अफ़ग़ानिस्तान में बाढ़ की मार झेलने वाला वो इलाक़ा जहां सबने दो-तीन रिश्तेदार खोए

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- Author, यामा बारीज़ और कैरोलिन डेविस
- पदनाम, बग़लान प्रांत, अफ़ग़ानिस्तान
बाढ़ आने के अगले दिन नूर मोहम्मद को अपने परिवार के लोगों की लाशें गलियों और खेतों से मिलीं.
75 साल के नूर मोहम्मद अफ़ग़ानिस्तान के उत्तरी प्रांत बग़लान में अपने घर से 100 मीटर की दूरी पर थे जब उन्हें जानलेवा बाढ़ का शोर सुनाई दिया. नूर मोहम्मद ने पानी की आवाज़ सुनकर तुरंत अपने घर की तरफ़ दौड़ लगा दी जहां उनकी पत्नी, बहन, बेटा और नाती-नतिनी आराम कर रहे थे.
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.
अचानक आने वाली बाढ़ की यह तेज़ धार उनके घर और परिवार के लोगों को अपने साथ बहाकर ले गई थी.
यह बाढ़ सर्दी के सूखे मौसम के बाद भारी बारिश और तूफ़ान के कारण आई थी और ज़मीन के लिए इतना पानी सोखना संभव नहीं था. इस बाढ़ से मीलों तक तबाही फैली हुई है.
इस बाढ़ में उत्तरी प्रांत बग़लान बुरी तरह प्रभावित हुआ और सबसे अधिक मौतें भी इसी जगह हुई हैं. बाढ़ के बाद हज़ारों लोग बेघर हो गए हैं जिन्हें भोजन, रहने की जगह और इलाज की तत्काल ज़रूरत है.
संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम का कहना है कि बाढ़ से 300 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घर बर्बाद हो गए. इस बाढ़ से उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के राज्य बग़लान के पांच ज़िले प्रभावित हुए हैं. बाढ़ से हुई मौतों की संख्या बढ़ने की आशंका है.
'यह बहुत भयानक था'

बाढ़ से बदख़्शां, ग़ौर और पश्चिमी हेरात के राज्य भी बहुत प्रभावित हुए हैं.
नूर मोहम्मद का कहना है, “मैंने ख़ुद को बेबस महसूस किया.”
वह बग़लान के गांव ग़ाज़ में जब पागलों की तरह अपने घर के आसपास बाढ़ के रेले में बह जाने वाले अपने घर वालों को तलाश कर रहे थे तो दोपहर ढल चुकी थी. उन्होंने उन्हें बहुत तलाशा लेकिन उनका पता न चल सका.
तलाश करते-करते जब आधी रात बीत गई तो तीन घंटे की दूरी पर बसी अपनी बेटी सईदा के घर चले गए. वह अगले दिन अपने घर वापस आए तो उन्हें अपने रिश्तेदारों की लाशें मिलीं.
वह कहते हैं, “यह बहुत भयानक था.”
नूर मोहम्मद का कहना है कि चाहे प्राकृतिक आपदा हो, जो अक्सर क्षेत्र को प्रभावित करती है, या गृह युद्ध, जिसने सालों से देश को बर्बाद कर रखा है, उन्होंने अपनी ज़िंदगी में कभी ऐसा अनुभव नहीं किया.
उस दिन बाढ़ की तेज़ धार से नूर मोहम्मद के घर पर जिन लोगों की मौत हुई, उनमें सईदा की 25 साल की बेटी भी शामिल थीं. सईदा कहती हैं कि बाढ़ की तेज़ धार की ख़ौफ़नाक आवाज़ सुनकर वह बहुत डर गई थीं.
बाढ़ की वजह से नूर मोहम्मद का गांव सड़क से कट चुका है. इस गांव में हर किसी ने अपने दो या तीन रिश्तेदारों को बाढ़ में खोया है और इस समय उन्हें मदद की बहुत ज़रूरत है.
'चाय पीने के लिए गिलास तक नहीं बचा'

