राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी के अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने के आख़िरी घंटों में क्या हुआ था

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- Author, मोहम्मद मादी, अहमद ख़ालिद और सैयद अब्दुल्ला निज़ामी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
तालिबान ने सत्ता खोने के 20 साल बाद अफ़ग़ानिस्तान में एक नई सरकार के गठन की घोषणा की है. शिक्षा, अंतरराष्ट्रीय निवेश और लोकतांत्रिक भविष्य की उम्मीद के साथ पली-बढ़ी पीढ़ी को तालिबान की ये घोषणा अविश्वसनीय लग सकती है. लेकिन ऐसे में सवाल ये उठता है कि राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की सरकार इतनी जल्दी कैसे गिर गई?
तालिबान को मुल्क के एक बड़े शहर पर अधिकार करने से काबुल की देहरी तक पहुंचने में केवल दस दिन लगे.
ऐसा लगा जैसे काबुल में किसी को इसका अंदाज़ा नहीं था. अधिकांश विश्लेषक ये सोच रहे थे कि तालिबान तब तक काबुल पर नियंत्रण नहीं कर पाएगा जब तक कि बातचीत के ज़रिए कोई समझौता नहीं हो जाता.
लेकिन 15 अगस्त रविवार को सब कुछ बदल गया.
काबुल की दहलीज़ पर तालिबान के पहुंचने के कुछ ही घंटों के भीतर राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी और उनकी हुक़ूमत के अन्य आला अफ़सर मुल्क छोड़कर भाग गए. अफ़गान सेना और पुलिस के बचे लोगों ने अपनी वर्दी उतार दी और अंधेरे में साये की तरह ग़ायब हो गए.
अरबों डॉलर की सैन्य सहायता और 20 साल तक पश्चिमी देशों से ट्रेनिंग ले चुकी फ़ौज के साथ अफ़ग़ान हुक़ूमत तालिबान के सामने बर्फ़ की तरह पिघल गई.
विभिन्न स्रोतों से बातचीत के ज़रिये बीबीसी ने अफ़ग़ान हुक़ूमत के आख़िरी कुछ घंटों की कहानी जानने की कोशिश की है.

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शनिवार, 14 अगस्त
उच्चस्तरीय सूत्रों के मुताबिक़ शनिवार सुबह राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी के क़रीबी लोग फिक्रमंद तो थे लेकिन डरे हुए नहीं लग रहे थे.
राजधानी को सुरक्षित करने के लिए एक योजना तैयार की गई थी और अफ़ग़ानिस्तान में शीर्ष अमेरिकी सैन्य अधिकारी, सेनाध्यक्ष जनरल अली ज़ै और एडमिरल वेस्ले के बीच चर्चा हो रही थी. योजना का मक़सद तालिबान को बातचीत के लिए काबुल शहर के बाहर रोकना था.
देश के सबसे बड़े प्रांत हेलमंद में कमांडर रहे सामी सादात को काबुल की नई सुरक्षा टीम की कमान संभालना था. योजना के अनुसार, ज़रूरत पड़ने पर अफ़ग़ान फौज तालिबान से लड़ती, लेकिन कोशिश ये थी कि तालिबान को शांतिपूर्ण वार्ता के माध्यम से काबुल में दाखिल न होने के लिए राज़ी किया जाए.
अगर ऐसा नहीं हो पाता तो काबुल का प्रशासन शहर को खाली करने में कम से कम समय लेगा.
लेकिन जब लेफ़्टिनेंट जनरल सादात अभी भी अपनी पुरानी टीम के साथ थे. तालिबान उत्तर के सबसे बड़े शहर मज़ार-ए-शरीफ़ पर कब्ज़ा कर रहे थे, और पूर्वी शहर जलालाबाद में दाख़िल होने की कोशिश कर रहे थे. सीमित प्रतिरोध के बाद दोनों ही शहर तालिबान के नियंत्रण में आ गए.
काबुल तालिबान के अधीन आने वाला आख़िरी शहर था.
आईएमएफ के पूर्व अधिकारी अशरफ़ ग़नी सितंबर, 2014 में अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति चुने गए थे. आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रपति ग़नी अपने कार्यकाल के आख़िरी कुछ हफ्तों में कई बार तालिबान के ख़तरे का ठीक से अंदाज़ा लगाने में चूक गए.
लेकिन उनके ज़हन में अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नजीबुल्लाह के साथ जो कुछ हुआ था, वो ज़रूर आया होगा. अशरफ़ ग़नी ने एक मैसेज में इसका ज़िक़्र भी किया जिसमें उन्होंने देश छोड़ने की वजह बताई थी.
साल 1996 में जब तालिबान ने काबुल को अपने नियंत्रण में लिया था तो उन्होंने राष्ट्रपति नजीबुल्लाह को पकड़ लिया था. नजीबुल्लाह साल 1992 में ही इस्तीफ़ा दे चुके थे, लेकिन काबुल पर अफ़ग़ान मुजाहिदीनों के नियंत्रण करने के बाद वे देश नहीं छोड़ पाए.
इसलिए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की इमारत में पनाह ली. साल 1996 में तालिबान ने उन्हें काबुल में संयुक्त राष्ट्र के परिसर से बाहर निकाला और उनकी हत्या कर दी जिसके बाद उनके पार्थिव शरीर को राष्ट्रपति भवन के बाहर एक ट्रैफ़िक लाइट से लटका दिया गया.

