'रोज़े रखता हूं, पहचान रामलीला से है', रामायण के पात्र निभाते मुसलमान कलाकारों से मिलिए

बरसों से रामलीला में हिस्सा ले रहे हैं कई मुस्लिम कलाकार

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    • Author, आसिफ़ अली
    • पदनाम, नैनीताल से बीबीसी हिंदी के लिए

उत्तराखंड के नैनीताल शहर में हर साल होने वाला रामलीला का मंचन अपने आप में बेहद ख़ास है. इस रामलीला की ख़ासियत इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों के लोगों का शिरक़त करना है.

दिलचस्प बात ये है कि ये कोई नयी पहल नहीं है. पहाड़ और शहरी संस्कृति का संगम कहे जाने वाले नैनीताल शहर में रहने वाले हिंदू और मुसलमान ऐसी रामलीला का मंचन दशकों से देख रहे हैं.

इन कलाकारों की पोशाकों से लेकर साज-सज्जा का जिम्मा हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों के कलाकार संभालते हैं. यह आपसी सद्भाव और प्यार ही पहाड़ की इस रामलीला को अपने आप में ख़ास बनाता है.

यूं तो नैनीताल जिले में कई स्थानों पर रामलीला का मंचन होता है, लेकिन ख़ास नैनीताल में होने वाली रामलीला का मंचन यहां दोनों संप्रदायों के लोग एकजुट होकर करते हैं.

रामलीला में कुछ मुस्लिम कलाकार तो ऐसे हैं, जिन्हें किरदार निभाते हुए 40 बरस तक हो चुके हैं.

यहाँ मुस्लिम समाज के लोग स्वेच्छा से रामलीला के विभिन्न क़िरदार निभाते आ रहे हैं. रामलीला में जिनका अभिनय देख दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं.

रामलीला का मंचन देखने के लिए भी बड़ी संख्या में मुसलमान दर्शक भी पहुंचते हैं.

126 साल पुरानी है तल्लीताल रामलीला समिति

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हिंदू-मुसलमानों ने मिलकर की थी शुरुआत

तल्लीताल रामलीला समिति के अध्यक्ष रविंद्र पांडे बताते हैं, "नैनीताल की तल्लीताल रामलीला समिति क़रीब 126 वर्ष पुरानी सबसे प्राचीन रामलीला समिति है.”

“यहाँ हिंदू-मुस्लिम समुदाय के लोगों ने मिलकर रामलीला के मंचन की शुरुआत की थी.”

रविंद्र पांडे ये भी बताते हैं, “उस दौर में अकबर हुसैन ने जनक और मारीच और खुदाबख़्श ने अंगद की भूमिका निभाई थी.”

रविंद्र पांडे के मुताबिक़ नैनीताल में इसके बाद 1918 में राम सेवक सभा मल्लीताल, 1956 में आदर्श रामलीला समिति सूखाताल और 1973 में नव सांस्कृतिक सतसंग समिति शेर का डांडा में रामलीला की शुरुआत हुई.

"इन सबमें मुस्लिम समाज के लोगों ने भागीदारी की और आज भी कर रहे हैं.”

'रोजे़ रखता हूं लेकिन पहचान रामलीला से है'

पिछले 30 साल से रामलीला कर रहे हैं अनवर रज़ा

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अनवर रज़ा पिछले क़रीब तीन दशकों से नैनीताल की अलग-अलग रामलीलाओं में हिस्सा लेते आ रहे हैं.

बीबीसी हिंदी से अनवर रज़ा ने कहा, “इंसान के दिल में, उसके रोम-रोम में राम भी हैं अल्लाह और रहीम भी है.”

उन्होंने बताया, “मैं क़रीब 3 दशकों से रामलीला में भूमिकाएं निभाते आ रहा हूँ. मैं कभी शत्रुघ्न, तो कभी केवट और कभी विश्वामित्र बनता हूँ. मैं 1995 से रामलीला के मंचन से जुड़ा था. और मैंने सबसे पहले शिवजी के रूप में अभिनय किया था.”

अनवर

अनवर अभी नैनीताल की रामलीला आदर्श समिति सूखाताल से जुड़े हूँ.

वो कहते हैं, “मैं पाचों वक़्त की नमाज़ पढ़ता हूँ और रोज़े भी रखता हूँ. मगर मेरी जो आज पहचान बनी है, वो रामलीला से ही बनी है.”

अनवर बड़े फख़्र से कहते हैं, “मेरा परिवार हो या फिर मेरा समाज, वो भी मुझे रामलीला के मंच पर जाने से नहीं रोकते. आदर्श रामलीला समिति मुझे मेरे परिवार की ही तरह लगती है और उनका मुझे पूरा सपोर्ट भी मिला है.”

अनवर बताते हैं कि जब वो कोई क़िरदार निभाते हैं तो उसी में पूरी तरह से रम जाते हैं.

वो कहते हैं, “मैं यह चाहता हूँ कि जो यहाँ की गंगा जमुनी तहज़ीब है वो सब जगह बरक़रार रहे और किसी तरह का कोई हिंदू मुस्लिम बैर ना हो.”

