वो भारतीय महिला जो तालिबान के क़ब्ज़े से पहले अफ़ग़ान जेल में क़ैद थी

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
ऐसा लगता है कि जब उनकी बेटी अफ़ग़ानिस्तान की किसी जेल में क़ैद थीं तब वह ज़्यादा सहज थीं. लेकिन उनके मुताबिक़ अब स्थिति बद से बदतर हो चुकी है.
केरल के तिरुवनन्तपुरम में रहने वालीं बिंदू संपत ने बीबीसी हिंदी को बताया, "काबुल से एक पत्रकार ने फ़ोन किया कि पुरुषों को जेल से छोड़ दिया गया है लेकिन महिलाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं है. ये मैसेज़ आए चार दिन बीत चुके हैं."
"महिलाओं" से उनका आशय अपनी बेटी निमिशा उर्फ़ फातिमा ईसा और पोती उम्मू कुलसू से है जो कि शुक्रवार को पाँच साल की हो जाएंगी.
निमिशा और उसके पति बेक्सेन विंसेंट उर्फ़ ईसा उन 21 लोगों में शामिल थे जो साल 2016 में अचानक केरल से गायब होकर इस्लामिक स्टेट में शामिल होने के लिए श्रीलंका चले गए थे.
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बेटी को वापस लाने के संघर्ष में लगी मां
इसके बाद से बिंदू अपनी बेटी और पोती को भारत वापस लाने के लिए एक बड़ा संघर्ष कर रही हैं. लेकिन इस्लामिक स्टेट के लिए लड़ते हुए अमेरिकी हवाई हमले में बेक्सेन विंसेंट की मौत होने के बाद बिंदू का ये संघर्ष बढ़ गया है.
निमिशा और उम्मू जब तक अफ़ग़ानिस्तान की जेल में थे तब तक बिंदू विदेश मंत्रालय के साथ साथ केंद्र सरकार में अन्य जगहों को पत्र लिखकर अपनी बेटी और पोती को भारत वापस लाने की कोशिशें कर रही थीं.
बिंदू अपनी इस गुहार के साथ दो बार केरल हाई कोर्ट के दरवाज़े खटखटा चुकी हैं.
उनकी माँग ये रही है कि निमिशा को इस्लामिक स्टेट जैसे संगठन में शामिल होने के लिए भारतीय क़ानून के अनुसार सज़ा मिलनी चाहिए और पोती उम्मू को उनके साथ रहने देना चाहिए ताकि वह समाज के साथ घुल मिल सके.
हाई कोर्ट में उनकी याचिका 24 अगस्त के लिए लंबित है. लेकिन बिंदू अब इस केस को जारी रखने या न रखने को लेकर उलझन में हैं.
बिंदू ने बीबीसी को बताया है कि "मैं इसे आगे नहीं चलाना चाहती हूं. मैं पहले ये जानना चाहती हूं कि वे कहां पर हैं." ये कहते हुए बिंदू काफ़ी परेशान लग रही थीं.
बिंदू ने बीबीसी से 2016 में भी बात की थी लेकिन अब वो पहले से कहीं अधिक वह उस दौर से भी ज़्यादा परेशान लग रही हैं.

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निमिशा में अचानक आए बदलाव
बिंदू ने बताया था कि साल 2015 के नवंबर महीने में निमिशा ने अचानक हालचाल जानने के लिए उन्हें हर रोज़ फ़ोन करना बंद कर दिया.
निमिशा कासरगोड़ के एक डेंटल कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं जहां एक साल के अंदर उन्हें डेंटिस्ट बनना था. वह कासरगोड़ में रह रही थीं जबकि उनकी माँ तिरुवनन्तपुरम में रहती थीं.
बेटी की ख़ैर-ख़बर न मिलने से परेशान बिंदू को काफ़ी प्रयासों के बाद पता चला कि निमिशा ने शादी कर ली है और उसके बाद से गायब हैं.
9 नवंबर, 2015 को निमिशा के सौतेले पिता ने कासरगोड़ पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाई. पुलिस ने तेज़ी से कार्रवाई करते हुए निमिशा को न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत में पेश किया. यहां उन्हें रिहा कर दिया गया.
