अफ़ग़ानिस्तान: मिनी स्कर्ट में बेफ़िक्र घूमने से लेकर बुर्क़े में क़ैद होने तक, ऐसे सिमटती गई औरतों की ज़िंदगी

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अफ़ग़ानिस्तान के काबुल शहर पर तालिबान ने जैसे ही क़ब्ज़ा किया, सोशल मीडिया में वहां की अराजक स्थिति से जुड़ी तस्वीरें वायरल होने लगीं.
इस दौरान कुछ पुरानी तस्वीरें भी सामने आईं. इनमें काबुल की सड़कों पर मिनी स्कर्ट पहने बेफ़िक्री से चलती कुछ युवा महिलाओं की तस्वीरें भी थीं.
ये तस्वीरें 1970 के दशक की बताई गईं. इन्हें पोस्ट करने वाले ये बताने की कोशिश कर रहे थे कि भले ही इस मुल्क में ज़्यादातर लोग मुस्लिम परंपराओं और रूढ़ियों से घिरे हुए हों लेकिन एक ज़माने में यहां की महिलाओं को अपनी मर्ज़ी से ज़िंदगी जीने का हक़ था.
कई लोगों के ज़हन में 1996 से 2001 तक तालिबान शासन के उस दौर की याद भी ताज़ा हैं जब पुरुषों के लिए दाढ़ी बढ़ाना और महिलाओं के लिए बुर्क़ा पहनना अनिवार्य कर दिया गया था.

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तालिबान ने टीवी, संगीत और सिनेमा पर भी प्रतिबंध लगा दिया और 10 साल या उससे ज़्यादा उम्र की लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी थी.
अब सभी के दिल-दिमाग़ में वो खौफ़ घिरता जा कर रहा है कि क्या तालिबान का वही दौर फिर लौट आया है. लोग डरे हुए हैं कि फिर महिलाओं की स्थिति पहले जैसी हो जाएगी.
तालिबान शासन के दौरान महिलाओं पर हुई सामाजिक, मानसिक और शारीरिक ज़्यादतियों की कहानियां सामने आती रही हैं लेकिन क्या वहां महिलाओं की स्थिति कभी वैसी भी थी जो सोशल मीडिया पर पुरानी तस्वीरें पोस्ट कर बयां करने की कोशिश हो रही है?

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70 के दशक की तस्वीर
अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया में रहने वाली भारतीय मूल की डॉक्टर हुमा अहमद घोष अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं पर शोध पत्र लिख चुकी हैं. शोध के सिलसिले में वो साल 2003 से 2013 तक लगातार अफ़ग़ानिस्तान जाती रही हैं.
सैन डिएगो स्टेट यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ़ विमेन स्टडीज़ में प्रोफ़ेसर रह चुकीं हुमा अहमद हँसते हुए बताती हैं, "मेरा पहला विदेशी दौरा काबुल का था, जब में दिल्ली के जेएनयू में पढ़ा करती थी और मैं पहली बार 1978 और 1979 में काबुल गई थी."
फ़ोन पर हुई बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि काबुल बहुत ही सुंदर शहर था और ये शहर बहुत हद तक वेस्टर्न (पश्चिमी देशों जैसा) दिखता था.
वे कहती हैं, ''काबुल में अमीर मर्द और महिलाएं वेस्टर्न कपड़ों में नज़र आते थे. ये लोग पढ़े-लिखे थे. काबुल के कुछ हिस्सों में पश्चिमीकरण की पूरी झलक मिलती थी लेकिन जब हम काबुल से बाहर निकले जैसे बामियान, ग़ज़नी, वहां कट्टरपंथ तो नज़र नहीं आया, लेकिन महिलाएं पूरी तरह से ख़ुद को ढके हुए दिखती थीं. उनके सिर पर स्कार्फ़ होते थे. वहां का समाज पारंपरिक था और वहां ग़रीबी भी झलकती थी.''
वे बताती हैं कि काबुल में पहली बार उन्होंने इंटरनेशनल रिवॉल्विंग रेस्त्रां में बैठकर लज़ान्या (एक तरह का पास्ता) खाया था. उनके मुताबिक़ भारत में उस समय जो विदेशी ब्रांड नहीं मिलते थे वो काबुल में मिल जाते थे. उन्होंने काबुल से लिवाइस की जींस ख़रीदी थी और अपने दोस्तों के लिए विदेशी कॉस्मेटिक्स भी लेकर आई थीं.
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समाज में विभाजन
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन से जुड़े कबीर तनेजा भी कहते हैं कि 70 के दशक के अफ़ग़ानिस्तान में कम्युनिस्ट सरकार थी और वहां काफ़ी आज़ादी थी. तब के काबुल की तस्वीरें ऐसा आभास देती हैं कि जैसे आप लंदन या पेरिस की पुरानी तस्वीरें देख रहे हैं.
लेकिन अगर आप इसकी जाँच करें तो अफ़ग़ानिस्तान के अन्य इलाक़ों से समाज की ऐसी तस्वीर नहीं मिलती है.
मध्यपूर्व मामलों के विशषेज्ञ कबीर तनेजा ने बीबीसी से कहा, ''अफ़ग़ानिस्तान में एक विभाजन दिखाई देता है. जो काबुल या शहरों में रहते थे वो कमा रहे थे. वहां आधुनिकता थी. वहां जो अधिकार मर्दों को थे वे महिलाएं को भी थे लेकिन ये एलीट या अभिजात्य वर्ग तक ही सीमित था.''
''वहीं ग्रामीण इलाक़े और छोटे शहरों में जातीय और क़बायली समूह रह रहे थे. तालिबानी सोच उस ज़माने में भी थी. फ़र्क़ ये था कि वो सोच उस तरह से सामने नहीं आती थी जैसे अब आती है.''