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रौज़तुल्लाह नर्स हैं और उन्होंने फ़लूल नाम के सबसे अधिक प्रभावित गांव का दौरा किया है. वह कहते हैं, “हमने उन इलाक़ों का भी दौरा किया जहां सब कुछ बिल्कुल ख़त्म हो चुका है.”
फ़लूल में उखड़े हुए पेड़, टूटी हुई चट्टानें, बिखरी ईंटें और टूटी हुई कारें कीचड़ में धंसी हुई हैं. बाढ़ के जमा पानी से बनने वाला कीचड़ गर्मी की वजह से सूखना शुरू हो गया है. ऐसे लोग जो अभी खुदाई कर रहे हैं और अपना सामान निकालने की कोशिश कर रहे हैं उनके लिए यह और भी मुश्किल हो गया है.
मोहम्मद गुल अपने घर के दो कमरों को खोदने के लिए बेलचे का इस्तेमाल कर रहे हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया, “हमारे पास चाय पीने के लिए एक गिलास या कप तक नहीं बचा. हमारे पास कुछ भी नहीं.”

वह केवल एक ही चीज़ को बाढ़ से बचाने में कामयाब रहे और वह एक मुड़ी हुई साइकिल है जिसे वह गधे पर लादते हैं.
बाढ़ के कई दिन बाद भी कुछ परिवार अपने रिश्तेदारों की लाशों की तलाश में हैं. एक घर में भीड़ जमा है. यहां एक लड़की की लाश मिली है. उसे एक चादर में लपेट दिया गया और उसे एंबुलेंस ले गई.
एक परिवार के 16 लोगों की मौत

रौज़तुल्लाह 15 दूसरी नर्सों, पैरामेडिक्स और डॉक्टरों के साथ प्रभावित क्षेत्र में पहुंच गए हैं. उनका कहना है कि उन्होंने 200 से अधिक घायलों की मदद की है जिनमें एक शख़्स ऐसा भी था जिसने अपने परिवार के 16 लोगों को खो दिया. हालांकि वह अब तक बाढ़ से प्रभावित कुछ दूर-दराज़ इलाक़ों तक नहीं पहुंच सके हैं जहां लोगों को मदद की बहुत ज़्यादा ज़रूरत है.
वह कहते हैं, “यहां पीने का पानी नहीं” और सावधान करते हैं कि यहां पानी से पैदा होने वाली बीमारियां जैसे टाइफ़ायड और डायरिया फैल सकता है.
वह जिन इलाक़ों तक पहुंचने में कामयाब हुए हैं वहां उनकी टीम ने मोबाइल रिलीफ़ सेंटर बनाना शुरू कर दिया है और लाशों को निकालने का काम कर रहे हैं.
बीबीसी को हर गांव में बाढ़ से नुक़सान और मौत की एक कहानी मिली है.
एक शख़्स हमें अपने पांच साल के भतीजे अबू बकर की तस्वीर दिखा रहा है. वह उस वक़्त अपने दादा के साथ खेल रहा था जब बाढ़ की तेज़ धार उनके पास आ गई. जब उन्होंने इसे निकालने की कोशिश की तो इस दौरान अबू बकर तेज़ धार में बह गए.
अबू बकर ने अपने दादा की टांग को इतनी मज़बूती से थाम रखा था कि जब उनके दादा ने ख़ुद को बचाने की कोशिश की तो उनकी टांग पर अबू बकर की पकड़ का निशान बाक़ी रह गया. अबू बकर ने जब अपने दादा की पकड़ खोई तो केवल उनकी मां ने उन्हें उस वक़्त देखा था.
अब्दुल ख़ालिक़ को जब बाढ़ की ख़बर मिली तो वह शहर से बाहर थे. जब वह वापस आए तो उनके परिवार के घरों में जो कुछ बचा था वह बस बाथरूम की दीवारों का एक छोटा टुकड़ा था. बाक़ी सब कुछ मिट चुका है. उनके परिवार के 18 लोगों में से 10 लोग इस बाढ़ में बह गए हैं.
वह कहते हैं, “हम घर वालों को घंटों तक कीचड़ में तलाश कर रहे थे इसलिए हमने अपने जूते उतारे और तलाश जारी रखी. आख़िर में हमें यहां से मीलों दूर उनकी लाशें मिलीं.”
दूसरे लोग तबाही के लम्हे के बारे में बताते हैं कि किसी ने बस चीख़ कर कहा था कि पानी आ रहा है. कुछ लोग इस बाढ़ की तेज़ धार से बच निकलने में कामयाब हुए लेकिन अपना सारा सामान खो बैठे.
गाढ़े कीचड़ के तालाब बन गए हैं खेत

