अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान को लेकर चिंतित अमेरिका भारत से क्या चाहता है

इमेज स्रोत, Reuters
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जब तत्कालीन सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया था और अमेरिका ने अफ़ग़ान लड़ाकुओं का समर्थन किया था, तो उस वक़्त भारत ने अपने लिए तटस्थ रहने का रास्ता चुना था.
लेकिन जब साल 2001 में अमेरिकी फौज ने तालिबान के ठिकानों पर हमला करना शुरू किया था, तो भारत ने इस कार्रवाई का स्वागत किया था.
बाद में भारत ने अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण में काफ़ी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और वहाँ कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काफ़ी बड़ी रक़म भी ख़र्च की.
अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने का अमेरिकी फ़ैसला
सामरिक मामलों के विशेषज्ञ मानते हैं कि तालिबान से बिना कोई ठोस आश्वासन लिए अमेरिकी फौजों ने अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने का जो फैसला किया है. उस वजह से वहाँ साल 2001 से पहले वाले हालात पैदा हो गए हैं.
अमेरिका के साथ कई दौर की चली वार्ता के बावजूद तालिबान ने कभी ये आश्वासन नहीं दिया कि वो अहिंसक तरीक़े अपनाएगा.
ये भारत के लिए भी बहुत चिंता की बात है. नौबत यहाँ तक आ पहुँची कि भारत को कंधार में अपना वाणिज्य दूतावास बंद करना पड़ा.
बाइडन प्रशासन
दक्षिण एशिया में उत्पन्न हुए मौजूदा हालात के नज़रिए से देखें, तो 27 जुलाई को अमेरिकी विदेश मंत्री एंथनी जे ब्लिंकेन के दो दिवसीय भारत दौरे को काफ़ी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
हालाँकि भारत के विदेश मंत्री डॉक्टर एस जयशंकर और ब्लिंकेन अलग-अलग आयोजनों में तीन बार पहले भी मिल चुके हैं.
ब्लिंकेन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के प्रशासन के दूसरे ऐसे क़द्दावर अधिकारी हैं, जो भारत के दौरे पर आ रहे हैं.
इससे पहले अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन भारत के दौरे पर आ चुके हैं.
जयशंकर और ब्लिंकेन ब्रिटेन में आयोजित जी-7 देशों की बैठक में मिले थे और फिर इटली में संपन्न हुई जी-20 के देशों की बैठक के दौरान भी उनकी मुलाक़ात हुई थी.
ब्लिंकेन का भारत दौरा

इमेज स्रोत, SAUL LOEB
विदेश मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार मनोज जोशी कहते हैं, "ब्लिंकेन के दौरे में अफ़ग़ानिस्तान तो चर्चा का अहम मुद्दा होगा ही क्योंकि भारत ने हमेशा से ही हिंसक तरीक़े से अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के सत्ता पर काबिज़ होने का विरोध किया है. भारत ने ये पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता परिवर्तन में अफ़ग़ानिस्तान के आम लोगों की भागीदारी और उनकी राय का सम्मान किया जाना चाहिए."
वैसे मनोज जोशी को लगता है कि भले ही ब्लिंकेन के दौरे के कोई बड़ा समझौता न हो पाए, लेकिन ये स्पष्ट है कि अफ़ग़ानिस्तान से सेनाओं को हटाने के बाद अमेरिका चाहता है कि दक्षिण एशिया में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभाए, जिससे अफ़ग़ानिस्तान में भी जल्द स्थिरता आ सके.
अमेरिकी विदेश मंत्रालय में दक्षिण और मध्य एशिया के सहायक सचिव डीन थॉमसन का कहना था कि ब्लिंकेन अपने भारत दौरे में कोरोना महामारी को लेकर प्रशांत क्षेत्र में आपसी सहयोग पर चर्चा करेंगे. उन्होंने ये भी कहा कि इसके अलावा लोकतंत्र और मानवाधिकार के मुद्दों पर चर्चा होगी.
अफ़ग़ानिस्तान में सामान्य हालात की बहाली
भारत और पाकिस्तान के बीच के संबंधों को लेकर थॉमसन का कहना था कि ये दोनों देशों का आपसी मामला है, जो दोनों देशों को ही मिलकर सुलझाना पड़ेगा .
सिंगापुर नेशनल यूनिवर्सिटी में 'इंस्टीट्यूट ऑफ़ साउथ एशियन स्टडीज़' के निदेशक सी राजा मोहन के अनुसार पश्चिमी देशों को भी चाहिए कि वो तालिबान के ज़बरन सत्ता पर दख़ल करने को सामान्य बात के रूप में ना देखें.
उनका कहना है कि अभी भी काफ़ी वक़्त है, जब विकासशील देश अफ़ग़ानिस्तान में सामान्य हालात की बहाली के लिए अंतिम प्रयास कर सकते हैं और तालिबान को हिंसा का रास्ता छोड़ने के लिए राज़ी कर सकते हैं.
