रामदेव की पतंजलि के ख़िलाफ़ शिकायतों पर सरकारों के रुख से सुप्रीम कोर्ट इतना नाराज़ क्यों है?

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- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
ठीक ऐसे वक़्त में जब दवाइयों के भ्रामक प्रचार को लेकर हंगामा मचा है और पतंजलि का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया, केंद्र सरकार उस क़ानून को ही समाप्त करने जा रही है जिसके तहत इस तरह के प्रचार-प्रसार को रोका जा सकता है.
साथ ही, उत्तराखंड सरकार ने केंद्र सरकार के सीधे निर्देश के बावजूद पतंजलि के भ्रामक विज्ञापन मामले में उन नियमों का सहारा नहीं लिया जिसके तहत कंपनी के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो सकती थी.
राज्य सरकार ने कार्रवाई को सिर्फ नोटिस भेजने तक सीमित रखा.
ये बातें पतंजलि केस के संबंध में शिकायतकर्ता और केंद्र सरकार के बीच हुए पत्राचारों, आरटीआई में मिले जवाबों और दूसरे दस्तावेज़ों के माध्यम से सामने आई हैं.
केंद्रीय आयुष मंत्रालय ने साल 2023 में अगस्त में राज्यों के संबंधित विभागों में चिट्ठी भेजकर कहा है कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स क़ानून की धारा 170 और उससे संबंधित प्रावधानों को हटाने के लिए अधिसूचना जारी की जाएगी.
'इंडस्ट्री के दबाव का असर'

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चिट्ठी में आयुष मंत्रालय ने क़ानून की अधिसूचना में वक़्त लगने की बात कही है मगर साथ ही राज्यों को ये निर्देश भी दिया है कि वो इस क़ानून के तहत किसी तरह की कार्रवाई न करें.
ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक क़ानून की धारा 170 किसी दवा के फायदे को बढ़ा-चढ़ाकर बताने वाले विज्ञापनों पर रोक लगाती है.
धारा 170 को क़ानून में साल 2018 में शामिल किया गया था. मगर अब सरकार भ्रामक प्रचारों पर रोक लगाने वाले सेक्शन को ख़त्म करने की प्रक्रिया में है.
स्वास्थ्य कार्यकर्ता और नेत्र विशेषज्ञ डॉक्टर बाबू केवी के अनुसार, ये 'इंडस्ट्री के दबाव का असर' है.
सेक्शन 170 के विरुद्ध आयुर्वेदिक कंपनियों का एक समूह हाई कोर्ट चला गया था.
कुन्नूर के रहने वाले डॉक्टर बाबू केवी पिछले पांच सालों से लगातार पतंजलि और उस तरह की दूसरी कंपनियों के कामकाज और उनके प्रचार पर शोध करते रहे हैं और उन्होंने पत्राचार, आरटीआई और दस्तावेज़ों के ज़रिए जो जानकारियाँ जुटाई हैं उन्होंने पतंजलि के ख़िलाफ़ आईएमए के केस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
लाइसेंसिंग अथॉरिटी

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आईएमए यानी इंडियन मेडिकल एसोसिएशन मॉर्डन मेडिसिन्स (एलोपैथी) और उससे संबंधित डॉक्टरों का समूह है और देश भर में इसकी शाखाएं मौजूद हैं.
पतंजलि के मामले में ये बात भी सामने आई है कि जहाँ केस दाख़िल करने वाली संस्था आईएमए इस मामले में ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज़ (1954) क़ानून के तहत कार्रवाई की मांग कर रही थी.
वहीं, उत्तराखंड सरकार एक दूसरे कानून (ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट) के तहत बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की कंपनी के ख़िलाफ धारा 170 के तहत भी नोटिस भेजती रही.
राज्य सरकार की लाइसेंसिंग अथॉरिटी ने केंद्रीय आयुष मंत्रालय की हिदायत के बावजूद मामले में सीधे तौर पर उन क़ानूनों का सहारा नहीं लिया जिसके तहत कड़ी कार्रवाई संभव हो सकती थी.
केंद्र ने भी इस मामले में अपना रुख़ बहुत देर से फ़रवरी, 2023 में साफ़ किया था जबकि पतंजलि के विरुद्ध ये शिकायत सालों से जारी थीं.
उत्तराखंड सरकार को भेजे गए एक जवाब में दिव्य फार्मेसी (पतंजलि) ने कहा कि धारा 170 को लेकर मुंबई हाई कोर्ट ने किसी तरह की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा रखी है.
हालांकि दिव्य फार्मेसी ने ये भी कहा कि नोटिस के बाद वो अपने विज्ञापनों पर रोक लगा रही है मगर कुछ दिनों की रोक के बाद कंपनी इस तरह के विज्ञापन दोबारा छपवाने लगी.
भ्रामक विज्ञापनों वाले केस की सुनवाई

