उत्तरकाशी की टनल के भीतर का पहला वीडियो, जानिए किस हाल में हैं फँसे मज़दूर

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- Author, आसिफ़ अली
- पदनाम, उत्तरकाशी से बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तरकाशी सुरंग हादसे में मज़दूरों को बचाने के अभियान को नौ दिन पूरे हो गए हैं.
समाचार एजेंसी पीटीआई ने टनल के भीतर का एक वीडियो क्लिप जारी किया है. इस वीडियो क्लिप में दिख रहा है कि टनल के भीतर मज़दूर खड़े होकर आपस में बातचीत कर रहे हैं.
इस वीडियो के आने के बाद उम्मीद बढ़ी है कि लोगों हालत अभी ठीक है.
यह विजुअल इंडोस्कोपिक कैमरा के ज़रिए क़ैद किया गया है. इस कैमरे को छह इंच की फ़ूड पाइपलाइन से भेजा गया था. वीडियो में दिख रहा है कि मज़दूर पीले और सफ़ेद हेलमेट पहने हुए हैं.
इसमें ये भी दिख रहा है कि वे पाइपलाइन के ज़रिए खाना ले रहे हैं और एक-दूसरे से बात कर रहे हैं. यह वीडियो फुटेज मज़दूरों के परिजनों को आश्वस्त करने में मददगार साबित हो सकता है.
नेशनल हाइवे एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर डिवेलपमेंट कॉर्पोरेशन लीमिटेड के निदेशक अंशु मनीष खालखो ने कहा कि टनल के भीतर से लोगों का हालचाल जान पाना एक बड़ी कामयाबी है.
अंशु मनीष खालखो ने कहा, ''हमने 53 मीटर का पाइप टनल में फँसे मज़दूरों तक भेजा है. यह पहली और बड़ी उपलब्धि है. अगला क़दम ज़्यादा अहम है.''

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पहली बार भेजा गया गर्म खाना
समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़ टनल के भीतर मज़दूरों को 53 मीटर लंबी और छह इंच मोटी इस पाइप के ज़रिए गर्म खिचड़ी भेजी गई है.
सुरंग के एक हिस्से में बिजली और पानी उपलब्ध है और चार इंच की एक कंप्रेसर पाइप के ज़रिये मज़दूरों को ऑक्सिजन, खाने-पीने की चीज़ें और दवाएं भेजी जा रही थीं.
अब नई पाइप के ज़रिये अंदर फंसे लोगों को खाने के लिए क्या भेजा जाएगा, इस बारे में खालखो ने कहा कि मज़दूरों की हालत को देखते हुए डॉक्टरों की मदद से एक लिस्ट बनाई गई है.
उन्होने कहा, “हम खुले मुंह वाली प्लास्टिक की गोल बोतलें ला रहे हैं ताकि उनके ज़रिये केले, सेब, खिचड़ी और दलिया अंदर भेज सकें.”
खिचड़ी भी गोल बोतलों में भरकर अंदर भेजी गई थी. खिचड़ी बनाने वाले कुक हेमंत ने कहा कि पहली बार मज़दूरों के लिए गर्म खाना भेजा गया है. उन्होंने कहा, हम वही बना रहे हैं, जिसकी हमें सलाह दी गई है.
डिफ़ेंस रीसर्च एंड डिवेलपमेंट ऑर्गनाइज़ेशन (डीआरडीओ) के ड्रोन और रोबॉट भी यहां लाए गए हैं, ताकि फंसे हुए लोगों को निकालने के लिए रास्ते तलाशे जा सकें.
बचावकर्मी अभी तक सामने से रास्ता बनाने का काम शुरू नहीं कर पाए हैं, क्योंकि मलबे में अंदर कोई चट्टान आ जाने के कारण काम रोकना पड़ा था.
रेस्क्यू कार्यों में जुटी एजेंसियों ने बीते नौ दिनों से एक के बाद एक योजना पर काम करने की कोशिश की है. लेकिन, अब तक कोई भी योजना सफल नहीं हो पाई है.
अधिकारी और मंत्रियों का आने-जाने का भी सिलसिला बना हुआ है. आदेश और निर्देश देने के दौर के बीच यह ऑपरेशन कब पूरा होगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है.
सुरंग में फंसी ज़िंदगियों को कब बचाया जाएगा? ये सवाल सुरंग के बाहर मातमी सन्नाटे के बीच मज़दूरों के परिजनों के चेहरों पर तैर रहा है. सबके चेहरे पर आशंका यही है कि कहीं कुछ अनहोनी ना जाए.
परिजनों का यह डर जायज़ भी है. क्योंकि अब तक इन परिजनों को कहीं से कोई स्पष्ट भरोसा नहीं मिल रहा है. सोमवार शाम पत्रकारों से बातचीत के दौरान एनएचआईडीसीएल के डायरेक्टर ने चौंकाने वाली बात बताई.
16 नवंबर को आए भूकंप का डर

