चीन ने आख़िर अमेरिका से क्यों कहा- वो सोवियत संघ नहीं है

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अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी और पश्चिमी देंशों की वापसी के बाद, एशिया और विशेषकर मध्य एशिया के अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के समीकरणों में भारी बदलाव आने वाले हैं.
बीते एक महीनें में जिस रफ़्तार से अफ़ग़ानिस्तान में परिवर्तन आया है, शायद ही अमेरिका और उसके सहयोगियों को उसकी उम्मीद थी. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन तो अगस्त के शुरू में ये कह रहे थे कि तालिबान, तीन लाख की अफ़ग़ान सेना के सामने नहीं टिक पाएँगे.
शायद ये इस बात का संकेत था कि अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में 20 साल बिताने के बाद भी, वहाँ की क़बायली वफ़ादारियों और पेचीदा सियासत को पूरी तरह से नहीं समझा था. पाँच अगस्त के बाद तेज़ गति से तालिबान ने देश के दक्षिणी और पश्चिमी हिस्से से उत्तर की ओर बढ़ना शुरु किया और एक के बाद एक बड़े शहर उनके सामने हथियार डालते गए.
कई अमेरिकी जानकार मानते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में जो कुछ हुआ है, उसका असर अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय क़द पर पड़ेगा. कहा जा रहा है कि दुनिया की एकमात्र सुपरपॉवर किसी मुल्क में 20 साल बिताने के बाद, ख़ाली हाथ लौटी है. अमेरिका में लोग इसकी तुलाना पिछली सदी के वियतनाम के युद्ध से भी कर रहे हैं.
अगर वाक़ई अमेरिका की साख़ और क़द पर उसकी अफ़ग़ानिस्तान पॉलिसी का असर पड़ा, तो इसका फ़ायदा किसे होगा?

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कौन होगा फ़ायदे में
अफ़ग़ानिस्तान में चीन की रुचि को सिर्फ़ अमेरिका ही नहीं, भारत भी बड़े ध्यान से देख रहा है. मीडिया में ये बात उठती रही है चीन, अमेरिका की अफ़ग़ानिस्तान से वापसी के बाद, एशिया में अपने हितों के प्रति और आक्रामक हो जाएगा.
ब्रायन हास ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट के सेंटर फॉर ईस्ट एशियन स्टडीज़ में सीनियर फ़ैलो हैं. हास के मुताबिक चीन अफ़ग़ानिस्तान में सिर्फ़ अपने हित देख रहा है.
ब्रायन हास लिखते हैं, "चीन सिर्फ़ अपने हितों के बारे में चिंतित है. और ये हित मुख्य रूप से चीन की आंतरिक सुरक्षा चिंताओं से जुड़े हैं. चीनी नेताओं को अफ़ग़ानिस्तान से सटे अपने इलाक़े में अस्थिरता के फैलने के बारे में चिंता है. उन्हें लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान की घटनाओं का स्पिलओवर उनके यहाँ भी हो सकता है. उन्हें ये भी फ़िक्र है कि तालिबान का इस्लामी सैन्यवाद, उनके यहाँ लोगों को प्रेरित कर सकता है."
तो क्या चीन सिर्फ़ अफ़ग़ानिस्तान में अपने हित साध रहा है? वो अमेरिका की वापसी का इस्तेमाल, एशिया में अपना दबादबा बढ़ाने के लिए नहीं करेगा?
वॉशिंगटन में चीन के राजदूत चिन गॉन्ग ने कुछ ट्वीट किए हैं, जिनसे चीन के इस बारे में नज़रिए पर कुछ रोशनी पड़ती है.
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चिन गॉन्ग ने ट्वीट किया है, "कुछ लोगों का ये मानना है कि चीन अमेरिका के ख़िलाफ़ दाँव खेल रहा है और चीन का लक्ष्य अमेरिका को चुनौती देना और उसे रास्ते से हटाना है. ये चीन की रणनीतिक मंशा का ग़लत आकलन है."
