पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों के ख़िलाफ़ हो रहे अत्याचारों के लिए कौन ज़िम्मेदार?

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- Author, शुमाएला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, रबवाह(चिनाब नगर), पाकिस्तान से
पाकिस्तान के सेंट्रल पंजाब के एक कस्बा रबवाह में 12 अगस्त 2022 को नसीर अहमद रोज़ की तरह मार्निंग वॉक पर गए थे. वो शुक्रवार का दिन था, इसलिए वो अपने परिजनों के कब्र पर फ़ातेहा पढ़ने चले गए.
कब्रिस्तान से घर लौटते वक़्त अपने एक परिचित से बातचीत के लिए नसीर कुछ मिनटों के लिए 'लैरी अड्डा' पर रुके. जब नसीर बातचीत में व्यस्त थे उनके पास सफ़ेद सलवार कमीज़ पहने हुए दाढ़ी वाला एक व्यक्ति आया.
उस व्यक्ति ने बीच में उन्हें रोकते हुए पूछा,"क्या तुम अहमदी हो?" जैसे ही नसीर ने इसके जवाब में सर हिलाते हुए कहा, "हां मैं हूं" वैसे ही उस इंसान ने उनपर चाकू से ताबड़तोड़ हमला कर दिया.
उन पर चाकू से वार करते हुए वो बार-बार नबी मोहम्मद के लिए नारे लगाने लगा रहा था.
बाद में हमलावर को मौक़े पर गिरफ़्तार कर लिया गया और उसने अपना जुर्म भी कबूल लिया था. फ़िलहाल वो अंडर ट्रायल हैं.
'हम बता नहीं सकते की हम कौन हैं'
सरकार ने रबवाह शहर का नाम बदलकर चिनाब नगर कर दिया है. ये शहर ज़मात-ए-अहमदिया का मुख्यालय माना जाता है.
यहां रहने वालों में बहुसंख्यक अहमदिया हैं. संवैधानिक संशोधन द्वारा उन्हें ग़ैर-मुस्लिम घोषित किया गया है.
पाकिस्तान में लगभग 40 लाख अहमदिया मुसलमान रहते हैं. 1889 में अहमदिया समुदाय की स्थापना कादियान नाम के एक गाँव में हुई थी. ये गांव अब भारत के पंजाब में है.
अहमदिया मुसलमान और सुन्नी या शिया मुसलमान के मान्याताओं के बीच अंतर की वजह से कई मुसलमान अहमदिया मुसलमान को विधर्मी मानते हैं.
साल 1974 में पाकिस्तान में ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो सरकार ने अहमदियों को गै़र-मुस्लिम घोषित करते हुए एक संवैधानिक संशोधन पेश किया था. इसके 10 साल बाद ज़िया-उल-हक़ के शासन के दौरान अहमदिया समुदाय पर और प्रतिबंध लगाते हुए एक क़ानूनी अध्यादेश लागू किया गया और अहमदिया को ख़ुद को मुसलमान बताने को अपराध घोषित कर दिया गया.
नसीर अहमद की बेटी राबिया (पहचान छिपाने के लिए नाम बदल दिया गया है) बताती हैं कि जब उनके पिता मार्निंग वॉक के लिए निकले तब वो उन्हें ढंग से विदा भी नहीं कह पाई थी.
राबिया कहती हैं, "एक रात पहले मैंने उन्हें सोने से पहले नई कंबल दी थी और वह काफ़ी खु़श थे. अगले दिन मैंने अस्पताल में एक सफे़द चादर से लिपटा उनका पीला चेहरा देखा तो मैं टूट गई. यह ऐसा नज़ारा था जो मुझे जीवनभर के लिए डराता रहेगा."
राबिया ये कहते हुए सिसकने लगती हैं. वो कहती हैं, "हमें अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता नहीं है. हमें खुद को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता नहीं है. हम नहीं बता सकते कि हम कौन हैं और हम किसमें आस्था रखते हैं. हम डरे हुए हैं और ये डर लगातार बढ़ रहा है. यहां हमारे लिए जगह तेज़ी से कम हो रही है और इसलिए हमारा पूरा समुदाय इससे चिंतित हैं."

