अफ़ग़ानिस्तान पर भारत और पाकिस्तान एक साथ क्यों हैं सक्रिय?

अफ़ग़ानिस्तान पर भारत में आयोजित बैठक में हिस्सा लेते हुए प्रधानमंत्री मोदी और एनएसए अजित डोभाल

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अफ़ग़ानिस्तान को लेकर एशियाई देशों के बीच हलचल एक बार फिर बढ़ गई है.

भारत और पाकिस्तान दोनों देश एक दिन के अंतराल पर अफ़ग़ानिस्तान के ताज़ा हालात पर बैठक कर रहे हैं.

भारत में ये बैठक बुधवार 10 नवंबर को हुई, जिसमें रूस, ईरान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान के प्रतिनिधि शामिल हुए.

बैठक के बाद 'दिल्ली डिक्लेरेशन ऑन अफ़ग़ानिस्तान' नाम से 12 प्वाइंट का घोषणा पत्र भी जारी किया गया. बैठक में शामिल सभी देश इस बात पर राज़ी हुए कि अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल आंतकवाद को किसी तरह के पोषण देने, ट्रेनिंग, प्लानिंग या आर्थिक मदद के लिए नहीं किया जाएगा.

लेकिन चीन और पाकिस्तान ने इस बैठक से दूरी बनाए रखी.

दूसरी तरफ़ पाकिस्तान में अफ़ग़ानिस्तान को लेकर बैठक एक दिन बार गुरुवार को होगी, जिसमें रूस के साथ साथ अमेरिका और चीन के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे.

चीन, भारत की बैठक में हिस्सा लेने नहीं पहुँचा, लेकिन पाकिस्तान की बैठक में अपना प्रतिनिधि भेज रहा है. वहीं रूस एकमात्र ऐसा देश है, जो दोनों बैठकों में हिस्सा लेगा.

वैसे दोनों देशों की बैठकों की 'गेस्ट लिस्ट' भले ही अलग हो, लेकिन टाइमिंग ने इन बैठकों में दिलचस्पी ज़रूर बढ़ा दी है.

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पाकिस्तान की बैठक का एजेंडा

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी पिछले महीने अफ़ग़ानिस्तान के दौरे पर थे. तभी उन्होंने तालिबान के विदेश मंत्री को अपने यहाँ होने वाली बैठक में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया था.

यहाँ अहम बात ये है कि पाकिस्तान ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है, लेकिन इस्लामाबाद में अफ़ग़ानिस्तान दूतावास में तालिबान के अधिकारी काम कर रहे हैं.

इन दोनों बैठकों की 'गेस्ट लिस्ट' और 'होस्ट लिस्ट' से क्या मायने निकलते हैं?

इस सवाल के अफ़ग़ानिस्तान में पूर्व में भारत के राजदूत रहे राकेश सूद कहते हैं, "ये दोनों बैठक इस बात की ओर इशारा करती है कि भारत का तालिबान के साथ रिश्ता कैसा है और पाकिस्तान का तालिबान के साथ कैसा रिश्ता है. एक दूसरी बात, जो इन दोनों बैठकों से जाहिर होती है, वो ये कि भारत पाकिस्तान के आपस में रिश्ते कैसे हैं. पाकिस्तान ने भारत में बैठक में शामिल होना स्वीकार नहीं किया और तालिबान के साथ सिर्फ़ तीन देशों- चीन, रूस और अमेरिका को निमंत्रण भेज कर अलग बैठक कर रहा है."

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी

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पाकिस्तान में ये बैठक उस समय में हो रही है, जब हाल ही में इमरान ख़ान सरकार ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के साथ बातचीत का फ़ैसला किया है. ऐसा भी माना जा रहा है कि अफ़ग़ान तालिबान ने इमरान सरकार के इस फ़ैसले में अहम भूमिका निभाई है.

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, पाकिस्तान में सक्रिय चरमपंथी संगठन है. ये वही गुट है, जिसे साल 2014 में पेशावर में एक आर्मी स्कूल पर हुई गोलीबारी के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है, जिसमें क़रीब 200 लोगों की जान गई थी.