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रविवार, 15 अगस्त
जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, काबुल के लोगों के बीच ख़बरें फैल रही थीं कि तालिबान शहर की दहलीज़ तक पहुंच गया है. ऐसी ख़बरें सुनकर आम लोगों की बेचैनी बढ़ने लगी. काबुल हवाई अड्डे और बैंकों के बाहर लंबी कतारें लगने लगीं.
लेकिन अब तक अशरफ़ ग़नी के क़रीबी साथियों को ये लग रहा था कि काबुल का पतन इतनी जल्दी नहीं होगा. काबुल में राष्ट्रपति भवन में काम करने वाले स्टाफ़ के लोग हमेशा की तरह ड्यूटी पर पहुंचे.
14 अगस्त को हुई वार्ता से लोगों को ये उम्मीद बंधी थी कि इतनी जल्दी अनिश्चितता पैदा नहीं होगी. अशरफ़ ग़नी के क़रीबी सहयोगी सलाम रहीमी तालिबान के साथ परदे के पीछे की बातचीत कर रहे थे और इस बात पर सहमति बनती दिख रही थी कि तालिबान काबुल पर बलपूर्वक कब्ज़ा नहीं करेगा और बदले में उन्होंने अंतरिम सरकार में संयुक्त शक्ति की पेशकश की थी.
इससे विदेशी नागरिकों को अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने के लिए समय मिल जाता और क़तर में चल रही वार्ता सफल हो जाती.

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काबुल के लोगों की हिम्मत बढ़ाने के लिए अशरफ़ ग़नी की टीम ने रविवार को एक वीडियो शेयर किया जिसमें उन्हें अपने इंटीरियर मिनिस्टर के साथ शहर की सुरक्षा पर चर्चा करते देखा जा सकता है.
इस वीडियो में उन्हें गृह मंत्री के साथ फ़ोन पर बात करते देखा जा सकता है. वीडियो से ऐसा लग रहा था कि तालिबान के साथ कोई समझौता होने वाला है और काबुल में कोई लड़ाई नहीं होगी.
लेकिन शायद इस मैसेज ने उनके वरिष्ठ मंत्रियों को भी प्रेरित नहीं किया.
बीबीसी के सूत्रों का कहना है कि राष्ट्रपति अपनी टीम के वरिष्ठ सदस्यों तक नहीं पहुंच पाए. उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह पहले ही पंजशीर घाटी जा चुके थे और रक्षा मंत्री बिस्मिल्लाह ख़ान से संपर्क नहीं हो रहा था. उनकी योजना बिगड़ती जा रही थी.