बिंदू ने केरल हाई कोर्ट में हिबियस कॉरपस पेटिशन दाखिल करके निमिशा, उसके पति बेक्सेन को पेश करने और धर्मांतरण की जाँच करने की माँग की.
इसके बाद 25 नवंबर, 2015 को हाई कोर्ट ने ये याचिका ख़ारिज कर दी और कहा कि निमिशा एक वयस्क हैं और उसने अपनी मर्ज़ी से शादी की थी.
बिंदू ने बेटी के धर्मांतरण को शांति से स्वीकार करते हुए बेटी और दामाद को अपने साथ रहने के लिए मनाया.
बेक्सेन ने अपने ईसाई धर्म छोड़कर इस्लाम अपना लिया था. इसके बाद निमिशा कई बार अपनी माँ से मिलने आईं.
जब इस्लामिक स्टेट में शामिल होने गए
साल 2016 के मई महीने में बेक्सेन ने बिंदू को बताया था कि वह श्रीलंका जा रहे हैं.
बिंदू ने इस यात्रा को टलवाने की काफ़ी कोशिश की क्योंकि निमिशा गर्भवती थीं और उनका सातवां महीना चल रहा था.
दो दिन बाद 17 मई 2016 को निमिशा और बेक्सेन श्रीलंका के लिए निकल गए.
जुलाई 2017 को बिंदू को उनके जीवन का सबसे बड़ा झटका लगा जब उन्हें पता चला कि उनकी बेटी और दामाद केरल से गए उन 21 लोगों में शामिल हैं जो इस्लामिक स्टेट स्टेट में शामिल होकर अफ़ग़ानिस्तान गए हैं.
बिंदू अभी भी ये नहीं मानना चाहती थीं कि उनके बेटी, दामाद इस्लामिक स्टेट में शामिल हो गए हैं. इसे लेकर उन्हें भगवान में पूरा भरोसा था.
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अफ़ग़ानिस्तान में क़ैद
नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) ने साल 2016 में आतंकवादी संगठन में शामिल होने वाले गुमशुदा लोगों के पुलिस में दर्ज केसों पर काम करना शुरू कर दिया.
तीन साल पहले नवंबर 2019 में मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया कि 10 महिलाओं, जिनमें निमिशा भी शामिल हैं, ने अफ़ग़ानिस्तान सरकार के सामने समर्पण कर दिया है.
इसका मतलब बिंदू के लिए एक नए संघर्ष की शुरुआत थी. वो भी तब, जब भारत एक आईएस में शामिल होने वाले शख़्स नशीदुल हमज़फ़र को अफ़ग़ानिस्तान से लेकर आया हो. ऐसे में बिंदू का तर्क है कि निमिशा क्यों नहीं आ सकतीं.
ऐसे में उन्होंने एक हीबियस कॉरपस पेटिशन दाखिल की लेकिन उन्हें बताया गया कि ये अमान्य है क्योंकि निमिशा जेल में थीं.
बिंदू बताती हैं, "मुझे एक पत्रकार का संदेश आया था कि वे जेल में सुरक्षित हैं."
हाई कोर्ट ने उन्हें ये पेटिशन वापस लेकर एक अन्य पेटिशन परमादेश (रिट ऑफ़ मेंडामस) दाखिल करने की अनुमति दी. इस पेटिशन पर आगामी 24 अगस्त को सुनवाई होनी है.
इसी बीच तालिबान ने काबुल पर हमला करके सत्ता को अपने हाथ में ले लिया है. इससे बिंदू की उम्मीदें थोड़ी बढ़ी थीं लेकिन फिर उन्हें निराश होना पड़ा.
एक महिला पत्रकार ने उन्हें बताया कि जेल से पुरुषों को छोड़ दिया गया है लेकिन उन्हें ये नहीं पता है कि महिला कैदियों को छोड़ा गया है अथवा नहीं.
बिंदू ने आस नहीं छोड़ी है.
वह कहती हैं, "सबसे ऊपर भगवान हैं. भगवान सिर्फ सही बात के लिए काम करते हैं, राजनीति, जाति या धर्म के लिए नहीं. ऐसे में मुझे इंतज़ार करना होगा."
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