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इतिहास में महिलाओं के अधिकार
अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं की स्थिति समझने के लिए अगर इतिहास पर नज़र डालें तो पता चलता है कि 1880-1901 तक शासक रहे अब्दुर रहमान ख़ान ने अपने शासनकाल में महिलाओं की ज़िंदगी में सुधार लाने के लिए काफ़ी काम किया था.
उन्होंने रूढ़िवादी क़ानूनों में बदलाव लाए. जैसे पति की मौत के बाद उसके भाई से महिला की शादी की परंपरा को ख़त्म करना, शादी की उम्र में इज़ाफ़ा किया गया और कुछ विशेष परिस्थितियों में महिलाओं को तलाक़ लेने का अधिकार दिया गया.
महिला को पिता और पति की जायदाद में हक़ भी दिया गया. अब्दुर रहमान की मौत के बाद गद्दी उनके बेटे आमिर हबीबुल्लाह ख़ान ने संभाली और अपने पिता के उठाए गए प्रगतिशील क़दमों को आगे बढ़ाया.
हुमा अहमद ने अपने शोध पत्र 'ए हिस्ट्री ऑफ़ विमेन इन अफ़ग़ानिस्तान: लेसन लर्न्ड फ़ॉर फ्यूचर, और 'यस्टर्डे एंड टूमॉरो: अफ़ग़ान विमेन' में भी इस बारे में लिखा है.
वे अपने शोध में लिखती हैं कि आमिर हबीबुल्लाह ने शादियों में गै़र-ज़रूरी ख़र्चों पर रोक लगाई और उनकी पत्नी को पहली बार सार्वजनिक तौर पर किसी नक़ाब के बिना पश्चिमी लिबास में देखा गया.

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उन्होंने पहले हबीबिया कॉलेज की शुरुआत की जिसमें भारत, तुर्की और जर्मनी के शिक्षकों को बुलाया गया. साथ ही पहला अस्पताल खोला था.
वे अपने शोध में लिखती हैं कि आमिर हबीबुल्लाह ने अफ़ग़ान निर्वासितों की वापसी की राह खोली. इसमें प्रगतिशील विचारक महमूद बेग तारजी का नाम महत्वपूर्ण है.
सीरिया और तुर्की में पढ़ाई कर चुके तारजी इस्लामिक धर्मशास्त्र को आधुनिकता से जोड़ने के विचारों के क़ायल थे. इस सिलसिले में उन्होंने महिलाओं के समान अधिकार पर ज़ोर दिया, पूरी नागरिकता की बात कही, शिक्षित महिलाओं को भविष्य के लिए संपत्ति बताया और कहा कि इस्लाम में महिलाओं को समान अधिकार देने की मनाही नहीं है.
हबीबुल्लाह की हत्या के बाद उनके बेटे अमानुल्लाह ने क़बायली संस्कृति के क़ायदों से महिलाओं की आज़ादी की बात कही.
अमानुल्लाह ने सार्वजनिक तौर पर पर्दा, बहुविवाह प्रथा का विरोध किया और काबुल और उसके आस-पास के इलाक़ों में लड़कियों की शिक्षा पर ज़ोर दिया.
अमानुल्लाह ने एक सार्वजनिक समारोह में कहा था कि इस्लाम में महिलाओं को अपने शरीर को ढँकने और किसी ख़ास प्रकार का नक़ाब पहनने को ज़रूरी नहीं बताया गया है.

