तोरखम में आमने-सामने पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान, गहरी हो रही अविश्वास की दरार

तोरखाम क्रॉसिंग पर खड़े ट्रक

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    • Author, शुमाइला जाफ़री
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज इस्लामाबाद

अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तोरखम सीमा को बंद हुए करीब एक हफ्ता हो गया है.

दोनों देशों के सुरक्षाकर्मियों के बीच छह सितंबर को गोलीबारी हुई थी. इसके बाद से व्यापार बंद है और सैकड़ों ट्रक और यात्री फंस गए थे.

ऐतिहासिक ग्रैंड ट्रंक रोड के साथ, तोरखम व्यापार के प्रमुख रास्तों में से एक है. यह अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान संचालित शासन की अर्थव्यवस्था के लिए एक लाइफ लाइन की तरह है. तालिबान अभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता पाने की कोशिश कर रहा है.

हर दिन ताजे फल और सब्जियां और अन्य वस्तुओं से लदे सैकड़ों ट्रक दूसरी तरफ से पाकिस्तान में प्रवेश करते हैं. इसी तरह दवाओं, रासायनिक खाद, चीनी और अन्य जरूरी सामान से लदे ट्रक इस ट्रांजिट प्वाइंट से अफगानिस्तान की ओर जाते हैं.

पाकिस्तानी सैनिक

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यह पहली बार नहीं है जब बॉर्डर बंद किया गया है. इससे पहले फरवरी में भी कई दिनों तक सीमा पर व्यापार रुका रहा था.

आइए देखते हैं कि यह ताजा विवाद कैसे शुरू हुआ. पाकिस्तान का दावा है कि बॉर्डर के पास अफगान तालिबान कुछ गैरकानूनी चीजों का निर्माण करा रहे हैं. पाकिस्तान इसे क्षेत्रीय संप्रभुता का उल्लंघन बता रहा है.

वहीं अफगान तालिबान इस तरह के किसी निर्माण से इनकार कर रहा है. उसका कहना है कि वह तोरखम क्रासिंग पर पहले से मौजूद पोस्ट की मरम्मत करवा रहे हैं.

क्या कहना है पाकिस्तान का?

तोरखम सीमा के खुलने का इंतजार करते अफगान नागिरक.

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इमेज कैप्शन, तोरखम सीमा के खुलने का इंतजार करते अफगान नागिरक.

पाकिस्तान की ओर से कहा गया है कि अफगान की तरफ से बिना किसी कारण के अंधाधुंध गोलीबारी की गई.

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इससे तोरखम टर्मिनल पर बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा. उसका कहना है कि इस गोलीबारी से पाकिस्तानी-अफगान दोनों तरफ के नागरिकों की जान खतरे में पड़ गई. वहीं अफगानिस्तान का आरोप है कि जब वे एक पुराने पोस्ट की मरम्मत करवा रहे थे तो पाकिस्तान ने उसके सैनिकों पर गोलीबारी की.

बंद सीमा को दोबारा खोलने के लिए अफगानिस्तान और पाकिस्तान के अधिकारी कई दौर की बैठकें कर चुके हैं. लेकिन इनमें कोई नतीजा नहीं निकला है.

जिस दिन तोरखम क्रासिंग पर यह घटना हुई, उसी दिन चित्राल में अंतरराष्टीय सीमा पर पाकिस्तान पर हमला किया गया. इस सीमा को परंपरागत रूप से अपेक्षाकृत शांत माना जाता है.

पाकिस्तानी सेना का कहना है कि आधुनिक हथियारों से लैस आतंकवादियों के एक बड़े समूह ने चित्राल के कलाश में सीमा के पास स्थित उसकी दो चौकियों पर हमला किया.

उनका यह भी दावा है कि चित्राल से सटे नूरिस्तान और कुनार प्रांतों में आतंकवादियों की आवाजाही और जमावड़े को पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने पहले ही पकड़ लिया था.

इस जानकारी को अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार के साथ समय रहते साझा किया गया था. लेकिन वो कोई कार्रवाई करने में विफल रही.

भारी गोलीबारी के बाद इस हमले को विफल कर दिया गया था. इस कार्रवाई में 12 आतंकवादी मारे गए. पाकिस्तान सेना का कहना है कि इसमें उसके चार सैनिकों की भी जान गई.

क्या कहते हैं सुरक्षा विश्लेषक

बंद पड़ी पाकिस्तान-अफगानिस्तान की तोरखम सीमा.

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कई विशेषज्ञों का मानना ​​है कि पाकिस्तान का धैर्य कम हो रहा है.

मुश्ताक यूसुफजई ऐसा मानने वालों में से एक है. उनका मानना ​​है कि हाल में हुई झड़पों ने एक बार फिर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बिगड़ते रिश्तों को रेखांकित किया है.

अफगान तालिबान को काफी लंबे समय से पाकिस्तान का सहयोगी माना जाता है. लेकिन वे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के कथित समर्थन को लेकर उससे अलग हो गए हैं.

पाकिस्तान ऐतिहासिक रूप से गठबंधन सेनाओं के खिलाफ अफगान तालिबान के प्रतिरोध का समर्थन करता रहा है.

वहीं वह टीटीपी, जो पाकिस्तानी तालिबान का एक गुट है, उसे अपना नंबर एक का दुश्मन मानता है. इस वजह से उसके पश्चिमी सहयोगी देश उस पर डबल गेम खेल खेलने का आरोप लगाते रहे हैं.

टीटीपी उन सैकड़ों हमलों के लिए जिम्मेदार है जिनमें हजारों पाकिस्तानी नागरिक और सैनिक मारे गए हैं.

मुश्ताक यूसुफजई का मानना ​​है कि अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार की विफलता यह है कि वह टीटीपी से निपटने में नाकाम रही.

