अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान की वापसी के बाद आम अफ़ग़ान लोगों की ज़िंदगी कैसी बदली

तालिबान

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    • Author, सोफ़ी विलियम्स
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के अचानक सत्ता में आने से पूरे देश में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है. जब एक रिपोर्टर ने हाल ही में अफ़ग़ान लोगों से तालिबान के सत्ता में आने से पहले और बाद में उनके जीवन में आए बदलाव के बारे में पूछा, तो कई लोगों ने बताया कि उनकी जिंदगी और परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया है.

बीबीसी ने कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और दफ़्तर में काम करने वालों से बात कि और उनकी कहानी जाननी चाही. हमने जानना चाहा कि अब उनकी जिंदगी कैसी है?

बीबीसी ने सुरक्षा और गोपनीयता का ध्यान रखते हुए उन लोगों के नाम बदले है, जिन्होंने अपनी कहानियां हमसे साझा कीं.

अहमद: जिंदगी मेरे लिए और मुश्किल हो चुकी है

तालिबान के सत्ता में आने से पहले अहमद एक निजी अफ़ग़ान कंपनी में साल 2019 से बतौर मैनेजर काम कर रहे थे.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "यह मेरे लिए एक अच्छा समय था क्योंकि मैं काम कर रहा था और अपनी बहनों को संभाल रहा था जो विश्वविद्यालय और स्कूल में पढ़ती थीं,"

"उस समय मेरी अच्छी तनख़्वाह थी और यह मेरे परिवार के लिए भी लगभग पर्याप्त था. मैं पैसे बचा भी रहा था और घर भी भेजता."

अहमद
इमेज कैप्शन, अहमद एक कंपनी में बतौर मैनेजर काम करते थे.

वह बताते हैं, "मेरे कई दोस्त नौकरी करते थे लेकिन उन सभी की नौकरी चली गई और वे बेरोज़गार हो गए."

"अब मेरे लिए जीवन बेहद कठिन है, खासकर मेरे परिवार के लिए, क्योंकि यहां कोई नौकरी नहीं है और परिवारों के लिए आय का कोई रास्ता नहीं बचा है."

अहमद अपने परिवार में इकलौते बेटे हैं और सबसे बड़े हैं. उनके 60 साल के पिता, उम्र और घुटनों में समस्या के कारण काम नहीं कर सकते.

वह कहते हैं, ''अपने पिता की असमर्थता के कारण मुझे और भी ज़्यादा ज़िम्मेदारियों का अहसास होता है. बढ़ती मंहगाई ने हमारी हालत खस्ता कर दी है.''

ज़हराः अब ज़िंदगी जी नहीं रही हूं

ज़हरा तालिबान के कब्ज़े से ठीक पहले विश्वविद्यालय में पढ़ रही थीं लेकिन तलिबान की वापसी के बाद वह अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाईं.

वह कहती हैं, ''मेरे जीवन का सबसे बेहतरीन पल तब था जब मैं एक मेडिकल छात्रा थी, मैंने विश्वविद्यालय की नामांकन परीक्षा में अपना मनचाहा स्कोर पाने के लिए दो साल तक मेहनत की, लेकिन आज मेरा दिल दर्द से भर उठता है क्योंकि मैंने बहुत कोशिश की लेकिन मुझे खाली हाथ लौटना पड़ा.''

''मैं अब जिंदगी जी नहीं रही हूं बल्कि बिना किसी उद्देश्य के केवल जिंदा हूं. ये वो ज़िंदगी नहीं है जिसका स्कूल में पढ़ते हुए या यूनिवर्सिटी में दाखिला लेते वक़्त मैंने सपना देखा था. मुझे अपने दोस्तों के साथ पढ़ाई करने का शौक था और मुझे वास्तव में अपने कॉलेज के दिनों की याद आती है. ''

ज़हरा का कहना है कि अब उनका अधिकांश समय घर पर बीतता है और वह "बिना किसी हिचकिचाहट" के बेधड़क घर से बाहर ना निकल पाने की कमी महसूस करती हैं.

