उत्तरकाशी सुरंग हादसा: टनल के धंसने से क्यों है सबक सीखने की ज़रूरत?

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- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
उत्तरकाशी की सुरंग में पिछले लगभग 17 दिनों से फंसे 41 मजदूरों के निकलने की संभावनाएं प्रबल होती दिख रही हैं.
कहा जा रहा है कि अब से कुछ घंटों में अच्छी ख़बर मिल सकती है. लेकिन राष्ट्रीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के बीच इसे एक बेहद चुनौतीपूर्ण अभियान बताया जा रहा है.
भारत सरकार की ओर से बतौर सलाहकार आमंत्रित किए गए भूमिगत निर्माण और टनल बनाने के ऑस्ट्रेलियाई विशेषज्ञ अर्नोल्ड डिक्स इसे उनके जीवन का ‘सबसे कठिन’ बचाव कार्य अभियान बताते हैं.
वह उत्तराखंड में उस निर्माणाधीन सुरंग के बाहर दिन-रात डटे हुए हैं, जिसके अंदर 41 मज़दूर पिछले दो हफ़्तों से भी ज़्यादा समय फंसे हुए हैं.
उत्तरकाशी के सिलक्यारा में बन रही यह सुरंग 12,000 करोड़ रुपये की लागत से बन रहे 890 किलोमीटर लंबे चार धाम प्रॉजेक्ट का हिस्सा है.
इसके तहत उत्तराखंड में मौजूद चार अहम हिंदू धर्म स्थलों को डबल-लेन हाइवे से जोड़ा जा रहा है.
सुरंग के मुहाने में 60 मीटर तक गिरे मलबे को हटाने और अंदर फंसे मज़दूरों को पाइप से रेंगते हुए बाहर निकालने की कोशिशों में कई अड़चनें आ रही हैं. जैसे कि ड्रिलिंग कर रही मुख्य मशीन ही ख़राब हो गई है.
डिक्स ने बताया, “मेरे ख्याल से सिर्फ़ तकनीकी कारणों के चलते ही यह मुश्किल अभियान नहीं है. यह मुश्किल इसलिए भी है, क्योंकि इस पर बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है. कोई भी ज़ख़्मी नहीं हुआ है और हमें यह सुनिश्चित करना है कि अंदर फंसा हर शख़्स सुरक्षित बाहर निकले.”
लेकिन डिक्स जानते हैं कि ऐसा करना बहुत पेचीदा है.
यहां तक कि टनल के ऊपर से वर्टिकल (खड़ी) ड्रिल या पाइप के सहारे सुरंग बनाना एक आसान तरीक़ा नज़र आता है, मगर इसमें भी कई मुश्किलें हैं.
कितना बड़ा ख़तरा है हिमालय की अस्थिरता

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हिमालय के पहाड़ काफ़ी नए हैं और यहां की बदलती संरचना के कारण पैदा होने वाली अस्थिरता चिंता का विषय है.
आशंका यह भी है कि सुरंग के ऊपर पानी के स्रोत भी हो सकते हैं, जिनसे छेड़छाड़ के कारण बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है, जिससे बचावकर्मी और अंदर फंसे लोग ख़तरे में पड़ सकते हैं.
सुरंग बना रही भारतीय कंपनी, जर्मन-ऑस्ट्रियाई इंजिनियरिंग कंसल्टेंसी कंपनी ‘बर्नार्ड ग्रुप’ की सेवाएं ले रही है.
इस कंपनी ने अगस्त में कहा था कि ‘जबसे सुरंग बनाने का काम शुरू हआ है, भौगोलिक परिस्थितियां टेंडर (निविदा) वाले दस्तावेज़ में लगाए गए अनुमानों की तुलना में कहीं ज़्यादा चुनौती भरी साबित हुई हैं.’
अभी तक यह भी स्पष्ट नहीं हुआ है कि जब तक यह सुरंग ढही, उस समय तक वह ‘बाहर निकलने का रास्ता’ क्यों नहीं बनाया गया था, जिसके लिए साल 2018 में इजाज़त दी गई थी.
कितना गंभीर है ये संकट?

