अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान के राज में बदलाव की बयार से गुजरती अफ़ग़ान पुलिस

काबुल में सुरक्षा बल

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    • Author, यामा बरीज़
    • पदनाम, बीबीसी अफ़ग़ान सेवा

बीस साल तक ये दोनों व्यक्ति अफ़ग़ानिस्तान में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हथियार लेकर खड़े थे.

इनमें से एक हज़रत मोहम्मद महमूद, तालिबान के पूर्व कमांडर हैं और दूसरे व्यक्ति हैं नासिर ख़ान, जो कभी अफ़ग़ान नेशनल पुलिस में आला अधिकारी थे.

लेकिन अब ये दोनों काबुल की पुलिस अकादमी में साथ-साथ काम कर रहे हैं.

ब्रिगेडियर महमूद कहते हैं, "अब हम भाई जैसे हैं." ऐसा कहते हुए वो मुस्कुरा देते हैं, जहां बाजू में ही उनके साथी कड़क वर्दी में बैठे हुए हैं.

आमतौर पर ऐसा होता नहीं है, लेकिन अब उन दो लोगों में अच्छी दोस्ती है, जो कभी एक-दूसरे के जानी-दुश्मन थे.

दो दशक तक हुए ख़ून-ख़राबे के बाद, ये दोनों अब एक जैसी वर्दी पहनते हैं, एक ही दफ़्तर में बैठकर पुलिस के भविष्य पर चर्चा करते हैं और चाय की चुस्कियों के साथ हंसी-मज़ाक करते हैं.

हज़रत मोहम्मद महमूद काबुल की पुलिस अकादमी में चीफ़ ट्रेनर हैं और नासिर ख़ान अकादमी के प्रशासनिक कामों की ज़िम्मेदारी संभालते हैं.

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'एक अलग दौर'

हज़रत मोहम्मद महमूद और नासिर ख़ान
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महमूद ने किसी दौर में तालिबान के सैन्य कैंपों में ट्रेनिंग ली थी और वे तालिबान के ज़मीनी सैनिकों की एक यूनिट का नेतृत्व भी कर चुके हैं.

यह मिशन था अफ़ग़ान बलों और उसके अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों से लड़ना. जंग में वे अपने दो भाइयों को खो चुके हैं.

तालिबान लड़ाके अधिकतर आत्मघाती बम हमलों और कार धमाकों में शामिल होते थे. साथ ही वे अफ़ग़ानिस्तान के भीतर शहरों को निशाना बनाते थे.

वहीं दूसरी तरफ़, अमेरिकी मदद से खड़ी हुई अफ़ग़ान सिक्योरिटी फोर्स थी, जिसमें अफ़ग़ान नेशनल पुलिस फोर्स के डेढ़ लाख जवान शामिल थे.

महमूद और नासिर, जहां तालिबान के युवा लड़ाकों को ट्रेनिंग दे रहे हैं, ये वही परिसर है जिसे तालिबान के आत्मघाती हमलावरों ने कभी निशाना बनाया था.

काबुल पुलिस अकादमी के यंग कैडेट्स पर लगातार हमले होते रहते थे.

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सुलह-समझौता

काबुल की पुलिस अकादमी

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अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता जब तालिबान के हाथों में आई, और सैन्य अधिकारियों के लिए अपनी पोस्ट्स पर वापस जाने का आदेश जारी हुआ, तब नासिर ख़ान काबुल में ही रहे और उन्हें महमूद का साथ मिला.

नासिर और महमूद के संबंध अब दफ़्तर तक सीमित नहीं हैं. वे शादी-ब्याह और धार्मिक जलसों में भी साथ नज़र आते हैं.

अपनी निजी क्षति के बावजूद, महमूद कहते हैं कि तालिबान के शीर्ष नेता की तरफ़ से मिली आम माफ़ी की वजह से, दोनों पक्षों के लोग साथ मिलकर काम कर पा रहे हैं.

वो कहते हैं, "तब हम जिहाद के दौर में थे, अब हम पुनर्निर्माण के दौर में हैं और हम इसे अकेले नहीं कर सकते. हम अतीत को पूरी तरह भूल चुके हैं."

इस पुलिस अकादमी में भले ही सुलझ-समझौते का अनुभव होता हो, लेकिन सुरक्षा बलों के कई पूर्व सदस्यों को लगता है कि उन पर अभी भी ख़तरा मंडरा रहा है.

देश छोड़ कर भाग गए हैं सुरक्षा बलों के कई पूर्व सदस्य

काबुल पुलिस अकादमी के अधिकारी
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सुरक्षा बलों के कई पूर्व सदस्य, देश छोड़कर भाग गए हैं और शरणार्थी बन गए हैं. उन्हें तालिबान की सत्ता में अपनी ज़िंदगी, दोबारा पटरी पर आना मुश्किल लगती है.

अफ़ग़ान पुलिस के एक पूर्व अफ़सर शब्बीर (बदला हुआ नाम) को लगता है कि तालिबान और उसकी तरफ़ से दी गई माफ़ी पर भरोसा नहीं किया जा सकता.

तालिबान के सत्ता में आने के बाद शब्बीर को गिरफ़्तार कर लिया गया था और वो ख़ुद बीस दिन तब तक छिपे रहे, जब तक कि गुपचुप तरीके से हेरात के रास्ते ईरान नहीं निकल गए.