उनके अनुसार, "भारत को अब भी लगता है कि कूटनीतिक और राजनीतिक स्तर पर काफ़ी गुंज़ाइश है जब तालिबान को अपने तेवर नरम करने के लिए बाध्य किया जा सकता है. भारत पश्चिमी देशों से यही आग्रह कर रहा है."
विदेश और सामरिक मामलों के जानकार कहते हैं कि ब्लिंकेन के साथ भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर अपने नोट्स का भी आदान-प्रदान करेंगे क्योंकि हाल ही में 'शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन' के सम्मलेन के दौरान उनकी और चीन के विदेश मंत्री वांग यी की बातचीत भी हुई थी.
भारत-अमेरिका संबंध
मनोज जोशी को लगता है कि इस साल के अंत में 'क्वॉडिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग' यानी 'क्वॉड' में शामिल देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया, भारत, अमेरिका और जापान के विदेश मंत्रियों की बैठक भी प्रस्तावित है.
ब्लिंकेन के दौरे से इस बैठक का मार्ग तो प्रशस्त होगा ही, साथ ही इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों की आमने-सामने की मुलाक़ात का रास्ता भी बन पाएगा.
सामरिक मामलों के जानकारों का कहना है कि साल 2008 के बाद से भारत और अमेरिका के संबंधों में एक तरह की 'थकान' सी देखी गई. यानी वो गर्मजोशी जो अमूमन हुआ करती थी वो ग़ायब ही रही.
वरिष्ठ पत्रकार और सामरिक मामलों के जानकार अभिजीत अय्यर मित्रा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि साल 2009 में परमाणु संधि के बाद जो बाद परमाणु रिएक्टर को लेकर समझौते होने वाले थे, वो नहीं हो पाए.
साल 2009 में भारत सरकार ने अमेरिका के साथ 'परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल' के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.
परमाणु करार के बाद
इस समझौते के बाद अमेरिकी कंपनियों को भारत में परमाणु रिएक्टर और अन्य ऊर्जा के संयंत्र और आधारभूत संरचना तैयार करने का मार्ग प्रशस्त हो गया.
मित्रा कहते हैं, "समझौता तो हुआ लेकिन परमाणु रिएक्टर लगाने का कोई समझौता अमेरिकी कंपनियों से नहीं हो पाया. इस लिए दोनों तरफ़ से रिश्तों को लेकर ज़्यादा उत्साह नहीं देखने को मिला."
वो मानते हैं कि चीन का बढ़ता प्रभाव और उसका रवैया अमेरिकी विदेश मंत्री और भारत के विदेश मंत्री के बीच बातचीत का अहम मुद्दा ज़रूर हो सकता है.
मित्रा का कहना था, "मानवाधिकार और लोकतंत्र की बात अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से इसलिए की गई होगी, क्योंकि अमेरिका की जो बाइडन सरकार अपने दल के सांसदों को ख़ुश भी रखना चाहती है. वैसे भी कूटनीतिक तौर पर अमेरिका को कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि भारत मानवाधिकार और लोकतंत्र के मुद्दों पर क्या राय रखता है क्योंकि अमेरिका के संबंध सऊदी अरब से भी काफ़ी अच्छे हैं जो इन दोनों मानकों पर बुरी तरह फ़ेल हो जाता है."
भारत के घरेलू मामलों पर अमेरिका की टिप्पणी
लकिन इस साल की शुरुआत में अमेरिका ने भारत के आंतरिक मामलों पर अपने सुझाव दिए थे, जिनमें दिल्ली बॉर्डर पर किसानों का आंदोलन भी शामिल है. इससे पहले भी अमेरिका ने नागरिकता संशोधन क़ानून पर भी चिंता जताई थी.
जहाँ तक बात अफ़ग़ानिस्तान की है, तो मित्रा को लगता है कि काबुल और एक दो बड़े शहरों को अगर छोड़ दिया जाए, तो अफ़ग़ानिस्तान की सरकार की पकड़ ग्रामीण इलाक़ों में कम ही रही है.
उनका कहना था कि जब वो अफ़ग़ानिस्तान से रिपोर्ट करने गए थे, तब भी उन्हें ग्रामीण अंचलों और कस्बों में तालिबान का ही नियंत्रण नज़र आया था.
जानकार मानते हैं कि भारत को ये चिंता ज़्यादा है कि कहीं अफ़ग़ानिस्तान में पैदा हुआ हालात का फायदा चीन उठाने की कोशिश ना करे. इस लिए ब्लिंकेन का भारत दौरा काफ़ी महत्वपूर्ण हो सकता है. इस दौरान ब्लिंकेन की मुलाक़ात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी प्रस्तावित है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
























