अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान अपना संगठन चलाने के लिए आख़िर कहां से लाता है धन?

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- Author, दाऊद आज़मी
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस एंड रियलिटी चेक
इसी महीने तालिबान ने क़रीब पूरे अफ़ग़ानिस्तान पर अपना क़ब्ज़ा कर लिया है. अगले कुछ दिनों में अमेरिका के नेतृत्व वाली पश्चिमी देशों की सेनाएं अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर चली जाएंगी. इस तरह, पिछले दो दशकों से दोनों पक्षों के बीच चल रहा संघर्ष शायद थम जाएगा.
तालिबान के लिए गठबंधन सेनाओं के साथ संघर्ष काफी कठिन रहा. एक ओर, उसके सामने दुनिया के अमीर देशों की सेनाएं थीं, जिनके पास न धन की कमी थी और न ही आधुनिक हथियारों की. वहीं दूसरी ओर, तालिबान की स्थिति इन दोनों मामलों में उन देशों के मुक़ाबले कोई ख़ास नहीं थी.
बहरहाल, एक अनुमान के अनुसार, 2011 में तालिबानी लड़ाकों की तादाद 30 हजार थी. 2021 के मध्य में, उसके लड़ाकों की संख्या बढ़कर 70 हजार से एक लाख के बीच हो गई.
ऐसे में इतने बड़े संगठन और चरमपंथी अभियानों को चलाने के लिए भारी आर्थिक मदद की जरूरत तो होगी ही. तो सवाल उठता है कि तालिबान को यह आर्थिक मदद मिलती कहां से है. और यह मदद देश के भीतर से होती है या बाहर से?

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आख़िर कितना अमीर है तालिबान?
तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर 1996 से 2001 तक शासन किया था. लेकिन चुनौती यह है कि तालिबान की आय के बारे में कोई विश्वस्त और ठोस जानकारी आम लोगों के बीच नहीं है. इनके बारे में धन के आवागमन को समझना एक तरह से कयास लगाने जैसा ही है.
हालांकि बीबीसी ने अफ़ग़ानिस्तान के अंदर और बाहर के ऐसे कई लोगों से बातचीत करके काफी सूचनाएं जुटाईं हैं. इससे पता चला कि तालिबान का आर्थिक ढांचा बेहद जटिल है.
साल 2011 में तालिबान की वार्षिक आय लगभग 2,900 करोड़ रुपए थी. लेकिन बीबीसी ने अपनी पड़ताल में पाया कि 2018 के अंत तक ये आंकड़ा बढ़कर 11 हजार करोड़ रुपए हो गया है. अब कुछ ही दिनों में वह अफ़ग़ानिस्तान की सरकार का संचालन करने जा रही है. ऐसे में माना जा रहा है कि उसकी आय के स्रोत काफी बढ़ जाएंगे.

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तालिबान की आमदनी के चार प्रमुख स्रोत
तालिबान के बारे में एक आम धारणा है कि उसकी कमाई का मुख्य ज़रिया अफ़ीम और उससे बनने वाला नशीला पदार्थ हेरोइन है. लेकिन जानकारों का मानना है कि यह बात पूरी तरह सही नहीं है.
जानकार कहते हैं कि अफ़ीम के अलावा, तालिबान की कमाई उसके क़ब्ज़े वाले इलाकों में लगाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के करों से भी होती है. साथ ही, विदेशों से मिलने वाले चंदे और खनिजों का कारोबार भी उसकी कमाई के ज़रिया हैं.
असल में, तालिबान की आय के चार प्रमुख स्रोत हैं.
1. विदेशों से मिलने वाला चंदा
पूर्व अफ़ग़ान सरकार और अमेरिकी अधिकारी लंबे समय से आरोप लगाते रहे हैं कि पाकिस्तान, ईरान, रूस, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर सहित खाड़ी के कई देश तालिबान को वित्तीय मदद दे रहे हैं. तालिबान के साथ उनके ये संबंध लंबे समय से बने हैं. हालांकि इन देशों ने इस बात को कभी स्वीकार नहीं किया.
यह भी माना जाता है कि पाकिस्तान सहित सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर जैसे खाड़ी के देशों के नागरिक निजी तौर पर भी तालिबान को मदद देते रहे हैं.
तालिबान को विदेशों से मिलने वाली मदद का सटीक आंकड़ा जानना तो असंभव है, पर जानकारों का मानना है कि उसे अब हर साल क़रीब 50 करोड़ डॉलर यानी 3,600 करोड़ रुपए विदेशों से मिल रहे होंगे.
इससे पहले अमेरिका की एक ख़ुफ़िया रिपोर्ट में ये अंदाज़ा लगाया गया था कि तालिबान को 2008 में विदेशों ख़ासकर खाड़ी देशों से 10.6 करोड़ डॉलर प्राप्त हुए थे.