इस बीच, अफ़ग़ानिस्तान के क़रीब दर्जन भर राजनेता एक व्यावसायिक उड़ान से इस्लामाबाद जाने की तैयारी कर रहे थे. इनमें पूर्व उपराष्ट्रपति करीम ख़लीली और नेशनल असेंबली के अध्यक्ष मीर रहमान रहमानी भी शामिल थे.
प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य और कृषि मंत्रालय के एक अधिकारी शाकिब शरीफ़ी ने बाद में इस बात से इनकार किया कि उनकी यात्रा देश छोड़ने की कोशिश का हिस्सा थी.
उन्होंने कहा, "हमारा लक्ष्य पाकिस्तानी सरकार के हस्तक्षेप की बात करके रक्तपात को रोकना था."
लेकिन राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी नहीं चाहते थे कि वे लोग जाएं. शाकिब शरीफ़ी का कहना है कि अशरफ़ ग़नी को डर था कि हम कोई ऐसा समझौता न स्वीकार कर लें जिससे वो सत्ता से बाहर हो जाते.
विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रपति को ये लग रहा होगा कि नेशनल एसेंबली के अध्यक्ष को देश छोड़ने की इजाज़त देने से अराजकता बढ़ सकती है.
शाकिब शरीफ़ी का कहना है कि प्रतिनिधिमंडल के साथ एयरपोर्ट जाते समय उन्होंने शहर में हर तरफ़ दहशत का माहौल देखा.

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"हमने सुना था कि तालिबान काबुल की दहलीज़ पर आ गया था, लेकिन हमने सोचा था कि यह इतनी जल्दी नहीं होगा. इससे पिछली रात बहुत तनावपूर्ण थी और हम अपने हथियारों के साथ सोए थे."
"बैंकों के बाहर लोगों की कतारें थीं और डॉलर निकालने की कोशिश की जा रही थी. एयरपोर्ट के पास वाले इलाके में भारी ट्रैफ़िक था.
ट्रैफ़िक इतना ज़्यादा था कि उपराष्ट्रपति ख़लीली को समय पर हवाई अड्डे तक पहुंचने के लिए गाड़ी से उतरकर 15 मिनट पैदल चलना पड़ा था.
जब वे एयरपोर्ट पहुंचे तो उन्हें लगातार तालिबान के आगे बढ़ने की ख़बर मिल रही थी.
"हर पल ख़बर आती थी कि तालिबान ने शहर के प्रमुख हिस्सों पर कब्जा कर लिया है. ये सब बहुत डरावना था."
"हवाई अड्डे के अंदर भी अफ़रा-तफ़री का माहौल था, कायदे क़ानून जैसी कोई चीज़ वहां दिखाई नहीं दे रही थी."

