दिल्ली में रहने वाली अफ़ग़ान लड़की अदीबा क़य्यूमी ने कहा- तालिबान से नफ़रत, वे कभी नहीं जीत पाएँगे

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अफ़ग़ानिस्तान के केंद्रीय प्रांत परवान से आने वाली 21 साल की अदीबा क़य्यूमी, तालिबान को चुनौती दे रही है कि वे कभी नहीं जीत पाएँगे.
बीबीसी से बातचीत में वे ग़ुस्से से कहती हैं, ''मैं सबसे ज़्यादा नफ़रत तालिबान से करती हूँ और मैं आप (तालिबान) से हार नहीं मानने वाली हूँ. तालिबान ने अफ़ग़ान औरतों और उनके सपनों के बीच दीवार खड़ी कर दी है और लेकिन हम ये दीवार अपनी आवाज़ के ज़रिए तोड़ कर रहेंगे.''

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15 अगस्त को तालिबान ने काबुल को अपने नियंत्रण में ले लिया था. उसके बाद से एयरपोर्ट पर लोगों के भागने का मंजर, दिल दहला देने वाली तस्वीरें और कहानियाँ लगातार सामने आ रही हैं.
अदीबा क़य्यूमी कहती हैं कि जब उन्हें इस ख़बर के बारे में पता चला तो उनका पूरा परिवार रोने लगा और उन्होंने अपनी बहन को फ़ोन किया, जो अफ़ग़ानिस्तान में ही है.

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वो दो घंटें कितने बैचेनी और परेशान करने वाले थे, वे शब्दों में बयाँ नहीं कर सकती.
वे बताती हैं, ''हम लगातार अपनी बहन से संपर्क करने की कोशिश कर रहे थे. दो घंटे तक हमारा उससे संपर्क नहीं हो पाया. लेकिन जैसे ही उसने फ़ोन उठाया हमने उसे अपने परिवार के साथ रिश्तेदारों के घर भाग जाने को कहा क्योंकि अगर तालिबान उनके बारे में जान जाते, तो उन्हें पक्का मार देते.''
अदीबा बहुत रुआंसी आवाज़ में बताती हैं कि जब उन्हें तालिबान के कब्ज़े की ख़बर के बारे में पता चला तो उनकी आँखों के सामने वहीं मंजर तैरने लगा, जब साल 2019 में वे अफ़ग़ानिस्तान से भाग कर भारत आई थी.
अदीबा क़य्यूमी का परिवार अफ़ग़ानिस्तान के परवान प्रांत में रहता था.
वे नवंबर के महीने में आए थे और भारत में कुछ महीने बाद ही लॉकडॉउन लग गया था.

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देश क्यों छोड़ा?
दिल्ली के भोगल इलाक़े में अपने परिवार के साथ रह रही अदीबा अपने देश को छोड़ने का कारण बताते हुए कहती हैं, "मेरी माँ वहाँ नागरिक अधिकारों के लिए काम करती थीं. उन्हें लगातार मारने की धमकी मिल रही थी. मेरी कज़न फ़रिश्ता भी वहाँ लोगों के अधिकारों के लिए काम कर रही थी और उसे मार दिया गया. हमें जिंदगी की ख़तरा था और ऐसी स्थिति में हमें अपना वतन छोड़ कर आना पड़ा."
वे कहती हैं, ''मेरा तालिबान के साथ बहुत ख़राब अनुभव रहा है. वो बहुत बुरे हालात थे, जब हम यहाँ भागकर आए. मुझे अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़नी पड़ी. मेरा पूरा साल बर्बाद हो गया. मैं यहाँ अब एक ट्रांसलेटर का काम करती हूँ. मैं इंतज़ार कर रही हूँ कि कहीं किसी कोर्स में दाखिला ले सकूँ.''
'सपने टूट गए'

