'अफ़ग़ानिस्तान में फिर तालिबान', कैसी थी तालिबान की पहली हुकूमत?

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- Author, महमूद जान बाबर
- पदनाम, पत्रकार, बीबीसी उर्दू के लिए
अफ़गानिस्तान की राजधानी काबुल पर तालिबान का नियंत्रण हो गया है. राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी के देश छोड़ कर उजबेकिस्तान भाग जाने की ख़बरें हैं. अफ़गानिस्तान के ज़्यादातर इलाके अब तालिबान के नियंत्रण में आ चुके हैं. तालिबान के पहले शासन को याद करते हुए तमाम अफ़ग़ान लोग देश छोड़कर भाग रहे हैं. कई देशों ने अपने राजनयिकों को निकाल लिया है और लोगों के अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने का सिलसिला जारी है. इस बीच तालिबान के नेताओं ने कहा है कि लोगों को डरने की ज़रूरत नहीं है, जो लोग देश छोड़कर जाना चाहते हैं उन्हें आसानी से जाने दिया जाएगा. आइए आपको याद दिलाते हैं पहले दौर की.

ये सन 1997 की बात है, अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सत्ता के शुरुआती दिन थे. जैसे-जैसे हम पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्ता की सीमा के क़रीब जा रहे थे हमारे दिल की धड़कनें तेज़ हो रही थीं. ज़बान पर वो सब दुआएं थीं जो बचपन से अब तक याद की थीं.
इस स्थिति में हमने सीमा पर वीरान पड़ा एंट्री पॉइंट बिना किसी दस्तावेज़ की चेकिंग के पार किया और अफ़ग़ानिस्तान में दाख़िल हो गए. यहां हमारी गाड़ी सड़क के बाईं ओर बनी एक मंज़िल की इमारत के सामने रुक गई.
यही वो जगह थी जहां के बारे में हमें ये बताया गया था कि यहीं पर हमें अफ़ग़ानिस्तान में दाख़िल होने के लिए तालिबान द्वारा तय सख़्त मानकों के हिसाब से चेक किया जाएगा.
हमारी गाड़ी में अफ़ग़ान युद्ध से परिचित पेशावर के कई वरिष्ठ पत्रकार भी बैठे थे. हम सब पेशावर से यहां तक तालिबान के सख़्त आदेश और सरकारी क़ानून से न डरने की बातें करते आ रहे थे. मैं उम्र में सबसे छोटा था और पत्रकारिता में सबसे जूनियर होने की बदौलत पिछली सीट पर दुबक कर बैठा था.

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नमाज़ और दाढ़ी के बारे में पूछा
उसके बाद एक लंबी दाढ़ी वाला काली पगड़ी पहने तालिबान शासन का सीमाई कमांडर हमारी गाड़ी की तरफ़ आया और उसने गाड़ी के अंदर झांका. हम सब ख़ामोशी से उसकी तरफ़ देख रहे थे. अप्रत्याशित रूप से उसने हम से वो सख़्त सवाल नहीं पूछे और न ही वो सख़्त रवैया दिखाया जिसके बारे में हमने बहुत कुछ सुन रखा था, लेकिन फिर भी उसने हमसे नमाज़ और दाढ़ी के बारे में पूछा और कहा कि नमाज़ पढ़ा करें और दाढ़ी रखना भी ज़रूरी है.
जिस पर हमारे सीनियर साथियों ने उनसे कहा कि पेशावर के पत्रकार इस्लाम की शिक्षा पर अमल करने की कोशिश करते हैं और वो नमाज़ भी पढ़ते हैं.
अफ़ग़ानिस्तान आने-जाने के लिए मशहूर एक बग़ैर दाढ़ी के हाफ़िज़-ए-क़ुरान (जिसे पूरा क़ुरान ज़ुबानी याद हो) वरिष्ठ पत्रकार अशरफ़ डार और उस तालिबान कमांडर के बीच वो बातचीत मुझे अब भी याद है जिसका सारांश ये था कि बग़ैर दाढ़ी के लोग भी अच्छे मुसलमान हो सकते हैं और तालिबान नेता अगर चाहें तो उनके साथ क़ुरान के किसी भी पारे (पाठ) को सुन सकते हैं.