बीबीसी के एक रिपोर्टर ने लोगों को आख़िरी उड़ानों की टिकट ख़रीदने के लिए दौड़ते-परेशान होते देखा. वीआईपी लोगों के आते ही कुछ लोगों के टिकट कैंसल किए जा रहे थे.
धीरे-धीरे, सीमा अधिकारी और हवाई अड्डे के सुरक्षाकर्मी भी ग़ायब होने लगे और लोग एयरपोर्ट के टरमैक की ओर जाने लगे.
शाक़िब शरीफ़ी का प्रतिनिधिमंडल आख़िरकार पीआईए की उड़ान में सवार हो गया. लेकिन एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल ने विमान को उड़ान नहीं भरने दी.
शरीफ़ी ने कहा, "हमें लगा कि तालिबान किसी भी समय हवाई अड्डे पर कब्ज़ा कर लेगा. हम सोच रहे थे कि अगर वे विमान में चढ़ गए तो हम अपना बचाव कैसे करेंगे. केवल एक चीज़ जो मैं देख सकता था, वह थी मेरे लैपटॉप की बैटरी जिसका ज़रूरत पड़ने पर मैं इस्तेमाल कर सकता था."
रविवार की दोपहर
इस बीच राष्ट्रपति भवन में स्थिति बिगड़ती जा रही थी. अशरफ़ ग़नी अभी भी रक्षा और गृह मंत्रालयों में अपने शीर्ष अधिकारियों तक पहुंचने की हिम्मत के साथ कोशिश कर रहे थे. लेकिन ज़ाहिर तौर पर वे सफल नहीं हो रहे थे.
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बीबीसी को बताया, "ऐसा लग रहा था कि पूरी सरकारी मशीनरी चरमरा गई है और उच्च पदस्थ अधिकारियों सहित लोग विभाजित हो गए हैं. इनमें से कोई भी समूह, दूसरों के बारे में कुछ नहीं जानता था.
"हम राष्ट्रपति भवन से मार्गदर्शन की उम्मीद कर रहे थे. लेकिन वहां से कोई संदेश नहीं आ रहा था."
ख़ुद अशरफ़ ग़नी के चारों ओर का घेरा तेजी से सिकुड़ रहा था, बाकियों से अलग-थलग पड़ रहा था. कई सूत्रों ने बीबीसी को बताया कि ग़नी के साथ एकमात्र प्रमुख निर्णयकर्ता उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, हमदुल्ला मोहिब और उनके चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़, फ़ज़ल फ़ाज़ली थे.
संयुक्त राज्य अमेरिका में राजदूत रह चुके पश्चिम देशों में पढ़े-लिखे 38 वर्षीय हमदुल्ला मोहिब अशरफ़ ग़नी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी थे. इस तथ्य के बावजूद कि मोहिब की कोई सैन्य या सुरक्षा पृष्ठभूमि नहीं है, अशरफ़ ग़नी ने उन्हें 2018 में अपना राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया था और उन्हें महत्वपूर्ण सैन्य निर्णय लेने का अधिकार दिया था.
राष्ट्रपति भवन के अंदरूनी सूत्रों ने हमें बताया कि दोपहर के आसपास हमदुल्ला मोहिब ने जबरन निकासी के लिए ज़ोर देना शुरू कर दिया. एक घंटे पहले महल के बाहर गोलियों की आवाज सुनाई दी. मौजूद लोगों के मुताबिक़ अशरफ़ ग़नी ख़ुद जाने से कतरा रहे थे. मोहिब ने राष्ट्रपति को बताया कि उनकी जान को ख़तरा है.
राष्ट्रपति भवन के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा, "मोहिब ने ग़नी से कहा कि तालिबान राष्ट्रपति भवन की ओर जा रहे हैं और वे उन्हें पकड़कर मार डालेंगे. वे बहुत परेशान थे."
वहीं पूरे काबुल में अनिश्चितता का माहौल गहराता जा रहा था.

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काबुल के एक निवासी ने बीबीसी को बताया, "मैं दफ़्तर में था, और दोपहर क़रीब दो बजे तक, सोशल मीडिया शहर के अंदर तालिबान लड़ाकों की मौजूदगी की तस्वीरों से भरा हुआ था. साथियों ने देश छोड़ने के लिए पैकिंग शुरू कर दी थी."
"हम एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे. जब मैं ऑफिस से निकला तो सड़कों पर भीड़ थी. दुकानें बंद थीं. मैंने गोलियों की आवाज़ें सुनीं."
कई सूत्रों का कहना है कि राष्ट्रपति के निजी सुरक्षा गार्ड राष्ट्रपति भवन से भागने की उनकी योजना के ख़िलाफ़ थे. जब राष्ट्रपति ग़नी, उनकी पत्नी और उनके दल को लेने के लिए तीन हेलीकॉप्टर महल में पहुंचे तो चालक दल और बाकी अंगरक्षकों के बीच गरमागरम बहस हुई.
बताया जाता है कि जब लोग हेलीकॉप्टर में सवार हो रहे थे तो उनके बैग ज़मीन पर फेंक दिए गए थे. कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया था कि पैसे का इस्तेमाल गार्डों को भुगतान करने के लिए किया जाना था. हालाँकि इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना नामुमकिन है.
अशरफ़ ग़नी ने ख़ुद यूएई पहुंचने के बाद एक संदेश में इन आरोपों से इनकार किया कि उन्होंने कोई बड़ी रकम लेकर देश छोड़ा है.
तड़के क़रीब साढ़े तीन बजे राष्ट्रपति ग़नी और उनके क़रीबी हमदुल्ला मोहिब और फ़ाजली समेत कुछ लोग हेलीकॉप्टर से राष्ट्रपति भवन से निकल गए.
वे वहां से उज्बेकिस्तान के टरमेज़ पहुंचे और फिर संयुक्त अरब अमीरात गए. राष्ट्रपति ग़नी के देश छोड़ने कुछ देर बाद विजयी, लेकिन स्पष्ट रूप से चकित तालिबान लड़ाके राष्ट्रपति भवन में उसी मेज़ पर बैठे थे, जहां राष्ट्रपति ग़नी कुछ घंटे पहले बैठे थे. ये तस्वीरें दुनिया भर में देखी गईं.

