अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई से बढ़ा तनाव, तालिबान ने दी सख़्त चेतावनी

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- Author, शुमाइला जाफरी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद
अफ़ग़ानिस्तान के अंदर पाकिस्तानी हवाई हमले के बाद से दोनों देशों के रिश्ते एक बार फिर तल्ख हो गए हैं.
इस साल ईरान के बाद अफ़ग़ानिस्तान दूसरा इस्लामिक पड़ोसी है, जिसके साथ पाकिस्तान की इस तरह की सैन्य तनातनी हुई है.
आइए जानते हैं कि हाल में तनाव कैसे भड़का और पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान संबंधों और इलाक़े की राजनीति पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है.
सैनिकों की मौत का बदला लिया जाएगा

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चकलाला गैरीसन रावलपिंडी में उस समय माहौल गमगीन था, जब पाकिस्तानी झंडे में लिपटे लेफ्टिनेंट कर्नल सैयद काशिफ़ अली और कैप्टन मुहम्मद अहमद बदर के ताबूतों को पूरे सैन्य सम्मान के साथ एम्बुलेंस से उतारा गया.
उत्तरी वजीरिस्तान के मीर अली इलाक़े में एक सैन्य चौकी पर 16 मार्च को हुए हमले में अपनी जान गँवाने वाले अधिकारियों की अंतिम विदाई देने के लिए पाकिस्तान के शीर्ष सैन्य अधिकारी और राजनीतिक नेतृत्व सबसे आगे खड़ा था.
सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी ने प्रार्थना सभा के बाद दूसरे सैनिकों के साथ ताबूतों को कंधा दिया. इसके बाद दोनों ने मृतकों के परिवारों से कहा कि उनके बेटों के ख़ून का बदला लिया जाएगा.
इसके कुछ घंटों बाद ही अफ़ग़ानिस्तान से ख़बर आई कि पाकिस्तान ने सीमा पार कई ठिकानों पर हमला किया है. इसकी जानकारी अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक बयान जारी कर दी.
मुजाहिद ने लिखा कि पाकिस्तानी विमानों ने उनके पक्तिका और खोस्त प्रांतों पर बमबारी की. इन हमलों में पांच महिलाओं और तीन बच्चों समेत आठ लोग मारे गए.
मुजाहिद ने इस हमले की निंदा करते हुए कहा कि यह अफ़ग़ानिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप था. उन्होंने कहा कि इसके परिणाम ऐसे हो सकते हैं, जिन्हें पाकिस्तान नियंत्रित नहीं कर पाएगा.
इस बयान के बाद अफ़ग़ान सीमा की तरफ़ से गोलीबारी की गई. इसमें भारी हथियारों का इस्तेमाल हुआ. अफ़ग़ान तालिबान के रक्षा मंत्री ने दावा किया कि उन्होंने हवाई हमलों के जवाब में सीमा पर पाकिस्तानी सैनिकों को निशाना बनाया.
अफ़ग़ानिस्तान की गोलीबारी से हुए नुकसान पर पाकिस्तान ने कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है. हालांकि, कुर्रम के सीमावर्ती इलाक़े में कई लोगों के घायल होने की ख़बर है.
पाकिस्तान ने यह भी पुष्टि की कि उसने अफ़ग़ानिस्तान के अंदर सीमावर्ती इलाक़ों में ख़ुफ़िया जानकारी के आधार पर चरमपंथ विरोधी अभियान चलाया.
पाकिस्तान के विदेश कार्यालय की ओर से जारी एक बयान में इस अभियान का कोई विवरण नहीं दिया गया है, लेकिन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) पर अपनी चिंताओं पर अफ़ग़ानिस्तान की ओर से से कार्रवाई की कमी पर देश की निराशा की बात की गई है.
बयान में कहा गया, "आज के ऑपरेशन का निशाना हाफ़िज़ गुल बहादुर समूह के चरमपंथी थे, जो टीटीपी से मिलकर पाकिस्तान के अंदर कई आतंकवादी हमलों के ज़िम्मेदार हैं. पाकिस्तान का कहना है कि इन हमलों में सैकड़ों नागरिकों और क़ानून प्रवर्तन अधिकारियों की जान गई.''
हाफ़िज़ गुल बहादुर समूह ने ही 16 मार्च को सेना की चौकी पर हुए हमले की ज़िम्मेदारी ली थी. पाकिस्तान के सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि गुल बहादुर समूह के लड़ाके अफ़ग़ानिस्तान के हैं, उनमें से ज़्यादातर खोस्त प्रांत के हैं.
पाकिस्तानी सेना ने भी उसी दिन उत्तरी वज़रिस्तान ज़िले में अपने इलाक़े में ख़ुफ़िया सूचनाओं पर आधारित एक अभियान चलाया. इस हमले में एक कमांडर समेत आठ चरमपंथियों की जान गई थी. सेना का दावा है कि मारे गए चरमपंथी मीर अली हमले में शामिल थे.
पाकिस्तान के ख़िलाफ़ हमला