साथ में सवार हुआ तालिबान का गाइड
इस छोट- सी बातचीत के बाद तालिबान कमांडर ने आगे बात नहीं की और पश्तो में अपने दूसरे साथी को कहा कि ये मेहमान हैं और गाड़ी जहां जा रही है वहां के लिए लेट भी हो रही है, इसलिए अपने साथी को हमारी गाड़ी में सवार करके हमें आगे जाने के लिए विदा कर दिया.
इस सीमा को पार करने को लेकर हम जो सहमे हुए थे उसे बहुत आसानी से पीछे छोड़ दिया और तूरख़म से जलालाबाद की ओर चल पड़े. इस सफ़र पर आने से एक रात पहले पेशावर प्रेस क्लब के नोटिस बोर्ड पर ये नोटिस पढ़ा था कि कल सुबह गाड़ी अफ़ग़ानिस्तान जाएगी जिसको जाना है वो सुबह-सुबह पहुंच जाए.
तालिबान ने मुजाहिदीन के युद्ध से तबाह हो चुके अफ़ग़ानिस्तान पर बहुत जल्द और आसानी से क़ब्ज़ा कर लिया था और उनके अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़े के साथ ही बड़ी अजीब ख़बरें फैलना शुरू हुई थीं.
तालिबान के क़ब्ज़े के बाद अफ़ग़ानिस्तान में शांति स्थापित करने के हवाले से अजीब-अजीब कहानियां सुनने को मिल रही थीं और लोग हैरान भी थे कि अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के मदरसों के छात्रों पर निर्भर इस तालिबान नाम के संगठन ने कैसे इतनी बड़ी घटना को अंजाम दे दिया है.
हालांकि, उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा करने के साथ ही अफ़ग़ानियों के लिए अप्रत्याशित और कुछ अजीब समझे जाने वाले क़ानून भी लागू किए थे जिनमें पुरुषों के लिए दाढ़ी रखना, संगीत, कबूतर और पतंगबाज़ी पर रोक के साथ-साथ महिलाओं के लिए बुर्क़ा पहनने के सख़्त आदेश जारी किए थे.
अफ़ग़ानिस्तान के अंदर हालात चाहे जो भी थे, लेकिन पाकिस्तान में उन ख़बरों की बदौलत लोग एक-दूसरे को वहां न जाने की सलाह दे रहे थे कि वहां नहीं जाना वरना तालिबान ने पकड़ लिया तो वापस नहीं आने देंगे.
पुरुषों की दाढ़ी के लिए तालिबान ने जो इस्लामी क़ानून के हिसाब से मानक तय किए थे उसके बारे में भी बहुत कुछ सुन रखा था और ख़ुद मेरी अपनी दाढ़ी बहुत छोटी थी इसलिए दिल धड़क रहा था कि अगर तालिबान ने अपने मानकों पर जांचा तो ख़ैर नहीं.
गाड़ी के अंदर के माहौल और एक दूसरे को अपनी कहानियों से डराने वाले हमारे सीनियर पत्रकार साथी यूं तो बड़ी बहादुरी का प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन साथ ही साथ उनकी बातों में एक अनिश्चितता भी थी कि क्या पता तालिबान हमारे बिना दाढ़ी के दोस्तों को रोक ही न लें.
ख़ैर जैसे ही गाड़ी उस चेक पोस्ट से आगे बढ़ी तो हमारे ठहाके शुरू हुए और सब अपनी पेशावर वाली हालत में वापस आ गए थे. तब मुझे एहसास हुआ कि तालिबान या तो पत्रकारों को कुछ नहीं कहते और उनके साथ क़ानून में छूट देते हैं या हमारे साथ ये नरमी किसी उद्देश्य से बरती जा रही है.
जब हम दौरे से वापस आए तो कुछ दिन बाद पता चला कि हमारा ये दौरा भी तालिबान ने दुनिया में अपने बारे में मानवाधिकार उल्लंघन की ख़बरों का तोड़ पेश करने के लिए कराया था ताकि हम को वो कुछ दिखाया जा सके जो तालिबान के अनुसार दुनिया को मालूम नहीं था.

