अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान के डर के साये में जीते अफ़ग़ान लोग

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    • Author, रॉड्री डेविज़ और बीबीसी इन्वेस्टिगेशन टीम
    • पदनाम, इलस्ट्रेशनः इलियान जंग

अफ़ग़ानिस्तान के ताखर प्रांत के एक ग्रामीण इलाके में काम करने वाली नर्स नूरिया हया के रोज़मर्रा के काम में पुरुष डॉक्टरों के साथ बातचीत और सलाह-मशविरा करना भी शामिल था.

इसमें स्थानीय लोगों के लिए इलाज और हेल्थ क्लीनिक की प्राथमिकताओं पर बातचीत होती थी.

ताखर का इश्कामिश ज़िला देश के पूर्वोत्तर में ताजिकिस्तान की सीमा से लगने वाला एक ग्रामीण इलाका है. यहां स्वास्थ्य के क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है.

लेकिन हाल ही में 29 साल की नूरिया हया को मालूम चला कि अस्पताल के पुरुष और महिला स्टाफ़ की मीटिंग्स पर रोक लगा दी गई है. नूरिया बताती हैं कि इस क्षेत्र की कमान संभालने के बाद ये तालिबान का पहला फरमान था.

अब वो खुद से बस यही सवाल कर सकती थीं कि और कैसे उनकी ज़िंदगी बदलेगी.

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अफ़ग़ानिस्तान का दूसरा सबसे बड़ा शहर

इश्कामिश हिंदुकुश पर्वत श्रृंखला के बीच पड़ने वाला इलाका है. मई में नेटो ने जब अपने दस हज़ार सैनिकों को अफ़ग़ानिस्तान से हटाया था तो तालिबान ने इस प्रमुख सीमावर्ती इलाके को अपने नियंत्रण में ले लिया था.

15 मई के आस-पास ऐसा लगा कि दक्षिणी हेलमंद में सरकारी सुरक्षा बल तेज़ होती लड़ाई के लिए तैयार नहीं हैं और तब तालिबान ने हिंदुकुश श्रृंखला की तराई में स्थित बुर्का ज़िले को अपने दखल में ले लिया.

लगभग उसी समय अमेरिका सुरक्षा बलों ने कंधार हवाई अड्डे को अलविदा कह दिया. कंधार अफ़ग़ानिस्तान का दूसरा सबसे बड़ा शहर है. तालिबान जिस रफ़्तार से आगे बढ़ रहा था, स्थानीय लोगों को इसकी ख़बर थी.

तालिबान की बढ़त
वीडियो कैप्शन, COVER STORY: अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल की ओर बढ़ता तालिबान

तालिबान की मौजूदगी

कंधार शहर से पूरब में दो घंटे की दूरी पर अर्गिस्तान ज़िला आता है. इसकी सरहद पाकिस्तान से लगती है. अर्गिस्तान के 54 वर्षीय जान अग़ा कहते हैं, "सब डरे हुए हैं. लोगों ने खुद को घरों में बंद कर लिया है. तालिबान की मौजूदगी सभी गांवों में है. स्थानीय लोग उनसे बचकर कहीं भाग नहीं सकते."

तालिबान के हथियारबंद लड़ाके सड़कों पर खुलेआम घूमते देखे जा सकते हैं. सुबह और शाम वे लोगों के दरवाज़ों पर दस्तक देते हैं और खाने-पीने की चीज़ें मांगते हैं. लोग अंज़ाम के डर से उनकी मांग पूरी करते हैं.

पेशे से फल विक्रेता जान अग़ा बताते हैं, "तालिबान लड़ाकों को हरेक घर से तीन-चार रोटियां या कोई और खाना दिया जाता है. उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिससे मांगा जा रहा है, अफ़ग़ान जैसे ग़रीब मुल्क में वो कितना ग़रीब है. अगर तालिबान लड़ाका उनके घर में रहना चाहे तो लोगों के पास इसे मानने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता है."

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अमेरिका और तालिबान की बातचीत

जून के आख़िर तक तालिबान ने उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के कई सूबों को अपनी दखल में लेने का दावा किया. इसमें ताखर, फरयाब और बदाखशान जैसे सूबे शामिल थे. तालिबान ने रणनीतिक रूप से न केवल अफ़ग़ान सुरक्षा बलों को बल्कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी कदम वापस खींचने के लिए मजबूर किया.

इस वक़्त तक अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद ढाई हज़ार अमेरिकी सैनिकों में से ज़्यादातर देश छोड़ चुके थे. हालांकि कुछ मुट्ठी भर अमेरिकी सैनिक और उनकी एयरफोर्स काबुल में रह गए थे.