टीटीपी के लड़ाके अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार में स्वच्छंदता से रह और फल-फूल रहे हैं. वो अफगानिस्तान की धरती से पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में हमलों को अंजाम दे रहे हैं. इससे पाकिस्तानी अधिकारी सबसे ज्यादा परेशान हैं.

यूसुफ़ज़ई कहते हैं, "तोरखम सीमा के बंद होने और चित्राल में हमले को अलग-अलग करके कोई भी नहीं देख सकता है, ये दोनों घटनाएं जुड़ी हुई हैं. इसी तरह उनका विश्लेषण किया जाना चाहिए."

वो कहते हैं, ''पाकिस्तान की हताशा तालिबान सरकार की प्रतिक्रिया से पैदा होती है. वे सहयोग नहीं कर रहे हैं. उनके इरादे अच्छे हो सकते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि काबुल पर कब्जे के बाद से टीटीपी मजबूत हुई है. इससे रिश्तों पर असर पड़ रहा है.''

अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में कितना है अविश्वास

तोरखम सीमा पर लगी ट्रकों की लाइन.

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विश्लेषकों का मानना ​​है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच काफी अविश्वास है.

यह समय के साथ बढ़ता ही जा रहा है. अफगान तालिबान का मानना ​​है कि पाकिस्तान अभी भी अमेरिकी की मदद कर रहा है.

वह अपनी सीमा में लक्षित कार्रवाइयों में अमेरिका की मदद कर रहा है.

हालांकि राजनयिक रूप से वे अलग-थलग हैं और राजनीतिक और आर्थिक रूप से अपने अस्तित्व के लिए पाकिस्तान पर बहुत हद तक निर्भर हैं, इसलिए वे एक तय सीमा से आगे सीधे तौर पर आगे नहीं बढ़ सकते हैं.

मुश्ताक यूसुफजई कहते हैं कि जहां तक ​​टीटीपी का सवाल है, अफगान तालिबान भी पाकिस्तान की लाइन पर चलने को तैयार नहीं हैं.

इसमें कई जटिल चीजें हैं. हालांकि सेना ने लड़ाकों का विवरण सार्वजनिक नहीं किया है, मुश्ताक यूसुफजई का दावा है कि चित्राल में पाकिस्तानी सुरक्षा चौकियों पर हुए हमले के हमलावरों में अफगान तालिबान लड़ाकों के शामिल होने का सबूत सेना के पास हैं.

वरिष्ठ पत्रकार सिराजुद्दीन मुश्ताक यूसुफजई की इस बात से सहमत हैं.

उनका मानना ​​है कि तोरखम सीमा बंद होने से पाकिस्तान से ज्यादा अफगानिस्तान को नुकसान हो रहा है.

वो कहते हैं कि तोरखम में झड़प के बाद सीमा बंद कर दी गई थी. देर-सबेर वह फिर खुल जाएगी, लेकिन यह पाकिस्तान के लिए अपनी ताकत बढ़ाने का एक तरीका है.

यह दूसरे पक्ष को यह चेताने के लिए है कि उन्हें एकजुट होकर काम करने की जरूरत है. उन्हें अपनी जमीन से आतंकवाद को रोकना होगा. ऐसा नहीं होने पर पाकिस्तान उनके खिलाफ इसका कुछ फायदा उठा सकता है.

पाकिस्तान के कार्यवाहक प्रधानमंत्री का दावा

तोरखम सीमा पर अफगानिस्तान की तरफ तैनात तालिबान के हथियार बंद लड़ाके.

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इमेज कैप्शन, तोरखम सीमा पर अफगानिस्तान की तरफ तैनात तालिबान के हथियार बंद लड़ाके.

पाकिस्तान के कार्यवाहक प्रधानमंत्री अनवर उल हक काकड़ ने हाल में दिए एक इंटरव्यू में बताया था कि कैसे अमेरिका की अफगानिस्तान से वापसी के बाद उसके छोड़े गए अत्याधुनिक हथियार टीटीपी के हाथ लग गए हैं. अब वो इसका इस्तेमाल पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के खिलाफ कर रहे हैं.

सुरक्षा विश्लेषक मुहम्मद अमीर राणा का मानना है कि अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकवादियों की घुसपैठ ने चित्राल हमलों में अफगान तालिबान की सीधी भागीदारी को लेकर चिंता बढ़ा दी है. उनका मानना ​​है कि कोई भी आतंकवादी संगठन तालिबान शासन के समर्थन और इजाजत के बिना पाकिस्तान के अंदर इतना बड़ा हमला नहीं कर सकता है. अमीर का मानना है कि अगर इन संदेहों में जरा भी दम है तो यह एक देश के खिलाफ युद्ध की घोषणा के समान है.

अमीर का मानना ​​है कि अफगान तालिबान और पाकिस्तानी आतंकवादी समूहों के बीच संगठनात्मक संबंध समय के साथ-साथ विकसित और मजबूत हुए हैं. अब ये सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहा है.

अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ अपनी जमीन के इस्तेमाल से इनकार किया है. लेकिन सुरक्षा विश्लेषकों में इस बात को लेकर आम सहमति है कि वे इसमें शामिल हैं.

इस शत्रुतापूर्ण माहौल में सीमा बंद होने से तोरखम में हजारों व्यापारी, यात्री और मरीज परेशान हो रहे हैं. अभी दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं, लेकिन उन्हें समाधान निकलने की उम्मीद है. तोरखम सीमा जल्द खुल सकती है, लेकिन बिगड़ते रिश्ते और बढ़ता अविश्वास ही बड़ा सवाल है. यह आगे भी दोनों देशों को परेशान करता रहेगा.

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