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इन तस्वीरों में ग़नी की सुबह की कॉन्फ़्रेंस कॉल के दौरान मेज़ पर रखी एक किताब अभी भी दिखाई दे रही थी. ग़नी के जाने के बाद शायद किसी ने उसे छुआ तक नहीं था. लेकिन अब तालिबान एक नया अध्याय शुरू कर रहे थे.

उधर, अन्य वरिष्ठ सरकारी अधिकारी एयरपोर्ट पर अशरफ़ ग़नी का इंतजार कर रहे थे. ग़नी के भागने की ख़बर अभी सामने नहीं आई थी.
वो आख़िरी घंटा
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, "मैं सचमुच हवाई अड्डे पर इंतजार कर रहे मंत्रियों सहित दो दर्जन उच्च पदस्थ अधिकारियों की गिनती कर सकता हूं." सब एक दूसरे से राष्ट्रपति ग़नी के बारे में पूछ रहे थे. लेकिन किसी को पता नहीं लग रहा था कि वे कहां हैं?
पीआईए की उड़ान पीके6250, शरीफ़ी और उनके प्रतिनिधिमंडल के अन्य सदस्यों के साथ, साढ़े चार घंटे तक हवाई अड्डे पर रुकी रही. हवाई अड्डे का एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल मौन था.
उड़ान के बारे में पायलट को फैसला करना था.
हवाईअड्डे के दूसरी तरफ़ चिनूक हेलीकॉप्टरों और अन्य अमेरिकी सैन्य विमानों में सैनिक लगातार उड़ान भर रहे थे.
पायलट मक़सूद बजरानी ने बिना अनुमति के उड़ान भरने का फ़ैसला किया. इस साहसिक निर्णय के कारण उन्हें पाकिस्तान में एक नायक के रूप में शोहरत मिली. उन्होंने स्थानीय मीडिया को बताया कि रनवे पर वे दो सौनिक विमानों के पीछे निकल लिए.
बाद में शरीफ़ी ने अफ़ग़ान प्रतिनिधिमंडल के बचाव की कहानी सुनाई.
"हम बहुत खुश थे कि हमारी उड़ान ने आख़िरकार उड़ान भरी, लेकिन साथ ही हम दुखी भी थे क्योंकि हमें यक़ीन नहीं था कि हम कब लौट पाएंगे."
उस समय उन्हें नहीं मालूम था कि राष्ट्रपति पहले ही देश छोड़ चुके हैं.

कुछ दिनों बाद, राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी संयुक्त अरब अमीरात से फ़ेसबुक पर लाइव दिखाई दिए, जहां उन्हें 'इंसानियत' की बुनियाद पर रहने की अनुमति दी गई है.
राष्ट्रपति ग़नी को जरूरत के समय अपने देश से भागने के लिए व्यापक आलोचनाओं को सामना करना पड़ा. अशरफ़ ग़नी ने फ़ेसबुक पर अपने बयान में अपने देश से भागने के अपने फ़ैसले पर सफ़ाई देने की कोशिश की.
उन्होंने कहा, "काबुल छोड़ने का फ़ैसला मेरा नहीं था. ये निर्णय मेरी क़रीबी सुरक्षा टीम ने लिया था. मैं अगर वहां होता तो ख़ून-ख़राबा हो जाता."
"और 25 साल पहले अफ़ग़ानिस्तान में जो हुआ था, वह फिर से होने जा रहा था. मुझे अफ़ग़ानिस्तान के लोगों की आंखों के सामने फांसी पर लटका दिया जाता और यह हमारे इतिहास में एक भयानक आपदा होती."

