अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान के लिए कैसे 'लाइफ़लाइन' बने तुर्की और क़तर

इमेज स्रोत, Reuters
- Author, टॉम बेटमैन
- पदनाम, बीबीसी के मध्य-पूर्व संवाददाता
अमेरिका की आख़िरी फ़्लाइट काबुल हवाई अड्डे से उड़ते ही तालिबान के लड़ाकों ने जश्न में ख़ूब फ़ायरिंग की. लेकिन अकेले हथियारों के दम से दुनिया में अलग-थलग पड़े तालिबान लाखों अफ़ग़ानों को अनिश्चित भविष्य से बाहर नहीं निकाल पाएगा.
सारी दुनिया तालिबान की वापसी के बाद अफ़ग़ानिस्तान पर अपना दबाव बनाने की तैयारी कर रही है. लेकिन इन सबके बीच दो मुस्लिम देश, मध्यस्थ और सूत्रधार के रूप में उभर रहे हैं. ये देश हैं - क़तर और तुर्की.
दोनों हाल के वर्षों में तालिबान से हुई नज़दीकी का फायदा उठा रहे हैं. दोनों को अफ़ग़ानिस्तान में अवसर दिख रहे हैं. लेकिन दोनों एक जुआ भी खेल रहे हैं. एक ऐसा जुआ जो मध्य पूर्व में पुरानी प्रतिद्वंद्विता को और भी हवा दे सकता है.
गैस के समृद्ध भंडार वाले छोटे से खाड़ी देश क़तर के अधिकारियों ने अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकल रहे कई लोगों को जीवनदान दिया है.
थिंक टैंक इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप की एक वरिष्ठ सलाहकार, डीना एस्फंडियरी बताती हैं, "कोई भी मुल्क़, अफ़ग़ानिस्तान से अपने लोगों को बाहर निकालने की प्रक्रिया को, किसी न किसी रूप में क़तर को शामिल किए बिना पूरा नहीं कर पाया है."
वे आगे कहती हैं, "अफ़ग़ानिस्तान और तालिबान, क़तर के लिए एक महत्वपूर्ण जीत होगी. सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उसने दिखा दिया है को वो तालिबान के साथ मध्यस्थता करने में सक्षम हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि अब क़तर, पश्चिमी देशों की नज़र में खाड़ी में एक गंभीर खिलाड़ी बनता जा रहा है."
जैसे-जैसे पश्चिमी देश काबुल से भागे, क़तर के अधिकारियों का राजनयिक मूल्य बढ़ता गया. क़तर के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता लोलवाह अलखटर के ट्विटर फ़ीड को दुनिया की बड़ी ताक़तों की ओर से ताबड़तोड़ रिट्वीट मिले.
डीना ने इस महीने की शुरुआत में लिखा था, "क़तर... इस संघर्ष में एक विश्वसनीय मध्यस्थ बना हुआ है."

इमेज स्रोत, Reuters
लेकिन तालिबान से दोस्ती के ये पुल भविष्य के लिए जोखिम हो सकते हैं, जिसमें मध्य पूर्व की पुरानी रंजीशें एक बार फिर सिर उठा सकती हैं.
तुर्की और क़तर इस क्षेत्र के इस्लामी आंदोलनों के क़रीब हैं. इसकी वजह से अक्सर मिस्र, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसी क्षेत्रीय शक्तियों के साथ तनाव पैदा होता रहता हैं. ये देश इन इस्लामी समूहों को अपने अस्तित्व के लिए ख़तरे के रूप में देखते हैं.
अगर ये दो देश दक्षिण एशिया में तालिबान के साथ डिप्लोमेसी में दुनिया की मदद करते हैं, तो क्या इसका असर मध्य-पूर्व की राजनीति पर भी होगा.
डीना एस्फांदरी का कहना है कि तालिबान का सत्ता में वापस आना, इस्लाम की ओर एक नए सिरे से झुकाव है. ये एक ऐसी विचारधारा है जो इस्लामी क़ानून के अनुसार सरकार और समाज को फिर से संगठित करना चाहती है. लेकिन डीना कहती हैं कि फ़िलहाल ये सोच दक्षिण एशिया तक ही सीमित है.
वे कहती हैं, "यह अफ़ग़ानिस्तान में हो रहा है, इसका मतलब यह नहीं है कि यह मध्य पूर्व के लिए भी सही है."