अफ़ग़ान लोगों को ये शिकायत है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने में बहुत जल्दबाज़ी की. कुछ लोगों का ये कहना है कि पिछले दो साल भी ज़्यादा अरसे से चली आ रही अमेरिका और तालिबान की बातचीत ने इस संगठन को वैधता दी.

तालिबान की महत्वाकांक्षाओं को परवाना चढ़ाया और उसके लड़ाकों की भर्ती तेज़ हुई.

इस जंग के आख़िरी पड़ाव पर एक बात यकीन के साथ कही जा सकती है कि 20 साल पहले अमेरिका की अगुवाई जिस तालिबान को सत्ता से बेदखल कर दिया गया था, दरअसल वो संघर्ष कभी ख़त्म ही नहीं हुआ था.

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वीडियो कैप्शन, अफ़ग़ानिस्तान से निकलने की जल्दी में क्यों अमेरिका?

दो दशकों के लंबे संघर्ष के बाद

जून में ही ये बात साफ़ हो गई थी कि तालिबान ने अपनी खोई ताक़त फिर से हासिल कर ली है. वे खाने-पीने की चीज़ों और पनाह से ज़्यादा की मांग करने लगे थे.

अफ़ग़ानिस्तान में पिछले दो दशकों के लंबे संघर्ष के बाद जिन सामाजिक और आर्थिक अधिकारों को हासिल करने में थोड़ी-बहुत कामयाबी मिली थी, वो पलक झपकते ही छीन ली गईं.

महिलाओं से उनके हक छीने जाने के फ़ैसले की जद में नूरिया भी आ गईं. उनकी अब तक की ज़िंदगी में ये बिलकुल नया तजुर्बा था.

नूरिया बताती हैं, "अब यहां कई पाबंदियां हैं. जब मैं बाहर जाती हूं तो मुझे बुर्का पहनना पड़ता है और मेरे साथ एक मर्द भी रहेगा क्योंकि तालिबान ने ऐसा करने के लिए हुक्म दिया है."

वीडियो कैप्शन, अफ़ग़ानिस्तान में क्या हासिल करना चाहते हैं अर्दोआन?

'अमरी बिल मारोफ़'

एक मिडवाइफ़ नर्स के रूप में ज़िले के दूरदराज़ के इलाकों में जाना उनके लिए पहले से एक मुश्किल भरी चुनौती थी. मर्दों को दाढ़ी बनाने की इजाजत नहीं है क्योंकि तालिबान इसे इस्लाम के ख़िलाफ़ मानता है.

बाल काटने वाले हज्जामों को भी कथित रूप से पश्चिमी शैली वाली हेयर कटिंग से दूर रहने के लिए कहा गया है. तालिबान के भीतर 'अमरी बिल मारोफ़' नाम का एक समूह है जो इस तरह के 'सामाजिक नियमों' को लागू करता है.

नब्बे के दशक में इसी समूह के द्वारा दी गई सज़ाओं के डरावने किस्से आज भी कहे-सुने जाते रहे हैं.

अब ये गुट एक बार फिर से अपने नियम-कायदों को थोप रहा है. ये पहले चेतावनी देता है फिर सज़ा. और सज़ा में सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने के अलावा जेल भेजना, पिटाई करना और कोड़े मारना शामिल है.

वीडियो कैप्शन, अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वजह से कई सपने टूट रहे हैं

इस्लाम का इस्तेमाल

नूरिया बताती हैं, "हमसे हमारी ज़्यादातर आज़ादियां छीन ली गई हैं. ये बहुत मुश्किल है. लेकिन हमारे पास कोई चारा नहीं है. वे निर्दयी लोग हैं. वे जो कहते हैं, हमें उस पर अमल करना पड़ता है. वे अपने मक़सद के लिए इस्लाम का इस्तेमाल कर रहे हैं. हम भी मुसलमान हैं लेकिन उनकी मान्यताएं अलग हैं."

ज़मीन पर जो बदलाव हो रहे हैं, उसे लेकर लोगों की अलग-अलग राय है. कुछ स्थानीय लोग तालिबान के वर्चस्व स्थापित होने के बाद आई शांति का स्वागत कर रहे हैं, भले ही उन्हें इस बात पर शक हो कि ये शांति कब तक रहेगी.

हालांकि ये वही लोग हैं जो जिनकी काबुल की हुकूमत को लेकर भी यही राय थी.

