अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के आने से भारत पर क्या असर पड़ेगा?- प्रेस रिव्यू

तालिबान

अफ़ग़ानिस्तान के बारे में सबसे निराश करने वाले अनुमानों से भी ज़्यादा तेज़ी से उसके शहरों और प्रांतों पर तालिबान का कब्ज़ा होता चला जा रहा है. तालिबान की इस मज़बूती से भारत के हितों पर पड़ने वाला प्रभाव अब साफ़ दिख रहा है.

अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिन्दू' ने 'तालिबान के बढ़ते प्रभाव का भारत पर क्या असर पड़ेगा' को लेकर एक विश्लेषण छापा है. इस विश्लेषण में कहा गया है कि सबसे पहली चिंता तो, अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद भारत के राजनयिकों, कर्मचारियों और नागरिकों के बारे में है.

हालांकि पिछले एक साल में, जब यह साफ़ हो गया कि अमेरिकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने जा रहे हैं, तब से भारत ने अपने राजनयिक उपस्थिति को वहॉं कम कर दिया.

अप्रैल 2020 में, भारत सरकार ने सुरक्षा और कोविड-19 की चिंताओं को देखते हुए, हेरात और जलालाबाद में मौजूद अपने मिशन के सभी कर्मचारियों को भारत भेज दिया था.

पिछले महीने, कंधार और मज़ार-ए-शरीफ़ के वाणिज्य दूतावासों को भी बंद कर दिया गया. वहीं अब देश में काम कर रहे अकेले मिशन काबुल दूतावास ने सभी भारतीय नागरिकों को यह कहते हुए सख़्त सलाह भेजी है कि वे जल्द से जल्द भारत लौट जाएं.

द हिन्दू ने अपने रिपोर्ट में लिखा है कि विदेश मंत्रालय ने हिंदू और सिख समुदाय के 383 से अधिक लोगों को भारत 'लौटने' में मदद कर चुका है. अख़बार के अनुसार मंत्रालय ने यह भी कहा है कि वह अफ़ग़ानिस्तान के इन दोनों अल्पसंख्यक समुदायों की मदद करेगा.

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हालांकि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर भारत सरकार का जो अडिग रुख़ देखा गया, उसे देखते हुए अब तक यह साफ़ नहीं हो सका है कि सरकार का दूसरे पीड़ित अफ़ग़ान नागरिकों को लेकर क्या रुख़ रहेगा. देखना यह है कि भारत सरकार क्या पहले की तरह अब भी अफ़ग़ानिस्तान के अन्य हज़ारों नागरिकों का अपने यहॉं स्वागत करेगा या नहीं.

अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''अफ़ग़ानिस्तान के ज़्यादातर हिस्सों पर तालिबान के फैल जाने से भारत की अन्य चिंताएं भी बढ़ गई हैं. एक चिंता तो यह है कि लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे समूहों को भारत पर हमले के लिए अब पहले से कहीं अधिक अनियंत्रित स्थान मिल जाएगा.''

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल की ओर बढ़ता तालिबान

''वहॉं तालिबान का नियंत्रण होने का यह भी मतलब है कि देश में अब पाकिस्तानी सेना और उसकी ख़ुफ़िया एजेंसियों का प्रभाव निर्णायक हो जाएगा. ऐसे में, अफ़ग़ानिस्तान में पिछले दो दशकों से चलाई गई विकास और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं में भारत की भूमिका सिमट जाएगी. हालांकि अब तक वहॉं के विकास को लेकर भारतीय प्रयासों की काफ़ी सराहना होती रही है.''

''यही नहीं, तालिबान के आने के बाद, अफ़ग़ानिस्तान से कारोबार कराची और ग्वादर बंदरगाह के ज़रिए हो सकता है. ऐसे में पाकिस्तान को दरकिनार करने के लिहाज से ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित करने के लिए किया जा रहा भारत का निवेश अब अव्यावहारिक हो सकता है. इसके अलावा, भारत के पड़ोस में कट्टरपंथ और इस्लामिक आतंकी समूहों के बढ़ने का ख़तरा पैदा हो गया है.''

भारतीय विदेश मंत्री, एस जयशंकर

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भारत के पास विकल्प क्या हैं?

अख़बार के अनुसार, इन सभी चिंताओं को देखते हुए अब भारत के पास चार विकल्प हैं. हालांकि इनमें से कोई भी विकल्प आसान नहीं है. साथ ही हर विकल्प उल्टा नतीजा भी दे सकता है.

पहला विकल्प, ये है कि काबुल में केवल लोकतांत्रिक सरकार का समर्थन करने के अपने सिद्धांत पर वह टिका रहे और वहॉं की सरकार को अंत तक राजनीतिक और मानवीय सहायता प्रदान करता रहे.

