काबुल एयरपोर्ट पर हुए हमले में 60 लोग नहीं, बल्कि 60 परिवार मारे गए हैं

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- Author, मलिक मुदस्सर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, काबुल
मैं काबुल एयरपोर्ट से कुछ किलोमीटर दूर मौजूद अपने होटल की छत पर खड़ा हूं. एयरपोर्ट पर हुए बम धमाकों के कारण मरने वालों की संख्या हर गुज़रते पल के साथ बढ़ रही है. हालांकि इस हादसे में कुल कितने लोगों की मौत हुई है, इस संबंध में देश के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से कोई सटीक आंकड़ा अभी तक जारी नहीं किया है.
उस समय, जब एयरपोर्ट के एबी गेट के बाहर विस्फ़ोट हुआ मैं अपने कमरे में सो रहा था. इस गेट को जिसे दक्षिणी गेट भी कहा जाता है.
बीबीसी के मेरे सहयोगी पत्रकार सिकंदर किरमानी उस समय मेरे पास आए, उन्होंने ही मुझे जगाया. उन्होंने ही मुझे इस हमले की ख़बर दी थी.
हमें काबुल हवाई अड्डे पर हमले को लेकर तालिबान, अमेरिकी खुफ़िया विभाग और हमारे कार्यालय से हर स्तर पर अलर्ट मिल रहे थे.

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'हवाई अड्डे के बाहर एक विस्फोट हुआ है'
हमले की इस ख़बर को सुनने से तीन दिन पहले तक हम लगातार सुन रहे थे कि हवाई अड्डे पर विस्फ़ोट होने का ख़तरा है. और फिर एक दिन ये ख़तरा... विस्फ़ोट के रूप में सामने आ ही गया.
कोई अलर्ट इतना सटीक हो, ऐसा बहुत कम ही होता है. आपको कुछ पहले से पता हो और एक-दो दिन में ठीक वैसा ही हो जाए जैसा पहले से पता था, ऐसा बहुत कम होता है.
अफ़गानिस्तान पर पूरी तरह से तालिबान के कब्ज़े के 13 दिनों के भीतर देश में यह पहला बड़ा विस्फ़ोट है.
तालिबान के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने पत्रकारों से आग्रह किया है कि वे एयरपोर्ट जाएं, लेकिन सुरक्षित दूरी ज़रूर बनाए रखें. लेकिन लोगों के हुजूम के बीच सुरक्षित स्थान या सुरक्षित दूरी खोज पाना और बनाए रखना हमारे लिए लगभग असंभव-सा है.
बताया जाता है कि काबुल शहर पर तालिबान के कब्ज़े के बाद से इस शहर पर ज़बीहुल्लाह मुजाहिद का ही नियंत्रण है.

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आमतौर पर कहीं बम विस्फोट हो या दुर्घटना हो तो हम स्वास्थ्य मंत्रालय से संपर्क करते हैं, लेकिन काबुल एयरपोर्ट पर हमले के बाद जब हमने स्वास्थ्य मंत्रालय से संपर्क किया तो वहां के कर्मचारियों ने हमें स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि उन्हें किसी से बात करने की अनुमति नहीं हैं.
हालांकि सोशल मीडिया पर जो तस्वीरें और वीडियो देखने को मिले उससे वहां मची तबाही का अंदाज़ा लग रहा था. लोगों की उस भारी भीड़ के बीच कई ऐसे थे जिन्होंने अपनों को हमेशा-हमेशा के लिए खो दिया था.
15 अगस्त को काबुल हवाईअड्डे पर लैंड करने के बाद से मैं न्यूज़ कवरेज के लिए तीन बार काबुल हवाई अड्डा जा चुका हूं.
मुझे आज भी वो पल याद हैं जब मैं यहां पहुंचा था.
वहां अजीब-सा सन्नाटा था, जैसे कभी भी, कुछ भी हो जाएगा. जब मैं वहां से बाहर निकला तो ऐसा लग रहा था कि मानो सारा शहर सड़क पर निकल आया हो और सभी इधर-उधर भाग रहे हों.