इस बैठक में अमेरिका की तरफ से थॉमस वेस्ट शामिल होंगे, जो अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के विशेष दूत है.

वहीं तालिबान सरकार की तरफ़ से विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी इस बैठक में हिस्सा लेंगे. वो बुधवार को पाकिस्तान पहुँच रहे हैं.

तालिबान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने ट्वीट कर इस बात की जानकारी दी है. तालिबान सरकार के मुताबिक़, पाकिस्तान में हो रही बैठक में वित्त और व्यापार मामलों के अलावा तालिबान सरकार के साथ रिश्ते, शरणार्थी और प्रवासी मामला और आम लोगों की आवाजाही से जुड़े मसलों पर बात होगी.

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दोनों देशों की बैठक के एजेंडे पर राकेश सूद कहते हैं, "एजेंडा एक ही है- अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता कैसे क़ायम हो."

हालाँकि भारत का कहना है कि तालिबान के सत्ता में आने के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर उपजे हालात पर दिल्ली की बैठक में चर्चा होगी. इस पर राकेश सूद कहते हैं, "सुरक्षा और स्थिरता दोनों आपस में एक दूसरे से जुड़े हैं. सुरक्षित होंगे, तभी स्थिरता होगी, अस्थिरता के साथ कोई देश ना सुरक्षित हो सकता है और ना दूसरों को सुरक्षित रख सकता है."

वहीं विदेश मामलों की वरिष्ठ पत्रकार और टाइम्स ऑफ़ इंडिया की डिप्लोमेटिक एडिटर इंद्राणी बागची कहती हैं, "पाकिस्तान की बैठक का मुद्दा 'रिकॉन्सिलिएशन' यानी 'तालिबान के साथ संबंध सुधारने' को लेकर है."

तालिबान की अंतरिम सरकार पर 'समावेशी' ना होने का आरोप लगता है.

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल

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भारत की बैठक में क्या हुआ

दिल्ली की बैठक में अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के क़ब्ज़े से पैदा हुई चुनौतियों से, देश के अंदर और बाहर आतंकवाद और कट्टरता से, मादक पदार्थों का उत्पादन, तस्करी, अमेरिका और उसके सहयोगियों के छोड़े गए हथियारों के संभावित इस्तेमाल से निपटने के लिए क्षेत्रीय सुरक्षा पर सभी देशों के साथ विचार किया गया.

रूस के प्रतिनिधि निकोलाई पेत्रुशेव ने कहा, "इस तरह की बहुपक्षीय बैठक से अफ़ग़ानिस्तान के विकास से जुड़ी चुनौतियों को समझने और उससे निपटने के तरीक़े के बारे में चर्चा करने में मदद मिलती है. इससे वहाँ लंबे समय तक शांति बहाली के लिए काम किया जा सकेगा."

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वहीं ईरान के प्रतिनिधि ने एक बार फिर से तालिबान सरकार के 'समावेशी' नहीं होने पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि शरणार्थी समस्या हो या फिर प्रवासियों की दिक़्क़त - सभी का समाधान तभी संभव हो सकता है, जब सरकार में हर गुट का प्रतिनिधित्व हो.

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ये तीसरा मौक़ा है, जब एनएसए स्तर की ऐसी वार्ता आयोजित की जा रही है. इससे पहले 2018 और 2019 में ईरान ने इस तरह की बैठक की मेज़बानी की थी.

उन दोनों बैठकों में भारत को शामिल किए जाने को लेकर पाकिस्तान ने आपत्ति जताई थी और ख़ुद शामिल नहीं हुआ था.

भारत में हो रही बैठक की अध्यक्षता राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने की. उन्होंने अपने संबोधन में अफ़ग़ानिस्तान के लोगों की मानवीय मदद के वादे को एक बार फिर से दोहराया.

इस बार की बैठक में भारत ने पाकिस्तान को भी न्योता भेजा था. लेकिन पाकिस्तान के एनएसए मोइद युसूफ़ ने ये कहते हुए इस बैठक में हिस्सा लेने से मना कर दिया था कि 'स्थिति को बिगाड़ने वाला शांति स्थापित नहीं कर सकता.'