दूसरा यह हो कि, आगे जाकर अफ़ग़ान नेशनल डिफ़ेंस एंड सिक्योरिटीज़ फ़ोर्सेज़ यानी एएनडीएसएफ को संभवतः ईरान के रास्ते से गोला-बारूद और हवाई सहायता जैसी सैन्य मदद दी जाए.

तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने शुक्रवार को एनडीटीवी को दिए एक साक्षात्कार में धमकी दी कि अगर भारत ने ऐसा किया तो उसे इसके गंभीर नतीजे भुगतने होंगे.

तीसरा विकल्प, तालिबान के साथ संपर्क को तेज़ करना होगा. हालांकि, पाकिस्तान के चलते भारत को इससे अधिक लाभ होने की संभावना नहीं है. यही नहीं, सभी क्षेत्रीय और दानदाता देश पहले ही ऐसा कर चुके हैं.

आख़िरी विकल्प ये है कि, भारत 'इंतज़ार करो और देखो' वाली नीति का अनुसरण करे. समय के साथ जब यह साफ़ हो जाए कि जीत कौन रहा है, तब उसके बाद अपने क़दम उठाए. यह विकल्प उचित लगता है, लेकिन इससे बातचीत के टेबल पर भारत की प्रासंगिकता दांव पर लग जाती है.

अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य को लेकर इस सप्ताह पाकिस्तान के साथ अमेरिका-रूस-चीन के विशेष दूतों के 'ट्रॉइक-प्लस' समूह की बैठक हुई थी. लेकिन भारत को दोहा में अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य में बहुत कम हिस्सेदारी वाले दूसरे समूह में शामिल किया गया.

अफ़ग़ानिस्तान

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जेएनयू में अफ़ग़ान छात्रों में देश लौटने को लेकर भय, वीजा बढ़ाने की मांग

इस बीच भारत में नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू में अपना कोर्स ख़त्म करने जा रहे अफ़ग़ानिस्तान के छात्र अपने देश की ताज़ा स्थिति से बहुत परेशान हैं. ऐसे विद्यार्थियों को अपने देश लौटने से डर लग रहा है. द हिन्दू की ख़बर के अनुसार अफ़ग़ान छात्र चाहते हैं कि उनके वीज़ा की अवधि बढ़ा दी जाए.

अख़बार के अनुसार वर्तमान में, जेएनयू में अफ़ग़ानिस्तान के 12-13 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं. इनमें से तीन ने पिछले साल एडमिशन लिया था लेकिन वे वीज़ा हासिल न हो पाने के कारण कैंपस की क्लास में शामिल नहीं हो पाए. वहीं अगले सत्र के लिए एडमिशन की घोषणा के समय ही अफ़ग़ानिस्तान के ताज़ा हालात विद्यार्थियों को भय है कि इस अवसर का लाभ नहीं उठा पाएंगे.

स्कूल ऑफ सोशल साइंस में पढ़ रहे एक अफ़ग़ान छात्र ने बताया कि उनका एमए का कोर्स पूरा करने वाला है जबकि उनका वीज़ा अगले माह समाप्त हो रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि वह विदेशी छात्रों के लिए जेएनयू में होने वाले पीएचडी कोर्स का खर्च वहन नहीं कर सकते.

उन्होंने द हिन्दू से बताया, "मैं कोरोना महामारी के दौरान कैंपस में रहा हूँ, लेकिन कोर्स ख़त्म होने के चलते मुझे अब कैंपस छोड़ना होगा. मुझे अपने देश वापस जाने से डर लग रहा है. वहॉं की स्थिति बेहद ख़तरनाक है. मेरे परिवार ने भी मुझे सलाह दी है कि मैं अपने वीजा की अवधि बढ़ाने का प्रयास करूं.''

जेएनयू छात्र संघ, आइशी घोष

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इमेज कैप्शन, जेएनयू छात्र संघ (जेएनयूएसयू) अध्यक्ष, आइशी घोष

जेएनयू छात्र संघ कुलपति को लिखा पत्र

जेएनयू छात्र संघ (जेएनयूएसयू) ने कहा है कि वह विद्यार्थियों की मदद के लिए प्रशासन और केंद्र सरकार के सामने इस मुद्दे को उठाएंगे. जेएनयूएसयू अध्यक्ष आइशी घोष ने द हिन्दू को बताया, "पिछले साल प्रवेश पाने वाले छात्रों में से एक महिला है. उसने मदद के लिए हमसे संपर्क किया है क्योंकि उसे डर है कि अगर वह अफ़ग़ानिस्तान में रही तो उसे अपनी पढ़ाई बंद करनी पड़ सकती है.''

जेएनयूएसयू ने कुलपति को लिखे पत्र में कहा है कि तालिबान हर दिन अफ़ग़ानिस्तान में अपनी पकड़ मज़बूत कर रहा है. इसलिए संबंधित सभी विद्यार्थियों को छात्रावास सुविधा के साथ उनके वीज़ा को मंज़ूर किया जाए. हालांकि डीन ऑफ स्टूडेंट्स ने संपर्क करने के बावज़ूद कोई उत्तर नहीं दिया.