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यह संकट कितना बड़ा है, इसकी गंभीरता को समझने के लिए यह समझना ज़रूरी है कि यह कहां बन रही है. यह बन रही है हिमालय में.
वह हिमालय, जो दुनिया की सबसे नई पर्वतमाला है.
दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों वाले ये पहाड़ आज से क़रीब साढ़े चार करोड़ साल पहले दो महाद्वीपों के टकराने के कारण बने थे.
यह भूगर्भीय हलचल वाला यानी कि भूकंप संभावित क्षेत्र भी है.
भूविज्ञानियों का कहना है कि उत्तरी हिमालय के जिस क्षेत्र में उत्तराखंड बसा है, वहां की चट्टानें सेडिमेंटरी (अवसादी) हैं.
फ़ाइलाइट, शेल, चूनापत्थर और क्वॉर्टज़ाइट जैसी ये चट्टानें तब बनती हैं, जब पृथ्वी के सतह पर मौजूद ढीली मिट्टी के कण दबाव के कारण एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं.
जाने-माने भूविज्ञानी सी.पी. राजेंद्रन ने बताया, “इस क्षेत्र में समस्या यह है कि यहां आपको अलग-अलग मज़बूती वाली अलग-अलग चट्टानें मिलेंगी. कुछ बहुत नरम हैं तो कुछ ज़्यादा सख़्त हैं. कच्ची चट्टानें भुरभुरी होती हैं. इसी कारण यह इलाक़ा काफ़ी अस्थिर बन जाता है.”
कैसा है चार-धाम वाला क्षेत्र

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इसे समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि उत्तराखंड के जिन चार ज़िलों में चार धाम फैला हुआ है, वह क्षेत्र कैसा है.
इसी क्षेत्र में गंगा और उसकी मुख्य सहायक नदियों का जन्म होता है. वह नदी, जो 60 करोड़ से ज़्यादा भारतीयों को पानी और खाना देती है. इस क्षेत्र में कहीं जंगल हैं, कहीं ग्लेशियर, तो कहीं पानी की धाराएं.
भारत का मौसम भी इस क्षेत्र से प्रभावित होता है. यहां की सतह पर मौजूद मिट्टी कार्बन सिंक का काम करती है. यानी वह प्राकृतिक तौर पर कार्बनडाइऑक्साइड को सोखकर रखती है, जिससे ग्रीन हाउस गैसों के ख़राब असर को घटाने में मदद मिलती है.
इसी इलाक़े में चार धाम हाईवे प्रॉजेक्ट के तहत, पहले से मौजूद सड़क को डबल-लेन पक्के हाइवे में बदला जा रहा है. इसके लिए 16 बाईपास, नई जगह से सड़कें और सुरंगे बन रही हैं. 15 फ़्लाई ओवर और 100 से ज़्यादा छोटे पुल भी तैयार किए जा रहे हैं.
इस प्रॉजेक्ट में दो मुख्य सुरंगे हैं. पहली तो सिलक्यारा में बन रही है, दूसरी चंबा में है जो 400 मीटर लंबी है. इसके अलावा, रेलवे और हाइड्रो पावर के लिए भी कुछ सुरंगों का निर्माण हो रहा है. इनमें 125 किलोमीटर लंबी रेललाइन के लिए एक दर्जन से ज़्यादा सुरंगे बनी हैं.
हाइड्रो प्रॉजेक्ट के लिए भी सुरंगों का निर्माण हो रहा है. सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार, यहां 33 सरकारी हाइड्रो प्रॉजेक्ट चल रहे हैं और 14 अभी बन रहे हैं.
पर्यावरणविद हेमंत ध्यानी ने मुझे बताया, “पिछले 15-20 सालों में सुरंगें बनाने के काम में तेज़ी आई है. ये पहाड़ इतने बड़े स्तर पर इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए नहीं बने हैं.”
साल भर में 1000 से ज़्यादा भूस्खलन