लेकिन इन सब के बीच और भी चीज़ें पीछे छूट रही हैं. अफ़ग़ान लोग ताखर खूब जाया करते थे. ये देश के 34 सूबों में से अपनी साफ़-सफ़ाई, खूबसूरत ओबाहवा, बर्फीले पहाड़ों, सब्ज़ हरे खेतों और साफ़-सुथरी नदियों के लिए मशहूर है.

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लोगों की सामाजिक ज़िंदगी

फरख़ार ज़िले के टैक्सी ड्राइवर आसिफ़ अहदी कहते हैं कि वो हर रोज़ 900 अफ़ग़ानी (भारतीय मुद्रा में 816 रुपये) कमा लिया करते थे. लेकिन तालिबान की बढ़ती रफ्तार के कारण यहां सैलानियों ने आना बंद कर दिया है.

35 वर्षीय आसिफ़ बताते हैं, "वे सैलानी ही मेरे ग्राहक थे. जो पैसा उनसे मिलता था, उससे मेरे परिवार की रोज़ी-रोटी चलती थी. अब कोई दिन बहुत अच्छा गुजरता है तो मैं 150 अफ़ग़ानी कमा लेता हूं. इससे तो तेल का भी खर्च नहीं निकलता है जो अब पहले से दोगुना बढ़ गया है."

इसका असर लोगों की सामाजिक ज़िंदगी पर भी पड़ा है.

आसिफ़ कहते हैं, "लोग हर जुमे की रात दावत किया करते थे. संगीत होता था, नाच-गाना चलता था. खूब मस्ती होती थी. अब इन सब चीज़ों पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है."

"हर कारोबार का यही हाल हुआ है."

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सरकार चलाने का तरीका

अमेरिकी और नेटो सैनिकों के बगराम एयरबेस छोड़ने के दो दिनों बाद चार जुलाई को तालिबान ने कंधार प्रांत के अपने पुराने गढ़ पंजवई ज़िले को अपने कब्ज़े में ले लिया. पंजवई ही वो जगह है जिसे तालिबान का जन्मस्थान माना जाता है.

बीते दो दशकों से अमेरिकी नेतृत्व में ज़्यादातर मिलिट्री ऑपरेशंस को इसी बगराम एयरबेस से अंज़ाम दिया गया था.

पंजवई पर कब्ज़े के हफ़्ता भी नहीं बीता था कि तालिबान ने ईरान की सीमा से लगने वाली सबसे बड़ी सीमा चौकी और ट्रेड रूट इस्लाम क़ला पर नियंत्रण स्थापित कर लिया.

जुलाई के तीसरे हफ़्ते तक तालिबान ने देश के 90 फीसदी सरहद और 85 फीसदी मुल्क पर नियंत्रण हासिल कर लेने का दावा किया. तालिबान के इन दावों की स्वतंत्र तरीके से पुष्टि करना एक तरह से नामुमकिन था.

आसिफ़ बताते हैं कि तालिबान की मजबूत होती पकड़ के साथ-साथ अपने घरों में छिपे लोग बाहर निकलने लगे. इनमें से कुछ ने तालिब के फटाफट इंसाफ़ और सरकार चलाने का तरीका पहले कभी नहीं देखा था.

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अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही है

आसिफ़ बताते हैं, "वे आपराधिक मामलों में बहुत जल्द फ़ैसला लेते हैं. उनके यहां कोई नौकरशाही और लालफीताशाही नहीं है. हर मुश्किल का हल कुछ दिन में निकल जाता है और उनके फ़ैसलों को कोई चुनौती नहीं दे सकता है."

वे 'तालिबान अशर' और 'ज़कात' भी वसूलते हैं. इस्लाम में ज़कात का मतलब ग़रीबों को दी जाने वाली मदद होती है. लोग अपनी फसल का दस फीसदी या आमदनी का एक हिस्सा ज़कात की शक्ल में देते हैं. लेकिन तालिबान ने अपने मतलब के लिए इस दान को टैक्स में बदल दिया है.

आसिफ़ का कहना है कि सरकारी कामकाज बंद हो गया है. अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही है. बाहरी और आंतरिक व्यापार पर पाबंदियां हैं. इन हालात में ज़रूरी चीज़ों की कीमतें आसमान छू रही हैं. इससे लोगों पर वित्तीय दबाव बढ़ा है.

वो कहते हैं, "लोग पहले से ही ग़रीब थे. अब न तो काम करने के लिए गुंज़ाइश है और नही लगाने के लिए पैसा."

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इस्लामी तौर तरीके

कुछ लोगों ने तालिबान की पिछली हुकूमत देख रखी है.