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टीटीपी अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में तालिबान के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के बीच संबंधों में मुख्य अड़चन रही है. पाकिस्तान का दावा है कि अफ़ग़ानिस्तान ने टीटीपी को पनाह दी है.
पाकिस्तान इसे अपनी सुरक्षा के लिए गंभीर ख़तरा बताता है. पाकिस्तान अपने यहाँ सैकड़ों हमलों के लिए टीटीपी को ज़िम्मेदार बताता है.
रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ़ ने 16 मार्च के हमले पर प्रतिक्रिया देते हुए आरोपों को दोहराया. उन्होंने अपने गृहनगर सियालकोट में मीडिया से कहा, "हमारे (पाकिस्तान) ख़िलाफ़ दहशतगर्द ज़्यादातर अफ़ग़ानिस्तान से संचालित होता है."
अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान के विशेष प्रतिनिधि राजदूत आसिफ़ दुर्रानी ने भी कहा कि पाकिस्तान के लिए टीटीपी ख़तरे की रेखा है. उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान के पास इस बात के सबूत हैं कि प्रतिबंधित टीटीपी को अफ़ग़ानिस्तान प्रतिनिधियों के ज़रिए भारत से पैसा मिल रहा है.
ऐसा अनुमान है कि 5,000 से 6,000 टीटीपी आतंकवादियों ने अफ़ग़ानिस्तान में शरण ले रखी है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने अंतरिम अफ़ग़ानिस्तान सरकार से बार-बार कहा है कि उन्हें टीटीपी के हथियार लेने और उनका आत्मसमर्पण करवाने की ज़रूरत है.
इन सभी दलीलों का कोई फ़ायदा नहीं हुआ. तालिबान की ओर से 2021 में अफ़ग़ानिस्तान पर फिर से कब्जा करने के बाद इन दोनों पड़ोसियों के बीच तनाव बढ़ रहा है.
पिछले साल ही पाकिस्तान ने अपने यहाँ अवैध रूप से रह रहे हज़ारों अफ़ग़ानों को इस उम्मीद में बाहर निकाल दिया था कि इससे चरमपंथ की समस्या से निपटने में मदद मिलेगी. इसके बाद भी हमलों में कोई कमी नहीं आ रही है.
पिछले साल पाकिस्तान भर में लगभग 650 हमले हुए. इन हमलों में क़रीब 1,000 लोग मारे गए. इनमें से अधिकांश सुरक्षाकर्मी थे. इनमें से अधिकतर हमलों में अफ़ग़ानिस्तान की सीमा से लगे ख़ैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान प्रांतों को निशाना बनाया गया.
कई सशस्त्र समूह पाकिस्तान में आतंकवाद में शामिल रहे हैं. पाकिस्तान का मुख्य हमलावर टीटीपी रहा है, जो वैचारिक रूप से अफ़ग़ान तालिबान से जुड़ा है.
वहीं दूसरी ओर अफगानिस्तान पाकिस्तान के इन आरोपों से इनकार करता है. उसका दावा है कि पाकिस्तान अपनी कमज़ोरियों और समस्याओं के लिए उसे दोषी ठहराने की कोशिश कर रहा है.
अफ़ग़ानिस्तान तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया दी.
उन्होंने कहा, ''हम अफ़ग़ानिस्तान में किसी भी विदेशी समूह की उपस्थिति को नकराते हैं. उन्हें अफ़ग़ानिस्तान धरती पर काम करने की इजाज़त नहीं है. इस संबंध में हमने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है और आगे भी करते रहेंगे. लेकिन एक बात हमें स्वीकार करनी होगी कि अफ़ग़ानिस्तान पाकिस्तान से बहुत लंबा सीमा साझा करता है. पहाड़ों और जंगलों सहित ऊबड़-खाबड़ इलाकों और ऐसे स्थान हैं, जो हमारे नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं.''
अफ़ग़ान तालिबान का विरोधाभास