रामलीला में महर्षि विश्वामित्र की भूमिका निभाने वाले जावेद अली

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इमेज कैप्शन, रामलीला में महर्षि विश्वामित्र की भूमिका निभाने वाले जावेद हुसैन

रामलीला मंच से मिली पहचान और बेहद प्यार

नैनीताल की रामलीलाओं में क़रीब पिछले 15 सालों से अलग अलग किरदार निभा रहे जावेद हुसैन बताते हैं, “यूँ तो बचपन में, मैं घरवालों के साथ रामलीला देखा करता था. तब रामलीला में वानरों को देखकर मैं अपने मन में यह सोचता था कि, क्या कभी मैं भी वानर का किरदार कर पाऊंगा.”

जावेद बताते हैं जब वो क़रीब 5 साल के थे तब उन्हें रामलीला में एक वानर का रोल करने के लिए मिला. तब से आज लगातार 15 सालों से रामलीला के साथ जुड़े हुए हैं.

जावेद

जावेद हुसैन ने बताया कि, “मैं अलग अलग रामलीलाओं में नए नए करेक्टर करता रहता हूँ, इसके अलावा कलाकारों का मेकअप और ड्रेसअप से लेकर काफ़ी चीज़ों पर भी काम करना जानता हूँ.”

उन्होंने बताया कि, “रामलीला से हमें जो प्यार और सम्मान मिलता है, उसने हमें एक अलग ही पहचान दे दी है. रामलीला के पवित्र मंच ने हमें दूर दूर तक प्रसिद्धि दी है.”

“रामलीला ने हमें एक जुड़ाव दिया है अपने जन समुदाय से मिलने और उनसे जुड़ने का और उनके साथ प्रेम और सौहार्द से रहने का है.”

पूरे उत्तराखंड में मशहूर हैं कुमाऊं की रामलीला

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जावेद ने बताया क्यों ख़ास है कुमाऊँ की रामलीला

जावेद हुसैन ने बताया, “कुमाऊँ की रामलीला को कुछ ख़ास बातें अलग बनातीं हैं. इसलिए यहाँ की रामलीला दूर-दूर तक मशहूर है.”

उन्होंने बताया, “पारंपरिक तरीक़े से रामलीला में किरदार पुरुष ही करते थे. वो परंपरा यहाँ आज भी बरक़रार है.”

जावेद ने ताड़का के डायलॉग (मैं तो ताड़का तड़-तड़ तड़ाक करती हूँ, मैं तो सौ सौ पुरुषों का आहार करती हूँ) को गायन शैली में कहते हुए बताया कि, “दूसरी सबसे ख़ास बात यह है कि यहाँ गायन शैली में रामलीलाओं का मंचन होता है.”

“रागों पर आधारित गायन होता है और उसमें अलग तरह के राग होते हैं.”

“रागों के माध्यम से ही पूरी रामलीला को दिखाया जाता है. जो लोगों के दिलों पर एक अलग तरह का असर छोड़ता है.”

अलग-अलग रागों पर आधारित कुमाऊं की रामलीला

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'लोग देते हैं सम्मान'

जावेद कहते हैं, “जब हम लोग रामलीला में अपने किरदार निभाते हैं तो लोग हमें प्यार और सम्मान देते हैं, उससे किसी तरह से उन लोगों से अलग होने का अहसास ही नहीं होता. बल्कि ऐसा महसूस होता है कि हम लोग हिंदू मुस्लिम ना होकर बल्कि एक परिवार हैं.”

वो कहते हैं कि, “हालाँकि मैं एक मुसलमान हूँ, लेकिन हमारी जो परंपरा है वो गंगा जमुनी तहज़ीब वाली है. और वो परंपरा यहाँ बरक़रार है.”

जावेद ये भी कहते हैं कि ऐसा आज तक नहीं हुआ कि हम कहीं रामलीला मंचन के लिए गये हों और हमें सम्मान ना मिला हो.”

वो कहते हैं, “बल्कि लोग हमें गले लगाकर यह कहते हैं कि वाह आपके किरदार में मज़ा आ गया. और यही वजह है कि हमें भी रामलीला के दौरान किरदार में डूबकर किरदार निभाने का मज़ा आता है.”

126 साल पुरानी तल्लीताल रामलीला समिति से 40 बरसों से जुड़े हैं सईब अहमद.

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तल्लीताल की रामलीला में सईब अहमद का रोल

सईब अहमद के बिना नैनीताल की तल्लीताल रामलीला समिति अधूरी सी लगती है.

नैनीताल की क़रीब 126 साल पुरानी तल्लीताल रामलीला समिति में बीते 40 वर्षों से जुड़ा नाम है सईब अहमद.

पाँचों वक़्त के नमाज़ी सईब अहमद रामलीला में पूर्ण रूप से सहयोग करते हैं.

सईब राम से लेकर दशानन रावण तक सभी पात्रों का मेकअप कर उन्हें किरदार के रूप में तैयार करते हैं.

सईब अहमद ने बताया , “यूं तो मैं मुसलमान हूँ, लेकिन जब तक मैं सभी पूज्य कलाकारों को तैयार नहीं कर देता तब तक रामलीला मंचन की शुरूआत नहीं होती.”

“पात्र मुझसे ज़रूर पूछते हैं कि क्या अब हम मंच पर जायें, तब वह जाते हैं. इसलिए यह महसूस ही नहीं होता कि हम हिंदू या मुसलमान हैं. ऐसा लगता है कि हम एक ही मंच के सारे कलाकार हैं.”

सईब अहमद ने बताया, “ जब मंचन के दौरान वहाँ खाना या चाय तैयार होती है तो सबसे पहले मुझसे ही पूछा जाता है.”

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