स्नाइपर, यूट्यूबर और तालिबान, साल भर में कितना बदला अफ़ग़ानिस्तान

- Author, सिकंदर किरमानी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले साल अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर तालिबान के कब्ज़े के साथ ही कई अफ़ग़ानी ज़िंदगियां हमेशा के लिए बदल गईं. लाखों अफ़ग़ानी लोगों को उनके ही देश से सुरक्षित निकालने के लिए अभियान चलाया गया.
अफ़ग़ानिस्तान में रहने वालीं ज़्यादातर लड़कियों के स्कूलों को बंद करवा दिया गया है और ग़रीबी बढ़ती जा रही है.
लेकिन पिछले चार दशकों में ये पहला मौका है जब अफ़ग़ानिस्तान युद्ध और हिंसा का सामना नहीं कर रहा है और भ्रष्टाचार में भी भारी कमी आई है.
पिछले साल जब तालिबान अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता को अपने हाथों में ले रहा था तब बीबीसी की टीम वहां मौजूद थी.
इस दौरान उनकी मुलाक़ात कई तालिबानी लड़ाकों और अफ़ग़ानी लोगों से हुई थी. बीबीसी ने अफ़ग़ानिस्तान वापस जाकर इन लोगों से मिलकर उनकी ज़िंदगी में आए बदलावों को समझने की कोशिश की है.
काग़ज-कलम घिसता तालिबानी स्नाइपर
स्नाइपर से आशय सशस्त्र बलों में शामिल उन लड़ाकों से है जो लॉन्ग रेंज वाली बंदूक की मदद से दुश्मन पर निशाना लगाते हैं.
पिछले साल गर्मियों में जब तालिबानी लड़ाके धीरे-धीरे पूर्ववर्ती अफ़ग़ान सरकार के सैन्य बलों कर हराकर इलाके जीत रहे थे, तब बाल्ख प्रांत के उत्तरी ज़िले में एक कट्टर तालिबानी लड़ाके आइनुद्दीन से हमारी मुलाकात हुई.
मैंने उनसे पूछा कि वह हिंसा को कैसे सही ठहरा सकते हैं तो इस पर उन्होंने कहा कि, "हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि आम लोगों को नुकसान न हो. लेकिन ये जंग है और लोग मरेंगे. हम अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक सिस्टम के सिवाए कुछ और स्वीकार नहीं करेंगे."
हमारी बातचीत ज़्यादा देर तक नहीं चली, युद्ध चल रहा था और अफ़ग़ान सेना के हवाई हमलों का ख़तरा लगातार बना हुआ था.
कुछ महीनों बाद तालिबान ने काबुल में सत्ता की बागडोर संभाल ली तो आइनुद्दीन से मेरी मुलाक़ात अफ़ग़ानिस्तान को उज्बेकिस्तान से अलग करने वाली नदी अमु दरिया के किनारे हुई.
नई ज़िंदगी
इस नदी के किनारे बैठकर भुनी हुई मछली खाते हुए आइनुद्दीन ने मुझे बताया कि वह तालिबान का स्नाइपर था. उसने कहा कि उसने अफ़ग़ान सेना के दर्जनों सैनिकों की हत्या की होगी और खुद भी दस बार जख़्मी हुआ है.
लेकिन तालिबान के सत्ता में आने के बाद उसे बाल्ख प्रांत में भूमि और शहरी विकास विभाग का निदेशक बनाया गया है.
तालिबान की सरकार बनने के कुछ दिनों बाद जब मेरी आइनुद्दीन से दोबारा मुलाक़ात हुई तो मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्हें 'जिहाद' वाले दिन याद आते हैं. इस पर उन्होंने तुरंत कहा - हां.
इस मुलाकात के साल भर बाद जब मैं आइनुद्दीन से मिला तो वह एक ऑफिस में इस्लामिक एमीरेट्स के काले-सफेद झंडे के पीछे बैठे थे. उन्हें देखकर ऐसा लगा कि वह अभी भी अपनी नई ज़िंदगी में ढलने की कोशिश कर रहे हैं.
लेकिन वह अपनी मौजूदा भूमिका के महत्व को स्वीकार करते हैं.
वह कहते हैं, "हम अपने दुश्मनों के ख़िलाफ़ बंदूकों से लड़ रहे थे. अल्लाह का शुक्र है कि हमने उन्हें मात दी. अब हम कलम के ज़रिए अपने लोगों की सेवा करने की कोशिश कर रहे हैं."

