अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान शासन के एक साल: 'औरतों' से कहा जा रहा है कि वो अपनी नौकरी मर्दों को दे दें

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- Author, लीस डूसेट
- पदनाम, मुख्य अंतरराष्ट्रीय संवाददाता, काबुल
पासपोर्ट पर मुहर लगाती महिलाएं. काले रंग के बुर्के और भूरे रंग की स्कार्फ़ पहनी हुईं. काबुल इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर जब आप पहुंचते हैं तो आपका ध्यान सबसे पहले इन्हीं पर जाता है.
साल भर पहले इस एयरपोर्ट पर कुछ और ही मंज़र था. मुल्क छोड़ने के लिए बेताब लोगों का सैलाब, चारों ओर अफ़रा-तफ़री का आलम. तब यही दिख रहा था यहां.
लेकिन अब यहां पिछले बरस की तुलना में ख़ामोशी है, साफ़-सफ़ाई है. काबुल की गर्मियों की मंद बयार में तालिबान के सफ़ेद रंग के झंडे एक कतार में लहरा रहे हैं.
पुराने मशहूर चेहरों के बिल बोर्ड्स पर अब रंग पोत दी गई है.
एयरपोर्ट कैंपस के दरवाज़े के उस पार एक मुल्क है जो तालिबान के सत्ता में आने के बाद पूरी तरह से बदल गया है.

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काबुल, जहां औरतों से कहा जा रहा है कि वो अपनी नौकरी मर्दों को दे दें
ऐसे संदेश सुनने में चौंका देने वाले लगते हैं, लेकिन उसके नतीज़े कहीं अधिक गहरे हैं. एक महिला एक मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्म पर लिखती है, "वे चाहते हैं कि मैं अपनी नौकरी अपने भाई को दे दूं."
एक दूसरी महिला कहती है, "हमने अपनी तालीम और तज़ुर्बे से ये मुकाम हासिल किया है... अगर हम ये कबूल कर लें तो इसका मतलब होगा कि हम ख़ुद के साथ फ़रेब कर रहे हैं."
मैं अफ़ग़ानिस्तान के वित्त मंत्रालय के कुछ पुराने और सीनियर नौकरशाहों के साथ बैठी हूं. वो भी अपनी भावनाओं का इज़हार करती हैं.
वे सब 60 से ज़्यादा महिलाओं के एक समूह का हिस्सा हैं. उनमें से कई महिलाएं अफ़ग़ानिस्तान के राजस्व निदेशालय से जुड़ी रही हैं. पिछले बरस अगस्त में उन्हें ड्यूटी से घर जाने का हुक़्म दे दिया गया था जिसके बाद वे इस समूह का हिस्सा बनीं.
उनका कहना है कि तालिबान के अधिकारियों ने उन्हें तब ये कहा था, "आप लोग अपने पुरुष रिश्तेदारों की सीवी भेज दें जो आपकी नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं."
'हम अपनी पहचान खो रहे हैं'
एक महिला ज़ोर देकर कहती हैं, "ये मेरी नौकरी है." वो भी इस ग्रुप की दूसरी महिलाओं की तरह ही अपनी पहचान छुपाए रखने का आग्रह करती हैं.
"इस नौकरी को हासिल करने के लिए मैंने 17 साल से भी ज़्यादा अरसे तक बड़ी मुश्किलों से काम किया है और अपनी पोस्ट ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. अब सब कुछ ख़त्म हो चुका है."
अफ़ग़ानिस्तान राजस्व निदेशालय की पूर्व महानिदेशक अमीना अहमदी ने अफ़ग़ानिस्तान के बाहर से हमसे टेलीफ़ोन पर बात की.
वे किसी तरह मुल्क छोड़ने में कामयाब रही थीं, लेकिन इससे उनकी मुश्किलें ख़त्म नहीं हो गईं. वो अफ़सोस जताती हैं, "हम अपनी पहचान खो रहे हैं. हम इसे केवल एक जगह पर बरकरार रख सकते हैं और वो है हमारा मुल्क."
महिलाओं के इस समूह ने अपने लिए एक बड़ा-सा नाम रखा है - 'वूमन लीडर्स ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान'- ये नाम उन्हें ताक़त देता है. लेकिन वे केवल अपनी नौकरियां चाहती हैं.
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मौजूदगी के दौरान
ये वो महिलाएं हैं जिन्होंने दो दशकों तक अफ़ग़ानिस्तान में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मौजूदगी के दौरान अपने लिए नई जगह बनाई थी. तालीम हासिल की, नौकरियों में आईं.
लेकिन तालिबान की वापसी के साथ ही वो दौर अब इतिहास का हिस्सा बन चुका है. तालिबान के अधिकारी कहते हैं कि महिलाएं अभी भी काम कर रही हैं.
लेकिन जो महिलाएं काम कर रही हैं, वो मुख्य रूप से मेडिकल स्टाफ़, टीचर और एयरपोर्ट पर सिक्योरिटी स्टाफ़ हैं. ऐसी जगहों पर महिलाओं का आना-जाना अधिक रहता है.
तालिबान इस बात पर भी जोर देता है कि महिला कर्मचारियों को अभी भी पैसे दिए जा रहे हैं, भले ही ये रकम उनकी सैलरी का मामूली हिस्सा ही क्यों न हो.
एक वक़्त था जब अफ़ग़ानिस्तान की सरकारी नौकरियों में महिलाओं की भागीदारी एक चौथाई तक थी. एक पूर्व सरकारी कर्मचारी ने मुझे बताया कि सड़क पर तालिबान के एक गार्ड ने उन्हें किस तरह से रोक दिया था.
तालिबान के गार्ड ने उस महिला को उनके हिजाब के लिए टोका, उनकी आलोचना की जबकि उन्होंने ख़ुद को पूरी तरह से ढक रखा था.
महिला ने गार्ड को पलटकर जवाब दिया, "हिजाब के मसले के अलावा तुम्हारे पास हल करने के लिए और भी ज़रूरी काम हैं." इस्लाम की हद में रह कर हक़ के लिए किसी औरत के आवाज़ उठाने का ये एक और लम्हा था.
ग़ोर के ग्रामीण इलाके में अकाल का डर
अफ़ग़ानिस्तान के इस दूर दराज़ के इलाके में नज़ारा वाकई ख़ूबसूरत है. गर्मियों की धूप में गेहूं की पकी हुई फ़सल सुनहरी आभा का एहसास करा रही थी.
गायों के झुंड से रंभाने की मद्धम आवाज़ सुनी जा सकती है. 18 साल के नूर मोहम्मद और 25 वर्षीय अहमद दोनों ही बची हुई गेहूं की फ़सल काटने के लिए अपना हंसिया लहरा रहे हैं.
नूर कहते हैं, "सूखे के कारण इस बार गेहूं की फ़सल कम हुई है." उनके नौजवान चेहरे पर पसीना और धूल दोनों ही चमक रहे हैं. वे कहते हैं, "लेकिन मेरे पास केवल यही एक काम रह गया है."

