उत्तराखंड टनल हादसा: क्या है ऑगर मशीन, जिस पर टिकी हैं 41 जिंदगियां

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- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तराखंड की निर्माणाधीन सुरंग में 41 श्रमिकों को फंसे 17 दिन हो गए हैं. वे सुरंग से कब बाहर आएंगे, इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है.
हर कोई कयास लगा रहा है, क्योंकि अभी भी फंसे हुए श्रमिकों के सामने करीब 9 मीटर का मलबा पड़ा हुआ है, जिसे हटाने का काम जारी है.
रेस्क्यू ऑपरेशन में लगे माइक्रो टनलिंग एक्सपर्ट क्रिस कूपर और अर्नोल्ड डिक्स ने वादा किया है कि जल्द श्रमिकों को निकाल लिया जाएगा.
सुरंग के अंदर ड्रिलिंग करते हुए शनिवार को ऑगर मशीन का कुछ हिस्सा टूटकर रेस्क्यू पाइप में फंस गया था, जिसे बाहर निकाल लिया गया है और अब मैनुअल तरीके से बची हुई खुदाई की जाएगी.
हालात तो मुश्किल हैं, लेकिन रोशनी की किरण किसी भी वक्त फूट सकती है. इस रेस्क्यू ऑपरेशन में जिसकी सबसे बड़ी भूमिका है, उसका नाम ऑगर मशीन है.
दिवाली के दिन जब निर्माणाधीन सुरंग धंसी तो श्रमिकों के सामने करीब 70 मीटर मलबा था, लेकिन ऑगर मशीन ने धीरे-धीरे इस मलबे में करीब 60 मीटर तक ड्रिल कर दिया.
ऐसे में ऑगर मशीन से जुड़े कई ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब हमने तलाशने की कोशिश की है.
क्या है ऑगर मशीन

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ऑगर मशीन को हिंदी में बरमा मशीन या ड्रिलिंग मशीन भी कहा जाता है, जिसका काम जमीन में छेद करना होता है.
जयपुर की जेबी इंडस्ट्रीज कई सालों से ऑगर मशीन बनाने का काम कर रही है. कंपनी के सीनियर सेल्स पर्सन मुकेश कुमावत ने बताया कि वे खुद उत्तराखंड में चल रहे रेस्क्यू ऑपरेशन पर बारीक नजर रख रहे हैं.
वे बताते हैं कि ऑगर मशीन, वर्टिकली और होरिजेंटली दोनों तरीके से छेद करने में काम आती है. एक पाइप के ऊपर गोल-गोल प्लेट्स लगाते हैं और आगे की तरफ यानी मुंह पर कटिंग एज होता है, जो मिट्टी या चट्टान को काटने का काम करता है.

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कुमावत बताते हैं, “जब मशीन के मुंह पर लगा कटिंग एज चट्टान को काटने का काम करता है तो गोल-गोल दिखने वाली प्लेट्स मलबे को बाहर खींचने का काम करती हैं."
"ड्रिल करने के लिए जो कटिंग एज लगता है, उसे बनाने के लिए टंगस्टन कार्बाइड का इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इससे सख्त सतह को काटना आसान होता है.”
ऑगर मशीन में जीपीएस और इलेक्ट्रॉनिक ट्रैकिंग सिस्टम भी लगा होता है, ताकि ओपरेटर सटीक कोण पर किसी सतह में छेद कर पाए.
ऑगर मशीन कितनी जरूरी