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उस दिन से अब तक हज़ारों लोग यहां आ चुके हैं. जो लोग कल तक कोरोना संक्रमित होने और उसके कारण मौत के डर से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे थे वही लोग आज सोशल डिस्टेंसिंग को भुलाकर तालिबान के हाथों मौत के डर से भाग रहे हैं और अपने लिए ज़िंदगी के उपाय खोज रहे हैं.
उनके पास बैठने के लिए बेहद तंग जगह है लेकिन रात-दिन वे एकसाथ बैठे रह रहे हैं, इस उम्मीद में कि कोई आएगा जो उन्हें यहां से कहीं दूर ले जाएगा.
हम रिपोर्टिंग के लिए कल शाम एयरपोर्ट के एक ही गेट पर थे. जलालाबाद रोड पर अगर आप एयरपोर्ट के मेन गेट से तीन किलोमीटर पूर्व में जाएंगे तो एबी गेट आ जाता है.
यह गेट हमेशा से अमेरिकी और ब्रिटिश सेना के कब्ज़े में रहा है और इसे मिलिट्री गेट भी कहा जाता है. अब भी गेट के अंदर अमेरिकी सेना है लेकिन बाहर तालिबान है.
पिछले पांच सालों में मैंने कई बार गठबंधन सेना के साथ गेट पार किया है, लेकिन अब जब तालिबान ने काबुल पर कब्ज़ा कर लिया है तो यह अब यह गेट सिर्फ़ सेना के लिए आरक्षित नहीं रह गया है.
हालांकि, ब्रिटेन और यूरोप जाने की प्रतीक्षा कर रहे लोगों को उचित ईमेल भेजे जाते हैं लेकिन फिर भी हवाई अड्डे के दूसरे द्वारों की तरह ही भारी संख्या में लोग यहां इंतज़ार करते दिखते हैं. इनमें से तो कई ऐसे भी होते हैं जिनके पास ज़रूरी दस्तावेज़ और वीज़ा तक नहीं हैं.

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इंतज़ार कर रहे लोग जब किसी विदेशी सैनिक या पत्रकार को देखते हैं तो वे मदद के लिए पुकारने लगते हैं. अपने कागज़ों को हवा में लहरा-लहराकर मदद की गुहार लगाते हैं.
हाल के दिनों में कई ऐसी तस्वीरें सामने आयी हैं जिसमें लोग हवाई अड्डे की बाहरी कांटों की दीवार को लांघकर अंदर प्रवेश करने की कोशिश करते देखे गए हैं.
एयरपोर्ट के इस गेट पर इतनी भीड़ है कि इन दिनों हमें यहां से मेन गेट तक पहुंचने का दूसरा रास्ता खोजना पड़ता है. और वो रास्ता है- काबुल से जलालाबाद तक याका तूत हाईवे.
ऐसा लगता है कि सब कहीं भाग रहे हैं. मानो कयामत का दिन आ गया हो और सब उससे भाग रहे हैं.
यह सड़क एक जगह बंद हो जाती है और फिर यहां से ढाई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. यह रास्ता खेत से होकर गुज़रता है. जब हम कल वहां गए तो हमने देखा कि बुजुर्ग महिलाओं को सामान ढोने वाली गाड़ियों में ले जाया जा रहा था.
वहां अस्थायी टेंट में महिलाएं और बच्चे बैठे थे. ये लोग शौच के लिए कहां जाते हैं, खाने-पीने की क्या व्यवस्था है कुछ भी समझ नहीं आता.
अभी कल ही मैं यहां एक महिला से मिला, जिसने कहा कि वह काबुल में अपने घर नहीं जाना चाहती.
बीते वक्त में काबुल हवाई अड्डे पर कई हमले हुए जिनमें बड़ी संख्या में रॉकेट से हमले किये गए हैं. लेकिन हताहतों की संख्या के लिहाज़ से हाल में हुआ हमला, बड़ा हमला था. यहां सेना पर भी पहले हमले हो चुके हैं लेकिन यह पहली बार है जब हवाईअड्डे पर आम नागरिक हमले का शिकार हुए हैं.

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हम भले ही कहते हों कि इस हमले में 60 आम लोगों की मौत हुई है, लेकिन ये सिर्फ़ 60 लोग नहीं बल्कि ये 60 परिवार थे.
मैं कल या आज में यहां से वापस जाने के बारे में नहीं सोच रहा था. हवाईअड्डे पर बीती शाम हुए हमले के बाद हम काबुल शहर की तस्वीरों पर रिपोर्ट करते रहे और अब हम बम विस्फ़ोट के संबंध में लगातार अपडेट दे रहे हैं.
हालांकि मेरे दिमाग की स्क्रीन पर फ्लैशबैक अभी भी चल रहा है. मैं बहुत कोशिश कर रहा हूं लेकिन वो बातें और दृश्य मेरे ज़हन से दूर नहीं हो रहे. वह दृश्य जब मेरे अपनों को मैंने एक आत्मघाती हमले में खोया था.
सच कहूं तो हमारे सामने जो शव होते हैं, उन्हें हम गिनते हैं लेकिन अपनों को खोने वाले भी चलती-फिरती लाश ही होते हैं, जिनका जीवन कभी भी हादसे से पहले जैसा नहीं हो पाता है.
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