ज़ोहरा बीबी बाढ़ के बाद अब तिरपाल से बने एक टेंट में रह रही हैं. वह कहती हैं, “बाढ़ के दौरान अफ़रा-तफ़री के बीच में घर की ऊपरी मंज़िल तक पहुंचने के लिए जद्दोजहद कर रही थी लेकिन इसी दौरान हमारा घर और हमारे तमाम मवेशी बह गए.”
वह कहती हैं कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी में पहले कभी ऐसा कुछ नहीं देखा. बाढ़ यहां कोई असामान्य बात नहीं लेकिन हमें बताया गया कि 20, 40 और 60 साल में किसी ने अपने इलाक़े में ऐसी बाढ़ नहीं देखी.
गडन बाला गांव में मोहम्मद रसूल एक ऐसे खेत के पास सिगरेट पी रहे थे जहां कभी उनकी फ़सलें उगती थीं. अब यह खेत गाढ़े कीचड़ का तालाब बन गया है.
सैकड़ों एकड़ में फैले खेत, कपास और गेहूं की फ़सलें पूरी तरह बर्बाद हो चुकी हैं. हम गेहूं के उन खेतों से गुज़रे जहां पानी की धार ने फ़सल को दो हिस्सों में काट दिया था. पानी की तेज़ धार ने हरी फ़सलों को चीरते हुए अपने पीछे केवल मलबा और कीचड़ ही छोड़ा है.
मोहम्मद रसूल ख़ुद को भाग्यशाली समझते हैं कि उनका परिवार बाढ़ में बच गया लेकिन वह कहते हैं कि उन्होंने बाक़ी सब कुछ खो दिया.
उन्होंने हमें वह खेत दिखाया जहां उनकी फ़सलें बर्बाद हो गई हैं. वह कहते हैं, “मेरी आमदनी का यही एक ज़रिया था. अब मैं बेबस और लाचार महसूस कर रहा हूं.”
'बाढ़ ने सब कुछ ले लिया'

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अस्सी फ़ीसद अफ़ग़ान नागरिकों की तरह वह अपनी आमदनी के लिए खेती पर निर्भर करते हैं. मोहम्मद रसूल का कहना है कि उन्हें पता नहीं कि अब वह कैसे गुज़र बसर करेंगे.
वह कुछ दूरी पर अपने घर के बचे खुचे हिस्से की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं कि वह अपने घर वापस नहीं जा सकते क्योंकि बाढ़ का पानी अब भी बहुत अधिक है.
वह कहते हैं, “मेरे पास अब कुछ भी नहीं, मैं क्या करूं? मेरे पास परिवार है लेकिन उन्हें पालने के लिए मेरे पास कुछ नहीं.”

बाढ़ से प्रभावित होने से पहले ही संयुक्त राष्ट्र ने अनुमान लगाया था कि इस साल लगभग 2 करोड़ 40 लाख लोगों को किसी न किसी रूप में मानवीय सहायता की ज़रूरत होगी. यह अफ़ग़ानिस्तान की आधी से अधिक आबादी है.
बाढ़ से केवल फ़सलें ही बर्बाद नहीं हुई हैं. मोहम्मद रसूल का कहना है कि उनके पड़ोसी ने बाढ़ में अपनी दो गाएं खो दीं. उनकी आमदनी बस उन्हीं दो गायों से होती थी.
और नूर मोहम्मद, जो अपनी बेटी के साथ रह रहे हैं, कहते हैं कि उनके पास केवल वही चीज़ रह गई है जो उन्होंने पहन रखी है. वह कहते हैं कि जो घर बाढ़ में बह गया वहां बचपन से रहते थे, उनके पिता ने उसे 65 साल पहले बनवाया था.
वह कहते हैं, “मुझे भविष्य के बारे में उम्मीदें थीं. मेरा बेटा और नतिनी शिक्षक थे. मुझे उन पर फ़ख़्र था क्योंकि वह देश के भविष्य में अपना रोल निभा रहे थे.”
वह कहते हैं, “दोनों अब मर चुके हैं. बाढ़ ने सब कुछ ले लिया.”
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