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अपने शोध में हुमा अहमद बताती हैं कि इन विचारों और क़दमों का विरोध भी शुरू हुआ.
अफ़ग़ानिस्तान के ग्रामीण इलाक़ों में मौजूद रूढ़िवादी लोग मानने लगे कि ये सुधार उनके समाज के लिए बहुत ज़्यादा 'पश्चिमी' थे. काबुल में महिलाओं की मिलने वाली आज़ादी को लेकर 1928 में क़बायली नेताओं ने ग्रामीण इलाक़ों में विरोध शुरू कर दिया.
यहां ये बात ध्यान देने वाली है कि इस दौर में क़बायली और ग्रामीण महिलाएं जो काबुल से बाहर रहती थीं उन्हें आधुनिकीकरण का कोई फ़ायदा नहीं मिल रहा था.
लोया जिरगा यानी क़बायली नेताओं की महापरिषद ने लड़कियों की शादी की उम्र 18 साल और पुरुषों की 21 साल करने और बहुविवाह प्रथा नीतियों का विरोध किया और लड़कियों की शिक्षा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई. यहां तक कि अमानुल्लाह को अपनी नीतियों में बदलाव लाना पड़ा.
काबुल और ग्रामीण इलाक़ों में स्कूल बंद कर दिए गए और लड़कियों को हिजाब पहनना पड़ा. विरोध इतना बढ़ा कि अमानुल्लाह को देश छोड़ना पड़ा. दो दशकों में अफ़ग़ान में शासक बदले लेकिन महिलाओं को आगे बढ़ाने का एजेंडा नहीं दिखाई दिया.
50 का दशक तक आते-आते सोवियत संघ की विदेशी और तकनीकी सहायता से अफ़ग़ानिस्तान ने फिर करवट बदली. और 1950 के आस-पास महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने की ज़रूरत समझी जाने लगी.

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महिलाओं के आर्थिक रूप से सक्षम होने पर ज़ोर
शोध में लिखा गया है कि प्रधानमंत्री मोहम्मद दाऊद ने महिलाओं के पर्दे को स्वैच्छिक बना दिया. 1940 से 1950 के दशक में महिलाएं नर्स, डॉक्टर और शिक्षिकाएं बन रही थीं.
1964 में आए तीसरे संविधान में महिलाओं को राजनीति में आने की अनुमति मिली और वोट का अधिकार मिला.
अफ़ग़ानिस्तान में पहली महिला मंत्री स्वास्थ्य विभाग में बनाई गईं और इन को मिलाकर तीन महिलाएं संसद तक पहुँची.
इसी साल पहला महिला समूह डेमोक्रेटिक ऑर्ग्रेनाइजेशन ऑफ़ अफ़ग़ान विमेन भी बना. इस समूह का मक़सद महिलाओं में निरक्षरता मिटाना, जबरन शादियों पर प्रतिबंध लगाना और विवाह में लड़कियों पर बोली लगाने की प्रथा को ख़त्म करना था.