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लोग जब खुलकर नहीं बोले
हमारे साथ गाड़ी में मौजूद हमारे गाइड तालिब ने जो काफ़ी पढ़े-लिखे लग रहे थे तमाम सवालों के जवाब दिए, जिनमें से कुछ-कुछ हमें याद हैं. उसकी हर बात की तान इसी पर ख़त्म होती थी कि उनके आने से अफ़ग़ानिस्तान के लोग ख़ुश हैं जो उनके आने से पहले लगातार अशांति और लूट-मार से सख़्त तंग थे.
वो तूरख़म से जलालाबाद के रास्ते में शायद बटीकोट का इलाक़ा था जहां से गुज़रते हुए वो हमें उस इलाक़े में पहले की ज़िंदगी के बारे में बता रहे थे कि यहां पर लोगों के साथ क्या-क्या होता रहा और उनके सत्ता में आने से पहले होने वाली लूट-मार, अत्याचार के साथ-साथ उनके ज़रिए स्थापित शांति और सुरक्षा को पूरी तरह उजागर कर रहा था.
यूं तो जहां-जहां से हम गुज़र रहे थे लोग कम ही घरों से बाहर घूम रहे थे और अधिकतर जगहों पर बहुत कम लोग या तो खेतों में काम कर रहे थे या बुर्क़ा पहने महिलाएं आती-जाती दिखाई दे रही थीं. इस दौरान हमें एक जगह कुछ दुकानें नज़र आईं तो हमने अपने मेज़बान से कहा कि हमें यहां रुककर लोगों से बात करनी है और कुछ चीज़ें ख़रीदनी हैं.
उसने बेहद ख़ुश होकर गाड़ी रुकवाई. हम वहां मौजूद लोगों से मिले और दुकानदारों से ख़रीदारी के नाम पर बातचीत शुरू कर दी.
मैं उस दौरान यह जानने के लिए बहुत उत्सुक था कि जल्दी से कुछ पता चल सके कि क्या आम लोग भी तालिबान के आने से ख़ुश हैं या सिर्फ़ उनका दावा था. मैंने एक दुकानदार से जाते ही पूछ लिया कि तालिबान कैसे लोग हैं और उनके आने से आम लोग ख़ुश हैं या नहीं. वो मुस्कुराया और ख़ामोश रहा तो मैंने उसे कहा कि मैं पेशावर से आया पत्रकार हूं, लेकिन उसने फिर भी ज़्यादा कुछ न कहा और इस बात पर सहमत हुआ कि यहां हालात पहले से बेहतर हैं और लूट-मार नहीं होती और शांति हो गई है.
मुझे याद है कि मैंने अपने सीनियर दोस्त से पूछा कि ये दुकानदार क्यों अपने दिल की बात नहीं बता रहा है तो उन्होंने अपने अनुभव की रोशनी में जो बात बताई वो मैंने सारी उम्र के लिए गांठ बांध ली कि 'तुम तालिबान की गाड़ी में उनके साथ आए हो तो ये कैसे हो सकता है कि ये दुकानदार सब कुछ देखकर भी वो बातें बताए जो वो किसी भरोसेमंद शख़्स को ही बता सकता है.'
दुकानदार के पास से मायूस होकर मैं सड़क किनारे खड़े अधिक उम्र के उन पुरुषों के पास चला गया जो पगड़ी वाले थे.

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दाढ़ी के नाप तोल के सवाल पर जब लगे ठहाके
उनसे बात की तो एक बुज़ुर्ग जो पहले से तैयार बैठे थे खुलकर बात करने लगे और कहा कि चाहे तालिबान जैसे भी हैं कम से कम वो अपने से पहले के वॉर लॉर्ड्स और मुजाहिदीन से बेहतर ही थे जिनके दौर में पूरे अफ़ग़ानिस्तान में हर किसी की अपने इलाक़े में चेक पोस्ट हुआ करती थी जो वहां से गुज़रने वालों को लौटाया करते थे.