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आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस साल अब तक उत्तराखंड में 1000 से ज़्यादा भूस्खलन हुए हैं, जिनमें 48 लोगों की जान गई है. इनमें से ज़्यादातर के लिए मॉनसून के दौरान हुई भारी बारिश को दोषी बताया गया है. इसी साल, उत्तराखंड के जोशीमठ क़स्बे में सड़कों और सैकड़ों मकानों में दरारें पड़ गई थीं.
शोध बताते हैं कि हिमालय की ऊपरी सतह की मिट्टी, देश की औसत दर से तीन गुना ज़्यादा अपरदित हो रही है. इस कारण इस क्षेत्र में कार्बन सिंक भी घट रहा है.
साल 2013 में केदारनाथ में भारी बारिश के कारण आई बाढ़ के कारण भीषण तबाही मची थी, जिसमें हज़ारों लोगों की जान चली गई थी.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनी विशेषज्ञों की कमेटी के सदस्य रहे ध्यानी कहते हैं कि इस कमेटी ने सुझाव दिया था कि एक छोटी सुरंग बनाई जाए, लेकिन इसे नज़रअंदाज़ कर दिया गया, जिससे ब्लास्टिंग किए जाने और इससे सुरंग ढहने का खतरा बढ़ गया.
ध्यानी को लगता है कि इस बड़े प्रॉजेक्ट को 100-100 किलोमीटर के छोटे हिस्सों में बांट दिए जाने के कारण भी पर्यावरण से जुड़े ख़तरों का आकलन नहीं हो पाया.
सुरंग बनाने की तकनीक पर सवाल

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इस पूरे मामले पर कुछ लोग अलग राय भी रखते हैं. भूमिगत निर्माण के विशेषज्ञ, मनोज गरनायक ने एक अख़बार को बताया कि अगर सही ढंग से सुरंगें बनाई जाएं तो वे पहाड़ों या वहां की पारिस्थितिकी को नुक़सान नहीं पहुंचातीं.
उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि सुरंग बनाने की तकनीक क़रीब 200 साल पुरानी है और यह ख़तरनाक नहीं है. इसे सही से बनाने के लिए चट्टानों की नाज़ुकता और मज़बूती वगैरह की गहन पड़ताल करना ज़रूरी होता है.
ध्यानी जैसे पर्यावरणविद सुरंगें बनाने से पहले ‘हर क्षेत्र की विशेषताओं को ध्यान में रखने’ की वकालत करते हैं.
उनका कहना है कि हर क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थिति में अलग तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है.
उनका मानना है कि हिमालय में इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह ‘आपदाओं और मौसम की मार को झेल सके.’
साथ ही, प्रशासन को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील धार्मिक स्थानों को लेकर कोई नीति बनाते समय विभिन्न साझेदारों को शामिल करना चाहिए.
अब प्रशासन का भी मानना है कि ‘तकनीकी बाधाओं, हिमालय के पेचीदा भूभाग और अप्रत्याशित चुनौतियों’ के कारण सुरंग में फंसे 41 लोगों को बाहर निकालने में समय लग सकता है.
और यह सब हो रहा है उस सड़क के लिए, जिसे हर मौसम में सड़क सुविधा देने, कुछ समय बर्फ़ से प्रभावित रहने वाले 25.6 किलोमीटर लंबे हिस्से को घटाकर 4.5 किलोमीटर करने और 50 मिनट के सफ़र को 5 मिनट करने के लिए बनाया जा रहा है.
अंदर फंसे लोगों को निकालने में जितना ज़्यादा समय लग रहा है, हालात उतने ज़्यादा तनावपूर्ण होते जा रहे हैं.
पर्यावरणविद ध्यानी कहते हैं, “यह हम सभी के लिए सबक सीखने का एक मौक़ा है.”
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