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एनएचआईडीसीएल के डायरेक्यर अंशु मनीष खलको ने सोमवार शाम पत्रकारों से बातचीत में बड़ी जानकारी देते हुए बताया, ''16 नवंबर को भूकंप की वजह से टनल में क्रेक्स की आवाज़ आई थी. जिसके डर से मजदूर भी काम करना नहीं करना चाहते थे और टनल में कार्य की गति दो दिन धीमी रही.''
उन्होंने यह भी बताया, "अब एस्केप टनल बनाई जा रही है. जिससे कभी कोई भी लैंडस्लाइड या कोई घटना होती है तो काम करने वालों को निकाला जा सके."
उन्होंने मज़दूरों को निकालने के विकल्पों के बारे में कहा, "मज़दूरों के बचाव के लिए सभी विकल्पों पर तेजी से काम चल रहा है. सभी विशेषज्ञों की टीम को यहां बुलाया गया है ताकि रेस्क्यू ऑपरेशन को तेज आगे बढ़ाया जा सके."
उन्होंने बताया, "इंटरनेशनल लेवल के एक्सपर्ट भी मौजूद हैं जिनसे वक्त पर राय ली जा रही है. टनल के अंदर के लिए ड्रोन मँगाए गए हैं. लेकिन ड्रिलिंग के चलते कामयाबी नहीं मिली, अब एंडोस्कोपी कैमरा मंगाया गया है."
रेस्क्यू कार्य में पहले दिन से ही कुछ ना कुछ दिक़्क़तें सामने आ रही हैं. इससे एक बात तो साफ़ है कि रेस्क्यू एजेंसियां किसी एक प्लान पर पुख़्ता तौर पर फ़िलहाल सही से काम नहीं कर पाई हैं.
अब वर्टिकल ड्रिल की तैयारी

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बताया गया है कि सुरंग में फंसे मज़दूरों को बचाने के लिए सुरंग के ऊपर से एक शाफ्ट (गोलाई वाला रास्ता) बनाने के लिए एक मशीन यहां लाई गई है, जिसे 80 मीटर गहराई तक खुदाई करनी होगी.
इस मशीन को पहाड़ी के ऊपर पहुंचाने तक रास्ता बना दिया गया है और ओएनजीसी अन्य उपकरणों का इंतज़ाम कर रही है.
हालांकि, सवाल यह भी है कि चट्टानों और ऊँचे पेड़ों को काटकर बनाए गए इस खड़े रास्ते से मशीनों को ड्रिल करने वाली जगह पर पहुँचाने में कितना समय लगेगा.
साथ ही, सुरंग के दूसरे सिरे से भी ड्रिलिंग चालू हो गई है.
क्या कहना है एसजेवीएनएल के अधिकारियों का

