पाकिस्तान में 93 रुपए की चीनी अफ़ग़ानिस्तान में 193 रुपए किलो कैसे स्मगल हो रही?

- Author, सहर बलोच
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद
अपनी एक स्टोरी के लिए पंज पाई से क्वेटा वापस लौटते समय मुझे एक चेक पोस्ट पर कस्टम का एक पिकअप ट्रक नज़र आया. एक अधिकारी बड़ी-बड़ी सफ़ेद बोरियां पिकअप के अंदर रख रहा था.
उन अधिकारी ने बताया कि इन बोरियों में चीनी है, जो पंजाब के रास्ते अफ़ग़ानिस्तान ले जाई जा रही थी और उसे पकड़ने के बाद अब उन बोरियों को वापस क्वेटा हेडक्वार्टर ले जाया जा रहा है.
वहां के अधिकारी भी पुष्टि करते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तानी चीनी की तस्करी की जा रही है.
कस्टम के एक अधिकारी ने हाल में क्वेटा से चाग़ी पहुंचने वाली एक ट्रेन से लगभग 112 टन चीनी, परमिट न होने की वजह से ज़ब्त करवा कर वापस क्वेटा भेज दिया थी.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने दावा किया कि उनके अनुमान के मुताबिक़, "क्वेटा से लगभग हर दूसरे दिन 100 टन चीनी और हर हफ़्ते लगभग 700 टन चीनी ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से अफ़ग़ानिस्तान पहुंचाई जा रही है."
अफ़ग़ानिस्तान के चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के अनुसार भी ऐसे तस्करी के रास्ते हैं, जिनके ज़रिए चीनी और खाने-पीने के दूसरे सामान पाकिस्तान से अफ़ग़ानिस्तान पहुंचाए जाते हैं. उस सामान पर कस्टम ड्यूटी नहीं दी जाती और दोनों देशों के बीच बनी चेक पोस्टों से होती हुई इनकी बसें और ट्रक अफ़ग़ानिस्तान के आठ अलग राज्यों में पहुंच जाते हैं.

यह चीनी अफ़ग़ानिस्तान कैसे पहुंचती है?
इस समय चाग़ी ज़िला बलूचिस्तान का एक ख़ास पॉइंट है, जहां से चीनी अफ़ग़ानिस्तान स्मगल की जाती है, लेकिन यह बलूचिस्तान राज्य का अकेला ऐसा केंद्र नहीं है.
इसके अलावा बलूचिस्तान के अफ़ग़ानिस्तान से सटे दूसरे क्षेत्रों जैसे चमन, क़िला सैफ़ुल्लाह, क़िला अब्दुल्लाह, पशीन और ज़ौब के इलाक़े भी स्मगलिंग रूट में शामिल हैं. तस्करी के रास्तों की खोज लगाने पर पता चला कि पाकिस्तान से चीनी जाने का क़ानूनी और कुछ हद तक ग़ैर-क़ानूनी रास्ता एक ही है.
एक सरकारी प्रवक्ता ने बताया, "रास्ता एक ही इस्तेमाल होता है, लेकिन जहां स्थानीय व्यापारियों की बड़ी गाड़ियों को परमिट देख कर छोड़ दिया जाता है, वहीं ग़ैर-क़ानूनी तौर पर जाने वाले ट्रक का परमिट ही नहीं देखा जाता."
यह परमिट पाकिस्तान की सरकार की ओर से स्थानीय व्यापारियों और उनकी कंपनियों को जारी किया जाता है. इसमें कंपनी के मालिक के पहचान पत्र की जांच करने और कारोबार देखने के बाद उनके नाम पर परमिट जारी किया जाता है. इस परमिट के तहत ट्रक मालिक के मातहत माल ले जाने वाले ट्रक और उन्हें चलाने वाले ड्राइवरों की पहचान भी की जाती है.