अब गुरुवार को अफ़ग़ानिस्तान पर पाकिस्तान अपनी अलग बैठक कर रहा है.

तालिबान सरकार की तरफ़ से विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी

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भारत की बैठक में तालिबान शामिल नहीं

वैसे तो दिल्ली की बैठक में अफ़ग़ानिस्तान को लेकर जितनी चर्चा हुई, उनका सरोकार तालिबान शासन से है. लेकिन भारत की बैठक में उनको निमंत्रण नहीं भेजा गया है.

भारत सरकार का कहना है कि बैठक के लिए आमंत्रित किसी देश ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं है. इससे पहले भी अफ़ग़ानिस्तान पर कई बैठकें तालिबान के बिना भी हुई है.

हालाँकि तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने भारत में चल रही इस बैठक पर आशावादी रुख़ दिखाते हुए कहा है कि 'उन्हें उम्मीद है कि ऐसी बैठकों से अफ़ग़ानिस्तान मामले में बेहतर समझ बनाने में मदद मिलेगी.'

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इंद्राणी बागची कहती हैं, "भारत ने तालिबान को निमंत्रण नहीं भेजा क्योंकि भारत इस बैठक में उन्हें शामिल नहीं करना चाहता था."

अहम बात ये भी है कि अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में वापसी के बाद दो मौक़ों पर भारत ने उनके साथ 'इंगेज' किया है.

पहले दोहा में भारतीय राजदूत की तालिबान प्रतिनिधि से मुलाक़ात हुई थी. उसके बाद रूस की राजधानी मॉस्को में हुए वार्ता में विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव भी गए थे, जहाँ तालिबान प्रतिनिधियों के साथ बैठक का आयोजन किया गया था.

जब दो अलग-अलग जगहों पर तालिबान के साथ भारत बातचीत कर चुका है, तो इस बार उनसे परहेज़ क्यों?

इस सवाल पर इंद्राणी कहती हैं, "भारत के तालिबान के साथ रिश्ते, रूस के रिश्ते से बहुत अलग है. रूस ने पिछले कुछ सालों में तालिबान के साथ अपने संबंध बहुत अच्छे रखे हैं, केवल उन्हें मान्यता ही नहीं दी है. इस वजह से मॉस्को फ़ॉर्मेट में रूस ने तालिबान को निमंत्रण भी भेजा था."

"लेकिन भारत का इतिहास तालिबान के साथ रूस जैसा नहीं रहा है. कंधार हाइजैक की घटना सभी को याद है. भारत की सबसे बड़ी चिंता है कि 'तालिबान हुकूमत में अफ़ग़ानिस्तान के आतंकवाद का गढ़ ना बन जाए'. अफ़ग़ानिस्तान में फ़िलहाल भारत का सीमित हित यही है."

" इस चिंता के साथ भी अगर बातचीत के टेबल पर भारत तालिबान को साथ बिठा कर कोई वार्ता करे, ये उचित नहीं होता"

अफ़ग़ानिस्तान पर भारत में आयोजित बैठक

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यहाँ एक और बात ग़ौर करने वाली है कि भारत ने ना तो तालिबान को बुलाया और ना ही पूर्व में वहाँ सत्ता में रहे किसी और को, जिनसे भारत सरकार के पूर्व में अच्छे संबंध रहे.

इंद्राणी कहती हैं, "भारत की तरफ़ से ये एक तरह का 'पॉलिटिकल बैलेंसिंग एक्ट' है. भारत तालिबान को मान्यता नहीं दे रहा है, तो अफ़ग़ानिस्तान की राजनीति में किसी दूसरे पक्ष से भी बात नहीं कर रहा है. यानी भारत, तालिबान के साथ नहीं है तो उनके ख़िलाफ़ भी नहीं है."

भारत समेत दुनिया के किसी देश ने अभी तक तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है, लेकिन अमेरिका सहित दुनिया के अलग-अलग देश तालिबान हुकूमत के साथ अलग-अलग स्तर पर बातचीत कर रहे है. कुछ देशों के दूतावास भी अफ़ग़ानिस्तान में चल रहे है.

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