मैंने सवाल किया कि दुनियाभर के अख़बार में और टीवी चैनलों पर ख़बरें चल रही हैं कि तालिबान के दौर में मानवाधिकार उल्लंघन हो रहे हैं और पुरुषों को दाढ़ी रखने और महिलाओं को बुर्क़ा पहनने पर मजबूर किया जा रहा है, तो साथ ही खड़े दूसरे बुज़ुर्ग ने भी पहले वाले बुज़ुर्ग का साथ दिया और कहा कि ज़िंदा रहने की सहूलियत मिले तो ये पाबंदियां कोई हैसियत नहीं रखतीं और कहा कि जिस इलाक़े में आप मौजूद हैं यहां के लोगों का ये मुद्दा ही नहीं है क्योंकि यहां पर रहने वाले पख़्तून समुदाय में ज़्यादातर इन बातों की परंपरा पहले से है और अब जो तालिबान कह रहा है उस पर अमल किया जा रहा है.
तालिबान की ओर से पुरुषों की दाढ़ी नापने का सवाल पूछा तो सब बूढ़े मुझे देखकर ठहाका लगाने लगे हालांकि उससे ज़्यादा उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.
तभी मुझे एहसास हुआ कि ये लोग दो-तीन वजहों से ख़ामोश हैं. या तो वे वास्तव में ख़ुश थे और उन्हें शांति जैसी दौलत मिली थी या वो तालिबान को ख़बर होने और बाद में सज़ा मिलने के डर से ख़ामोश थे और ख़ुश नज़र आने की कोशिश कर रहे थे या फिर वो इस इलाक़े में पख़्तून परंपरा के मुताबिक इन आदेशों के लागू होने से ख़ुश थे.
इस सफ़र में आख़िरकार हम तालिबान के उस केंद्र में पहुंच गए जिसके इर्द-गिर्द कोई आबादी न होने के बराबर थी.
तालिबान की ब्रीफ़िंग
उस इलाक़े का नाम तो मेरी याद्दाश्त में नहीं है हालांकि ये वो जगह थी जहां से उस पूरे इलाक़े और तूरख़म बॉर्डर तक के लोगों की मदद की जाती थी. वहां पर हमें आधिकारिक तौर पर तालिबान की सरकारी नीतियों के बारे में एक वरिष्ठ तालिबान नेता ने ब्रीफ़िंग दी.
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इस ब्रीफ़िंग के दौरान हमारे समूह में शामिल दोस्तों के चंद सवालों के दौरान तो मेरा दिल मुंह को आने लगा था कि वो उनसे हर वो सवाल पूछ रहे थे जो मैं पूछने का सोच भी नहीं सकता था.
जबरन महिलाओं को पर्दा करवाने से लेकर पुरुषों को दाढ़ी रखने पर मजबूर करने और युवाओं के पसंदीदा पतंगबाज़ी पर पाबंदी लगाने पर भी सवाल पूछे गए. लेकिन तालिबान के उस नेता ने पूरी सहनशीलता के साथ तमाम सवालों के जवाब देने की कोशिश भी की और इन आरोपों को भी ख़ारिज करना चाहा कि उनके बारे में सख़्त पाबंदियां लगाने के हवाले से जो ख़बरें आईं हैं उनमें पूरी तौर पर सच्चाई नहीं है.
हां कुछ कारणों से ही पता चल गया कि उनके बारे में जो कुछ पढ़ा और सुना है वो ठीक था और वो ऐसा ही कर रहे थे.
हमें ब्रीफ़िंग देने वाले तालिबान नेता कभी-कभी मुस्कुरा भी देते थे जिससे हमें अंदाज़ा हुआ कि वो भी शायद मज़ाक़ पसंद करते होंगे जिसका सबूत वापसी में हमें तब मिला जब हमारे उस तालिबान गार्ड की भी ज़बान खुल गई. उसने हमें चुटकुले सुनाने शुरू कर दिये.