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उत्पीड़न का इतिहास
पाकिस्तान में अहमदियों के उत्पीड़न का एक लंबा इतिहास है. उनकी जान, संपत्ति और इबादत स्थलों पर हमले होते रहे हैं. वो मानते हैं कि क़ानूनों के तहत उत्पीड़न उनका किया गया है. उनके इकट्ठा होने, धर्म का प्रचार करने, अपने पूजा स्थलों को मस्जिद बुलाने और अज़ान देने पर रोक है.
यहां तक कि सोशल मीडिया पर कु़रान की आयतों को शेयर करना या कब्र की पत्थरों पर कलमा जैसे इस्लामिक शिलालेखों को लिखना तक उन्हें क़ानूनी परेशानी में डाल सकती हैं.
पाकिस्तान में साल 2010 से अप्रैल 2022 तक इस समुदाय के लोगों पर कब्र को अपवित्र करने 28 घटनाएं दर्ज की गईं हैं. जबकि साल 2021 के बाद से उनके पूजा स्थलों पर लगभग 30 हमले हुए हैं. सोशल मीडिया पर क़ुरान की आयतें शेयर करने पर कई अहमदियों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है.
क़मर सुलेमान पाकिस्तान में ज़मात-ए-अहमदिया के प्रतिनिधि है. वह हाल के महीनों में अहमदिया समुदाय के लोगों के ख़िलाफ़ हो रहे हमलों में बढ़ोतरी की बात को स्वीकार करते हैं. लेकिन वो इसके लिए कट्टरपंथ और उग्रवाद में व्यापक वृद्धि को इसका ज़िम्मेदार मानते हैं.
क़मर सुलेमान कहते हैं, "जनता की भावना हमारे ख़िलाफ़ नहीं है. लोग हमारे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और हमें बेहतर तरीके से समझते हैं. यहां के लोग ख़ुद के अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं. इन सब बातों में आमतौर पर उनकी दिलचस्पी नहीं है, लेकिन हाल ही में एक सोचा-समझा अभियान चलाया गया है और कभी-कभी ये लोग इस प्रोपेगेंडा में बह जाते हैं."

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क़मर का मानना है कि यह धार्मिक आस्था का कम सत्ता और ईर्ष्या का खेल ज़्यादा है.
वो कहते हैं, "हमारे पास यहां समान अवसर नहीं है, इसलिए हम अपनी बात स्पष्ट तरीके से नहीं रख सकते. ऐसे लोग हैं जो बिना किसी तर्क के अहमदियों को विधर्मी मानते हैं. ख़त्म-ए-नबुव्वत जैसे समूहों ने खुले तौर पर स्वीकार किया है कि वे हमारी मान्यताओं को नहीं जानते हैं. ख़त्म-ए-नबुव्वत के मुद्दे के रूप में इसका विरोध काफ़ी ज़्यादा राजनीतिक हो गया है."
क़मर सुलेमान ने बताया कि ख़त्म-ए-नबुवत पैगंबर मोहम्मद के आख़िरी मूल्यों की रक्षा के लिए बना एक इस्लामी आंदोलन है.
अहमदिया समुदाय से जुड़े एक व्यक्ति के अनुसार घुटन और हताशा के माहौल के कारण दशकों से कई अहमदिया देश छोड़कर जा चुके हैं.
क़मर कहते है, "ऐसे राजनेता हैं जो कहते हैं कि अगर अहमदी यहां रहना चाहते हैं, तो उन्हें प्रतिबंधों के तहत रहना सीखना होगा. नहीं तो वो जहां चाहें वहां जा सकते हैं और रह सकते हैं."