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वे बीबीसी को अपना दुख बताते हुए कहती हैं, ''जब मैं किसी डॉक्टर को सफ़ेद ऐप्रन पहने देखती हूँ, तो मुझे महसूस होता है कि मैं भी ऐसी ही दिखती. लेकिन अब मैं एक अनुवादक हूँ, समझिए मैं कैसा फ़ील करती हूँ, सिर्फ़ तालिबान की वजह से.''
अदीबा क़य्यूमी अफ़ग़ानिस्तान में बैचलर ऑफ़ मेडिसिन और बैचलर ऑफ़ सर्जरी (एमबीबीएस) की पढ़ाई कर रही थीं और ये उनका पहला साल था, जब उन्हें अफ़ग़ानिस्तान छोड़ना पड़ा.
उन्हें 12वीं में 99.85 फ़ीसदी अंक प्राप्त हुए थे और वे टॉपर थीं.
अपील
इसी साल की 17 अगस्त को अदीबा क़य्यूमी ने ऑनलाइन याचिका शुरू की है. इसके ज़रिए वे दुनियाभर की सरकारों से अफ़ग़ानिस्तान से भाग कर आई महिलाओं और बच्चों के लिए शरण देने के लिए अपील कर रही है.
उनकी इस अपील पर अब तक देश-विदेश से क़रीब चार लाख से ज़्यादा लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं
इस बीच दिल्ली के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के दफ़्तर के बाहर अफ़ग़ान नागरिक शरणार्थी दर्जा पाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं.
इस प्रदर्शन का हिस्सा अदीबा भी रही है और वहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. लेकिन अभी तक उन्हें अपनी अपील का कोई जवाब नहीं मिला है.
इधर ये संकेत मिल रहे हैं कि तालिबान 'इस्लामिक अमीरात' वाली नई सरकार का खाका जल्द दुनिया के सामने रखने वाला है.
हालाँकि तालिबान की तरफ़ से ऐसी ख़बरें भी आ रही है कि उनकी एक समावेशी सरकार होगी, जिसमें महिलाओं को भी शामिल किया जाएगा.
लेकिन इन वक्तव्यों पर अदीबा को ज़रा भी भरोसा नहीं है.
वे कहती हैं कि तालिबान महिलाओं का आदर नहीं करते और उनकी सरकार बनाने की बातें सिर्फ़ शब्दों तक ही सीमित रहेगी.
भरोसा

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उनके अनुसार, ''हम उनकी सरकार को स्वीकार नहीं करते. ''वे हमें पढ़ने और नौकरी की अनुमति दें.''
अदीबा कहती हैं कि उन्होंने तालिबान का दौर नहीं देखा लेकिन उनकी माँ ने देखा है.
साल 1996 से लेकर 2001 तक अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सत्ता पर काबिज़ रहे थे.
वे कहती हैं, "मैंने अपनी माँ से उनकी ज़्यादातियों के बारे में जाना है. वे बहुत मुश्किल से पढ़ाई पूरी कर पाई और एक मकाम तक पहुँची. वे वहाँ एक सफल महिला था. अब सिर्फ़ घर का काम देखती हैं और मेरे पिता बेरोज़गार हैं."
उन्होंने बताया कि तालिबान के जाने के बाद वहाँ विकास हो रहा था, लड़कियों को पढ़ने, नौकरी करने की आज़ादी थी. अब वे दोबारा लौट कर आए हैं, तो हमारे देश को फिर वैसा ही बना देंगे जैसा उन्होंने छोड़ा था. इसलिए हम इनकी सरकार पर भी विश्वास नहीं कर सकते
वे कहती हैं कि वे अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं से अपील करेंगी कि वे एकजुट हो और तालिबान के सामने ना झुकें. सबको एक साथ रहकर अपनी आवाज़ उठानी होगी.
उनके अनुसार, "भारत बहुत अच्छा देश हैं लेकिन हमारे पास कोई अधिकारिक दस्तावेज़ नहीं है. हम आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं लेकिन हमें जो देश नागरिकता देगा, हम वहीं रहने के लिए तैयार हैं."
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