तालिबान के डर से छिपी हुई हैं अफ़ग़ानिस्तान की महिला क्रिकेट खिलाड़ी

काबुल

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    • Author, जॉर्ज राइट
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

एसेल समेत अफ़ग़ानिस्तान की महिला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट टीम की कई खिलाड़ी ख़ुद को छुपा रही हैं. एसेल उनका असली नाम नहीं है.

काबुल में तालिबान के सदस्यों की नज़र अफ़ग़ानिस्तान की महिला क्रिकेट टीम पर है. एसेल कहती हैं कि जो भी महिलाएँ क्रिकेट या अन्य खेल खेलती हैं, वे अब सुरक्षित नहीं हैं. काबुल में हालत बहुत ही बुरे हैं.

एसेल कहती हैं, ''हमलोग वॉट्सऐप ग्रुप पर हर रात अपनी समस्याओं और साझा योजनाओं पर बात करते हैं. हमें क्या करना चाहिए, इसे लेकर सबसे ज़्यादा बात होती है. हस सभी नाउम्मीद हैं.''

पिछले महीने के दूसरे हफ़्ते में तालिबान ने काबुल में दस्तक दी, तभी से एसेल घर से बाहर नहीं निकल पाई हैं. अपना क्रिकेट किट भी हटा दिया है. एसेल बताती हैं कि कैसे उनकी एक साथी को काबुल में निशाना बनाया गया.

एसेल कहती हैं, ''जिस गाँव में क्रिकेट खेलते हैं, वहाँ तालिबान के साथ काम करने वाले कुछ लोगों के बारे में पता है. जब तालिबान ने काबुल को अपने नियंत्रण में लिया, तो उन्होंने धमकी दी. उन्होंने कहा कि अगर फिर से क्रिकेट खेला तो मौत के घाट उतार दिए जाएँगे.''

तक़वा (बदला हुआ नाम) सालों से अफ़ग़ान महिला क्रिकेट टीम में हैं. काबुल में तालिबान के नियंत्रण के बाद वो अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने में कामयाब रहीं. पहचाने जाने के डर से वो घर बदलती रहीं.

तालिबान ने उनके पिता को फ़ोन किया, लेकिन उन्होंने बताया कि वो अपनी बेटी के संपर्क में नहीं हैं.

2015 में हेरात में क्रिकेट के मैदान में मैच खेलती लड़कियां

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सपना

तक़वा कहती हैं, ''आगे क्या होगा, इसके बारे में मैं अब नहीं सोचना चाहती हूँ. तालिबान जब काबुल में आया, तो एक हफ़्ते तक मैंने न कुछ खाया और न ही सो पाई. मैं केवल अपने बारे में नहीं सोच रही थी, मैं दूसरी लड़कियों को लेकर भी चिंतित थी. वे अपना जीवन और पढ़ाई बर्बाद कर रही हैं. कइयों ने तो शादी तक नहीं की ताकि अफ़ग़ानिस्तान के लिए खेल सकें. मैं उनको लेकर बहुत चिंतित हूँ.''

एक और पूर्व खिलाड़ी हरीर (बदला हुआ नाम) ने बीबीसी से कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के लिए क्रिकेट खेलने का मतलब विकेट लेने और रन बनाने से ज़्यादा है.

वो कहती हैं, ''जब मैं खेलती थी तो एक मज़बूत महिला का भाव मन में रहता था. मेरे भीतर आत्मविश्वास भरा था और ख़ुद पर गर्व होता था. ऐसा लगता था कि एक महिला के रूप में कुछ भी कर सकती हूँ. अपने सपनों को सच कर सकती हूँ.''

लेकिन हरीर और अफ़ग़ानिस्तान महिला टीम की बाक़ी खिलाड़ियों का सपना शायद धरा ही रह जाए. एक साल पहले तक इनके मन में उम्मीद थी लेकिन अब ये अपनी सुरक्षा को लेकर डरी हुई हैं.

साल 2010 में स्कूल के मैदान में खेलती अफ़ग़ानिस्तान की लड़कियां

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अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट की कहानी

अफ़ग़ानिस्तान में क्रिकेट का उभरना किसी जादुई कहानी की तरह है. तालिबान के सत्ता से बेदख़ल होने के एक साल बाद आईसीसी ने अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट बोर्ड को मान्यता दी थी. तालिबान के जाने के बाद अफ़ग़ानिस्तान में खेलों को लेकर गतिविधियाँ शुरू हुईं.