तालिबानी लड़ाके
आइनुद्दीन कहते हैं कि वह जंग के दिनों में ख़ुश थे और अब भी ख़ुश हैं.
हालांकि, जंग के मोर्चे पर लड़ चुके कुछ तालिबानी लड़ाके निजी बातचीत में कहते हैं कि वे अपनी ऑफिस की नौकरियों से बोर हो रहे हैं.
आइनुद्दीन अपने दफ़्तर में जिन लोगों के काम पर नज़र रखते हैं, उनमें से ज़्यादातर को पिछली सरकार में नौकरी पर रखा गया था.
शहर के दूसरे हिस्सों में हमें कुछ लोगों से ये शिकायत सुनने को मिली कि उनसे उनकी नौकरियां छीनकर तालिबानी लड़ाकों को दे दी गयी हैं.
मैंने आइनुद्दीन से पूछा कि क्या वे इस नौकरी के लिए योग्य हैं या नहीं.
सैन्य पृष्ठभूमि
इस पर आइनुद्दीन ने कहा, "हमें सैन्य शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा भी मिली है. हम सैन्य पृष्ठभूमि से भले ही आए हों और अब लोगों के बीच काम कर रहे हों. लेकिन आप हमारे और पिछली सरकार के काम की तुलना करके देख सकते हैं कि किसने बेहतर नतीजे दिए हैं."
लेकिन वह ये भी कहते हैं कि गुरिल्ला युद्ध की तुलना में "प्रशासनिक काम ज़्यादा कठिन है. युद्ध आसान था क्योंकि उसमें ज़िम्मेदारियां कम थीं."
दशकों तक सत्ता के ख़िलाफ़ संघर्ष करने के बाद तालिबान आख़िरकार अफ़ग़ानिस्तान पर शासन करने वालों में तब्दील हो रहा है. ऐसे में पूरा तालिबानी आंदोलन उस चुनौती का सामना कर रहा है जिसकी ओर आइनुद्दीन समेत अन्य लड़ाकों ने इशारा किया.
दुनिया भर में तालिबान और पूर्ववर्ती अफ़ग़ान सरकार के बीच संघर्ष की ख़बरें तब पहुंचती थीं जब किसी बड़े अफ़ग़ानी शहर में बम धमाका होता था.
लेकिन सालों तक चले इस भयानक युद्ध का ज़्यादातर हिस्सा ग्रामीण इलाकों में लड़ा गया है.

सीमावर्ती गांवों के हालात सुधरे
इन संघर्षों में एक तरफ तालिबानी लड़ाके होते थे और दूसरी तरफ़ अंतरराष्ट्रीय बलों द्वारा समर्थित अफ़ग़ान सेना होती थी. और बीच में फंसते थे गांवों में रहने वाले आम लोग.
कुछ लोग मानते हैं कि दोनों पक्षों में ज़्यादा फर्क नहीं था. और उनकी मूल इच्छा यही थी कि शांति व्यवस्था कायम हो.
अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर तालिबान के कब्जे के कुछ समय बाद हम काबुल के दक्षिण पूर्व में स्थित लोगर प्रांत के पदख्वाब गांव पहुंचे थे.
स्थानीय लोग हमें उनके घरों और ज़िंदगियों पर पड़े युद्ध के असर को दिखाना चाहते थे.
टाइल बनाने वाले समीउल्लाह बताते हैं, "हालात बहुत ख़राब होते थे. हम कुछ भी नहीं कर पाते थे. बाज़ार भी नहीं जा पाते थे. अब अल्लाह का शुक्र है कि हम हर जगह जा सकते हैं."
पदख़्वाब जैसे गांवों में रहने वालों लोगों के विचार शहरी आबादी की तुलना में तालिबानी मूल्यों से ज़्यादा मेल खाते हैं.

अंतरराष्ट्रीय मदद
पिछली सरकार में भी महिलाएं सार्वजनिक जगहों पर अपने चेहरे ढककर रखती थीं और कभी कभी ही बाज़ार जाया करती थीं.
हम पिछले हफ़्ते यहां आए तो हमने देखा कि बाज़ार की दीवारों पर लगे गोलियों के निशान भर दिए गए हैं. और स्थानीय नागरिक बेहतर सुरक्षा व्यवस्था के लिए अभी भी शुक्रगुज़ार दिखे.
एक दर्जी गुल मोहम्मद कहते हैं, "पहले कई लोग, ख़ासकर किसान संघर्ष में घायल हो जाते थे या उनकी मौत हो जाती थी. कई दुकानदारों को गोलियां मारी गयी हैं."
अमेरिकी सेना की वापसी के बाद से अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था लगातार गिर रही है. इसके साथ ही अफ़ग़ानिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मदद मिलना बंद हो गयी. ये रकम अफ़ग़ानिस्तान के बजट की 75 फीसद थी.
अंतरराष्ट्रीय बैंकों ने प्रतिबंधों का उल्लंघन करने के डर से एक हद तक ट्रांसफर पर प्रतिबंध लगा दिए हैं. तालिबान अमेरिका पर अफ़ग़ानिस्तान के सेंट्रल बैंकों के रिज़र्व को फ्रीज़ करने का आरोप लगाता है.