चिन ने एक के बाद एक ट्वीट कर, अफ़ग़ानिस्तान के सियासी परिवर्तन के बाद अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा पर उठ रहे सवालों को ख़ारिज किया है.
राजदूत का कहना है कि चीन और अमेरिका के रिश्तों को शीत-युद्ध में सोवियत संघ और अमेरिका के संबंधों की तरह देखा जाना बेतुका और ख़तरनाक है.
उन्होंने ट्वीट किया, "चीन शांतिपूर्ण विकास और एक ऐसे समुदाय को लेकर प्रतिबद्ध है, जिसका मानवजाति के लिए साझा भविष्य हो. ये बहुत बेतुका और ख़तरनाक है कि आज के चीन-अमेरिका संबंधों के लिए 'शीत युद्ध प्लेबुक' का इस्तेमाल हो रहा है."
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एशिया में चीन और अमेरिका
ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूट के ब्रायन हास कहते हैं कि चीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका के कथित घटते असर का लाभ उठाने का प्रयास कर सकता है.
हास लिखते हैं, "चीन मुख्य तौर से अमेरिका की वापसी का फ़ायदा ये कहकर उठाने की कोशिश कर सकता है कि ये 'अमेरिकी की हार या उसका पतन है' चीन का प्रचार तंत्र अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने को अमेरिका पर भरोसे की कमी और उनकी अक्षमता के प्रमाण बता सकता है."
और ऐसा हुआ भी है. चीन के कई अधिकारियों ने ऐसे बयान और ट्वीट किए हैं जो अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी वापसी पर कटाक्ष करते नज़र आए हैं.
17 अगस्त को चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिजियान ज़ाओ ने एक ट्वीट किया जो काफ़ी चर्चा में रहा.
उनके ट्वीट में अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका चिनूक हेलिकॉप्टर की तस्वीर की तुलना साइगॉन (वियतनाम) में लगभग वैसे ही एक हेलिकॉप्टर से की थी. ये दोनों हेलिकॉप्टर क़रीब 50 साल के अंतराल के बाद, लगभग एक जैसे हालात से जूझ रहे थे.
उन्होंने चुटकी लेते हुए, अपने ट्वीट में लिखा, "ये साइगॉन तो नहीं लेकिन (दृश्य) निश्चित तौर पर वैसा ही लग रहा है."
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चीनी प्रवक्ता भले ही चुटकी ले रहा हो लेकिन इस मुद्दे पर जो ख़ुद अमेरिका में भी कई विश्लेषक और सियासतदान साइगॉन की कथित हार की तुलना तालिबान की काबुल पर जीत से कर रहे हैं.

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शीत युद्ध की प्रतिद्वंद्विता से तुलना
अमेरिका में चीन के राजदूत ने विशेषकर शीत युद्ध के ज़माने से तुलना पर सख़्त ऐतराज़ किया है.
राजदूत चिन गॉन्ग ने कहा, "चीन सोवियत संघ नहीं है. सोवियत संघ का विघटन उसकी अपनी वजह से हुआ था. चीन ने इतिहास के इस हिस्से से सबक सीखा है कि वर्चस्ववाद का अंत पतन में ही है."
लेकिन अमेरिकी अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल लिखता है कि अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर अमेरिका ने ग्लोबल पॉवर के बीच संबंधों में एक ढंग से फेरबदल किया है.
अख़बार में यारोस्लाव ट्रोफ़िमोव और जेरेमी पेज के मुताबिक़ चीन और रूस, दोनों को इसमें अवसर दिख रहे होंगे लेकिन अफ़ग़ानिस्तान से वापसी के मुद्दे पर अमेरिका ब्रिटेन जैसे अपने सहयोगियों से भी ताने सुन चुका है.
