अफ़ग़ानिस्तान: अमेरिका ने क्या वही ग़लतियां दोहराईं जो सोवियत रूस ने की थीं?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, ग्रिगोर अतनेस्यान
- पदनाम, बीबीसी रूसी सेवा
लगभग बिना किसी लड़ाई के अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा करने वाले तालिबान के हमले ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया. हालांकि कागज़ पर अफ़ग़ान सेना हथियारों और संख्या के मामले में तालिबान से बहुत आगे थी.
अमेरिका के जानकारों का कहना है कि अमेरिका ने सालों तक अफ़ग़ानिस्तान की वास्तविक स्थिति की अनदेखी की. उसने अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत रूस के नियंत्रण के दौरान हुई सभी ग़लतियों को दोहराया. अमेरिका ने कभी भी अफ़ग़ान संस्कृति और उनके रीति-रिवाजों को समझने की कोशिश ही नहीं की.
जानकारों का यह भी कहना है कि अमेरिका 'सूचना युद्ध' में तालिबान से हार गया और वह अपने सहयोगी पाकिस्तान को तालिबान का समर्थन बंद करने के लिए मनाने में नाकाम रहा.
अमेरिकी नेवी ग्रैजुएट स्कूल के प्रोफ़ेसर थॉमस जॉनसन 2008-2009 में अफ़ग़ानिस्तान में कनाडा की टीम कमांडर के वरिष्ठ सलाहकार के रूप में काम कर चुके हैं. उन्होंने बीबीसी रशियन सर्विस के साथ हुई बातचीत में कहा, "हम हार गए क्योंकि हम कभी अफ़ग़ानिस्तान को समझ नहीं पाए."
कंधार से लौटकर, जॉनसन ने लिखा था कि अमेरिका, सोवियत रूस की सभी ग़लतियों को दोहरा रहा है. उन्होंने उसी समय भविष्यवाणी की थी कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद अफ़ग़ान सरकार का पतन हो जाएगा.

इमेज स्रोत, AFP
उन्होंने यूएस आर्मी वॉर कॉलेज के अपने एक सहयोगी के साथ 2011 में लिखे एक आलेख में कहा, "अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति पद पर एक कठपुतली बैठा दिया और समाज का अलोकप्रिय परिवर्तन करना शुरू कर दिया जैसा कि सोवियत संघ ने 30 साल पहले किया था."
उन्होंने चेताया था कि अफ़ग़ान सेना की लड़ने की क्षमता संदिग्ध है और अमेरिका प्रायोजित राष्ट्रीय सुलह की पहल को कमज़ोरी के तौर पर लिया जा रहा है. और इससे केवल तालिबान का संकल्प मज़बूत होता है.
उसकी प्रस्तावना में यह बताया गया है कि लेखकों ने अमेरिका के सीनियर अधिकारियों को सलाह दी, पर इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि उनकी बात सुनी जा रही हो. जॉनसन कहते हैं, "हमने सोवियत हमले की सीख पर अपनी नीति नहीं बनाई. हमने समस्या को दूर नहीं किया."
जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर मार्क काट्ज़ ने भी बीबीसी से हुई बातचीत में सहमति जताई कि सोवियत रूस की हार से अमेरिका कोई सबक लेना नहीं चाहता था. जॉनसन की तरह उन्होंने भी 2014 में चेतावनी दी थी कि वॉशिंगटन उसी रास्ते पर चल रहा है जिसके चलते सोवियत रूस को अपने सैनिकों को लौटाना पड़ा था और अफ़ग़ानिस्तान में मास्को समर्थक सरकार का पतन हुआ था.
मार्क काट्ज़ कहते हैं, "सोवियत संघ और अमेरिका वास्तव में अफ़ग़ान समाज को वाक़ई नहीं जानते थे. उन्होंने कोशिश भी नहीं की. ऐसा नहीं है कि हम दोनों के पास अफ़ग़ान विशेषज्ञ नहीं थे. लेकिन सत्ता में बैठे लोग मानते थे कि उन्हें पता है कि उन्हें क्या करना है."
वॉशिंगटन पोस्ट ने 2019 में अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध की एक सरकारी ऑडिट प्रकाशित की. उसमें से कुछ में सेना, राजनयिकों और उनके सलाहकारों के इंटरव्यू शामिल थे. ऑडिटरों के साथ बातचीत में बुश और ओबामा प्रशासन के अफ़ग़ान सलाहकार जनरल डगलस ल्यूट ने स्वीकार किया था, "हमें अफ़ग़ानिस्तान की गहरी समझ नहीं थी. हमें नहीं पता था कि हम क्या कर रहे हैं और हम क्या हासिल करना चाह रहे थे? हमें इस बात का जरा सा भी अंदाज़ा नहीं था कि हम क्या कर रहे हैं."