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हमारे पीछे दूर तक परती खेत थे जिनकी फ़सल की कटाई हो चुकी थी. वे 160 रुपये की दिहाड़ी के लिए दस दिनों से वहां कमरतोड़ मेहनत कर रहे थे.
नूर मोहम्मद बताते हैं, "मैं इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था, लेकिन परिवार की मदद के लिए मुझे वो छोड़ना पड़ा."
उनके अफ़सोस को महसूस किया जा सकता था. अहमद की कहानी भी उतनी ही दर्द भरी थी. उन्होंने बताया, "मैंने ईरान जाने के लिए अपनी मोटरसाइकिल बेच दी लेकिन मुझे वहां काम नहीं मिला."
अफ़ग़ानिस्तान के ग़रीब इलाकों में रहने वाले इन लोगों के लिए थोड़े समय का काम पड़ोसी ईरान में मिल जाया करता था, लेकिन इस बार वहां भी हालात तंग हैं.
नूर कहते हैं, "हमने अपने तालिबानी भाइयों का स्वागत किया. लेकिन हमें ऐसी सरकार चाहिए जो हमें अवसर दे, नौकरियां मुहैया कराए."

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ग़रीबी, ख़राब सड़कें, अस्पतालों की कमी और...
उस दिन सवेरे हम एक चीड़ की लकड़ी से बनी चमकती हुई मेज़ के इर्द-गिर्द बैठे थे जिसके चारों ओर ग़ोर सूबे के तालिबान गवर्नर अहमद शाह दीन दोस्त और प्रांतीय कैबिनेट के अफ़सर थे.
जंग के दिनों में अहमद शाह दीन दोस्त विरोधी खेमे की ओर से शैडो डिप्टी गवर्नर के रोल में थे. उन्होंने अपनी भारी-भरकम आवाज़ में अपनी चिंताएं जाहिर कीं.
उन्होंने ग़रीबी, ख़राब सड़कें, अस्पतालों की कमी और स्कूलों के ठीक से काम नहीं करने जैसी परेशानियां गिनाते हुए कहा, "इन मुश्किलों ने मुझे उदास कर दिया है."
जंग ख़त्म होने का मतलब था कि यहां बड़ी संख्या में सहायता एजेंसियां काम कर रही होतीं. इस साल की शुरुआत में ग़ोर सूबे के दो ज़िलों में अकाल जैसी स्थिति का अंदाज़ा लगने लगा था.
लेकिन गवर्नर अहमद शाह दीन दोस्त के लिए जंग अभी ख़त्म नहीं हुई है. उन्होंने बताया कि अमेरिकी फ़ौजों ने उन्हें क़ैद कर लिया था और यातनाएं दी थीं.
'ग़रीबी और अकाल भी एक जंग है'
गवर्नर दोस्त ज़ोर देकर कहते हैं, "हमें अब और तकलीफ़ नहीं चाहिए. हमें पश्चिमी देशों से मदद नहीं चाहिए. पश्चिमी देश हमारे मामलों में हमेशा क्यों दखल देते हैं. हम ये नहीं पूछते हैं कि आप अपनी औरतों या मर्दों के साथ कैसा सलूक करते हैं?"
दिन में हम एक स्कूल और क्लीनिक गए. उस क्लीनिक में कुपोषण से पीड़ित लोगों का इलाज होता था. साथ में गवर्नर अहमद शाह दीन दोस्त की टीम के लोग भी शामिल थे.
तालिबान के पढ़े-लिखे नौजवान स्वास्थ्य निदेशक अब्दुल सतार मफ़ाक़ कहते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है."
उनका लहजा अधिक व्यावहारिक लग रहा था. उन्होंने कहा, "हमें लोगों की ज़िंदगियां बचाने की ज़रूरत है और इसमें राजनीति को शामिल करने की ज़रूरत नहीं है."
मुझे याद है कि गेहूं के खेत में नूर मोहम्मद ने क्या कहा था, "ग़रीबी और अकाल भी एक जंग है और ये बंदूक़ की जंग से बड़ी लड़ाई है."