दिव्य फार्मेसी दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट की एक यूनिट है जो पतंजलि से संबंधित है.
सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि के भ्रामक विज्ञापनों वाले केस की सुनवाई करते हुए कंपनी के विरुद्ध हुई ढीली-ढाली कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार और राज्य शासन पर कड़ी टिपण्णियां की हैं.
अदालत ने बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण से कार्रवाई के लिए तैयार रहने को कहा है, और हफ़्ते भर के अंदर हलफ़ानामा दाख़िल कर अदालत की अवमानना मामले में जवाब देकर बताने को कहा कि उनके ख़िलाफ़ अवमानना की कार्यवाही क्यों नहीं शुरू की जाए.
दोनों को अगली सुनवाई 10 अप्रैल को कोर्ट में हाज़िर रहने का हुक्म भी सुनाया गया है.
पिछले साल नवंबर में हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि को भ्रामक प्रचार पर रोक लगाने को कहा था जिसको लेकर कंपनी की ओर से रज़ामंदी भी जताई गई थी लेकिन उसके ठीक बाद बाबा रामदेव ने न सिर्फ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया बल्कि इसी तरह का प्रचार बाद में कंपनी की तरफ़ से जारी हुआ.
सुप्रीम कोर्ट के सवाल

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समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार पर भी सवाल उठाते हुए कहा है, "केंद्र ने मामले में आंखें क्यों बंद करके रखीं जबकि पतंजलि हर ओर ये बात फैला रहा था कि एलोपैथी में कोविड का कोई इलाज नहीं."
अदालत ने उत्तराखंड सरकार के रवैए पर सख़्त रुख़ अपनाते हुए कहा कि "वो अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर पाई" क्योंकि उसने केंद्र सरकार के दो दिनों में कार्रवाई करने के आदेश के बावजूद मामले में सिर्फ़ नोटिस जारी करके हाथ झाड़ लिया.
उत्तराखंड शासन को इस मामले में अगली सुनवाई के दिन हाज़िर रहने का हुक्म अदालत ने सुनाया है.
सुप्रीम कोर्ट पतंजलि से जुड़ी दिव्य फार्मेसी के ख़िलाफ़ सुनवाई कर रहा है. इन विज्ञापनों में ब्लड प्रेशर से लेकर, थॉयरायड, जिगर और चमड़े की बीमारियों को पूरी तरह से ठीक होने का दावा किया गया था, साथ ही आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की आलोचना की गई थी.
रामदेव की कंपनी के दावे

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कोरोना के इलाज की कथित दवाई कोरोनिल को लेकर भी बाबा रामदेव की कंपनी ने कई तरह के दावे किए थे और विश्व स्वास्थ्य संगठन तक से हरी झंडी मिलने की बात कही गई थी.
हालांकि डबल्यूएचओ ने ऐसी कोई मान्यता देने की बात से साफ़ इनकार कर दिया था.
कोरोनिल के जारी होते समय नरेंद्र मोदी सरकार के दो मंत्री- पूर्व स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन और नितिन गडकरी रामदेव के साथ स्टेज पर मौजूद थे.
आईएमए ने इस मामले में पूर्व स्वास्थ्य मंत्री की मौजूदगी को लेकर सवाल भी खड़े किए थे.
योग गुरु रामदेव 2010-11 में चले भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के दिनों में सक्रिय रहे थे और कांग्रेस की तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार लगातार उनके निशाने पर रही थी.
आईएमए के पूर्व सेक्रेटरी जनरल डाक्टर जयेश लेले ने मुंबई से टेलीफ़ोन पर बीबीसी से कहा कि इस तरह के भ्रामक विज्ञापनों का सिलसिला लंबे समय तक जारी रहा तभी हमने पहले तो पुलिस में अलग-अलग जगहों पर शिकायतें कीं जो कई जगह एफ़आईआर में तब्दील हुईं और फिर हमने अगस्त 2022 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.
जेल और जुर्माने का प्रावधान

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डाक्टर जयेश लेले अदालत की कार्रवाई पर ख़ुशी का इज़हार किया.
इन दिनों कश्मीर में मौजूद डाक्टर केवी बाबू ने फ़ोन पर बीबीसी से कहा कि रिकॉर्ड बताता है कि पतंजलि नियामक प्राधिकरणों के आदेशों की बार-बार अनदेखी करता रहा है. लाइसेंससिंग अथॉरिटीज़ भी किसी कारण उनके साथ सख़्ती से पेश नहीं आते और नोटिस जारी कर मामले को रफ़ा-दफ़ा कर देते हैं.
साल 2018 में ट्विटर पर शेयर हो रहे एक आई-ड्राप के विज्ञापन ने केरल के नेत्र रोग विशेषज्ञ डाक्टर केवी बाबू का ध्यान खींचा जिसके बाद शुरू हुई पांच साल लंबी क़ानूनी प्रक्रिया.
इस प्रक्रिया में सियासी रसूख़ वाली 10 हज़ार करोड़ रुपये की कंपनी पतंजलि के कर्ता-धर्ता बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के लिए भरी अदालत में माफ़ी मांगनी पड़ी और हो सकता है उन्हें सज़ा भी भुगतनी पड़े.
भ्रामक विज्ञापनों के मामले में पहली ग़लती पर छह माह की जेल और जुर्माने की सज़ा हो सकती है. दोबारा इसी तरह का मामला सामने आने पर सज़ा दोगुनी करने यानी एक साल जेल और जुर्माने का प्रावधान है.
मगर पतंजलि के केस में अदालत की अवमानना की बात भी सुप्रीम कोर्ट ने कही है और बाबा रामदेव और आचार्य बालाकृष्ण को इस मामले में भी दोषी पाए जाने पर सज़ा मिल सकती है.
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