शब्बीर कहते हैं, "हममें से किसी के लिए ये महफ़ूज़ नहीं था. वो हमें गिरफ़्तार करने के अलग-अलग बहाने खोज रहे थे."

उनका ये भी मानना है कि जो पुलिस अधिकारी अफ़ग़ानिस्तान में ही रह गए, वो देश छोड़कर जाने में सक्षम नहीं थे या उन्हें तालिबान के साथ सहयोग करने में कोई समस्या नहीं थी.

तालिबान ने अपने लड़ाकों को पुलिस-फोर्स में तब्दील करने के लिए कई पूर्व पुलिस प्रशिक्षकों को ज़िम्मेदारी सौंपी है.

नई पुलिस

काबुल की नई पुलिस अकादमी

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हमें पुलिस अकादमी का टूर कराया गया. ये बहुत बड़ा, लेकिन सुव्यवस्थित परिसर है. जिसमें पुलिस कॉलेज, शूटिंग रेंज, खेल की सुविधाएं, और यहां तक कि उनकी अपनी मस्ज़िद भी है.

अंदर तालिबान के वो लड़ाके हैं, जो कभी सरकार को कमज़ोर करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देते थे, लेकिन अब उन्होंने साफ़-सुथरी वर्दी पहन रखी है और पुलिस फोर्स बनने के लिए ट्रेनिंग ले रहे हैं.

यही वो पुलिस फोर्स होगी, जिसे अफ़ग़ानिस्तान की सड़कों पर सुरक्षा का अहसास कराना है. अफ़ग़ानिस्तान के आम लोगों को इस अकादमी के भीतर का दृश्य किसी सपने की तरह लगेगा, जिस पर उन्हें यकीन करना मुश्किल होगा.

कभी किसी ने ये कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन ऐसा भी आएगा, जब वो तालिबान को अफ़ग़ान पुलिस की वर्दी में देखेंगे.

तालिबान ने पुलिस फोर्स के बड़े हिस्से को अपने लोगों से बदल दिया है. लेकिन तालिबान ने कई पूर्व पुलिस ट्रेनर्स को लड़ाकों की ट्रेनिंग के लिए रख लिया है.

तालिबान अब अपनी पुलिस फ़ोर्स को बढ़ाने पर ध्यान दे रहा है. दावा किया जाता है कि उसकी पुलिस फ़ोर्स में अब तीन लाख सक्रिय सदस्य हैं, जो पिछली सत्ता की तुलना में दोगुने हैं. इनमें सत्तर हज़ार सदस्य, पूर्व अफ़ग़ान नेशनल पुलिस के हैं.

लेकिन बीबीसी इन आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सकती है. अमेरिकी सरकार का अनुमान है कि तालिबान फोर्स में लगभग अस्सी हज़ार सक्रिय लड़ाके हैं, जिनमें फ़ौज और पुलिस दोनों शामिल हैं.

नई पुलिस ट्रेनिंग अकादमी में बीबीसी को क्या दिखा

काबुल की नई पुलिस अकादमी

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नई पुलिस अकादमी में ट्रेनिंग की प्रक्रिया देखने के लिए हमें ख़ासतौर पर मंज़ूरी दी गई. अधिकारियों ने पूरे दिन की गतिविधियों की योजना बनाई थी, ताकि वो हमें अपनी फोर्स का 'पेशेवर पक्ष' दिखा सकें.

इसमें दंगारोधी पुलिस की ड्रिल भी शामिल थी, जिसमें अकादमी के परिसर में गुस्साए प्रदर्शनकारियों की भीड़ को आसानी से क़ाबू करते हुए दिखाया गया था.

लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के कुछ अहम शहरों में हाल में हुई रैलियों में ये देखने में आया है कि तालिबान फोर्स अभी भी मारपीट और गोलियां चलाने जैसे तरीके इस्तेमाल कर रही है, जिसकी वजह से लोग अक्सर मारे जाते हैं.

काबुल की पुलिस अकादमी में 800 से अधिक स्टाफ़ है. इनमें से 650 से अधिक लोग सत्ता में बदलाव से पहले के हैं और ये नासिर ख़ान की तरह अफ़सर थे, जिनके साथ यहां ठीक से बर्ताव किया जा रहा है.

नासिर ख़ान कहते हैं, "मैं कर्नल था, लेकिन मुझे इस्लामिक अमीरात ने जनरल की रैंक पर प्रमोट किया, क्योंकि मैंने अकादमी को दोबारा खड़ा करने में कड़ी मेहनत की."

लेकिन हर कोई नासिर ख़ान की तरह किस्मत वाला नहीं था. मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान ने उनके पहले के कामों की वजह से कई पुलिस अधिकारियों को उत्पीड़ित किया, डराया-धमकाया और यहां तक कि जान से भी मार दिया.

लेकिन तालिबान ज़ोर देकर कहता है कि इसके पीछे बदले की निजी भावनाएं थी और पूर्व पुलिस अधिकारियों या सुरक्षाकर्मियों को निशाना बनाने जैसी कोई पॉलिसी नहीं है.

लेकिन नासिर ख़ान के लिए कोई राजनीतिक वजह नहीं है. उन्होंने बीते चार दशक में सत्ता के अलग-अलग दौर में अफ़ग़ान पुलिस में काम किया. उन्होंने कभी अपना वतन नहीं छोड़ा. उनके दो बेटे भी पुलिस में ही काम करते हैं.

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