इमेज स्रोत, Reuters
तालिबान से बातचीत
1990 के दशक में जब तालिबान ने पहली बार सत्ता संभाली थी तो सिर्फ़ तीन देशों के उसके साथ औपचारिक रिश्ते थे. वे देश थे- पाकिस्तान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात.
लेकिन अमेरिका में 11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद ये संबंध ख़त्म हो गए. हालाँकि, सऊदी अरब से कुछ लोग कई सालों तक चोरी-छिपे फ़ंडिंग करते रहे. सऊदी अधिकारी इस बात इनकार करते हैं कि वे तालिबान को किसी भी औपचारिक रूप से मदद करते हैं.
जैसे-जैसे अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की उपस्थिति, ख़ुद अमेरिकियों के बीच अधिक अलोकप्रिय होती गई, ऐसे देशों के लिए काबुल के रास्ते खुलने लगे जो वहाँ कूटनीति में हाथ आज़माना चाहते थे.
क़तर और तुर्की ने अलग-अलग ढंग से तालिबान के साथ संपर्क साधा.
जैसा ही साल 2011 में राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रशासन ने युद्ध को समाप्त करने के बारे में बोलना शुरू किया, क़तर ने शांति प्रक्रिया शुरू करते हुए तालिबान नेताओं की मेजबानी की.
लेकिन ये सारी प्रक्रिया काफ़ी विवादास्पद रही. चमक धमक वाले शहर दोहा में तालिबान के सफेद झंडों को फहरते देखकर कई लोग नाराज़ हुए. अमेरिका के बोलने पर बाद में इन झंडो को छोटा कर दिया गया.
क़तर के लिए ये तीन दशकों की कोशिश के बाद अपनी स्वतंत्र विदेश नीति क़ायम करने का मौक़ा था. एक ऐसा देश जो ईरान और सऊदी अरब के ठीक बीच में हो, उसके लिए ये एक महत्वपूर्ण क़दम था.
दोहा वार्ता इस साल के शुरू तक चली, जब अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता हो गया और अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान छोड़ेने का घोषणा कर दी. पद ग्रहण करने के बाद, जो बाइडन ने घोषणा की थी कि वे 11 सितंबर तक पूर्ण वापसी की समय सीमा बढ़ा रहे हैं.

इमेज स्रोत, Reuters
फूँक फूँक कर क़दम
तुर्की का अफ़ग़ानिस्तान से एक मज़बूत ऐतिहासिक रिश्ता हैं. तुर्की एकलौता मुसलमान मुल्क था, जो नेटो सेनाओं के साथ अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद था.
विश्लेषकों के अनुसार तुर्की ने तालिबान से जुड़े कुछ चरमपंथियों के साथ घनिष्ठ खुफिया संबंध बनाए हैं. तुर्की की पड़ोसी देश पाकिस्तान से भी अच्छी दोस्ती है. पाकिस्तान के धार्मिक मदरसों से ही तालिबान का जन्म हुआ था.
काबुल एयरपोर्ट पर मची अफ़रातफ़री के बीच तुर्की ने तीन घंटे तक तालिबान के अधिकारियों से बात की. इस दौरान कुछ चर्चा हवाई अड्डे के भविष्य में संचालन के बारे में भी हुई. तुर्की के सैनिकों ने इस हवाई अड्डे पर छह साल तक पहरा दिया था.
तालिबान ने पहले ही अफ़ग़ानिस्तान के "कब्जे" को ख़त्म करने के लिए, अन्य सभी विदेशी ताक़तों के साथ तुर्की को को भी देश छोड़ने को कह दिया था. विश्लेषकों का कहना है कि लेकिन पिछले हफ्ते की बैठक एक व्यापक एजेंडे का हिस्सा लगती है.