इमेज स्रोत, Getty Images
काबुल के साम्राज्य से मार्क्सवाद और लोकतंत्र तक
अमेरिका की मानसिकता समझाते हुए मार्क काट्ज कहते हैं, "इतिहास भूल जाइए. हमें बस अपने जैसे संस्थान बनाने और अफ़ग़ान शासन के हर फ़ैसले को कंट्रोल करने की ज़रूरत है."
वे नेताओं की पैरोडी बनाते हुए कहते हैं, "सोवियत संघ ने मार्क्सवाद को स्थापित करने का प्रयास किया. इसलिए वे असफ़ल होने को अभिशप्त थे. लेकिन हम बहुत बेहतर हैं."
जानकारों का कहना है कि अफ़ग़ान सरकार की अमेरिका पर पूर्ण निर्भरता ने उन्हें अफ़ग़ान नागरिकों के समर्थन से दूर कर दिया. लेकिन सोवियत समर्थक और अमेरिका समर्थक सरकारों की विचारधारा के अंतर ने उनके भाग्य में कोई ख़ास भूमिका नहीं निभाई.
जानकारों के अनुसार, अमेरिका के नेता सोवियत नेताओं की ही तरह अफ़ग़ान समाज और उसकी संस्कृति को नहीं समझते थे.
मार्क काट्ज़, काबुल दरबार के पहले ब्रिटिश राजदूत माउंटस्टुअर्ट एलफ़िंस्टन की लिखी गई एक पुस्तक 'ए टेल ऑफ़ द किंगडम ऑफ़ काबुल' का हवाला देते हैं. एलफ़िंस्टन उस किताब में ऐसे समाज के बारे में बताते हैं जिसमें हर कोई हर किसी के साथ लड़ रहा है और उन्हें केवल एक चीज़ एकजुट कर सकती है, वह है विदेश से आए आक्रमणकारी.
लेकिन तब से ब्रिटिश साम्राज्य, सोवियत संघ और अब अमेरिका ने इस तथ्य को नजरअंदाज़ किया कि अफ़ग़ान यदि किसी के खिलाफ़ लड़ने को तैयार हैं तो वो है विदेशी कब्ज़ा.
काट्ज़ व्यंग्य के लहज़े में कहते हैं, "अमेरिकी किसी की ग़ुलामी में रहने के बारे में सोच भी नहीं सकते. वे कहते हैं- नहीं, नहीं. हम अच्छा और सही काम करने के लिए वहां हैं. इसलिए लोगों को इसका स्वागत करना चाहिए."

इमेज स्रोत, Getty Images
शहरों में जीत, गांवों में हार
जॉनसन का मानना है कि सोवियत संघ और अमेरिका दोनों के अभियानों की विफलताओं का एक कारण यह भी था कि 75% अफ़ग़ान गांवों में रहते हैं, लेकिन सोवियत सैनिकों की तरह, अमेरिकी सैनिकों का भी मुख्यत: शहरों पर ही कब्ज़ा था. वे इसे शहर केंद्रित रणनीति कहते हैं.
अमेरिकी दल ने बड़ी बस्तियों के पास फ़ॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (एफ़ओबी) बनाया. अक्सर उन्हीं स्थानों पर ये बेस रहे जहां सोवियत सैनिक तैनात थे. बगराम एयरबेस अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत वायुसेना के केंद्र के रूप में कार्य किया था. अमेरिकी वायुसेना का भी वही आधार बना और फिर एक दिन आधी रात को अपने अफ़ग़ान सहयोगियों को बिना कोई चेतावनी दिए उनके विमानों ने देश छोड़ दिया.
अमेरिका के लोग अफ़ग़ानिस्तान के गांवों की संस्कृति और रीति-रिवाजों को नहीं जानते थे जबकि तालिबान उन्हें अपने हाथ के पिछले हिस्से की तरह जानते थे. अमेरिकी दल का ज़िक्र करते हुए जॉनसन कहते हैं, ''हमने कभी किसी अफ़ग़ान गांव में रात नहीं बिताई.''