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सतलुज जल विद्युत परियोजना के जीएम जसवंत कपूर ने बीबीसी को बताया , ''पीएमओ के निर्देश के बाद हमें यहाँ भेजा गया है. हमने अपना प्लान दिया है जिसके तहत 1.2 डाईमीटर की क़रीब 90 मीटर वर्टिकल ड्रिल किया जाएगा. इसके बाद टनल में फँसे लोगों को बचाया जाएगा.''
उन्होंने यह भी जानकारी दी, ''उस मशीन को यहाँ ग्राउंड पर लगाने के लिए जो फ़ेसिलिटी चाहिए वो काम अभी हम कर रहे हैं. दूसरी ड्रिल उसीसे कुछ दूरी पर 24 इंच ड्रिल होगी जो मज़दूरों को खाद्य पदार्थ पहुँचाने के लिए होगी. वर्टिकल ड्रिलिंग के लिए अब गुजरात के वलसाड और ओडिसा के हिराकोट से मशीने मँगवाई गई हैं.''
सिलक्यारा सुरंग में फंसे श्रमिकों को सुरक्षित निकालने के लिए चलाए जा रहे रेस्क्यू अभियान में सहयोग करने के भारत सरकार के आग्रह पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के टनल विशेषज्ञ अर्नोल्ड डिक्स भी उत्तरकाशी टनल पहुँचे हैं.
पीएमओ के निर्देश के बाद हमें यहाँ भेजा गया है. हमने अपना प्लान दिया है जिसके तहत 1.2 डाईमीटर की क़रीब 90 मीटर वर्टिकल ड्रिल किया जाएगा. इसके बाद टनल में फँसे लोगों को बचाया जाएगा.
अर्नोल्ड डिक्स इंटरनेशनल टनलिंग एंड अंडरग्राउंड स्पेस एशोसिएशन (आईटीए) के अध्यक्ष हैं.
दुनियाभर में भूमिगत सुरंगों के निर्माण और जोख़िम से निपटने की काबलियत रखने वाले अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ प्रो. अर्नोल्ड डिक्स ने सिलक्यारा ( उत्तरकाशी) पहुंचकर सुरंग के अंदर और बाहर का निरीक्षण किया.
उन्होंने बचाव कार्य में जुटी एजेंसियों से बातचीत की. अर्नोल्ड डिक्स ने यहाँ भूगर्भिय मिट्टी व पत्थरों की जाँच करने के बाद एसजेवीएनएल के अधिकारियों के साथ मिलकर दो जगह चिन्हित किए.
अर्नोल्ड का कहना है कि यह जगह टनल के ऊपर ड्रिल करने के लिए मुफ़ीद है और मज़दूरों को जल्दी ही सुरक्षित निकाल लिया जाएगा.
जियो फ़िज़िक्स सर्वे टीम ने क्या बताया

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टनल के उपरी भाग में जियो फ़िज़िकल सर्वे के तहत रेसिस्टिविटी सर्वे करने दिल्ली से आए चेन्दूर ने बीबीसी को बताया, ''हम यहाँ ड्रिलिंग से पहले इस जगह ज़मीन का मुआयना करने आए हैं. ड्रिलिंग से पहले हम यहाँ ज़मीन को स्केन करने आए हैं. यहाँ हम देखेंगे कि किस तरफ़ करंट ज़्यादा पास हो रहा है."
"जिस तरफ़ करंट ज़्यादा होता है, उस तरफ़ पानी ज़्यादा मिलने की संभावना होती है. जिस तरफ़ पानी होगा उस तरफ़ मिट्टी धंसने की आशंका होती है."
इस बीच सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से फोन पर उत्तरकाशी टनल में फंसे श्रमिकों को सुरक्षित निकालने के लिए जारी राहत और बचाव कार्यों की जानकारी ली. पीएम ने कहा है कि फंसे हुए मज़दूरों का मनोबल बनाए रखना ज़रूरी है.
केंद्र सरकार इस बचाव अभियान के लिए ज़रूरी उपकरण और संसाधन उपलब्ध करवा रही है.
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