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70 के दशक के अंत तक महिलाओं के जीवन में सुधार दिखने लगा, शिक्षा के क्षेत्र में वे यूनिवर्सिटी में काम कर रही थीं और संसद में भी नुमाइंदगी कर रही थीं.
लेकिन फिर 1970 के अंत में सोवियत संघ की सेना अफ़ग़ानिस्तान आई. उनका मक़सद तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार की मदद करना था.
मुजाहिदीन और तालिबान
सोवियत सेना मुजाहिदीन के ख़िलाफ़ लड़ रही थी. मुजाहिदीन गुटों को अमेरिका, पाकिस्तान, चीन और सऊदी अरब सहित कई और देशों का समर्थन हासिल था.
सोवियत रूस की सेना 1989 में अफ़ग़ानिस्तान से वापस चली गई लेकिन देश में गृह युद्ध चलता रहा. इससे फैली अराजकता में तालिबान को पनपने का मौक़ा मिल गया.
अपने शोध में डॉ हुमा अहमद घोष लिखती हैं, 1992-1996 के दौर में मुजाहिदीन गुटों की क्रूरता जैसे हत्या, बलात्कार, अंगों को काटने और अन्य तरह की हिंसक घटनाओं की कहानियां रोज़ आती थीं. बलात्कार और जबरन विवाह से बचने के लिए लड़कियां आत्महत्याएं तक कर रही थीं.
तालिबान के बाद बदलाव
हुमा बताती हैं कि जब तालिबान के जाने के बाद उन्होंने साल 2003 में अफ़ग़ानिस्तान का दौरा किया था तब पूरा काबुल बदल चुका था और वहां एक पत्थर भी पहचानना मुश्किल था. काबुल में भी औरतें केवल बुर्के़ में नज़र आ रही थीं. लेकिन धीरे-धीरे वहां हर साल थोड़ा विकास दिखने लगा. महिलाएं बुर्क़े में ज़्यादा नहीं दिखाईं दीं लेकिन वो सिर हमेशा ढकी हुई ही दिखती थीं.
वे बताती हैं, ''मैं भी शोध के लिए सिर ढँककर ही बाहर निकलती थी. वहां महिलाओं के लिए काम करने वाली संस्थाएं दिखने लगी थीं. लड़कियों के लिए स्कूल खुल रहे थे. वे नौकरियां कर रहीं थीं लेकिन जलालाबाद या काबुल से दूर जाने पर रूढ़िवादिता दिखाई देती थी. महिलाएं बुर्के़ में दिखती थी. वहां इस्लामीकरण और क़बायली सोच का एक मिश्रण दिखता था. काबुल में बदलाव दिख रहे थे लेकिन वहाँ से बाहर जाने पर स्थिति पहले जैसी ही थी.''
ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2002 से जो इलाक़े अफ़ग़ान सरकार के नियंत्रण में थे वहां लाखों की संख्या में लड़कियां स्कूली शिक्षा ले रही थीं. जो 2001 के बाद एक बड़े बदलाव को दर्शाता है.
राकेश सूद अफ़ग़ानिस्तान में 2006 से 2008 तक भारत के राजदूत रह चुके हैं. वे कहते हैं कि तालिबान के जाने के बाद देश में सामाजिक रूढ़िवादिता तो थी लेकिन साथ ही एक खुले या उदारवादी समाज की नींव भी रखी जा रही थी.

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बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया कि जब साल 2001 में तालिबान शासन में थे तो वहां प्राइमरी और सेकंडरी स्कूल में तक़रीबन नौ लाख बच्चे जाते थे और ये सब लड़के थे.
राकेश सूद बताते हैं, ''साल 2004 में अफ़ग़ानिस्तान का नया संविधान बना था. वहां महिलाओं को समान अधिकार का प्रावधान रखा गया. महिलाओं को कई क्षेत्रों में आरक्षण दिया गया. संसद में 27 प्रतिशत आरक्षण था. औरत, अल्पसंख्यक और पिछड़ों को आगे बढ़ाने की जागरुकता भी साफ़ दिखाई देती थी. महिलाएं आगे आईं.''
सूद बताते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में अभी हाल ही की बात की जाए तो लड़कियां हर क्षेत्र में कार्यरत दिख रही थीं जैसे सेना, एयरफ़ोर्स, पुलिस या जज भी थीं. संसद में तो हैं ही.
लेकिन वे ये भी कहते हैं कि ताजिक लड़कियां ज़्यादा प्रगतिशील दिखी और इन इलाक़ों में आपको लड़कियां बाहर आती ज़्यादा दिखती हैं.
अफ़ग़ानिस्तान के ज़्यादातर उत्तरी भाग में रहने वाले ताजिक लंबे समय से तालिबान का विरोध करते आए हैं. माना जाता है कि ताजिकों को ईरान से नज़दीकी और उनकी संस्कृति को अपनाने का फ़ायदा भी मिला है. देश के क़रीब 20 बड़े शहरों में से लगभग 14 ताजिक बहुल इलाक़े हैं जो देश के अन्य भागों से ज़्यादा उदारवादी माने जाते हैं.
राकेश सूद ये भी बताते हैं कि जितनी प्रगति महिलाओं को लेकर बड़े शहरों में दिखती है उतनी ग्रामीण इलाक़ों में नहीं दिखती.