"लेकिन सवाल यह है कि इतनी बड़ी आबादी पलायन कैसे कर सकती है, यह हमारी भी ज़मीन है, हमारा देश है. हमने यहां जन्म लिया और यहीं बले-बढ़े. कोई हमें कैसे अपना देश छोड़ने के लिए कह सकता है."
क़मर सुलेमान का मानना है कि अहमदियों की हताशा के पीछे सरकार का हाथ है.
क़मर कहते हैं कि, "जब व्यक्तिगत पूर्वाग्रह की वजह से एक मौलवी अहमदियों के ख़िलाफ़ भीड़ को भड़काता है तब उसे विश्वास होता है कि सरकार उन्हें रोकने नहीं आ रही है. इसलिए परोक्ष तौर पर सरकार की निष्क्रियता उन्हें ये करने के लिए ये बढ़ावा देती है."

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'नाज़ी जर्मनी के यहूदियों जैसा व्यवहार'
यासिर हमदानी एक वकील हैं. उनका मानना है कि अहमदियों को उनके मौलिक मानवाधिकारों से वंचित रखा गया है. ये अधिकार पाकिस्तान के संविधान में निहित हैं. विशेष तौर से भेदभावपूर्ण संशोधन और उसके बाद आने वाले क़ानूनों के बाद उन्हें उनके विश्वास के अधिकार और रिवाज़ों की स्वतंत्रता से वंचित कर दिया गया है.
फिर अलग-अलग तबके और समूह हैं जो अहमदियों के ख़िलाफ़ नफ़रत और हिंसा भड़काते रहते हैं.
यासिर कहते हैं, "उनके साथ वही व्यवहार किया जाता है जो नाज़ी जर्मनी में यहूदी लोगों पर किया गया था."
यासिर क़ानून की ओर इशारा करते हैं जो पाकिस्तानी नागरिकों को बाध्य करता हैं. यदि वे मुस्लिम होने का दावा करते तो वे शपथ में गवाही देते हैं कि वे नागरिक होने के नाते बुनियादी अधिकारों को प्राप्त करने के लिए पैगंबर मोहम्मद की मूल्यों में विश्वास करते हैं.
इतिहासकार अली उस्मान कासमी के मुताबिक़ पाकिस्तान में अहमदियों के ख़िलाफ़ हमलों की नई लहर में तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान जैसे समूहों की बढ़ती लोकप्रियता का हाथ है. हालांकि वो कहते हैं कि इसके लिए कुछ हद तक ज़िम्मेवार सरकार भी है.
2017 के बाद से तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान के समर्थक अहमदी विरोधी आंदोलन और ख़त्म-ए-नबुवत आंदोलन के आसपास की राजनीति में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं. हालांकि ऐतिहासिक रूप से अन्य धार्मिक समूह भी इसका हिस्सा रहे हैं.
कासमी का मानना है कि पाकिस्तान का क़ानून अहमदी विरोधी व्यवहार का समर्थन करता है और उसे सही ठहराता है.
अली उस्मान कासमी समझाते हैं कि अगर कोई पाकिस्तान के क़ानून, न्यायपालिका के निर्णयों और संसद से पारित संशोधनों और अध्यादेशों का विश्लेषण करेगा तो देख पाएगा कि इस मामले में अहमदियों को ईशनिंदा करने के दोषी के तौर पर परिभाषित किया गया है और उनके किए काम को देशद्रोही के रूप में पेश किया गया है.
वो कहते हैं, "यदि बहुसंख्यक मुस्लिम मानते हैं कि एक समूह केवल अपने अस्तित्व के कारण ईशनिंदा कर रहा है, तो कोई भी कल्पना कर सकता है कि उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाता होगा. पाकिस्तानी समाज में अहमदियों का अमानवीयकरण किया गया है."
2020 में जब इमरान खान की सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग की स्थापना की थी. उसमें अहमदिया समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं था.
इसके बारे में पूछे जाने पर तत्कालीन सूचना मंत्री शिबली फ़राज़ ने जवाब दिया कि अहमदी अल्पसंख्यकों में परिभाषित नहीं होते हैं.
