अफ़ग़ानिस्तान: पाकिस्तान के पहले दौरे से तालिबान के विदेश मंत्री क्या हासिल कर पाए?

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- Author, अमृता शर्मा
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान प्रशासन के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुत्तक़ी के पाकिस्तान के पहले दौरे के बड़े नतीजे नहीं निकले. हालांकि दुनिया के दूसरे देशों से जुड़ने और अपनी सरकार को मान्यता दिलाने के तालिबान के प्रयासों पर इस दौरे का सकारात्मक असर हो सकता है.
10 नवंबर को हुई इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने द्विपक्षीय और आर्थिक संबंधों पर चर्चा की. मालूम हो कि 15 अगस्त को राजधानी काबुल पर क़ब्ज़े के बाद किसी भी तालिबानी मंत्री की यह पहली पाकिस्तान यात्रा थी.
अमीर ख़ान मुत्तक़ी वैसे 10 नवंबर को अफ़ग़ानिस्तान के मसलों पर पाकिस्तान द्वारा बुलाई गई बहुपक्षीय बैठक 'ट्रोइका प्लस' में शामिल नहीं हुए. लेकिन उन्होंने अमेरिका, रूस और चीन के विशेष प्रतिनिधियों से मुलाक़ात ज़रूर की. उनके इस कदम को अफ़ग़ानिस्तान मामलों पर हो रहे विचार-विमर्श में तालिबान के शामिल होने के अवसर के रूप में देखा गया.
अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़े के बाद से तालिबान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने के प्रयासों में पाकिस्तान सबसे आगे रहा है.

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'बड़ा अवसर'
अफ़ग़ान विदेश मंत्री की इस यात्रा से पाकिस्तान के साथ उसके संबंधों को फिर से स्थापित करने में मदद मिली. पिछले कुछ हफ़्तों से कहा जा रहा था कि तहरीक़-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) या पाकिस्तानी तालिबान के ख़िलाफ़ अफ़ग़ान सरकार के कोई सख़्त कदम न उठाने से दोनों देशों के संबंध ख़राब हो गए.
अफ़ग़ानिस्तान से लगती पाकिस्तान की सीमा के बंद होने, डूरंड रेखा और शरणार्थियों जैसे अन्य मुद्दों के कारण भी दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया था.
अपने इस दौरे के दौरान, मुत्तक़ी ने स्पष्ट किया कि तालिबान चाहता है कि उसकी विदेश नीति और पाकिस्तान के साथ संबंधों में "संतुलन" हो. उन्होंने कहा, "हमें अतीत का क़ैदी बनकर नहीं रहना चाहिए."
उन्होंने यह भी पुष्टि की कि टीटीपी और पाकिस्तान सरकार के बीच हो रही बातचीत में तालिबान ने मध्यस्थता की, जिसके चलते 8 नवंबर से एक महीने के लिए युद्धविराम लागू हुआ है.
डॉन अख़बार में सुरक्षा मामलों के विश्लेषक मुहम्मद अमीर राणा के अनुसार, यह बातचीत "तालिबान प्रशासन को अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी चरमपथियों के जमघट से निपटने की उसकी इच्छाशक्ति और क्षमता साबित करने का एक बड़ा अवसर देती है."
उन्होंने लिखा, "वहां के चरमपंथी समूहों पर कार्रवाई करके तालिबान चीन, रूस और मध्य एशिया के देशों का भरोसा भी जीत सकता है."

कारोबार को बढ़ावा
इस दौरे ने दोनों देशों के बीच के व्यापार संबंधों को मज़बूत करने की दिशा में भी काम किया है. दोनों देश सीमा पार माल की आवाजाही शुरू करने को लेकर सहमत हुए.
मुत्तक़ी ने अफ़ग़ानिस्तान की अनूठी भौगोलिक स्थिति को "पूरे इलाक़े का संपर्क बिंदु" भी क़रार दिया.
उनके इस दौरे से पहले, दोनों देशों के लिए अहम 'चमन बॉर्डर क्रॉसिंग' को फिर से खोल दिया गया. उससे पहले यात्रा दस्तावेज़ को लेकर एक महीने तक विवाद बना रहा. इससे सीमा शुल्क और अन्य करों में दोनों देशों को भारी नुक़सान हुआ.
क्षेत्रीय विचार-विमर्श
इस यात्रा ने अफ़ग़ानिस्तान के हालात पर होने वाले विचार-विमर्श में तालिबान की भागीदारी का रास्ता भी खोल दिया.
हालांकि मुत्तक़ी के नेतृत्व में गए प्रतिनिधिमंडल ने 10 नवंबर को अफ़ग़ानिस्तान पर हुई बहुपक्षीय बैठक में भाग नहीं लिया, पर उन्होंने अमेरिका, चीन और रूस के वरिष्ठ राजनयिकों से मुलाक़ात ज़रूर की.
पाकिस्तानी सीनेट कमेटी ऑन डिफेंस के अध्यक्ष मुशाहिद हुसैन सैयद ने दुनिया न्यूज़ टीवी को बताया कि यह बैठक काफ़ी अहम थी, क्योंकि "पहली बार अमेरिका के किसी प्रतिनिधि ने पाकिस्तान के ज़रिए अफ़ग़ान सरकार के प्रतिनिधि से मुलाकात की."
हाल में नई दिल्ली में अफ़ग़ानिस्तान पर हुई सुरक्षा वार्ता में तालिबान के प्रतिनिधि को नहीं बुलाया गया. इस बातचीत में ईरान, रूस, कज़ाक़िस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान के अधिकारी शामिल हुए. हालांकि, अफ़ग़ानिस्तान ने उस बैठक के नतीज़े का स्वागत किया.
भारत में हुई बैठक पर तालिबान के प्रवक्ता एनामुल्ला समांगानी ने टोलो न्यूज़ टीवी से कहा कि तालिबान "उम्मीद करता है कि भविष्य में होने वाले सम्मेलनों में वो सीधे भाग लेगा."