विश्वविद्यालय में पिछले साल एमए (समाजशास्त्र) में एडमिशन लेने वाली एक अफ़ग़ान छात्रा ने बताया कि उसने अपना एक सेमेस्टर ऑनलाइन पूरा कर लिया है, लेकिन वीज़ा हासिल करने के लिए वह विश्वविद्यालय की ओर से एक पत्र चाहती है, जिसका बड़ी बेसब्री से इंतज़ार कर रही है.

उन्होंने अख़बार से बताया, "मैंने जेएनयू प्रशासन को कई ईमेल, संदेश भेजकर अपने वीजा के लिए एक पत्र मांगा है. मुझे डर है कि तालिबान जल्द ही काबुल हवाई अड्डे पर हमला कर देगा. काबुल में भारतीय दूतावास ने मुझसे कहा है कि यदि मेरे पास जेएनयू का पत्र हो तो वे दो दिनों के भीतर मेरे वीजा को मंज़ूर कर देंगे. प्रशासन से मुझे इसका जवाब चाहिए.''

सीपीएम महासचिव, सीताराम येचुरी
इमेज कैप्शन, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी

टीएमसी के साथ राष्ट्रीय स्तर पर चलने को तैयार, पर बंगाल-त्रिपुरा में नहीं: येचुरी

सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने शुक्रवार को कोलकाता में बयान दिया है कि उनकी पार्टी को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के साथ राष्ट्रीय स्तर पर साथ आने में कोई समस्या नहीं है. हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया है कि उनकी पार्टी पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में ममता बनर्जी की पार्टी के साथ गठबंधन नहीं कर सकती. इस ख़बर को अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने प्रमुखता से छापा है.

सीपीएम महासचिव का यह बयान वाम मोर्चा के अध्यक्ष बिमान बोस की हाल की उस टिप्पणी के बाद आया है कि वाम दल भाजपा छोड़कर किसी भी पार्टी के साथ काम करने को तैयार हैं.

सीताराम येचुरी ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ''2004 में संसद में 61 वामपंथी सांसद थे. हमने कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन किया था जबकि इनमें से 57 ने कांग्रेस को हराया था. इसलिए विरोधियों के साथ चलना भारत के लोकतंत्र में नया नहीं है. हमने पहले भी टीएमसी के साथ भाजपा विरोधी मंच को साझा किया था. पिछली बैठक में, मैंने इस बैठक का प्रस्ताव लिखा था जबकि ममता बनर्जी ने उस पर अपने हस्ताक्षर किए थे.

वहीं त्रिपुरा के बारे में सीताराम येचुरी ने कहा, "टीएमसी ने हाल में त्रिपुरा में शुरुआत की है, जबकि हम तीन साल से वहॉं बीजेपी से लड़ रहे हैं. अब टीएमसी को अहसास हो रहा है कि बीजेपी एक फ़ासीवादी ताकत है. त्रिपुरा में टीएमसी की पहले कुछ उपस्थिति थी लेकिन उसके सभी नेता भाजपा में शामिल हो गए। तो अब देखना है कि वहॉं टीएमसी क्या करती है."

इस बीच, येचुरी ने बताया, ''हमारी पार्टी सीपीएम 20 अगस्त को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा बुलाई गई विपक्ष की बैठक में भाग लेगी. राष्ट्रीय स्तर पर 14 दल भाजपा के खिलाफ लड़ रहे हैं. यह संसद के भीतर और बाहर जारी रहेगा. यदि अन्य दल हमसे जुड़ना चाहते हैं तो, हम जरूर उनका स्वागत करेंगे.''

पेगासस विवाद और कोविड-19 महामारी को लेकर केंद्र सरकार के रुख पर निशाना साधते हुए सीताराम येचुरी ने कहा, "पेगासस जासूसी मामला न केवल निजी आजादी पर बल्कि लोकतंत्र पर भी हमला है. यही इस मामले का सबसे खतरनाक पहलू भी है. सरकार सरासर झूठ बोल रही है. ऐसी सरकार मैंने कभी नहीं देखी. 16 अगस्त से सरकार के नए मंत्री 22 राज्यों में यात्रा पर निकलेंगे और 20 हजार किमी की यात्रा करके 1,300 से अधिक जनसभाएं करेंगे. असल में, केंद्र सरकार कोरोना की तीसरी लहर को बुला रही है. इसलिए हम इस यात्रा का विरोध करते हैं. सितंबर में सभी धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ तय किए गए प्रमुख मुद्दों पर हम देशव्यापी विरोध करेंगे. देश फ़ासीवाद और हिंदुत्व की ओर बढ़ रहा है. इसलिए हमें इसका विरोध करना ही होगा.''

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