अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान का वो ख़ूंख़ार दौर जब मैंने अपने पिता को खो दिया था - एक अफ़ग़ान महिला की आपबीती

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अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के सरकार बनाने की तैयारियों के बीच 1999 में तालिबान का शासन देख चुकी एक महिला अपनी आपबीती सुना रही है.

इस महिला का परिवार 1999 में तालिबान के शासन के दौरान बिखर गया था.

अफ़ग़ानिस्तान के पश्चिमी शहर हेरात की रहने वाली फ़रीबा दस साल की थीं जब आख़िरी बार उन्होंने अपने घर पर अपने पिता को देखा था.

उनका परिवार मानता है कि उन्हें तालिबान ने अग़वा कर लिया था.

ये फ़रीबा की कहानी है.

इस कहानी में नाम बदल दिए गए हैं ताकि लोगों की पहचान छुपाई जा सके - तालिबान के शासन में रहना ऐसा है जैसे किसी ख़राब रिश्ते में रहना.

शुरुआत में ये अच्छा होता है. वो वादे करते हैं और अपने कुछ वादों को पूरा भी करते हैं, वो संभल-संभल कर क़दम रखते हैं.

लेकिन जब आपको झूठी सुरक्षा का एहसास हो रहा होता है, वो अपने प्लान बना रहे होते हैं. धीरे-धीरे दुनिया अफ़ग़ानिस्तान से बोर होने लगती है और मीडिया अगली कहानी पर आगे बढ़ जाता है.

फिर वो दिन-ब-दिन अपनी पकड़ मज़बूत करते जाते हैं और उनका ख़ूंख़ार चक्र शुरू हो जाता है.

मेरे पिता का जन्म हेरात में हुआ था और उन्होंने काबुल यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने शादी की और फिर वो तत्कालीन अफ़ग़ानिस्तान सरकार की एक छोटी टीम में काम करने लगे.

जब रूसी चले गए और मुजाहिदीन सत्ता में आए तो मेरे पिता ने एक एनजीओ में काम करना शुरू कर दिया. जब तालिबान हेरात आए, मेरे पिता के पास भागने का मौका था, लेकिन वो घर पर ही रुके रहे. वो अपने काम से और हेरात से प्यार करते थे.

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'मैं कभी अपनी मां का चेहरा नहीं भूल पाऊंगी'

तालिबान के शासन में जीवन मुश्किल और क्रूर था. उनकी चार बेटियां थीं जिनकी पढ़ाई रुक गई थी और एक छोटा बेटा था.

लेकिन उनका काम अच्छा था और वो उससे ख़ुश थे. वो अपने लिए और हमारे लिए काफ़ी कुछ कर पा रहे थे. वो जानवरों के साथ काम करते थे जिससे मुश्किल जीवन भी आसान लगता था.

वो जून 1999 की एक सुबह थी. मेरे पिता ने नाश्ता कर लिया था और वो दफ़्तर जाने के लिए तैयार हो रहे थे.

जब वो अपनी बाइक पर बैठकर काम के लिए निकले तो मुझे देखकर मुस्कुराए. कुछ देर बाद हमारे कुछ पड़ोसी उनकी बाइक लेकर हमारे घर आए और बताया कि तालिबान उन्हें पकड़ कर ले गए हैं.

मैं अपनी मां का वो चेहरा नहीं भूल पाती हूं. वो बिल्कुल ठंडी पड़ गई थीं. वो मेरे पांच महीने के भाई को गोद में लेकर बाहर पिता की तलाश में भागीं.

मेरे पिता के बारे में कोई ख़बर नहीं थी, हमें पता नहीं था कि वो कहां हैं, ज़िंदा भी हैं या नहीं. मेरे चाचा और मेरे पिता के दोस्तों ने ये पता करने की कोशिश की कि उन्हें कहां रखा गया है.

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पिता की तलाश

हर दिन मेरी मां तालिबान के दफ़्तरों के चक्कर लगाती, लेकिन वो उनकी एक ना सुनते.

जब हेरात में कुछ पता नहीं चला तो मेरे अंकल कंधार गए क्योंकि उन्हें बताया गया था कि तालिबान कुछ क़ैदियों को कंधार लेकर गए हैं. लेकिन वहां भी कोई ख़बर नहीं मिली.

फिर वो काबुल और मज़ार-ए-शरीफ़ गए, लेकिन वहां भी कुछ पता ना चला.

हमारे पड़ोसी इस बात को लेकर बिल्कुल निश्चित थे कि मेरे पिता को तालिबान ने ही पकड़ा था. कुछ और पड़ोसियों को भी तालिबान ने पकड़ा था. बाद में उन्हें हेरात जेल से रिहा कर दिया गया.

मेरी मां बहुत मज़बूत थीं, किसी शेरनी की तरह, वो हार नहीं मानने वाली थीं.

परिवार के लोगों ने उन्हें बहुत मना किया, लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी. वो मेरे छोटे भाई को अपने साथ लेकर (उस दौर में महिला किसी पुरुष के साथ ही बाहर निकल सकती थी भले ही वो बच्चा ही क्यों ना हो) कंधार में मुल्ला उमर के दफ़्तर पहुंच गईं.

तालिबान ने उन्हें पीटा और धमकी दी कि यदि वो दोबारा वहां दिखीं तो उन्हें पत्थरों से मार दिया जाएगा.

मेरी मां निराश और हारी हुई घर लौटीं.

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'हम तालिबान को माफ़ नहीं कर सकते'

तालिबान के शासन में हमारा जीवन किसी नर्क़ सा था जो निराशा के ब्लैक होल जैसा था. मेरी मां हम सबकी सुरक्षा को लेकर चिंतित थीं. वो हमें लेकर ईरान के मशहद भाग गईं.

2004 में जब अफ़ग़ानिस्तान के हालात कुछ बेहतर हुए तो हम लौट आए. हम पढ़ना चाहते थे और अपने लिए कुछ करना चाहते थे.

हमारे पिता को हमसे कुछ उम्मीदें थीं जिन्हें हम पूरी करना चाहते थे.

मुझे अभी भी उनकी वो दिलकश मुस्कान याद है. मेरे पास वो पेन अब भी है जो उन्होंने मुझे दिया था. हम उनका ग़म नहीं मना सके थे. हम उन्हें भूल भी नहीं सकते हैं.

अब जब हम फिर से अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के क़ब्ज़े की ख़बर देख रहे हैं, हमें डर है कि कहीं फिर वही इतिहास न दोहराया जाए.

अब मेरी शादी हो गई है और मैं इंग्लैंड में रहती हूं. लेकिन मुझे अपनी मां, बहनों और भाई की फ़िक़्र है जो अफ़ग़ानिस्तान में हैं.

मुझे उन दसियों लाख परिवारों की फ़िक़्र है जिन्हें हमारी तरह दर्द से गुज़रना पड़ सकता है.

उन सबका अपराध सिर्फ़ यही है कि वो अफ़ग़ानिस्तान में पैदा हुए हैं.

(प्रोड्यूसर:रोज़ीना सीनी)

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