ममता बनर्जी की तृणमूल क्या कांग्रेस का स्थान ले पाएगी?

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
क्या देश की राजनीति में कांग्रेस का स्थान 'तृणमूल कांग्रेस' ले लेगी - राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा चल रही है.
इसकी वजह ये है कि पिछले कुछ समय से कांग्रेस के कई नेताओं ने तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के लिए लाइन लगा दी है. चाहे वो कीर्ति आज़ाद हों या फिर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे कमलापति त्रिपाठी के पोते राजेश त्रिपाठी. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता रहे संतोष मोहन देव की बेटी सुष्मिता देव और अशोक तंवर का नाम भी ऐसे ही नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने पहले ही तृणमूल कांग्रेस का हाथ थाम लिया.
हालांकि तृणमूल कांग्रेस का हाथ थामने वालों में जनता दल (यूनाइटेड) के पवन वर्मा भी हैं. लेकिन वो कांग्रेस पार्टी ही है जिसने अपने नेताओं के टीएमसी में जाने को लेकर ममता बनर्जी पर खुलकर निशाना साधा है.
पार्टी सांसद अधीर रंजन चौधरी ने खुलकर ममता बनर्जी पर 'बीजेपी से साँठ-गाँठ' का आरोप लगाया.
चौधरी ने 'आश्चर्य' व्यक्त करते हुए ये भी कहा है कि पहले ममता बनर्जी इस बात पर राज़ी थीं कि सभी विपक्षी दल, कांग्रेस समेत, आपस में एकजुट होकर आगामी आम चुनावों में बीजेपी को टक्कर देने का काम करेंगे. मगर उनका आरोप था कि ममता बनर्जी के रुख़ में तबसे बदलाव आया जबसे उनके भतीजे और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी को ईडी ने नोटिस भेजा था.

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वैसे अधीर रंजन चौधरी के इस दावे से अलग, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस, और ख़ास तौर पर ममता बनर्जी, देश के अन्य राज्यों में पैठ जमाने की जल्दबाज़ी में है उससे उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा साफ़ झलक रही है.
कोलकाता स्थित वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक निर्माल्य मुखर्जी का मानना है कि ममता बनर्जी अभी जो कर रही हैं वैसा ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए किया था. उनका कहना है कि लगातार तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बाद मोदी की भी महत्वाकांक्षा जागी और उन्होंने अपना रुख़ क्षेत्रीय राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति की तरफ़ कर किया.
निर्माल्य मुखर्जी कहते हैं, "ममता बनर्जी भी प्रचंड जीत की ख़ुमारी पर सवार हैं. इसलिए अब वो खुद को पश्चिम बंगाल की राजनीति तक सीमित नहीं रखना चाहती हैं. पश्चिम बंगाल में जो उन्हें करना था वो उन्होंने हासिल कर लिया है."
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि विपक्ष के दल एकजुट नहीं हैं इसलिए कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल की भूमिका नहीं निभा पा रही है. पार्टी को अंदरूनी कलह से गुज़रना पड़ रहा है और उसके कई वरिष्ठ नेताओं के बाग़ी तेवर ख़त्म नहीं हुए हैं.
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पहले भी संकेत दे चुकी हैं ममता
ऐसे में कांग्रेस खुद दुविधा की स्थिति में है. वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त कहते हैं कि ममता बनर्जी ने पहले भी राष्ट्रीय राजनीति में आने के कई बार संकेत दिए हैं. वो बनारस से चुनाव लड़ने तक की इच्छा ज़ाहिर कर चुकी हैं.
जयशंकर गुप्त ने कहा, "तब उनकी पार्टी ने दूसरे राज्यों में अपने संगठन विस्तार के बारे में सोचा नहीं था और उनका पूरा ध्यान पश्चिम बंगाल की राजनीति पर रहा जहाँ वाम दलों और कांग्रेस को उन्होंने राजनीतिक रूप से हाशिये पर पहुंचा दिया."