जान अग़ा कहते हैं, "जब उनकी सोच और विचारधारा आज भी वैसी ही है, जैसी अमीरात हुकूमत के दौरान हुआ करती थी. वे बिलकुल नहीं बदले हैं. तालिबान का कहना है कि मजहबी हुकूमत की फिर से स्थापना के लिए उन्होंने कई कुर्बानियां दी हैं, इसलिए वे इसे दरकिनार नहीं कर सकते हैं."

जान अग़ा ने बताया कि तालिबान ने उनके इलाके के सभी स्कूलों को बंद कर दिया है.

उन्होंने कहा है कि तालीम इस्लामी तौर तरीकों से ही दी जानी चाहिए. ये स्थानीय लोगों के लिए बेहद चिंता की बात है.

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महिलाओं की सार्वजनिक जीवन में वापसी

साल 1996 से साल 2001 के बीच जब अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान की हुकूमत थी तो महिलाओं और लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई पर रोक लगा दी गई थी. उन्हें स्वास्थ्य सुविधाओं से भी मरहूम कर दिया गया था.

तालिबान के सत्ता से बेदखल होने के बाद महिलाओं की सार्वजनिक जीवन में वापसी हुई और आज अफ़ग़ान संसद में एक चौथाई महिलाएं हैं.

प्राइमरी स्कूलों में लड़कियों का दाखिला 50 फीसदी तक बढ़ गया. हालांकि सेकेंडरी स्कूलों में ये आंकड़े 20 फीसदी ही रहे.

महिलाओं की जीवन प्रत्याशा 57 साल से बढ़कर 66 साल हो गई. तुलनात्मक रूप से देखें तो ये आंकड़े ख़राब लगते हैं लेकिन ये भी सच है कि सुधार हुआ है. लेकिन अब चिंता इस बात को लेकर है कि महिलाओं को एक बार फिर हाशिये पर धकेल दिया जाएगा.

अफ़ग़ानिस्तान में आजकल प्रगति वही है तो तालिबान कर रहा है. अगस्त में तालिबान ने शहरी केंद्रों पर हमले तेज़ कर दिए. प्रांतीय राजधानियों में से एक तिहाई पर उसका नियंत्रण स्थापित हो गया. इसमें कुंदुज़ और ताखर प्रांत का तलोक़ान शहर भी शामिल हैं.

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संघर्ष की बड़ी कीमत

इस हफ़्ते उन्होंने पश्चिम में हेरात, दक्षिण में कंधार और लश्कर गाह और रणनीतिक और प्रतीकात्मक लिहाज से महत्वपूर्ण कई शहरों को अपने नियंत्रण में ले लिया. इन इलाकों में अफ़ग़ानिस्तान की दस लाख से ज़्यादा आबादी रहती है.

अमेरिकी वायुसेना अफ़ग़ान मिलिट्री की मदद कर रही थी लेकिन 11 सितंबर तक विदेशी सैनिक पूरी तरह से अफ़ग़ानिस्तान छोड़ देंगे.

इसी दिन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए 11 सितंबर के हमलों की 20वीं बरसी है.

इसके बाद अमेरिका के नेतृत्व में अफ़ग़ानिस्तान पर धावा बोला गया और ओसामा बिन लादेन और अल कायदा को शह देने के लिए तालिबान को अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता से बेदखल कर दिया गया.

इस संघर्ष की बड़ी मानवीय कीमत चुकानी पड़ी है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ अगस्त के पहले हफ़्ते तक एक महीने में एक हज़ार से ज़्यादा आम लोगों की मौत हुई, हज़ारों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा.

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अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान नियंत्रण हासिल करने के लिए बेकरार भी है और तैयार भी दिख रहा है. जहां उसका प्रशासन है, बदलाव साफ़ महसूस किया जा सकता है.

जान अग़ा कहते हैं, "ज़िंदा रहने के लिए आपको सिर झुकाना पड़ेगा. आप उन्हें चुनौती देने गलती नहीं कर सकते हैं. आप उनके ख़िलाफ़ कुछ नहीं कह सकते हैं. अगर वे हां कहेंगे तो आपको हां कहना होगा. जब वे ना कहेंगे तो आपको भी ना कहना होगा."

डर का ये माहौल बरकरार है.

नूरिया कहती हैं, "लोग भले ही बाहर से शांत दिखते हों लेकिन जब आप उनसे बात करेंगे तो आपको एहसास होगा कि वे किस कदर फिक्रमंद हैं. हम साथ बैठते हैं, साथ इबादत करते हैं कि खुदा उन्हें हमसे दूर रखे."

बीबीसी से बात करने वाले लोगों के नाम बदल दिए गए हैं.

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