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मानवीय संकट
मुत्तक़ी ने अपने इस दौरे का इस्तेमाल अफ़ग़ानिस्तान के मानवीय संकट को उजागर करने के लिए भी किया. संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान के 2.28 करोड़ लोगों को इस सर्दी में खाने-पीने के सामानों की भयंकर क़िल्लत हो सकती है.
ट्रोइका प्लस की बैठक के बाद उसके भागीदारों ने मानवीय संकट को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अनुरोध किया कि अफ़ग़ानिस्तान के रोककर रखे गए 9 अरब डॉलर उसे दे दिए जाएं.
चीन के विश्लेषक कियान फेंग ने चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स को बताया, "यदि अमेरिका वास्तव में अफ़ग़ानिस्तान के मानवीय संकट को हल करने का इच्छुक है, तो उसे अफ़ग़ानिस्तान के 3.8 करोड़ लोगों के कल्याण की बात का इस्तेमाल तालिबान के ख़िलाफ़ करने के बजाय उसकी संपत्ति को प्रतिबंध से मुक्त करने के लिए करना चाहिए."
इस यात्रा के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा कि उनका देश भारत के दान किए गए गेहूं को पाकिस्तान के जरिए अफ़ग़ानिस्तान जाने देने की अनुमति देने के अनुरोध पर "अनुकूलता से विचार" करेगा.

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वैश्विक मान्यता का सवाल
दुनिया से अपने प्रशासन की मान्यता हासिल करना तालिबान प्रशासन की एक और प्रमुख चिंता है.
कई देशों ने तालिबान से अपील की है कि वो अपनी सरकार को समावेशी बनाने के साथ महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुनिश्चित करे, तभी उनकी सरकार को मान्यता दिया जा सकता है. यहां तक कि उसे काफ़ी मदद देने वाले देशों पाकिस्तान, क़तर और चीन ने भी अभी तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है.
तालिबान ने पाकिस्तान के न्योते को विदेशी प्रतिनिधियों के सामने अपना पक्ष रखने के अवसर के रूप में देखा. ट्रोइका प्लस सम्मेलन के बाहर उसने उसके भागीदारों के साथ बैठक की.
मुत्तक़ी ने इस्लामाबाद में कहा, "अफ़ग़ानिस्तान में हमारे पास सभी के लिए जीत वाली स्थिति बनाने का एक ऐतिहासिक अवसर है. नए विकास ने स्थिरता के नए अवसर खोले हैं."
तालिबान ने ब्रिटेन के चीफ़ ऑफ डिफ़ेंस स्टाफ़ जनरल सर निक कार्टर की एक टिप्पणी का भी जवाब दिया. उन्होंने कहा था कि ब्रिटेन को तालिबान के साथ जुड़ना चाहिए. तालिबान के एक प्रवक्ता ने कहा, "यदि कुछ मुद्दों पर कोई समस्या है, तो हम बातचीत के जरिए उन्हें हल करने को तैयार है."
तालिबान ने हाल में अमेरिका और क़तर के बीच हाल में हुए समझौते का भी स्वागत किया है. इस समझौते के बाद अब अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के हितों का प्रतिनिधित्व क़तर करेगा.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक अज़ीज़ मोरेज ने अफ़ग़ानिस्तान के निजी चैनल वन टीवी को बताया, "इससे तालिबान को अमेरिका की आधिकारिक मान्यता मिलने का रास्ता धीरे-धीरे साफ होगा. इससे तालिबान के साथ राजनयिक संबंध फिर से शुरू होंगे, और फिर धीरे-धीरे दूसरे देश भी नई सरकार को मान्यता देंगे."
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