2. नशीली दवाओं का क़ारोबार
तालिबान के बारे में माना जाता है कि वह लंबे समय से अफीम, हेरोइन जैसी नशीली दवाओं का अवैध क़ारोबार करता रहा है.
मालूम हो कि अफ़ग़ानिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा अफ़ीम और हेरोइन उत्पादक है. हेरोइन, अफ़ीम से तैयार होता है. एक अनुमान के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान से हर साल 1.5 से तीन अरब डॉलर का अफ़ीम दूसरे देशों में भेजा जाता है.
अफ़ग़ानी अधिकारियों के अनुसार, तालिबान किसानों से अफ़ीम की खेती कराता रहा है और उनसे इस पर 10 फ़ीसदी का कर वसूलता है. इसके अलावा, हेरोइन बनाने वाली प्रयोगशालाओं से भी वह कर वसूलता है. इन सबसे तालिबान को हर साल 10 से 40 करोड़ डॉलर (7,500 से 3,000 करोड़ रुपए) के बीच की आय होने का अंदाज़ा लगाया जाता है.
2018 में अमेरिकी कमांडर जनरल जॉन निकोलसन ने एक रिपोर्ट में कहा था कि तालिबान को उसकी आय का 60 फ़ीसदी हिस्सा अवैध ड्रग के धंधे से आता है. हालांकि उनके इस अनुमान को कई जानकार बहुत ज़्यादा बताकर ख़ारिज़ करते हैं.

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3. इलाक़ों पर कब्ज़ा बढ़ाना
तालिबान की आय केवल अफ़ीम की खेती और उसकी बिक्री से नहीं आती. इसका प्रमाण 2018 में अफ़ग़ान कारोबारियों के नाम लिखा एक खुला ख़त है, जिसमें तालिबान ने उनसे तेल, निर्माण सामग्रियों सहित कई उत्पादों पर कर चुकाने को कहा था.
असल में जिन इलाक़ों में तालिबान का प्रभाव रहा है, वहां उसने लोगों से कई तरह के कर वसूले हैं. पिछले दो दशकों में पश्चिमी देशों का अच्छा-ख़ासा धन भी, न चाहते हुए तालिबान की जेब में गया है.
सबसे पहले, पिछले दो दशकों में दुनिया के कई देशों की मदद से देश में सड़क, स्कूल, अस्पताल आदि बनाए गए. लेकिन तालिबान ने इन सभी परियोजनाओं के लिए आनेजाने वाली गाड़ियों से पैसे वसूल किए. पिछले दो दशकों में दुनिया के कई देशों की मदद से देश में सड़क, स्कूल, अस्पताल आदि बनाए गए. लेकिन तालिबान ने इन सभी परियोजनाओं से पैसे वसूल किए.
यह भी अनुमान है कि पश्चिमी देशों को सामान की सप्लाई करने वाले ट्रकों से तालिबान ने हर साल करोड़ों डॉलर बनाए हैं. उसने इसके अलावा, अफ़ग़ान सरकार द्वारा आम जनता को दी जा रही सेवाओं से भी खूब कमाई की है.
अफ़ग़ानिस्तान की बिजली कंपनी के अध्यक्ष ने साल 2018 में बीबीसी को बताया था कि बिजली का इस्तेमाल करने वालों से तालिबान वसूली करता है. उनका अनुमान था कि इससे उसे हर साल 20 लाख डॉलर की आय होती है.
तालिबान जब किसी इलाक़े को अपने कब्ज़े में लेता है, तो वहां से उसे पैसे के साथ काफी सामान, गाड़ियां, हथियार आदि प्राप्त होते हैं. लगातार लड़ाई में जुटे रहने वाले संगठन के लिए आय का यह स्रोत भी महत्वपूर्ण होता है.

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4. खान और खनिज
खनिजों और कीमती पत्थरों के मामले में अफ़ग़ानिस्तान काफी अमीर है. दशकों से देश में लड़ाई होते रहने से अभी इनका पर्याप्त दोहन नहीं हो सका है. पूर्व अफ़ग़ान अधिकारियों के अनुसार, अभी देश का खनन उद्योग एक अरब डॉलर के आसपास का है.
देश का ज्यादातर खनन छोटे स्तर का है और अधिकांश अवैध ढंग से हो रहा है. तालिबान ने इस पर अपना नियंत्रण करते हुए वैध और अवैध सभी तरह के खनन से ख़ासी कमाई की.
2014 में यूएन की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि तालिबान ने हेलमंद प्रांत में 25 से 30 अवैध खनन परियोजनाओं से हर साल एक करोड़ रुपये से ज्यादा कमाए थे.
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