उत्तरकाशी की सुरंग में फंसने वाले बिहार के मज़दूरों ने सुनाया 17 दिन का हाल

- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना
उत्तराखंड के उत्तरकाशी में सिलक्यारा सुरंग से निकलने वाले बिहार के मज़दूरों ने बीबीसी हिंदी से उन 17 दिनों के अपने अनुभव साझा किया जब वो अंदर उम्मीद के सहारे समय काट रहे थे.
सुरंग में फंसे 41 मज़दूरों में बिहार के भी 5 मज़दूर थे, जो शुक्रवार को पटना पहुंचे और फिर अपने-अपने घरों की तरफ़ रवाना हुए.
घर पहुंचने पर इनका ज़ोरदार स्वागत किया गया. इस स्वागत के पीछे इन मज़दूरों का सत्रह दिनों का साहस है, जिसने उन्हें मुश्किल समय में हिम्मत दी.
किसी भी लंबी सुरंग के अंदर सूनेपन में भी एक आवाज़ होती है, फिर अंधेरा, मिट्टी और कीचड़. यहां न सोने की जगह होती है और न ही शौच की.
मज़दूरों ने सत्रह दिनों का यह समय कैसे गुज़ारा था, अपने इस ख़ौफ़नाक अनुभव को उन्होंने साझा किया. बिहार के भोजपुर ज़िले के पेउर गांव के सबा अहमद क़रीब 14 साल से उसी कंपनी में काम कर रहे हैं, जो उत्तरकाशी का सुरंग बना रही है.
सबा अहमद ने बताया कि अंदर फंसे लोगों में वो सबसे अनुभवी थे और सीनियर फोरमैन के तौर पर काम कर रहे थे. यह प्रोजेक्ट साल 2018 के अंत में शुरू हुआ था.

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जब इलेक्ट्रीशियन ने शोर मचाना शुरू किया
जिस दिन यानी 12 नवंबर को यह हादसा हुआ उस दिन भारत में दिवाली का त्योहार था. सुरंग के अंदर सभी मज़दूर 11 नवंबर की रात से ड्यूटी पर तैनात थे और उन्हें अपना काम पूरा करना था.
सबा ने बताया कि सभी मज़दूरों को उस फ़ेस का काम पूरा कर काम बंद करना था, ताकि दिवाली की तैयारी कर सकें.
दरअसल सुरंग बनाते समय इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि किसी काम को बीच में न छोड़ा जाए, जिससे कोई हादसा या परेशानी होने की आशंका हो.
इसी दौरान सुबह क़रीब 5 बजे एक इलेक्ट्रीशियन ने शोर मचाना शुरू किया कि सुरंग धंस रही है. यह सुनकर सबा अहमद सुरंग के अंदर इस्तेमाल में आने वाली एक गाड़ी (मशीन) को लेकर उस तरफ भागे, जहां सुरंग के धंसने की बात की गई थी.
सबा अहमद याद करते हुए कहते हैं, “मैं गाड़ी चलाते हुए बढ़ता गया. मुझे कहीं कुछ नहीं दिख रहा था. फिर जब सुरंग से बाहर निकलने वाले छोर के क़रीब 250 मीटर अंदर था तो देखा कि वहां सुरंग धंस गई है.”
सबा अहमद ने बताया, "हमने फ़ौरन अपना फ़ोन लगाने की कोशिश की लेकिन सुरंग के अंदर फ़ोन काम नहीं करता है. उस वक़्त सभी मज़दूरों को घबराहट होने लगी कि अब वो कैसे बाहर निकलेंगे."
शुरू में यह सुरंग क़रीब 10 मीटर तक धंसी थी, लेकिन इसके मलबे से होकर कहीं-कहीं से बाहर की थोड़ी रोशनी अंदर तक आ रही थी.
थोड़ी देर में इन मज़दूरों को ख़याल आया कि सुरंग में मौजूद पानी के पाइप से कोई सिग्नल भेजने की कोशिश की जा सकती है.
सबा ने बताया कि सुरंग की खुदाई करते समय एक पाइप के जरिए बाहर से ताज़ा पानी अंदर की तरफ लाया जाता है ताकि चट्टानों को काटने के दौरान मशीन को ठंडा रखा जा सके. जबकि एक अन्य पाइप से सुरंग के अंदर के गंदे पानी और कीचड़ को बाहर निकाला जाता है.