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फिलहाल टनल की जो भी तस्वीरें सामने आ रही हैं, उसमें टनल का सिल्कयारा की तरफ खुलने वाला हिस्सा दिखाई दे रहा है.
सिल्कयारा से बड़कोट के बीच बनाई जा रही है 4 किलोमीटर से अधिक लंबी सुरंग जब दिवाली के दिन धंसी तो उस वक्त 41 श्रमिक सिल्कयारा गेट से करीब 250 मीटर अंदर थे. अचानक उनके सामने करीब 70 मीटर का मलबा आ गिरा और वे उसी टनल में फंस गए.
शुरू में मलबे को सामान्य तरीके से खुदाई कर बाहर निकाला जा रहा था, लेकिन ऐसा करने में यह डर था कि कहीं मलबे को बाहर निकालते वक्त ऊपर से और मलबा ना आ गिरे, ऐसे में ऑगर मशीन की मदद ली गई.
ऑगर मशीन ने मलबे में ड्रिल कर करीब 60 मीटर तक एक रेस्क्यू पाइप फिट किया है जिसकी मदद से श्रमिकों को बाहर निकाला जाएगा. यह पाइप करीब 900 एमएम चौड़ा है.
जब यह मशीन ड्रिल करती है, तो कम शोर करती है, जिसके चलते सतह को नुकसान नहीं पहुंचता है. ऐसे में ऊपर से मलबा दरकने की उम्मीद कम है.
ऑगर मशीन से करीब 95 फीट तक धरती के अंदर छेद किया जा सकता है. इसके बाद ऑगर में एक्सटेंशन रोड लगानी पड़ती है.
कितनी तरह की होती है ऑगर मशीन

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किस सतह में छेद करना है, उसी हिसाब से ऑगर मशीन का इस्तेमाल किया जाता है.
मुख्यत पांच तरह की ऑगर मशीनों को इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें आइस ऑगर, अर्थ ऑगर, ग्रेन ऑगर, हैंड ऑगर और गार्डन ऑगर शामिल है.
आइस ऑगर में दूसरे ऑगर के मुकाबले ब्लेड तेज होते हैं, जिसकी मदद से बिना दरारें पैदा किए बर्फ में आसानी से छेद किया जा सकता है. इसका इस्तेमाल फूड इंडस्ट्री में किया जाता है.
ग्रेन ऑगर का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर अनाज को शिफ्ट करने के लिए किया जाता है. यह ऑगर आमतौर पर वहां दिखाई देता है जहां अनाज के साइलोज लगे होते हैं.
इनकी मदद से किसी एक ट्रक या ट्रॉली से अनाज को कुछ ही देर में ऊंचाई पर स्थित साइलोज में ट्रांसफर किया जा सकता है.
इसके अलावा हैंड ऑगर का इस्तेमाल धरती पर छोटे छेद करने के लिए किया जाता है और आखिर में अर्थ ऑगर यानी धरती में टनल बनाने या इस तरह के बड़े काम करने के लिए किया जाता है.
ऑगर की मुश्किलें

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उत्तराखंड टनल रेस्क्यू ऑपरेशन में अमेरिकन ऑगर 60-1200 होरिजोंटल मशीन का इस्तेमाल किया जा रहा है. यह मशीन 5 से 10 फीट डायामीटर तक छेद कर सकती है.
मशीन में तीन, छह और आठ मीटर के ब्लेड लगाए जा सकते हैं और 50 मीटर अंदर तक जाने के लिए ब्लेड को एक दूसरे से जोड़ना पड़ता है.
जेबी इंडस्ट्रीज के कुमावत कहते हैं, “मलबे में ड्रिल करते हुए लोहे की छड़े आने पर ऑगर मशीन काम नहीं कर पाती, वह कच्चा स्टोन, मिट्टी जैसे चीजों को तो आसानी से खोद कर बाहर निकाल देती है, यही वजह है कि लोहा सामने आने के कारण ऑगर मशीन को मुश्किल आ रही है.”
वे कहते हैं कि मलबे में कहां ड्रिल कर श्रमिकों तक पाइप पहुंचाना है इसलिए लिए एक्सपर्ट्स ने एक्स-रे भी किया था, लेकिन तब कोई लोहा की छड़े सामने नहीं दिखाई दी थी, लेकिन दुर्भाग्य से लोहे की छड़े शायद मलबे के साथ मिक्स हो गई हैं, जिन्हें कटर से काटना होगा.
अगर इस तरह की मुश्किलें सामने न आएं, तो ऑगर मशीन एक घंटे में करीब पांच मीटर तक मलबे में ड्रिल कर सकती है.
यही वजह है कि अब ऑगर मशीन को बंद कर बचे हुए 9 मीटर में मैन्युअली छेद किया जाएगा.
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