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पत्रकार अजाज सैयद ने एक दिन पहले संभावित हमलों की ओर इशारा किया था. उनका का कहना है कि अफ़ग़ान तालिबान की सरकार ने 2022 में सुलह प्रक्रिया चलाकर पाकिस्तान और टीटीपी के बीच तनाव कम करने की कोशिश की है, लेकिन कई कारणों से यह विफल हो गया.
अब पाकिस्तान ने साफ़ कर दिया है कि वह एक लाइन खींचना चाहता है और किसी भी आतंकवादी समूह से बातचीत नहीं करेगा.
अंतरराष्ट्रीय मान्यता की कमी और कड़े आर्थिक पाबंदियों के तहत अफ़ग़ान तालिबान की सरकार चाहती है कि पाकिस्तान उसके पक्ष में रहे. लेकिन इसके साथ ही उनके मन में अपने वैचारिक और सगे भाइयों, टीटीपी के प्रति नरम रुख़ भी है. इसने अफगानिस्तान में तालिबान शासन को मुश्किल में डाल दिया है. अजाज का दावा है कि इस मुद्दे पर अफ़ग़ान तालिबान में मतभेद है.
अजाज कहते हैं, ''इस समय अफ़ग़ान तालिबान में दो माइंडसेट हैं, इसमें प्रमुख सोच टीटीपी के पक्ष में है. जो लोग इस मानसिकता का समर्थन करते हैं वे टीटीपी से दूर होने के ख़िलाफ़ हैं. उनका मानना है कि टीटीपी उसी तरह का जिहाद/युद्ध लड़ रहा है, जैसा पहले अफ़ग़ान तालिबान ने अमेरिका के ख़िलाफ़ किया था. वहीं जो लोग दूसरी मानसिकता के समर्थक हैं, वे टीटीपी को नियंत्रित करना चाहते हैं, लेकिन इस समय ये लोग अल्पमत में हैं.''
अपने ब्लॉग में, अजाज ने यह भी दावा किया कि अफ़ग़ान तालिबान और पाकिस्तान के बीच एक अलिखित समझौता था. इसके परिणामस्वरूप चुनाव के दौरान हमले कम हुए. हालांकि, 16 मार्च का हमला एक और युद्ध की घोषणा थी.
वो कहते हैं, ''एक नई सरकार ने हाल ही में देश की बागडोर संभाली है. उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना है. इसलिए पाकिस्तान को निवेश आकर्षित करने और अपनी आर्थिक सुधार पर ध्यान केंद्रित करने के लिए क़ानून-व्यवस्था बनाए रखनी चाहिए. ऐसे में संदेश यह है कि स्थिरता को नुक़सान पहुँचाने के किसी भी प्रयास से कूटनीतिक और सेना से निपटा जाएगा.''
इस तनातनी का परिणाम क्या होगा

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सलमान जावेद पाक-अफ़ग़ान संबंधों के विशेषज्ञ हैं. वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि तनाव में आई वृद्धि को 16 मार्च की एक अकेली घटना से नहीं जोड़ा जा सकता है; बल्कि ये हमले उन हमलों की एक श्रृंखला का परिणाम थे जो अफ़ग़ानिस्तान में अफ़ग़ान तालिबान की सरकार बनाने के बाद से सीमा पार से किए गए हैं.
टीटीपी की ओर से किए गए कुछ बड़े हमलों को सूचीबद्ध करते हुए सलमान जावेद ने कहा कि पाकिस्तान ने आतंकवादी समूह के साथ सुलह करने की कोशिश की.
''पूर्व आईएसआई प्रमुख जनरल फैज़ हमीद काबुल गए ताकि वह टीटीपी के साथ बातचीत कर सकें, कई राजनीतिक और आधिकारिक प्रतिनिधिमंडलों ने दौरा किया. वहाँ बंद दरवाज़े की कूटनीति हुई, मौलवियों का एक समूह टीटीपी से निपटने का रास्ता खोजने के लिए अफ़ग़ानिस्तान गया लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ.''
वो कहते हैं, ''जब सभी राजनीतिक विकल्प समाप्त हो गए, तो पिछले साल पाकिस्तान की नीति में बदलाव आना शुरू हुआ. डेरा इस्माइल ख़ान में एक हमला हुआ था. इसमें अफ़ग़ान नागरिक शामिल थे. इसके बाद पेशावर पुलिस लाइन मस्जिद को अफ़ग़ान नागरिकों ने निशाना बनाया था, यह सूची लंबी है. इसीलिए पाकिस्तान ने हमलों का विकल्प चुना.''
जावेद का मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान के अंदर आतंकियों को खदेड़ने की नीति के अच्छे-बुरे परिणाम निकलेंगे.
वो कहते हैं, ''सैन्य रूप से, एक झटका होगा. अफ़ग़ानिस्तान के पास वायु सेना नहीं है और पाकिस्तान की मारक क्षमता बहुत बेहतर है, लेकिन उनके पास आत्मघाती हमलावर और टीटीपी जैसे प्रॉक्सी हैं, जिनका उपयोग वे पाकिस्तान के ख़िलाफ़ घातक हमले करने में कर सकते हैं. इसलिए, भविष्य में हमलों में तेज़ी आ सकती है.''
जावेद कहते हैं, ''दूसरी बात यह कि सार्वजनिक नैरेटिव में एक-दूसरे के प्रति दुश्मनी दोनों देशों में बढ़ेगी. इससे लोगों के आपसी रिश्ते ख़राब होंगे, लेकिन दूसरी तरफ़, पाकिस्तान ने एक मिसाल कायम की है कि वह किसी भी आक्रामकता को बर्दाश्त नहीं करेगा और भविष्य में चुनौती मिलने पर वह किसी भी सीमा को पार करने के लिए तैयार है.''
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