वह कहती हैं, ''मैं अपनी अंग्रेज़ी सुधारने और नई चीज़ें सीखने के लिए किताबों की मदद ले रही हीं लेकिन दुर्भाग्य से स्थिति निराशाजनक है. शायद एक दिन मैं कॉलेज फिर से जा सकूं.''

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सना
इमेज कैप्शन, सना अफ़ग़ानिस्तान में एक महिला अधिकारों की कार्यकर्ता थीं. इस वक़्त वह ईरान में हैं.

सना : काश ये बुरा ख़्वाब हो

सना अफ़ग़ानिस्तान में एक महिला अधिकारों की कार्यकर्ता थीं.

वह बताती हैं, ''तालिबान के आने से पहले, हम अपने कई अधिकारों से वंचित थे, लेकिन हम खुश थे क्योंकि हमें कुछ आज़ादी थी, हम पढ़ने जा सकते थे, काम कर सकते थे, अपने दोस्तों के साथ बाहर जा सकते थे, एक साथ बैठ सकते थे, बहस कर सकते थे और हंस सकते थे.''

''हम अपने अधिकारों के लिए एक साथ लड़ रहे थे और खुश थे... हम क़ानून बदलना चाहते थे लेकिन अचानक से सबकुछ बदल गया और हम अपने घर से ही बेघर हो गए.''

तालिबान

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सना इस वक़्त ईरान में हैं और उनके पास जर्मनी का वीज़ा है लेकिन अब तक वह जर्मनी नहीं पहुंच सकी हैं.

सना कहती हैं, ''उम्मीद है कि यह एक बुरा सपना हो जो जल्द टूट जाए और मैं इस सपने से जाग कर जल्द ही घर लौटूं. मेरे लिए अपनी मातृभूमि से दूर रहना मुश्किल है.''

"मैंने जो कुछ भी बनाया है उसे खोना मेरे लिए कठिन है. मैं शारीरिक रूप से ज़िंदा हूं लेकिन मुझे अपने परिवार और घर की याद आती है. मुझे अपने लोगों, अपनी भाषा, हमारे प्रयासों की याद आती है."

"मैं पलायन कर चुकी हूं लेकिन मेरी आत्मा अफ़ग़ानिस्तान में रह गई है और वह घायल है."

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सईद: सब कुछ इतना जल्दी ख़त्म हो गया

सईद एक पत्रकार हैं और अफ़ग़ानिस्तान के सबसे बड़े मीडिया आउटलेट में से एक के लिए एंकर के रूप में काम करते थे.

उन्होंने कहा, "मुझे एक पत्रकार के रूप में अपने पेशेवर जीवन की याद आती है, अपने करियर को लेकर मेरे सपने थे. मैं अब उन पलों को याद करता हूं तो लगता है सब तबाह हो गया."

सईद उस दिन भी काम कर रहे थे जिस दिन तालिबान ने काबुल पर कब्ज़ा कर लिया था और दोपहर तक, चीजें बिलकुल बदल गई थीं.

वह बताते हैं, ''हमारा दफ़्तर लगभग खाली था, सभी महिला कर्मचारी ऑफ़िस से जा चुकी थीं और हमारी तकनीकी टीम ने अपने कपड़े बदल कर आम लोगों के कपड़े पहन लिए थे."

सईद इस समय अमेरिका में हैं और शरणार्थी के रूप में शरण लेने की कोशिश कर रहे हैं. उनका परिवार अभी भी अफ़ग़ानिस्तान में रहता है.

वह कहते हैं, "20 साल की तरक्की और बलिदान सब बिखर गए और कुछ ही घंटों में मेरी उम्मीद और सपने सब कुछ बर्बाद हो गए. सब कुछ इतनी जल्दी बिखर गया, मुझे अभी भी विश्वास नहीं होता.''

''अपनो से दूर, बेहद नए वातावरण में ज़िंदगी बेहद मुश्किल है, ट्रॉमा को भीतर भरते रहना, कहना आसान है पर जीना बेहद मुश्किल''

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