जब हमारे बीच कुछ बातचीत बढ़ी तो वापसी पर तूरख़म में अफ़ग़ानिस्तान की तरफ़ उसे छोड़ते हुए मैंने उससे पूछ लिया कि वो जो अफ़ग़ानिस्तान में दाख़िल होने वाले तमाम पुरुषों की दाढ़ियां लालटेन के शीशे में डालकर चेक करने का तरीक़ा है वो कहां पर किया जाता है?
तो वो हंस दिया और बोला कि आपको कहीं नज़र आया तो मैंने कहा मुझे तो कोई बग़ैर दाढ़ी के नज़र नहीं आया इसलिए पता ही नहीं चला कि इस बात में कितनी हक़ीक़त है. वो मुस्कुराया और हम उससे हाथ मिलाकर पेशावर वापस लौट आए.

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इस सारे सफ़र के दौरान अफ़ग़ानिस्तान के जितने हिस्से को हमने देखा वहां पर ख़ामोशी तो थी, लेकिन इस ख़ामोशी पर ख़ौफ़ छाया हुआ था.
लोग तो थे लेकिन उतने भी नहीं थे कि जिससे हमें पूरे अफ़ग़ान समाज की मौजूदा शक्ल का अंदाज़ा हो सकता था कि वो किस हाल में हैं. हालांकि, बाद में तालिबान के साथ संपर्क बनने के दौरान वो इस बात का आरोप लगाते रहे कि उनके विरोधी और मीडिया उनको वैसा नहीं दिखा रहा जैसे वो हैं.
दिन ब दिन बदलता गया तालिबान का रवैया
वो जिस चीज़ का क्रेडिट लेते थे वो उनके अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता में आने के बाद क़ायम होने वाली शांति थी और जिन लोगों ने मुजाहिदीन और वॉर लॉर्ड्स के दिनों की अशांति और लूटमार देखी थी वो तालिबान को इस बात का क्रेडिट देते थे कि उनके सख़्त विरोधी भी इतना कहते थे कि तालिबान न आए होते तो मालूम नहीं अफ़ग़ानिस्तान में कितने लाख इस गृह युद्ध में मर जाते जो मुजाहिदीन के दौर में शुरू हुआ था.
इस यात्रा से तालिबान की सत्ता के पूरे तौर पर अंदाज़ा लगाना मुमकिन नहीं था, लेकिन ये उनके दौर की शुरुआत का एक प्रतिबिंब ज़रूर था जिसमें पाकिस्तानी पत्रकारों के उस ग्रुप को ये आभास देने की कोशिश की गई कि अफ़ग़ान लोग उनके आने से ख़ुश थे और ये भी कि लोगों की जान, इज़्ज़त और माल तो कम से कम लुटने से बच गया.
इसके बाद पेश आने वाली घटना ने हालांकि ये साबित किया कि तालिबान से अफ़ग़ान जनता को ऐसी शिकायतें हुईं जिसने उनके जन समर्थन को प्रभावित किया.
उनमें महिलाओं की शिक्षा और समाज में उनकी स्वतंत्र आवाजाही पर पाबंदी, महिलाओं को हिजाब की पाबंदी, पुरुषों को दाढ़ी रखने, नमाज़ पढ़ने का आदेश और कई खेलों पर पाबंदी और ख़ासतौर पर महिलाओं को सरेआम 'इस्लामी' सज़ाएं देने जैसे मामलों ने तालिबान के समर्थन को कम कर दिया.
बाद के दिनों में जब महिलाओं को भरे बाज़ार में पत्थरों से मारने और निक्कर पहनने पर फ़ुटबॉल टीम का सिर मूंडने और संगीत और शोबिज़ से संबंध रखने वाले लोगों को सज़ाएं देने की ख़बरें पाकिस्तान में पहुंचीं तो हम भी ये सोचने पर मजबूर हो गए कि क्या ये वही तालिबान हैं जिन्होंने अफ़ग़ानिस्तान पर अपनी सत्ता क़ायम करने के लिए शुरुआती दिनों में पाकिस्तान से आए पत्रकारों के सामने अपना साकारात्मक पक्ष पेश करने की कोशिश की थी.
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