अब चाग़ी से कुछ महीनों में होने वाली स्मगलिंग के कारण हाल में डिप्टी कमिश्नर,चाग़ी हुसैन जान बलोच ने चीनी के परमिट जारी करने पर पाबंदी लगा दी है. सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार, यह पाबंदी तब तक जारी रहेगी, जब तक सभी चीनी सप्लाई करने वालों का रजिस्ट्रेशन नहीं हो जाता. लेकिन व्यापारियों के अनुसार सीमा से सटे दूसरे क्षेत्रों में ऐसी पाबंदी नहीं लगाई गई हैं.
पंज पाई का क्षेत्र एक अरसे तक अफ़ग़ानिस्तान से व्यापार के लिए इस्तेमाल होता था, लेकिन अब इस रास्ते को सरकारी स्तर पर बंद कर दिया गया है. अब यहां से ग़ैर-क़ानूनी ढंग से चीनी ले जाई जाती है.
व्यापारियों और सरकार का कहना है कि सबसे पहले पंजाब और सिंध के रास्ते चीनी को क्वेटा पहुंचाया जाता है और क्वेटा से अफ़ग़ानिस्तान पहुंचा दिया जाता है.
इस धंधे में शामिल लोगों के अनुसार, इसका तरीक़ा कुछ ऐसा है कि पहले चीनी को चाग़ी तक बस, गाड़ी, ट्रक या फिर ट्रेन से पहुंचाया जाता है और फिर वहां से डख के रास्ते रेगिस्तानी इलाक़े से अफ़ग़ानिस्तान तक पहुंचा दिया जाता है.
चाग़ी पहुंचने वाली ट्रेन अधिकतर ईरान के शहर ज़ाहिदान की ओर जाती है, लेकिन इससे पहले ही नवकंडी रेलवे स्टेशन पर उससे चीनी और दूसरे सामान निकाल कर उसे छोटी गाड़ियों और ट्रकों से अफ़ग़ानिस्तान भेज दिया जाता है.
यही तरीक़ा सीमा से सटे दूसरे क्षेत्रों के लिए भी इस्तेमाल होता है, जहां रेगिस्तानी इलाक़ों से होते हुए चीनी को छोटी गाड़ियों में स्मगल किया जाता है, जबकि शहरों से मुसाफ़िर बसों के ज़रिए यह चीनी सीमा तक पहुंचाई जाती है.
इसका अंदाज़ा तब हुआ जब मानव तस्करी पर एक रिपोर्ट बनाने के दौरान क्वेटा के मूसा कॉलोनी बस अड्डे जाने की ज़रूरत पड़ी.
इस बस अड्डे पर एक ओर तो लोगों की भीड़ है, जबकि उसी अड्डे पर पीछे की तरफ़ कुछ बसें बाहर से ख़ाली खड़ी नज़र आती हैं. यहां पर 42 लोगों की यात्री बस की सीटों पर केवल चीनी की बोरियां लादी जा रही थीं.
हमें वहां देखने पर बस ड्राइवर ने तस्वीरें लेने से रोक दिया और अपनी बस उस जगह से हटा ली. लेकिन पूछने पर यह ज़रूर बता दिया कि यह चीनी पंजाब और घोटकी से क्वेटा आती है और यूरिया, दवाओं और दूसरे सामानों के साथ अफ़ग़ानिस्तान भेजी जाती हैं.

चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के प्रवक्ता का कहना है कि ऐसी कई और बसों के बारे में अधिकारियों को पता है, लेकिन वह सीमा पर क़ानूनी तौर से जाने वाले स्थानीय व्यापारियों को रोकते हैं.
क्वेटा चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के उपाध्यक्ष आग़ा गुल ख़िलजी ने इस बात की पुष्टि भी की कि चीनी ले जाने को कुछ लोग ग़ैर-क़ानूनी कारोबार का ज़रिया बनाकर सीमा पार भेज रहे हैं, जबकि इससे स्थानीय व्यापार करने वालों को घाटा उठाना पड़ रहा है.
उन्होंने कहा कि अधिकारियों को आशंका है, तो अफ़ग़ानिस्तान से अपनी सीमा पर सख़्ती करें.
