ममता बनर्जी की छवि बदलने की कवायद कितनी कारगर

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- Author, प्रभाकर एम.
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
जंगल की शेरनी को पिंजड़े में बंद करने के बावजूद उसकी दहाड़ पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता. ये बात पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ भी लागू होती है.
राजनीति के जंगल में आजीवन खुलेआम घूमने और दहाड़ने की वजह से ही उनको 'अग्निकन्या' और 'बंगाल की शेरनी' जैसे विशेषणों से नवाजा जाता रहा है.
लोकसभा चुनावों में लगे करारे झटके के बाद चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सलाह पर अपनी छवि बदलने की कवायद के तहत तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ने लगभग दो महीने से चुप्पी साध रखी थी.
लेकिन तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद में इसी हफ़्ते अपनी चुप्पी तोड़ते हुए वे एक बार फिर अपने पुराने आक्रामक तेवर में नज़र आईं.
इससे सवाल उठने लगा है कि छवि बदलने की यह कवायद कितनी कारगर होगी?
प्रशांत किशोर (पीके) की सलाह पर पूरे राज्य में ममता की छवि बदलने की कवायद चल रही है. इसके तहत ही 'दीदी को बोलो' अभियान शुरू किया गया जिसके तहत ममता के मुस्कराते चेहरे वाली तस्वीरों से पटे बैनर पूरे राज्य में लगाए गए हैं.

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'दीदी को बोलो' अभियान
बीते दो महीनों से उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी पर हमले भी एकदम कम कर दिए थे.
'दीदी को बोलो' अभियान के तहत एक हेल्पलाइन भी शुरू की गई है ताकि लोग अपनी समस्याएं सीधे उन (ममता) तक पहुंचा सकें.
ममता और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को सलाह दी गई है कि विपक्षी दलों की आलोचना करते समय वे नाप-तौल कर टिप्पणी करें और हर मामले पर टिप्पणी करने से बचें.
तृणमूल कांग्रेस के एक नेता बताते हैं, "नई रणनीति के तहत विपक्षी दलों के किसी भी आयोजन में बाधा नहीं पहुंचाने की सलाह दी गई है ताकि लोगों में यह संदेश जाए कि तृणमूल कांग्रेस लोकतंत्र में भरोसा रखती है."
ध्यान रहे कि हालिया लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की रैलियों और दूसरे कार्यक्रमों को अनुमति नहीं देने के लिए ममता सरकार की काफी आलोचना हुई थी.
लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद जय श्रीराम का नारा लगाने वालों के ख़िलाफ़ ममता के आक्रामक बयानों और ऐसे लोगों की गिरफ़्तारियों के मुद्दे पर भी उनकी काफी छीछालेदर हो चुकी है.

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'बीजेपी का अगला निशाना अब बंगाल'
पीके की सलाह पर ममता ने लगभग दो महीने से खुद पर संयम रखा था. उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी प्रमुख अमित शाह पर हमले बंद कर दिए थे.
कश्मीर में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को समाप्त करने से लेकर दूसरे तमाम मुद्दों पर अपनी टिप्पणी में वे काफी संयत नज़र आई थीं.
लेकिन कोलकाता में बुधवार को छात्र परिषद की रैली में वे एक बार फिर अपने पुराने तेवर में नज़र आईं.
ममता ने कहा, "सरकार कश्मीर घाटी में असंतोष की आवाज़ों का गला घोंटने के लिए क्रूर ताक़त का इस्तेमाल कर रही है. बीजेपी का अगला निशाना अब बंगाल है."
ममता ने केंद्र को सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने पर खुद को गिरफ़्तार करने की चुनौती देते हुए कहा कि वे किसी भी परिस्थिति में बीजेपी के समक्ष नहीं झुकेंगी.
उनका आरोप है, "केंद्र सरकार केंद्रीय एजेंसियों के जरिए विपक्षी नेताओं को या तो धमकी दे रही है या पैसे से उन्हें ख़रीद ले रही है. केंद्र की नीतियों और विभाजनकारी राजनीति का विरोध करने की वजह से बीजेपी अब बंगाल के पीछे पड़ी है."