बीबीसी पश्तो के एडिटर एमाल पासरली ने अगस्त में स्पोर्ट्स डेस्क के साथ पोडकास्ट में कहा था, ''अगर हम पिछले 20 सालों में देखें, तो हमने जंग, आत्मघाती हमला और कई तरह की समस्याओं को झेला है लेकिन खेल के दौरान ही ऐसा मौक़ा आता था, जब पूरा मुल्क ख़ुश होता था और भावनात्मक रूप से जुड़ जाता था. खेल ही ऐसा आयोजन और जगह के रूप में सामने आता था, जहाँ हम सब कुछ भूलकर ख़ुश हो जाते थे.''

क्रिकेट में दिलचस्पी अफ़ग़ानिस्तान में 2000 के दशक में बढ़ी. अफ़ग़ानिस्तान की पुरुष क्रिकेट टीम वर्ल्ड कप तक पहुँची. 2017 में टेस्ट क्रिकेट का भी दर्जा मिल गया. राशिद ख़ान और मोहम्मद नबी जैसे खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्टार अब स्टार बन चुके हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्रीय महिला क्रिकेट टीम 2010 में बनी. इसका विरोध भी हुआ. शुरुआत में अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने महिला टीम को अंतरराष्ट्रीय खेलों में मौक़ा देने से परहेज किया.

बोर्ड ने तालिबान के डर का हवाला दिया था. 2012 में अफ़ग़ानिस्तान की महिला टीम ताज़िकिस्तान में छह क्षेत्रीय टीमों के टूर्नामेंट में हिस्सा लेने गई और उन्हें जीत भी मिली. लेकिन दो साल बाद ही फिर से संकट आया. एसीबी ने इसके लिए तालिबान के ख़तरों को ज़िम्मेदार बताया.

अफ़ग़ानिस्तान की महिला क्रिकेट टीम के बिखरने के बाद भी लड़कियों ने खेलना बंद नहीं किया. एसीबी के पास अब भी छोटी संख्या में स्टाफ़ हैं, जिनकी ज़िम्मेदारी महिलाओं के लिए मैच का प्रबंधन देखना है. लेकिन महिला क्रिकेटरों की समस्याएं बढ़ती गईं.

हरीर कहती हैं, ''एसीबी के भीतर मदद करने वाले बहुत कम लोग हैं. ये मैच का आयोजन गिड़गिड़ाने के बाद ही कराते हैं.''

अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट

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ख़ुशी भी ज़ाहिर नहीं कर सकतीं खिलाड़ी

"मैं एक गेंदबाज़ हूँ, लेकिन विकेट लेने के बाद मैं ख़ुशी में शोर नहीं मचा सकती, मैं अपनी ख़ुशी ज़ाहिर नहीं कर सकती क्योंकि मर्द मुझे देख रहे हैं."

"मुझे अपनी भावनाओं को काबू में रखना होता है. मैं शोर मचा कर अपनी टीम का हौसला नहीं बढ़ा सकती. मैं उनका समर्थन नहीं कर सकती. मैं जश्न नहीं मना सकती, चिल्ला नहीं सकती, किसी तरह की हरकत नहीं कर सकती."

पुरुषों की टीम के अच्छा प्रदर्शन करने बाद एसीबी ने महिला क्रिकेट पर ध्यान देना शुरू किया था. आईसीसी के नियमों के मुताबिक़ क्रिकेट टीम में 12 सदस्य होने चाहिए. 2017 में अफग़ानिस्तान ने राष्ट्रीय टीम बनने की ये शर्त पूरी की. साल 2020 में 25 महिलाओं को कॉन्ट्रैक्ट दिया गया.

10 महीने पहले ही अफ़ग़ानिस्तान की महिला टीम को उम्मीद की एक नई किरण दिखी थी, जो कि बहुत दिनों तक नहीं रही.

तालिबान के पिछले शासन में यानी 1996 से 2001 के बीच, लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध था. आठ साल के अधिक उम्र की लड़कियों के स्कूल जाने पर मनाही थी. महिलाएं घर से बाहर काम करने नहीं जा सकती थीं. घर से निकलने के लिए किसी पुरुष का साथ होना ज़रूरी था.