रविवार दोपहर तालिबान ने जिस तेजी से काबुल पर क़ब्ज़ा किया, वह कुछ लोगों के लिए हैरान करने वाला था, लेकिन देश के अन्य हिस्सों से इसके संकेत मिलने शुरू हो गए थे.
बीबीसी न्यूज़ को स्थानीय स्तर पर सौदेबाज़ी के बारे में कुछ जानकारी मिली है, जिसके अनुसार एक दक्षिणी प्रांत तालिबान को सौंप दिया गया था.
पाकिस्तानी सीमावर्ती प्रांत ज़ाबुल में तालिबान के एक सूत्र ने कहा कि साल 2014 में इस प्रांत से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद अफ़ग़ान सौनिकों को बिना किसी मदद के छोड़ दिया गया था.
ज़ाबुल के शिनकाई ज़िले में तालिबान से वार्ता करने वाले एक दल ने बीबीसी को बताया, "जब अमेरिकी सेना ज़ाबुल पहुंची, तो उन्होंने पेशेवर चौकियां और ठिकाने बनाए. लेकिन जब वे चले गए, तो अफ़ग़ान सेना को मदद पहुंचाने में नाकाम रही. तालिबान ने उनकी आपूर्ति लाइनों को काट दिया और अफ़ग़ान सेना के लिए कार्य करना असंभव बना दिया था.
तालिबान लड़ाके, जो पहले से ही अधिकांश ग्रामीण इलाकों पर नियंत्रण कर चुके थे, धीरे-धीरे चौकियों पर कब्जा कर रहे थे, अफ़ग़ान सेना को वापस अपने बैरक में जाने के लिए मजबूर कर रहे थे.
जून, 2021 के मध्य तक ज़ाबुल में स्थिति स्पष्ट रूप से तालिबान के पक्ष में थी.
ज़ाबुल के शिनकाई ज़िले में तालिबान वार्ता दल के एक सदस्य ने बीबीसी को बताया, "हमने अपनी स्थानीय परंपराओं के अनुसार आदिवासी जिरगा के साथ बातचीत करने का फ़ैसला किया."
यह वार्ता 15 जून से दो दिनों तक चली और इसमें सभी पक्षों के दर्जनों प्रतिनिधि शामिल थे, जिसका नेतृत्व एक स्थानीय तालिबान कमांडर मुख़लिस ने किया और इसकी अध्यक्षता ज़ाबुल के डिप्टी गवर्नर इनायतुल्ला होटक ने की. मेज़ पर दो मुख्य विषय थे: अफगान सेना की सुरक्षा की गारंटी कैसे दी जाए और तालिबान और स्थानीय लोगों के बीच हथियार कैसे वितरित किए जाएं.
अगले दिन, एक समझौता हुआ जिसमें कबायली नेताओं ने तालिबान को अफ़ग़ान सेना और हथियार सौंपने पर सहमति व्यक्त की जिन्होंने उन्हें प्रांतीय राजधानी कलात के लिए एक सुरक्षित मार्ग का आश्वासन दिया.
प्रत्येक सैनिक को 5,000 अफ़ग़ानी रुपया, व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए एक हल्का हथियार और शहर को खाली करने के लिए पर्याप्त वाहनों का इंतज़ाम किया गया था.
तालिबान के नियंत्रण में कलात जाने के लिए सैकड़ों अफ़ग़ान सैनिक 16 जून को शिनकाई से रवाना हुए थे.
हमारे सूत्रों का कहना है कि एक के बाद एक, ज़ाबुल में कई अन्य स्थानीय बैरकों ने ऐसे ही समझौतों पर हस्ताक्षर किए जो सुरक्षित मार्ग की गारंटी देते थे.
कुछ दिनों बाद तालिबान ने काबुल पर क़ब्ज़ा कर लिया.

अफ़ग़ानिस्तान में कई लोगों के लिए, रविवार, 15 अगस्त, उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ है क्योंकि वे एक उज्जवल भविष्य से अनिश्चित भविष्य की यात्रा पर निकल पड़ते हैं.
काबुल के एक निवासी ने हमें बताया कि जैसे-जैसे रात हुई, लोगों ने महसूस किया कि चीज़ें हमेशा के लिए बदल गई हैं.
"अब बाहर अंधेरा और सन्नाटा है. यह अब तक की सबसे दुखद रात है. काबुल की सांसें थम गई हैं.
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