दस साल पहले उन्होंने अपने लेख में लिखा था, "सैन्य ज्ञान कहता है कि कृषि प्रधान देश में शहरों को क़ब्ज़े में लेकर गांवों के विद्रोहियों को हराना लगभग असंभव है. सोवियत नेताओं ने समय के साथ यह सबक सीखा. ज़ाहिर है अमेरिका भी अभी तक ऐसा नहीं कर रहा.''
उन्होंने बताया कि अफ़ग़ानिस्तान के गांवों के बारे में अमेरिका के लोगों की अज्ञानता और उदासीनता सैन्य रणनीतियों के साथ उसके प्रचार की पूर्ण विफलता में भी देखी गई.
वे कहते हैं, "हमारा सूचना प्रसार बहुत ख़राब रहा क्योंकि हम उस देश को उस तरह से कभी समझ ही नहीं पाए कि ग्रामीण आबादी को अपनी ओर आकर्षित किया जा सके. हमारी हार की यही असली वजह रही."
उनका कहना है कि अमेरिकी सैन्य सिद्धांत कहता है कि विद्रोहियों के साथ संघर्ष में सैन्य कार्रवाई केवल 20% परिणाम तय करती है, जबकि यह 80 फ़ीसदी तक सूचना और राजनीतिक कारकों पर निर्भर करती है. लेकिन रात को छापे मारने वाले (मारने या पकड़ने की रणनीति) अमेरिकी ऑपरेशन की सफलता हमेशा मारे गए और पकड़े गए आतंकियों की संख्या से मापी गई.
जॉनसन कहते हैं, "स्टेनली मैकक्रिस्टल या डेविड पेट्रियस कह सकते हैं कि 'बॉडी बैग' उनकी सफलता का पैमाना थे." वे 2009-2011 के दौरान गठबंधन सेनाओं की कमान संभालने वाले उन दो जनरलों की बात कर रहे थे. ये उस समय की बात है जब ओबामा प्रशासन ने तालिबान के नए हमलों के जवाब में अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी बलों की संख्या में काफ़ी वृद्धि की थी.
दूसरी ओर, तालिबान ने अफ़ग़ान लोगों के साथ व्यवस्थित तरीके से काम किया. 'तालिबान प्रोपेगेंडा' नामक किताब लिखने वाले जॉनसन कहते हैं, "तालिबान कहता है- हमारे दादा ने सोवियत संघ को हराया और उनसे पहले हमारे पूर्वजों ने तीन बार अंग्रेज़ों को हराया था और अब हम उन काफ़िरों को हराएंगे जो हमारी परंपराओं को नष्ट करने और हमें ईसाई बनाने के लिए आए हैं,"
उनके अनुसार, तालिबान ने अपने प्रचारकों को गांवों में भेजा. ये मुल्ला जुमे की नमाज़ के दौरान प्रचार करते थे और एक हफ़्ते तो कभी-कभी दस दिन तक गांवों में रहते थे.और उस दौरान वे स्थानीय लोगों को तालिबान के समर्थन के लिए मनाने का प्रयास करते थे. अगर मुल्ला कुछ नहीं कर पाते तो हथियारबंद आतंकी गांवों में घुस जाते, उन्हें बंधक बना लेते और मांग करते थे कि लोग उनके आंदोलन में शामिल हों.

इमेज स्रोत, AFP
भ्रष्टाचार और राजनीतिक रंगमंच
दूसरी ओर, अमेरिका "प्रतिवाद" के सिद्धांत का सहारा ले रहा था जिसने बताया कि निवेश, आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के ज़रिए विदेशी ताकतें अपने स्थानीय सहयोगियों की वैधता बढ़ा सकती है.
अफ़ग़ान मूल के अमेरिकी ज़ल्मए ख़लीलज़ाद ने नए संविधान का मसौदा तैयार करने में मदद की. वे बाद में काबुल में अमेरिका के राजदूत के रूप में कार्य किया. उन्होंने 2001 के बाद अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिका के 'राज' करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
एक या कई तरह से 2000 के दशक के मध्य में फिर से शुरू हुए गुरिल्ला युद्ध ने देश के आर्थिक विकास और पुनर्निर्माण को बाधित किया. इसने और भ्रष्टाचार ने अमेरिका की लोकप्रियता को रोकने में अहम भूमिका निभाई.
जानकारों का कहना है कि हर तरफ़ दिखने वाले भ्रष्टाचार और बड़े पैमाने पर हुई चुनावी धांधली के चलते ही राष्ट्रपति हामिद करज़ई और अशरफ़ ग़नी कभी भी बहुतेरे अफ़ग़ानों को स्वीकार नहीं हो सके.
जॉनसन कहते हैं, "ग़नी सरकार बहुत ज़्यादा भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के चलते गिर गई. लोगों को पता था कि वास्तव में उन्होंने 2014 और 2019 के चुनाव नहीं जीते थे."
बड़े पैमाने पर धांधली की ख़बरों के साथ वोट डाले गए. 2019 में विपक्षी प्रत्याशी अब्दुल्ला अब्दुल्ला पहले विजेता घोषित किए गए थे. दोनों उम्मीदवारों ने ख़ुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया. उसके बाद अमेरिका के दबाव में वे इस पर सहमत हो गए कि ग़नी ही इस पद पर बने रहेंगे.