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इजाज़त

तालिबान ने इस बार अपनी एक बेहतर तस्वीर पेश करने की कोशिश की है, लेकिन खेल के क्षेत्र में महिलाएँ की बेहतरी के लिए काम होगा, इसकी गुंज़ाइश कम ही है.

एसीबी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हामिद शिनवारी ने कहा है कि तालिबान ने पुरुष क्रिकेट टीम का समर्थन किया है, उन्हें ऑस्ट्रेलिया के साथ नवंबर में अपना पहला टेस्ट मैच खेलने की अनुमति भी दे दी गई है.

लेकिन उन्होंने बीबीसी से कहा कि उन्हें लगता है वो महिलाओं की टीम को रोकेंगे. इससे अफ़ग़ानिस्तान के आईसीसी की सदस्यता पर असर पड़ेगा.

अफ़ग़ानिस्तान की महिला टीम तालिबान के शासन से बाहर निकलना चाहती हैं, जैसे कि 50 अफ़ग़ानी एथलीट को निकाला गया. आईसीसी के एक प्रवक्ता ने कहा, "जैसा कि सभी को उम्मीद है, हम अफ़गानिस्तान क्रिकेट से संपर्क में हैं. बोर्ड और हम वहाँ की स्थिति पर नज़र बनाए हुए हैं."

लेकिन तक़वा का कहना है कि आईसीसी सीधे महिला क्रिकेटरों से संपर्क में नहीं है और एसीबी ने उनकी भलाई के लिए बहुत दिलचस्पी नहीं दिखाई है.

तालिबान के क़ब्ज़े के बाद अज़ीज़ुल्लाह फ़ज़ली की नियुक्ति के संदर्भ में बात करते हुए वो कहती हैं, "आईसीसी ने कभी हमारी मदद नहीं की. आईसीसी उन लोगों से बात कर रहा है, जो महिला क्रिकेट के ख़िलाफ़ हैं, जैसे कि एसीबी के नए चेयरमेन."

ये पूछने पर कि क्या एसीबी अभी भी महिला क्रिकेट को सपोर्ट करता है, शेनवारी ने कहा, "भविष्य सरकार तय करेगी."

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महिलाओं ने नहीं छोड़ी उम्मीद

माहौल ख़राब है, लेकिन एसेल को अभी भी उम्मीद है कि टीम फिर से साथ आ सकती है. अपने सपने और भविष्य के बारे में बात करते हुए हरीर उत्साहित हो जाती हैं. वो कहती हैं, "मैं एक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर बनना चाहती हूँ."

"मैं एक मज़ूबत अफ़ग़ान महिला बनना चाहती हूँ, जो लोगों की ज़िंदगियों में बदलाव ला सके. मैं दूसरी अफ़ग़ान लड़कियों और महिलाओं के लिए प्रेरणा बनना चाहती हूँ. मैं चाहती हूँ कि अफ़ग़ानिस्तान के कुछ मर्दों की सोच बदल सकूँ. मैं ख़ुद पर गर्व करना चाहती हूँ. बस और कुछ नहीं."

वो कहती हैं, "अफ़ग़ान संस्कृति में कई बाधाएँ हैं, जो महिलाओं को खेलने से रोकती हैं. वो कहते हैं कि महिलाएँ कमज़ोर हैं और वो क्रिकेट के लिए नहीं बनी हैं. उन्हें शादी करनी चाहिए, बच्चे पैदा करने चाहिए और घर के काम करना चाहिए. उन्हें अपने पति का ख़्याल रखना चाहिए."

"मेरे परिवार में भी कुछ रिश्तेदार कहते हैं कि मुझे नहीं खेलना चाहिए क्योंकि इस्लामी संस्कृति के हिसाब से महिलाओं का क्रिकेट खेलना सही नहीं है. लेकिन मुझे ये पसंद है. यहाँ पर हालात ख़राब हैं, लेकिन हमारी उम्मीदें ज़िंदा हैं. अगर हमें इस देश से बाहर निकाल कर कहीं और ले जाया जाए, तो हम फिर से शुरू कर सकते हैं."

"इंशाअल्लाह, हमारे सपने पूरे होंगे."

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