पानी के पाइप के सहारे दिए संकेत
सबा के मुताबिक़, उन लोगों ने तीन चार बार पंप चलाकर अंदर के पानी को कभी बाहर भेजा तो कभी बंद किया. इससे बाहर मौजूद लोगों को यह सिग्नल मिल गया कि अंदर मज़दूर सुरक्षित हैं और कुछ कहना चाहते हैं.
सबा ने बीबीसी को बताया कि उन्हें इसकी ट्रेनिंग दी जाती है कि कोई भी सुरंग बनाते समय यही पाइप लाइन सभी मज़दूरों के लिए जीने का सहारा होती है. इसलिए पानी के पाइप को सुरंग के एक तरफ और बिजली के तारों को दूसरी तरफ रखा जाता है.
यह सब करने में मज़दूरों को क़रीब 11 से 12 घंटे लग गए. उसके बाद वो फिर से निराशा में घिर गए, क्योंकि बाहर लोगों को क्या संकेत मिला है और बाहर के लोगों ने क्या समझा है, यह मज़दूरों को पता नहीं था.
सबा याद करते हैं, “हम सभी थक हारकर इंतज़ार कर रहे थे, तभी अचानक सुरंग के अंदर सांय- सांय की आवाज़ आने लगी और सभी मज़दूर घबरा गए. थोड़ी देर में हमें पता चला कि पानी के पाइप से अंदर ऑक्सीजन भेजा जा रहा है और यह उसी की आवाज़ है.”
इस तरह से सभी मज़दूरों को थोड़ी राहत ज़रूर मिली. लेकिन अभी उनके सामने और भी परेशानी थी. 41 प्यासे लोगों के लिए सुरंग के अंदर क़रीब 50 लीटर पानी बचा था, जबकि खाने को कुछ नहीं था.
बिहार के सारण ज़िले के खजुवान गांव के सोनू साह के मुताबिक़, उन्हें शुरुआत के चौबीस घंटे तक काफ़ी घबराहट रही थी. उसके बाद जब कुछ नहीं हुआ तो सभी को लगने लगा कि वो बच जाएंगे.
इसी दौरान छह इंच के एक पाइप को सुरंग के अंदर पहुंचाकर मज़दूरों के लिए खाने को कुछ भेजने की तैयारी हो रही थी, लेकिन यह पाइप मलबे से टकराकर ऊपर की तरफ चला गया. हालांकि बाद में पाइप सही जगह पर पहुंच गया और अंदर फंसे लोगों के लिए काजू, किशमिश, चने और खाने की कई चीज़ें भेजी जाने लगीं.

अंदर दो किलोमीटर तक खुदाई हुई थी
बिहार के ही मुज़फ़्फ़रपुर के सरैया के रहने वाले दीपक भी उन्हीं मज़दूरों में शामिल थे, जो सुरंग के अंगर फंसे थे.
दीपक याद करते हैं, “दो दिनों तक हमें काफ़ी डर लग रहा था कि क्या होगा, बचेंगे या नहीं. लेकिन खाने पीने की चीज़ें आने लगी थीं और फिर हमारे सीनियर फोरमैन ने समझाया कि कुछ नहीं होगा, घबराना नहीं है. उन्हें ऐसी स्थिति का पहले से थोड़ा-बहुत अनुभव था.”
सबा अहमद ने बताया कि 12 नवंबर को सुरंग जिस जगह पर धंसी थी, उसी जगह पर फिर से कुछ मलबा गिरा.
अगली रात को भी इस जगह पर कुछ मलबा गिरा और सुरंग पूरी तरह बंद हो गई. इस तरह से अब बाहर से रोशनी तो क्या हवा तक आने के लिए जगह नहीं बची.
सब अहमद कहते हैं, “मेरे अनुभव में इससे सुरंग के और धंसने का रास्ता बंद हो गया, क्योंकि मलबा ऊपर तक चला गया और इससे सुरंग के धंसने की जगह नहीं बची.”
सिलक्यारा सुरंग जिस जगह पर धंसी थी, उससे बाहर निकलने का छोर क़रीब 250 मीटर दूर था.
जबकि अंदर दो किलोमीटर से ज़्यादा खुदाई हो चुकी थी. इसी खुली जगह ने सभी लोगों की जान बचाने में बड़ी मदद की.
सुरंग में शौच के लिए क़रीब डेढ़ किलोमीटर अंदर मशीन से कुछ गड्ढे तैयार किए गए, जिन्हें शौच के लिए इस्तेमाल किया गया. साफ़ सफ़ाई को लेकर भी लोगों को हिदायत दी गई ताकि कोई संक्रमण न फैले.