इमेज स्रोत, Getty Images
उस समय तक, ट्रंप प्रशासन ने सैनिकों को वापस बुलाने का फ़ैसला कर लिया था. यह फ़ैसला जो बाइडन को विरासत में मिला और उन्होंने भी इसका समर्थन ही किया. अमेरिका ने क़तर की राजधानी दोहा में तालिबान के राजनीतिक नेतृत्व के साथ अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य पर गुप्त बातचीत की. ख़लीलज़ाद उस वार्ता में वॉशिंगटन के मुख्य वार्ताकार थे.
इस प्रक्रिया ने आख़िरकार काबुल की सरकार के पैरों तले से ज़मीन खिसका दी और वो देश के भविष्य की परिभाषा से बाहर आ गई. फ़रवरी 2020 में ख़लीलज़ाद ने तालिबान नेताओं में से एक अब्दुल ग़नी बरादर के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए. बरादर को इस बातचीत में भाग लेने के लिए अमेरिका के दबाव में पाकिस्तान की एक जेल से रिहा किया गया था.
जॉनसन कहते हैं, "यह एक शांति समझौता नहीं था. यह असल में एक राजनीतिक नाटक था."

इमेज स्रोत, EPA
पाकिस्तान की जीत
तालिबान ने अमेरिका से राजनीतिक समझौते की प्रक्रिया का समर्थन करने और ज़ोर-ज़बर्दस्ती से सत्ता न लेने, हिंसा के सबसे क्रूर तरीकों को छोड़ने और अल-क़ायदा आतंकियों को शरण न देने का वादा किया था.
लेकिन उन्होंने अपने वादों को नहीं निभाया. इसके बावज़ूद, ख़लीलज़ाद अमेरिका के विशेष दूत बने रहे और राष्ट्रपति बाइडन ने सेना की वापसी को रोकने से इनकार कर दिया.
अमेरिकी राष्ट्रपति की स्थिति बताते हुए मार्क काट्ज़ कहते हैं, "यह सनकी या व्यावहारिक फ़ैसला था कि अफ़ग़ानिस्तान बचाने के लायक नहीं है. शायद वह कभी भी नहीं था. तालिबान बेहद मज़बूत हैं. पाकिस्तान से उनकी मदद को रोका नहीं जा सकता तो छोड़िए उन्हें किसी और के लिए समस्या बनने दें."
कई जांच और जानकारों की रिपोर्टें बताती हैं कि पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी (आईएसआई) के तालिबान सरदारों के साथ कनेक्शन रहे हैं. हालांकि आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान इससे इनकार करता रहा है.
मार्क काट्ज़ ने कहा कि 1980 के दशक में मुजाहिदीनों को और अब तालिबान को पाकिस्तान से मिले समर्थन ने उन्हें पूरी तरह से हराना नामुमकिन बना दिया है.
वे याद करते हैं कि सोवियत राजनयिकों ने अपने सैनिकों की वापसी के बदले अमेरिका से मिल रहे मुजाहिदीनों के समर्थन को समाप्त करने पर समझौता किया था, लेकिन वह शर्त कभी पूरी नहीं हुई.
काट्ज कहते हैं, ''अमेरिका ने कभी पाकिस्तान के साथ ऐसा कोई समझौता करने का प्रयास तक नहीं किया.''
वे कहते हैं कि अमेरिका ने पाकिस्तान को तालिबान का समर्थन न करने के लिए मनाने की कोशिश की. लेकिन उसे अफ़ग़ानिस्तान के भारत के प्रभाव में आ जाने के डर से हमेशा इस्लामी कट्टरपंथियों का समर्थन करने को मज़बूर होना पड़ा. पाकिस्तान को लगता था कि तालिबान कभी हिंदू बहुल गणराज्य के साथ सहयोग नहीं करेंगे.
इतना ही नहीं, पाकिस्तानी नेतृत्व के एक तबके ने तालिबान की विचारधारा का भी समर्थन किया.
पूर्व पाकिस्तानी ख़ुफ़िया प्रमुख जनरल हामिद गुल ने 2014 में कहा था कि भविष्य में इतिहास की किताबों में लिखा होगा कि आईएसआई ने अमेरिका की मदद से अफग़ानिस्तान में सोवियत संघ को हराया और आईएसआई ने अमेरिका की मदद से अमेरिका को हराया.
इसलिए काट्ज ने कहा, "यदि किसी ने इस युद्ध को जीता है, तो वह पाकिस्तान है."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

