इमेज स्रोत, Reuters
तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने कहा कि वह तालिबान नेताओं के संदेशों को आशावादी तरीक़े से देखते हैं. उन्होंने कहा कि तुर्की किससे बात करे और किससे न करे, इसके लिए उन्हें किसी की अनुमति लेने की ज़रुरत नहीं है.
एक प्रेसवार्ता में अर्दोआन ने कहा, "यह कूटनीति है. तुर्की अफ़ग़ानिस्तान की एकता के लिए हर तरह का समर्थन देने के लिए तैयार है, लेकिन हम फूँक-फूँक कर क़दम रखेंगे."
इस्तांबुल के अल्टिनबास विश्वविद्यालय में अफ़ग़ान संबंधों के विशेषज्ञ प्रोफेसर अहमत कासिम हान का मानना है कि तालिबान से रिश्तों को राष्ट्रपति अर्दोआन एक अवसर की तरह देखते हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए तालिबान को अंतरराष्ट्रीय सहायता और निवेश की ज़रूरत है. तालिबान आज अपने सरकारी कर्मचारियों के वेतन का भुगतान भी नहीं कर पा रहे हैं."
उनका कहना है कि तुर्की ख़ुद को "गारंटर, मध्यस्थ, सूत्रधार" के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर सकता है. और वो रूस या चीन की तुलना में अधिक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में दिखना चाहता है.

इमेज स्रोत, Reuters
साख़ गँवाने का जोख़िम
तालिबान की वापसी के बाद कई देशों ने उनके साथ संपर्क साधा है. इसके लिए ये देश दोहा के ज़रिए ही आगे बढ़ रहे हैं. लेकिन तुर्की उन देशों में से है, जो ज़मीनी स्तर पर तालिबान से संबंध विकसित करने की मज़बूत स्थिति में हैं. हालाँकि ऐसे संबंध जोख़िम से भरे हैं.
प्रोफ़ेसर हान का यह भी मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान में आगे के संबंध राष्ट्रपति अर्दोआन को अपनी विदेश नीति के "शतरंज को व्यापक" करने का रास्ता खोलेंगे.
प्रोफ़ेसर हान कहते हैं, "वे दुनिया में तुर्की की एक बड़ी भूमिका चाहते हैं. सारे मुसलमान देशों से बड़ी भूमिका. इसके पीछी तुर्की के अतीत और ख़िलाफ़त की गद्दी होने से जुड़ी विरासत है. हालाँकि एक शरीयत शासित मुल्क के साथ तुर्की को ख़ुद को अलग ही रखना चाहेगा."
अर्दोआन के इस क़दम के कथित तौर पर अधिक "तर्कसंगत" उद्देश्य भी हैं. तुर्की चाहता है कि अमेरिका और नेटो के साथ उसके तनावपूर्ण संबंधों में सुधार हो. और साथ ही तुर्की में अफ़ग़ान शरणार्थियों के प्रवाह को रोका जा सके.
क़तर एक मध्यस्थ बनकर चाहेगा कि खाड़ी के देशों में पहले के मनमुटाव और न बढ़ें.
दोहा ने मध्य पूर्व के कई प्रमुख संघर्षों में अलग-अलग गुटों के बीच बातचीत में मध्यस्थता की है. लेकिन अरब स्प्रिंग के दौरान खाड़ी के कुछ देशों ने इस पर इस्लामवादियों का पक्ष लेने का आरोप लगाया था.
साल 2017 में, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और बहरीन ने दोहा के साथ संबंध तोड़ दिए थे. क़तर पर ईरान के बहुत क़रीब आने और अपने समाचार चैनल अल-जज़ीरा के माध्यम से अस्थिरता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया. क़तर ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था.
मौजूदा अफ़ग़ानिस्तान में क़तर और तुर्की ही ऐसे दो देश हैं, जो सीधे तालिबान के संपर्क में है. हालाँकि अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य में चीन और रूस भी अपनी मज़बूत मौजूदगी रखना चाहेंगे.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