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छवि बदलने की ज़रूरत
केंद्र को 1.76 लाख करोड़ रुपये देने के भारतीय रिज़र्व के फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि देश की तमाम महत्वपूर्ण संस्थानों पर सेवानिवृत्त नौकरशाह काबिज हैं. ये लोग बस सरकार की हां में हां मिला रहे हैं.
ममता का कहना था कि देश राष्ट्रपति शासन प्रणाली की ओर बढ़ता जा रहा है और उसमें लोकतंत्र के लिए कोई जगह नहीं होगी. बीजेपी एक सरकार, एक नेता, एक पार्टी और एक आपातकाल की ओर बढ़ रही है. दूसरे तमाम दल बिखर रहे हैं.
लेकिन आखिर ममता की छवि बदलने की ज़रूरत ही क्यों पड़ी है?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के गंभीर आरोपों की वजह से उनकी पार्टी की छवि ख़राब हुई है और बीजेपी ने लोकसभा चुनावों में इस मुद्दे को कामयाबी से भुनाया है.
एक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह अपनी चुनावी रैलियों में लगातार तोलाबाजी यानी जबरन वसूली का ज़िक्र करते रहे. इससे उनको तृणमूल कांग्रेस के ख़िलाफ़ माहौल बनाने में काफी सहायता मिली. चुनावों के बाद कटमनी का मुद्दा सामने आने के बाद भी पार्टी की छवि को करारा झटका लगा है."

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ममता के बदले तेवर
छवि बदलने की कवायद के तहत विपक्षी दलों के नेता भी छवि बदलने की कवायद के तहत ममता के बदले तेवरों का ज़िक्र करते हैं.
कांग्रेस विधायक अब्दुल मन्नान और वाममोर्चा नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, "ममता ने बीते महीने नियमित रूप से विधानसभा की कार्यवाही में हिस्सा लिया और विपक्ष के सवालों का जवाब दिया. वर्ष 2011 में उनके सत्ता में आने के बाद पहली बार ऐसा हुआ है."
लेकिन बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "अल्पसंख्यकों की तुष्टिकरण की नीति के तहत ममता कश्मीर के मुद्दे पर पाक प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की भाषा बोल रही हैं. अगर उनके नेताओं ने कोई ग़लत काम नहीं किया है तो वे केंद्रीय जांच एजेंसियों से डर क्यों रहे हैं?"
घोष का दावा है कि दीदी चाहे अपनी छवि बदलने के लिए कितना भी जोर लगा लें, आम लोग उनकी पार्टी की हक़ीक़त समझ गए हैं. अब सत्ता से तृणमूल की विदाई का समय आ गया है.

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बेदाग छवि...
ममता की छवि बदलने की यह कवायद कितनी कारगर होगी, इस सवाल पर लोगों की राय मिली-जुली है.
इस बात पर तो आमराय है कि ममता के जुझारू और बागी तेवरों को लंबे समय तक काबू में रखना मुश्किल है.
प्रेसीडेंसी कॉलेज के प्रिंसिपल रहे अमल मुखर्जी कहते हैं, "हाल की घटनाओं से आम लोगों में तृणमूल की छवि ख़राब हुई है. ममता ने भ्रष्ट नेताओं के ख़िलाफ़ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की है. इससे लोगों में ग़लत संदेश गया है."
विश्लेषकों का कहना है कि ममता की छवि पर तो कोई दाग नहीं है. लेकिन उन पर पार्टी के दागी नेताओं के संरक्षण के आरोप लगते रहे हैं.
छवि बदलने की कवायद की कामयाबी काफी हद तक पार्टी के भ्रष्ट नेताओं के प्रति ममता के रवैए और भाषा पर संयम रखने पर निर्भर है.
लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि जूझारू और बागी तेवरों वाली शेरनी को कब तक पिंजड़े में रखा जा सकता है?
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