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जयशंकर गुप्त कहते हैं कि राजनीतिक हलकों में ये मान लिया गया है कि अकेले कांग्रेस में वो क्षमता नहीं बची है कि वो बीजेपी को चुनौती दे सके या प्रमुख विपक्षी दल बन कर पूरे विपक्ष की अगुआई कर सके.
उन्होंने कहा, "कांग्रेस के संगठन या उसकी रणनीति में यही जो कमी है, उसका ममता बनर्जी पूरा फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रही हैं. इसलिए भी ता तृणमूल कांग्रेस के तरफ आकर्षित हो रहे हैं क्योंकि ममता बनर्जी इस स्थिति में हैं कि वो किसी को भी राज्यसभा का सांसद बना सकती हैं या दूसरा कोई महत्वपूर्ण पद दे सकती हैं."
जानकारों ये भी कहना है कि ममता बनर्जी कांग्रेस का विकल्प बनने की कोशिश कर तो रही हैं, लेकिन कुछ समय में बीजेपी को भी उनकी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है.
वो कहते हैं कि बीजेपी के भी कई क्षुब्ध नेताओं को भी तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने का रास्ता बनता दिख रहा है. इस कड़ी में यशवंत सिन्हा तो पहले ही शामिल हो चुके हैं जबकि तृणमूल कांग्रेस कई अन्य 'क्षुब्ध' बीजेपी नेताओं से संपर्क बना रही है.
बीजेपी के लिए भी बड़ी चुनौती
देश की राजनीतिक हलचल पर नज़र रखने वाले मानते हैं कि सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बीजेपी के सामने भी बड़ी चुनौती है. इसकी झलक हाल ही में 13 राज्यों में हुए उपचुनावों के परिणामों से मिलती है.
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पिछले महीने देश भर में लोकसभा की तीन और विधानसभा की 29 सीटों पर उपचुनाव हुए थे. विधानसभा उपचुनावों में बीजेपी के खाते में सात सीटें आईं जबकि कांग्रेस के पाले में आठ. बाक़ी की सीटों पर क्षेत्रीय दलों का दबदबा रहा. लोकसभा सीटों के उपचुनाव में भी कांग्रेस ने हिमाचल प्रदेश की प्रतिष्ठित मंडी सीट पर बीजेपी को मात दी. बीजेपी के लिए इन नतीजों को चुनौतीपूर्ण बताया गया.
निर्माल्य मुखर्जी कहते हैं कि ऐसा पहली बार नहीं है जब तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल के बाहर अपना राजनीतिक विस्तार करने का प्रयास कर रही है.
वो 2012 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों की चर्चा करते हुए कहते हैं कि उस समय मथुरा ज़िले की माँट विधानसभा सीट से तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी श्याम सुंदर शर्मा की जीत हुई थे. हालाँकि, बाद में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी का दामन थाम लिया.
दस राज्यों में फैल जाएगी तृणमूल?
निर्माल्य मुखर्जी का अनुमान है कि 2024 में होने वाले आम चुनावों में तृणमूल कांग्रेस दस राज्यों तक अपना प्रभाव फैला लेगी. उनका कहना है कि टीएमसी अभी तो बीजेपी को चुनौती नहीं दे रही है क्योंकि उसका लक्ष्य अभी मुख्य विपक्षी पार्टी का स्थान हासिल करना है जो अभी कांग्रेस मानी जाती है.
लेकिन जय शंकर गुप्त मानते हैं कि ऐसा सिर्फ दो सालों में हो पाए ये मुमकिन नहीं लगता क्योंकि लोक सभा की सीटों में से 50 प्रतिशत सीटें ऐसी हैं जिनपर बीजेपी और कांग्रेस में सीधी टक्कर है.
अलबत्ता वो कहते हैं कि ये ज़रूर है कि ममता बनर्जी को रणनीतिक रूप से अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, एमके स्टालिन और नवीन पटनायक आदि के दलों के सहारे मुख्य विपक्षी दल के रूप में खुद को स्थापित करने में कामयाबी मिल सकती है.
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