यह सब कहते-कहते सॉक्रेटीज़ खुद सुबकने लगे थे.
इस टीम की ताक़त और वर्ल्ड कप नहीं जीतने के दंश पर पेले ने अपनी ऑटोबायोग्राफ़ी में लिखा है, "सॉक्रेटीज़ बेहतरीन मिडफ़ील्डर थे और उनकी टीम भी कमाल की थी. यही टीम की ताक़त थी और यही कमज़ोरी भी, टीम के पास स्ट्राइकिंग फॉरवर्ड्स नहीं थे."
सॉक्रेटीज़ की बायोग्राफ़ी में बताया गया है कि हार के बाद वे टीम के साथी खिलाड़ियों के साथ पब में ड्रिंक करने चले गए और सुबह पांच बजे तक लोग पीते रहे. लेकिन अगली सुबह उन्होंने कहा, "इस हार को समझना मुश्किल है, क्योंकि हमलोगों ने कोई ग़लती नहीं की थी. मेरे ख़्याल से कहीं कोई चूक नहीं हुई. हमें हार के लिए तैयार रहना चाहिए. ख़ासकर फुटबॉल के खेल में. लेकिन यह किसी अपने की मौत जैसा ही होता है. आपको मालूम है कि वे चले जाएंगे लेकिन फिर भी दुख कम नहीं होता है."
इस हार ने थिंकर सॉक्रेटीज़ पर ऐसा प्रभाव डाला कि वे भी इस दुख से कभी उबर नहीं पाए. हालांकि वे खेल के मैदान पर सक्रिय रहे लेकिन खेल के प्रति उनका वह समर्पण का भाव दोबारा वैसा नहीं दिखा. उधर इस हार का असर ब्राज़ील में भी हुआ और समाज के पैसे वाले तबके को लगा कि कोरांथिएंस डेमोक्रेसी का आंदोलन बंद हो जाएगा लेकिन ब्राज़ील की घरेलू टूर्नामेंट में सॉक्रेटीज़ ने अपनी टीम को साल दर साल चैंपियन बनाकर इस आंदोलन को जीवित रखा.
लोकतांत्रिक मूल्यों पर भरोसा
ऐसा नहीं था कि सॉक्रेटीज़ का खेल जीवन इसके बाद ख़त्म हो गया, वे 1986 के वर्ल्ड कप में भी खेले.1986 में मेक्सिको में खेले गए वर्ल्ड कप में भी वे टीम में शामिल किए गए हालांकि चोटों की वजह से वे कप्तान नहीं चुने गए. स्पेन के ख़िलाफ़ पहले मैच में पेनल्टी पर गोल भी बनाया लेकिन क्वार्टर फ़ाइनल में पेनल्टी शूट आउट में वे चूक गए और उनकी टीम फ्रांस के सामने अपना मुक़ाबला हार गयी. ये उनका अंतिम मैच साबित हुआ.
लेकिन सॉक्रेटीज़ अपनी बिंदास जीवन शैली, सिगरेट और शराब पीने की लत के बावजूद फुटबॉल की दुनिया में चर्चा में रहे. उनके लोकतांत्रिक विचारों ने उन्हें फिलॉसफ़र और लीजेंड का दर्जा दिलाया. वे हमेशा ग़रीबों की मदद के लिए जाने गए और ब्राज़ील फुटबॉलर होने के बाद भी उनके हीरो पेले, गरिंचा जैसे दिग्गज़ नहीं थे. वे कहते थे कि उनके हीरो फिडेल कास्त्रो और चे ग्वेरा रहे. इसके अलावा बीटल ग्रुप से जुड़े और युद्ध विभाषिका के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले कार्यकर्ता जान लेनन का उन पर असर रहा.

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फिडेल कास्त्रो का उन पर ऐसा असर रहा कि उन्होंने अपने एक बेटे का नाम फिडेल रखा था. जब वे नाम अपने बच्चे का रख रहे थे तो उनकी मां ने कहा, "बच्चे के लिए तुमने ये एक मुश्किल शख़्सियत का नाम चुन लिया है." तब उन्होंने अपनी मां से कहा था, "देखो, तुमने मेरे साथ क्या किया." वे अपनी मां को ग्रीक फिलॉसफ़र सॉक्रेटीज़ की याद दिला रहे थे.
बहरहाल, उनका निजी जीवन उथल पुथल से भरा रहा. चार शादियों से उनके पांच बच्चे हुए. इन सबके बीच वे ना केवल फुटबॉल, बल्कि राजनीति और अर्थनीति पर अख़बारों और पत्रिकाओं के लिए लगातार लिखते रहे. दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों का प्यार उन्हें मिलता रहा.
अत्यधिक शराब सेवन के चलते 4 दिसंबर, 2011 को महज 57 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. वैसे दिलचस्प ये है कि सॉक्रेटीज़ खुद तो ब्राज़ील को वर्ल्ड कप नहीं दिला पाए लेकिन उनके छोटे भाई राय के कप्तानी में ब्राज़ील ने 1994 का वर्ल्ड कप जीता था. 1970 के 24 साल बाद. जो सपना सॉक्रेटीज़ ने देखा था, उसे छोटे भाई ने उनके सामने ही पूरा कर दिखाया था.
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