वो कहते हैं, "खाने-पीने का जो सामान भारत या फिर अफ़ग़ानिस्तान से आता-जाता है, उसे रोका नहीं जा सकता. यह कोई इंपोर्ट-एक्सपोर्ट की समस्या नहीं है. यह सामान स्थानीय लोगों के लिए होता है."
चीनी अफ़ग़ानिस्तान क्यों स्मगल की जा रही है?
अगस्त 2021 में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का क़ब्ज़ा होने के बाद वहां कई चीज़ों की क़िल्लत की खबरें आने लगीं. उनमें से एक क़िल्लत चीनी की थी, जो दो साल बाद भी ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही है.
इस कमी को अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के साथ होने वाले समझौते के ज़रिए पूरा किया गया. वहीं स्मगलरों ने इसका एक हल ग़ैर-क़ानूनी रास्तों से चीनी पहुंचा कर निकाला.
इस तस्करी की एक और ख़ास वजह व्यापारी अफ़गानी करंसी को बताते हैं, जो इस समय पाकिस्तान के रुपए से कई गुना बेहतर मुनाफ़ा देती है.
पाकिस्तानी तस्करों को चीनी बेचने का दोगुना फ़ायदा होता है, क्योंकि पाकिस्तान में चीनी का सरकारी मूल्य 93 रुपये प्रति किलो है, वहीं अफ़ग़ानिस्तान में चीनी 193 रुपये प्रति किलो बेची जाती है.
व्यापारियों के अनुसार सीधे और क़ानूनी रास्तों से चीनी भेजने में मुनाफ़ा का मार्जिन कम हो जाता है. क्वेटा में रहने वाले व्यापारी हाजी अज़ीम ने बताया कि इसमें टैक्स देना पड़ता है, गाड़ियों का किराया और ड्राइवरों को तनख़्वाह भी देनी पड़ती है.
उन्होंने कहा कि "ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से तस्करों को टैक्स की चिंता नहीं होती है, न इंसान की जान की. उन्हीं ख़तरनाक रास्तों से दिन-रात गाड़ी और ट्रक भगाकर यह सरकारी तौर पर भेजे जाने वाले सामान से दोगुना सामान अफ़ग़ानिस्तान पहुंचा देते हैं और कई जगहों पर तस्करी की चीनी की क़ीमत अफ़ग़ान व्यापारी डॉलर में भी अदा करते हैं. ऐसे में कोई सही रास्ता क्यों अपनाएगा?"

क्या सरकार इस तस्करी को पूरी तरह रोक सकती है?
अधिकारियों का कहना है कि इस समय ग़ैर-क़ानूनी तौर पर भेजी जाने वाली चीनी की रोकथाम बहुत मुश्किल से की जा सकती है, लेकिन इसके बावजूद एक मार्च को कस्टम अधिकारी चाग़ी के नवकंडी रेलवे स्टेशन पर 112 टन चीनी रोकने में कामयाब हो गए.
डिप्टी कमिश्नर चाग़ी हुसैन जान बलोच ने बताया, "कोशिशों में एक बड़ी रुकावट संसाधनों की कमी है. इसके बावजूद जहां जहां से ख़बर मिलती है, वहां कार्रवाई की जाती है."
दूसरा तरीक़ा परमिट जारी करने और उसकी जांच में सख़्ती बरतना है.
हाल में इसका एक उदाहरण बलूचिस्तान के ज़िला वाशुक में देखने को मिला, जहां डिप्टी कमिश्नर को तब नौकरी से हटा दिया गया, जब लगभग 400 ट्रकों को बिना परमिट जाने की इजाज़त देने की ख़बर स्थानीय लोगों और व्यापारियों ने बड़े अधिकारियों को दे दी.
अधिकारियों का यह भी कहना है कि चमन सीमा से अफ़ग़ानिस्तान पैदल जाने वाले अगर चीनी साथ ले जाएं, तो उन्हें रोका नहीं जा सकता.
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