वे लिखते हैं, "यहाँ तक कि अमेरिका के ब्रिटेन जैसे क़रीबी सहयोगी ने भी अमेरिकी वापसी की खुलेआम आलोचना की है. हाउस ऑफ कॉमन्स में विदेशी मामलों की समिति के अध्यक्ष और अफगानिस्तान युद्ध में हिस्सा ले चुके टॉम टंगेनडाट ने काबुल में हार की तुलना 1956 के स्वेज़ संकट से की है. स्वेज़ संकट ने ब्रिटेन की सत्ता की सीमाओं को थाम दिया था. और वहाँ से ही ब्रिटेन के अंतरराष्ट्रीय संबंधों में रणनीतिक पतन की शुरुआत हुई थी."
चीन के राजदूत चिन गॉन्ग अमेरिका के चीनी कंपनी ख़्वाबे के प्रति रवैए की ओर इशारा करके कहते हैं कि उसे अपनी ताक़त का इस्तेमाल एक कंपनी को दबाने के लिए नहीं करना चाहिए था. चीन-अमेरिका प्रतिद्वंद्विता पर सवाल उठाते हुए चिन गॉन्ग ने कहा कि दोनों देशों को ऐतिहासिक मौक़े नहीं गँवाने चाहिए. और ज़्यादा अहम बात ये है कि उन्हें ऐतिहासिक ग़लतियाँ नहीं करनी चाहिए.
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उन्होंने लिखा, "अलग-अलग राजनीतिक प्रणालियों, संस्कृतियों और विकास के स्तर वाले दो प्रमुख देशों के रूप में हमें शांति के साथ एक रास्ता निकालना चाहिए, जो आपसी सम्मान पर आधारित हो."
अमेरिका में चीनी राजदूत के बाद बुधवार शाम को चीन की विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने भी ट्वीट कर दोहराया कि चीन सोवियत यूनियन नहीं है.
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उन्होंने ट्वीट किया, "कुछ लोगों को लगता है कि अमेरिका को चीन के साथ मज़बूती के स्तर से डील करना चाहिए. उन्हें लगता है कि अमेरिका चीन के ख़िलाफ़ नया कोल्ड वॉर जीत लेगा. ठीक वैसे ही जैसे सोवियत यूनियन से जीता था. ये चीन के इतिहास के बारे में गंभीर अज्ञान है. चीन, सोवियत संघ नहीं है."

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ताइवान और साउथ चाइना सी
चीन के राजदूत जो भी कहें लेकिन एशिया में ताइवान और साउथ चाइना सी को लेकर दोनों मुल्कों के बीच गंभीर मतांतर है. अफ़ग़ानिस्तान से वापसी के बाद अमेरिका पूरी तरह से इस ओर अपना ध्यान लगाने की कोशिश करेगा.
और शायद चीन को इस बात की आशंका है.
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और विदेशी मामलों की विख्यात पत्रिका द फ़ॉरेन पॉलिसी में टीकाकार सी राजमोहन लिखते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका की वापसी के पीछे, जो बाइडन की मंशा इंडो-पैसेफ़िक में बढ़ती चीनी चुनौतियों का मुक़ाबला करना है.
सी राजमोहन भारत के जाने-माने रक्षा विशेषज्ञ हैं और नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर में दक्षिण एशिया इंस्टीट्यूट के निदेशक हैं.
अमेरिकी-चीन की एशिया पर चल रही कथित वर्चस्व की जंग में भारत एक अहम भूमिका में हो सकता है. कम से कम अमेरिका की रणनीति तो इस ओर ही इशारा करती है.
अपने लेख में सी राजमोहन भी कहते हैं, "भारत पाकिस्तान के मुक़ाबले चीन को बड़ा ख़तरा मानता है. उसके लिए अमेरिका का चीन पर फ़ोकस करने का क़दम स्वागत योग्य है. ट्रंप के आख़िरी दिनों में भारत और अमेरिका के बीच इंडो-पैसेफ़िक क्षेत्र सहयोग का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वो बाइडन के दौर में भी जारी है. भारत अब अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं में काफ़ी ऊपर आ गया है."
कॉपी: पवन सिंह अतुल
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