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हेरात की सोहैला की कहानी
अठारह साल की सोहैला उत्साह से भरी हुई थीं. मैं बेसमेंट की तरफ़ जाने वाली अंधेरी सीढ़ियों से उनके पीछे-पीछे नीचे उतर रही थी. हम हेरात के उस बाज़ार की तरफ़ बढ़ रहे थे जो सिर्फ़ महिलाओं के लिए था.
हेरात अफ़ग़ानिस्तान के पश्चिमी इलाके का वो शहर है जो कभी अपनी खुली संस्कृति, विज्ञान और अपनी क्रिएटिविटी के लिए जाना जाता था. तालिबान ने पिछले साल इस मार्केट को बंद कर दिया था.
तब से आज वो दिन था जब वो बाज़ार पहली बार खुला था. हमने सोहैला के परिवार की वो दुकान देखी. दुकान के सामने वाले हिस्से में शीशा लगा हुआ था. शीशे के उस पार कतार से रखी सिलाई मशीनें दिख रही थीं.
दिल के आकार वाले लाल रंग के बैलून छत से लटक रहे थे. सोहैला ने मुझे बताया, "दस साल पहले मेरी बहन ने ये दुकान शुरू की थी. तब मैं अठारह बरस की थी."
उन्होंने बताया कि उनकी मां और दादी किस तरह से पारंपरिक परिधान सिला करती थीं. उनकी बहन ने एक इंटरनेट क्लब और एक रेस्तरां भी शुरू किया था.
केवल महिलाओं की मौजूदगी वाली इस जगह पर चहल-पहल का माहौल था. कुछ महिलाएं अपनी दुकानों पर सामान सजा रही थीं, कुछ बातें कर रही थीं और कुछ खरीदारी में मशगूल थीं.

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'तालिबान ने स्कूल बंद कर दिए हैं'
उस जगह पर साफ़-सफ़ाई की स्थिति बहुत ख़राब थी, लेकिन फिर भी यहां की महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण जागी है. उन्होंने लंबा वक़्त घर की चाहरदीवारी के भीतर रहकर गुज़ारा है.
लेकिन सोहैला के पास शेयर करने के लिए एक और कहानी थी. वो बताती हैं, "तालिबान ने स्कूल बंद कर दिए हैं." उनके जैसी महत्वाकांक्षी लड़कियों के लिए तालिबान के इस फ़ैसले के दूरगामी परिणाम सामने आ रहे हैं.
तालिबान के बड़े मौलवियों के हुक्म पर अमल करते हुए ज़्यादातर हाई स्कूल बंद कर दिए गए हैं. हालांकि बहुत से अफ़ग़ान जिनमें तालिबान के सदस्य भी शामिल हैं, उन्होंने इन स्कूलों को फिर से खोले जाने की वकालत की है.
सोहैला बताती हैं, "मैं 12वीं क्लास में पढ़ती हूं. अगर मैं पास नहीं कर पाऊंगी तो मैं यूनिवर्सिटी नहीं जा सकती हूं."
मैंने उनसे पूछा कि क्या वो वैसी सोहैला बन पाएंगी जो वो अफ़ग़ानिस्तान में बनना चाहती हैं. सोहैला आत्मविश्वास के साथ जवाब देती हैं, "बेशक. ये मेरा देश है और मैं किसी दूसरे मुल्क में नहीं जाना चाहती हूं."
लेकिन बिना स्कूल गए बीता एक बरस उनके लिए मुश्किल रहा होगा. सोहैला कहती हैं, "ऐसा केवल मेरे साथ नहीं है. ये अफ़ग़ानिस्तान की सभी लड़कियों के साथ हो रहा है. ये उदास कर देने वाली यादें हैं..."
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