समुदाय को मुख्यधारा से बाहर करने के लिए कुछ दूसरे क़ानून भी बनाए गए हैं.

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सामाजिक भेदभाव
इस साल फ़रवरी के महीने में पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के नेतृत्व में एक फ़ैक्ट फाइनडिंग मिशन ने दावा किया कि दिसंबर और जनवरी के महीने के दौरान अहमदी पूजा स्थलों की मीनारों को तोड़ने में गुजरांवाला और वज़ीराबाद ज़िलों के नागरिक प्रशासन की प्रत्यक्ष भागीदारी थी.
रिपोर्ट में बताया गया है कि यह एक स्थानीय राजनीतिक-धार्मिक संगठन के सदस्यों द्वारा की गई आपत्तियों के बाद किया गया था.
जबकि इन इलाक़ों के प्रशासन का दावा है कि उन्होंने मॉब हिंसा के ख़तरे को दूर करने के लिए ऐसा किया. एचआरसीपी ने कहा कि स्थिति को नियंत्रित करने के तरीक़े से समुदाय के प्रति द्वेष को बढ़ावा मिला.
रिपोर्ट में कहा गया, "मिशन समझता है कि स्थानीय नौकरशाही, पुलिस और न्यायपालिका को एक धार्मिक समूह द्वारा धमकाया गया था. उनकी प्रतिक्रिया अहमदिया समुदाय के मौलिक अधिकारों का सम्मान करते हुए क़ानून और व्यवस्था का प्रबंधन करने में अक्षमता को दर्शाती है."
लेकिन यह सिर्फ क़ानूनी उत्पीड़न तक सीमित नहीं है. समुदाय को देश भर में सामाजिक भेदभाव का भी सामना करना पड़ रहा है.
मानवाधिकार कार्यकर्ता ताहिरा अब्दुल्ला का मानना है कि पाकिस्तान में अहमदी सॉफ्ट टारगेट हैं और राजनेताओं के लिए धर्म को इस्तेमाल करने का एक उपकरण हैं. वो कहती हैं कि इसका इस्तेमाल वे जिस समुदाय की क़ीमत पर करते हैं जो पहले से ही हाशिए पर खड़ा है.
यह पूछे जाने पर कि क्या अहमदिया समुदाय के उत्पीड़न में सरकार की मिलीभगत है?
ताहिरा कहती हैं, "हमला होने की सूरत में अगर वो पुलिस को मदद के लिए बुलाते हैं, तो पुलिस आंखें मूंद लेती हैं. यदि अहमदी अपनी एफ़आईआर दर्ज कराने जाते हैं तो पुलिस ऐसा करने में आनाकानी करती है. ये क्या रवैया है? यह तो सीधे-सीधे राज्य की भूमिका पर सवाल करता है. जांच और प्रोसेक्यूसन के दौरान भी उनके साथ भेदभाव किया जाता है."

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'धार्मिक पहचान से परेशान किया गया'
नसीर अहमद की बेटी राबिया दावा करती हैं कि उनकी धार्मिक पहचान के कारण उन्हें जीवन भर तंग किया गया है.
वो कहती हैं कि वो इसे लेकर कोई उदाहरण नहीं देतीं लेकिन वो कहती हैं कि उनके कॉलेज का समय उनके लिए बेहद कठिन था.
राबिया कहती हैं, "ऐसा कई बार हुआ है जब मुझे एक क्लास फेलो की फ़ेसबुक फ्रेंड लिस्ट से खुद को हटाने के लिए कहा गया. कभी-कभी जब हम ख़रीदारी करने जाते हैं तो कुछ दुकानदार हमसे सौदा करने से मना कर देते थे."
वो कहती हैं, "अहमदिया महिलाओं को हिज़ाब पहनने के तरीके से लोग पहचानते हैं. कभी-कभी सड़कों पर चलते-चलते हम चीख पड़ते हैं, ऐसे दर्द और घुटन में कोई कैसे बचेगा?"
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