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वॉटरप्रूफ़िंग शीट को बनाया बिस्तर
इन मुश्किल परिस्थितियों में इस सुरंग की एक और ख़ासियत ने अंदर फंसे लोगों की मदद की.
दरअसल सुरंग में अंदर काफ़ी ढलान है, जिससे मशीन के लिए इस्तेमाल होने वाला पानी, या पहाड़ों से रिसने वाला पानी दूसरे छोर पर इकट्ठा हो रहा था और सुरंग में बाक़ी जगह पर कीचड़ जैसी स्थिति नहीं थी.
इसलिए सभी लोगों के बैठने और आराम करने के लिए सूखी जगह मौजूद थी, लेकिन सुरंग के अंदर ठंड भी काफ़ी ज़्यादा होती है.
सोनू साह बताते हैं, “सुरंग में वॉटरप्रूफिंग के लिए जो शीट लगाई जाती है. सुरंग में बड़ी मात्रा में वह शीट मौजूद थी. हमने उसी को चाकू से काटकर ज़मीन पर बिछा दिया और उसी पर सोते थे, उसी को ओढ़ते थे.”
सबा अहमद याद करते हैं, “कुछ लोग सो जाते थे, लेकिन मैं पिछले 18 दिनों से नाइट ड्यूटी पर था तो ठीक से सो नहीं पा रहा था. सुरंग में सबसे सीनियर मैं ही था और हर परिस्थिति पर नज़र रखनी होती. इसलिए क़रीब 5 बजे सुबह सोता था और फिर 7 बजे से बाहर से संपर्क शुरू हो जाता था, इसलिए जगना होता था.”
इस तरह से सारे मज़दूर बाहर से पाइप के ज़रिए आने वाले भोजन के सहारे थे. आपस में बातचीत और एक दूसरे को भरोसा दिलाते हुए उनका समय गुज़र रहा था.
एक बार भोजन और पानी पहुंचने के बाद मज़दूरों को लगा कि अब वो सुरक्षित निकल जाएंगे.
दरअसल बाहर से सुरंग के अंदर के हालात और माहौल को समझ पाना मुश्किल था, लेकिन अंदर दो किलोमीटर से ज़्यादा लंबी सुरक्षित जगह और सुरंग में लगातार काम करने से जाना-पहचाना माहौल इन मज़दूरों को हौसला दे रहा था.
अंदर फंसे लोगों को उम्मीद थी कि कोई ना कोई तरीका निकालकर उन्हें बचा लिया जाएगा.

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ताश की गड्डियों की मांग
सबा अहमद बताते हैं, “मैंने इस तरह से प्रोजेक्ट पर कई साल काम किया है, इसलिए भरोसा था कि बाहर निकल जाएंगे, क्योंकि सुरंग से निकलने के चार-पांच तरीके होते हैं. हमें जिस तरीके से निकाला गया वह सबसे बेहतर तरीका है.”
सोनू के मुताबिक़, एक बार जब यह लगने लगा कि वो सुरक्षित बच जाएंगे तो समय काटने का जुगाड़ सबसे ज़रूरी था. इसके लिए उन्होंने 6-7 गड्डी ताश अंदर भेजने की मांग की.
सोनू ने बीबीसी को बताया, “मैंने ही जीएम साहब से इसके लिए आग्रह किया तो उन्होंने कहा ठीक है. फिर ताश आ गया, लेकिन ज़्यादातर लोगों को पता ही नहीं था कि ताश खेलते कैसे हैं. उसके बाद कई लोगों को ताश खेलना सिखाया गया और अलग-अलग ग्रुप बनाकर सुरंग के अंदर ताश खेलकर समय गुज़ारने लगे.”
फिर क़रीब एक हफ़्ते के बाद जब पहली बार जब इन मजदूरों का वीडियो सामने आया तब उनके घरवालों को भी थोड़ी राहत मिली.
मज़दूरों के घर वाले उन्हें सीधा देख पा रहे थे और बात भी कर पा रहे थे. इससे मज़दूरों का भी हौसला बढ़ा. इस दौरान नेता, मंत्री, बचाव दल और कई लोगों ने उनसे बात की.

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मज़दूरों ने धामी से कहा- 'जल्दबाज़ी न करना'
सबा अहमद के मुताबिक़, “हमें किसी भी समय नहीं लगा कि अब ज़िंदा नहीं बचेंगे. इसलिए उत्तराखंड से मुख्यमंत्री धामी जी को हमने कहा कि सर जल्दबाज़ी या घबराहट में कुछ नहीं करना है हम सब सुरक्षित हैं, आराम से काम करें, लेकिन हमें सुरक्षित बाहर निकाल दें.”
इस तरह से देश विदेश के विशेषज्ञ, कई तरह की मशीनें और तकनीक के सहारे आख़िरकार 17 दिनों बाद 28 नवंबर मंगलवार की शाम इन सभी मज़दूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया.
सुरंग से बाहर निकलते ही सभी मज़दूरों के चेहरे खिल गए और उन्होंने अपने-अपने घरवालों से बात की.
लेकिन सुरंग के अंदर 400 घंटे से ज़्यादा समय तक सुरक्षित बचे रहने में सबा अहमद, सबसे बड़ा योगदान पानी निकालने वाले पाइप का मानते हैं.
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