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'अर्थव्यवस्था तबाह हो गई है'
पश्चिमी राजनयिक लगातार कहते आए हैं कि तालिबान की महिलाओं के प्रति दमनकारी नीतियों के चलते अफ़ग़ान नागरिकों की मदद सरकार के ज़रिए नहीं की जा सकती.
इस संघर्ष की वजह से अफ़ग़ानी शहरों में रहने वाले मध्यवर्गीय परिवारों ने अपनी कमाई में भारी गिरावट देखी है क्योंकि पहले तो सरकारी कर्मचारियों की तनख़्वाहें नहीं मिलीं और उसके बाद तनख़्वाहें काट ली गयीं.
वो वर्ग जो पहले से ही आर्थिक रूप से परेशान था, उसके लिए अपने परिवार पालना मुश्किल हो गया है. पदख़्वाब में रोजमर्रा की चीजों के दाम काफ़ी बढ़ गए हैं. और लोग रोजगार की कमी से परेशान हैं.
समीउल्लाह कहते हैं, "अर्थव्यवस्था तबाह हो गई है, न काम है और न नौकरी. सब लोग विदेशों में रहने वाले रिश्तेदारों पर निर्भर हैं."
गुल मोहम्मद कहते हैं, "लोग आटा नहीं ख़रीद पा रहे हैं, मांस या फल खरीदने की बात छोड़ दीजिए." हालांकि, समीउल्लाह कहते हैं, "ये सही है कि पहले पैसा ठीक-ठाक था लेकिन हम पर दमन ज़्यादा होता था."

यूट्यूबर अभी भी बना रही हैं वीडियो
ये कहते हुए वे गांवों में मौजूद रही पूर्व अफ़ग़ान सरकार के सैन्य बलों पर दमन करने का आरोप लगाते हैं.
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की खुली आलोचना सुनना काफ़ी दुर्लभ होता जा रहा है. लेकिन तालिबान की जीत ने कुछ लोगों की ज़िंदगियां बेहतर कर दी हैं.
हालांकि, कई लोग महसूस करते हैं कि उन लोगों ने जिस देश को खड़ा किया था, वो उनके सामने गायब होता दिख रहा है और वे आने वाले दिनों को लेकर चिंतित हैं.
पिछले साल तालिबानी सैनिक जब काबुल में घुसे तो लोग डरे हुए थे. तालिबान ने सालों तक काबुल में आत्मघाती हमलों और सुनियोजित हत्याएं की थीं.
लेकिन यूट्यूब पर वीडियो बनाने वालीं रोइना ने तालिबान से बात करने का फ़ैसला किया.
पिछले साल अगस्त में रोइना ने बीबीसी से कहा था कि "महिलाओं और पुरुषों के अधिकार बराबर हैं"
दुनिया भर में बेचैनी
लेकिन तब उन्हें ये पता नहीं था कि वह आगे काम कर पाएंगी या नहीं. इसके एक साल बाद भी असमंजस जारी है. और ये असमंजस सिर्फ रोइना के मन में नहीं बल्कि पूरे देश में पसरा हुआ है.
तालिबान के शीर्ष नेतृत्व द्वारा लड़कियों के माध्यमिक विद्यालय बंद रखने के आदेश पर दुनिया भर में बेचैनी का भाव देखा गया है. तमाम अफ़ग़ानी लोगों और तालिबानी लड़ाकों के बीच भी इस आदेश को बेचैनी से देखा गया है.
नब्बे के दशक वाली तालिबान सरकार की तुलना में इस बार युवा लड़कियों को स्कूल जाने की इजाज़त दी गयी है. विश्वविद्यालयों में लैंगिक रूप से अलग कार्यक्रम लागू किए हैं. इस तरह मौजूदा महिला छात्राएं अपनी पढ़ाई जारी रख सकती है.
लेकिन तालिबानी नेतृत्व में प्रभावशाली और कट्टरपंथी तत्व टीनएज़ लड़कियों के स्कूल जाने देने से हिचक रहे हैं. ऐसा लगता है कि पिछले बीस सालों में महिला अधिकारों के क्षेत्र में जो कुछ प्रगति हुई है, वो अब ख़त्म हो रही है.
शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र की नौकरियों को छोड़ दिया जाए तो दूसरी सरकारी नौकरियों में काम करने वाली महिलाओं को काम पर वापस आने से मना कर दिया गया है.
तालिबान का आदेश
इसके बावजूद निजी क्षेत्र में काम करने वाली कुछ महिलाएं अभी भी काम कर पा रही हैं. रोइना अभी भी वीडियो बना रही हैं. वह अपना चेहरा तो नहीं लेकिन सिर ढक रही हैं.
काबुल में घूमते हुए वह काले रंग का अबाया और चेहरे पर सर्जिकल फेस मास्क पहनती हैं. तालिबान ने ये आदेश जारी किया है कि महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर अपने चेहरे ढककर रखने चाहिए.
लेकिन अभी इस आदेश का कड़ाई से पालन नहीं किया जा रहा है. और अभी भी बड़े शहरों में महिलाओं को सिर्फ बाल ढके हुए देखा जा सकता है.
तालिबान को संबोधित करते हुए अपनी मौजूदा ज़िंदगी पर बात करते हुए रोइना बड़े सधे हुए अंदाज़ में कहती हैं, "महिलाएं और लड़कियां हिजाब पहनती हैं.
और उन्हें उतनी आज़ादी मिलनी चाहिए जितनी इस्लाम में तय है. उनके अधिकार नहीं छीने जाने चाहिए. उन्हें काम और पढ़ने की इजाज़त मिलनी चाहिए."
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