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ग्रामीण इलाक़े अभी भी पिछड़े
इसी बात को आगे बढ़ाती हैं डॉक्टर बरखा वर्षा जो संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन' यानी यूनेस्को की सदस्य हैं और अभिज्ञान फ़ाउंडेशन की निदेशक हैं.
वे साल 2018 से अफ़ग़ानिस्तान में लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा और उनके कल्याण के लिए काम कर रही हैं.
डॉ बरखा वर्षा ने अफ़ग़ानिस्तान के 16 प्रांतों में काम किया है जिनमें हेरात, मज़ार-ए-शरीफ़, जलालाबाद, कंधार, बल्ख़ और काबुल जैसे बड़े शहर शामिल हैं.
उनके अनुसार, ''बड़े शहरों में लड़कियों के लिए यूनिवर्सिटी हैं, लड़कियां पढ़ रही हैं लेकिन ग्रामीण इलाक़ों में लड़कियां केवल पाँचवीं या ज़्यादा से ज़्यादा छठीं तक ही पढ़ पाती हैं. वहां अभी भी छोटी लड़कियों की अपने से दोगुने-तिगुने उम्र के आदमी के साथ शादियां की जा रही हैं. महिलाएं बुर्के़ में नज़र आती हैं.''
''अगर ये पता चल जाए कि गर्भ में लड़की है तो उसके पैदा होने से पहले ही लड़के के साथ शादी तय हो जाती है. अभी भी वहां बेटी के पिता को लड़के का पिता पैसे देता है. और मुझे ये कहने में कोई झिझक नहीं कि है कि वहाँ बेटियां बेची जाती हैं.''
वे कहती हैं कि गांवो में जाकर उन्हें कभी नहीं लगा कि वहां से तालिबान कभी गए थे. उनके अनुसार केवल उनका असर कम हुआ और वो हुकूमत नहीं कर रहे थे.

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वे राकेश सूद की बात से सहमत दिखती हैं कि लड़कियां हर क्षेत्र में दिखाई देती हैं जिसमें अब कॉर्पेोरेट भी शामिल हैं लेकिन उनकी संख्या कम है और ज़्यादातर लड़कियां शिक्षा और मेडिकल प्रोफ़ेशन में दिखती हैं.
वे अपना अनुभव बताते हुए कहती हैं, ''मेरे पास एक दिन अपनी संस्था की गाड़ी नहीं थी और मुझे टैक्सी में जाना पड़ा. मुझे लोगों ने बुर्के में जाने की सलाह दी. हालाँकि मैं दुपट्टा सिर पर रखकर बाहर जाती थी.''
वो याद करती हैं, "उस नीले बुर्क़े को मैंने कुछ मिनट ही पहना था और वो अहसास मेरे लिए दम घुटने वाला था, जैसे में जेल में हूं और अफ़ग़ानिस्तान में महिलाएं सारी ज़िंदगी उसे पहनकर जी रही हैं. आप समझ सकते हैं उनकी हालत?"
बरखा बताती हैं, "18 जुलाई से मुझे धमकी मिल रही थी और मैं निशाने पर थी. मेरी फ़ोटो सर्कुलेट कर मेरे बारे में जानकारी माँगी जा रही थी."
हालांकि तालिबान ये कह रहे हैं कि वो शरिया व्यवस्था के तहत महिलाओं के हक़ तय करने को प्रतिबद्ध हैं लेकिन जानकारों का कहना है कि फ़िलहाल तालिबान की किसी भी बात पर विश्वास करना और कुछ कहना बहुत मुश्किल है.
उनके अनुसार कई मुस्लिम देश हैं जैसे ईरान, तुर्की, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जहां इस्लाम के आधार पर महिलाओं को अधिकार दिए गए हैं तो वो कौन सा शरिया लागू करेंगे?
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